हूतियों पर कहर बरपाने को तैयार थे अमेरिकी फाइटर जेट, लेकिन आखिरी वक्त पर क्यों पलट गए ट्रंप ?

By Defence Detective

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Donald Trump standing at plane stairs

यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच लड़ाई अब केवल यमन तक सीमित नहीं रह गई है। हूती लगातार सऊदी क्षेत्र, ऑयल फैसिलिटीज और लाल सागर के अहम रास्तों को निशाना बना रहे हैं।

हूतियों के बढ़ते हमलों ने सऊदी अरब को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां उसे अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे देशों से मदद मांगनी पड़ रही है। इसी संकट के बीच सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने 11 सितंबर को अमेरिका से हूतियों के खिलाफ सैन्य मदद मांगी थी। तब अमेरिका ने सीधे हमले से इन्कार कर दिया था।

लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की अब खबर आई है कि करीब दो हफ्ते तक सोच-विचार के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हूतियों पर हमले को तैयार हो गए थे। अमेरिकी फाइटर जेट हूतियों पर कहर बरपाने के लिए एकदम उड़ान भरने को तैयार थे, लेकिन आखिर वक्त पर हमले शुरू होