एक महीने की शांति के बाद ईरान में लौटी अशांति, अमेरिका का हमला, ईरान का काउंटर अटैक  

By Defence Detective

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लराक द्वीप ईरान

अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई एक बार फिर शुरू हो चुकी है। अमेरिका ने रविवार की रात ईरान के लराक द्वीप पर दो रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया। इसके कुछ ही समय बाद ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले का दावा किया। साथ ही संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में ड्रोन हमले की बात कही। जार्डन ने सोमवार को कहा कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने आठ ईरानी मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया। इससे पहले 29 जुलाई को अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था, उसके बाद करीब 1 महीने तक सीज़फायर चला लेकिन अब एक बार फिर दोनों एक दूसरे के ठिकानों पर हमला कर रहे हैं।

बीती जुलाई के बाद यह पहली बार है जब अमेरिका और ईरान की भिड़ंत हुई है। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लराक द्वीप और होर्मुज जलडमरूमध्य केवल सैन्य दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिए भी बेहद संवेदनशील क्षेत्र हैं। अमेरिका का कहना है कि उसने लराक पर कार्रवाई इसलिए की, क्योंकि ईरानी बल समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने की तैयारी कर रहे थे। दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई को आक्रामक हमला बताते हुए जवाबी कार्रवाई की है।

लराक द्वीप पर अमेरिका ने क्या निशाना बनाया?

30 अगस्त को अमेरिकी बलों ने हॉर्मुज स्ट्रेट के पास लराक द्वीप पर मौजूद दो लॉन्चरों को निशाना बनाया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, वहां IRGC की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा रही थी और ईरानी सैनिक ऐसे रॉकेट लॉन्च करने की तैयारी में थे जिनका इस्तेमाल होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री बारूदी सुरंगें डालने के लिए किया जा सकता था।

अमेरिका के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इस कार्रवाई को “सीमित और सटीक कार्रवाई” बताया। उसके अनुसार निशाना IRGC की माइन-लेइंग यानी समुद्र में बारूदी सुरंग बिछाने वाली गतिविधि थी, जिसे अमेरिकी सेना ने वाणिज्यिक जहाजों और समुद्री यातायात के लिए तत्काल खतरा माना। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि कार्रवाई का उद्देश्य नागरिक नाविकों, वाणिज्यिक जहाजों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मुक्त आवागमन की रक्षा करना था।

रॉयटर्स के मुताबिक, यह जुलाई के बाद ईरानी क्षेत्र पर अमेरिका की पहली ज्ञात सैन्य कार्रवाई है। ईरान की अर्ध-सरकारी तस्नीम समाचार एजेंसी ने इसे ड्रोन हमले के रूप में रिपोर्ट किया, हालांकि अमेरिकी पक्ष ने सार्वजनिक रूप से हमले के प्रत्येक परिचालन विवरण को सामने नहीं रखा।

लराक इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

लराक ईरान के दक्षिणी हिस्से में होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित छोटा लेकिन रणनीतिक द्वीप है। यह क्षेत्र फारस की खाड़ी से अरब सागर की ओर जाने वाले समुद्री मार्गों के बेहद करीब है।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। यहां सैन्य तनाव बढ़ने का सीधा असर तेल टैंकरों, समुद्री बीमा, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है। लराक की स्थिति ऐसी है कि वहां से समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना और इस क्षेत्र में सैन्य दबाव बनाना संभव है।

यही वजह है कि अमेरिका के लिए ईरान द्वारा समुद्री बारूदी सुरंगों की संभावित तैनाती गंभीर खतरा मानी जा रही है। ऐसी सुरंगें जहाजों की आवाजाही को बाधित कर सकती हैं और उन्हें हटाने के लिए लंबा सैन्य अभियान चलाना पड़ सकता है।

ईरान ने अमेरिका को क्या जवाब दिया?

अमेरिकी हमले के बाद ईरान के IRGC ने कहा कि उसने जॉर्डन में स्थित दो अमेरिकी ठिकानोंकिंग हुसैन और अल-अज्राक—को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में अल-मिन्हाद एयर बेस को ड्रोन से निशाना बनाने का दावा किया। हालांकि यूएई ने इसका खंडन किया है।

IRGC के दावे के मुताबिक, जार्डन में हमले में उन ठिकानों की तकनीकी और रखरखाव सुविधाओं तथा उन स्थानों को लक्ष्य बनाया गया जहां अमेरिकी लड़ाकू विमान तैनात थे।

इसके विपरीत जॉर्डन की सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने आठ मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया और उन्हें नागरिकों या संपत्ति के लिए खतरा बनने से पहले नष्ट कर दिया। एक अमेरिकी स्रोत के हवाले से यह भी बताया गया कि जॉर्डन की ओर आने वाली लगभग सभी मिसाइलों को रोक लिया गया और तत्काल कोई बड़ा प्रभाव सामने नहीं आया।

अमेरिका के लिए जॉर्डन क्यों अहम है?

जॉर्डन लंबे समय से अमेरिका का महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदार रहा है और वहां अमेरिकी सैन्य उपस्थिति है। जॉर्डन की भौगोलिक स्थिति भी इसे महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि यह इजरायल, सीरिया, इराक और सऊदी अरब के बीच स्थित है।

अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए जॉर्डन के एयरबेस और अन्य सुविधाएं क्षेत्रीय निगरानी, हवाई अभियानों और लॉजिस्टिक समर्थन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए ईरान द्वारा वहां अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने का प्रयास संघर्ष को केवल ईरान-अमेरिका सीमा तक सीमित नहीं रखता, बल्कि दूसरे देशों को भी सीधे जोखिम में डालता है।

इसी कारण जॉर्डन के ऊपर मिसाइलों का आना राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। यदि भविष्य में कोई मिसाइल अमेरिकी सैन्य ठिकाने के बजाय जॉर्डन के नागरिक क्षेत्र में गिरती है, तो जार्डन को जवाबी कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

क्या यह फिर से युद्ध की शुरुआत है?

अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य गतिविधियों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच तनाव को नियंत्रित रखने की कोशिशें भी चलती रही हैं। लेकिन लराक पर अमेरिकी हमला और उसके बाद जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी मिसाइल कार्रवाई बताती है कि सैन्य टकराव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

इस घटना की खासियत यह है कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की है जिसका असर होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर जॉर्डन तक दिखाई दे रहा है। यानी संघर्ष का भौगोलिक दायरा फिर से फैलने का खतरा पैदा हो गया है।

अमेरिका का तर्क है कि लराक पर हमला किसी व्यापक अभियान की शुरुआत नहीं, बल्कि समुद्री मार्ग में तत्काल खतरे को खत्म करने के लिए सीमित कार्रवाई थी। ईरान ने इसे अलग नजरिए से देखा और जवाबी हमला किया। यही अंतर आगे की स्थिति को खतरनाक बनाता है।

तेल और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

इस टकराव का सबसे बड़ा गैर-सैन्य प्रभाव ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला तेल और गैस वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

लराक पर हमला ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका पहले ही होर्मुज में समुद्री सुरक्षा और जहाजों की आवाजाही को लेकर सक्रिय है। नए सैन्य टकराव से जहाज मालिकों और ऊर्जा कंपनियों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।

रॉयटर्स के अनुसार, ताजा सैन्य तनाव के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 2.4 प्रतिशत बढ़कर 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई। इसका अर्थ है कि सैन्य संघर्ष केवल मध्य-पूर्व तक सीमित प्रभाव नहीं डालता, बल्कि भारत सहित एशिया और यूरोप के ऊर्जा आयातकों पर भी दबाव डाल सकता है।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल तीन संभावनाएं सबसे महत्वपूर्ण हैं।

पहली, अमेरिका और ईरान दोनों सीमित जवाबी कार्रवाई तक रुक सकते हैं। इससे तनाव बना रहेगा लेकिन पूर्ण युद्ध का खतरा कुछ हद तक नियंत्रित रह सकता है।

दूसरी, ईरान अमेरिकी ठिकानों या क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर और हमले कर सकता है। ऐसी स्थिति में अमेरिका के लिए जवाब देना राजनीतिक और सैन्य रूप से लगभग अनिवार्य हो सकता है।

तीसरी और सबसे खतरनाक स्थिति होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी है। यदि समुद्री बारूदी सुरंगों की तैनाती या जहाजों पर हमले वास्तव में बढ़ते हैं, तो अमेरिका के साथ-साथ दूसरे देशों की नौसेनाएं भी समुद्री सुरक्षा अभियानों में अधिक सक्रिय हो सकती हैं।

इसलिए लराक द्वीप पर अमेरिकी हमला और जॉर्डन में ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल हमला केवल दो अलग-अलग सैन्य घटनाएं नहीं हैं। इनके पीछे होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, समुद्री सुरक्षा, अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और ईरान की जवाबी क्षमता का बड़ा रणनीतिक संघर्ष मौजूद है।

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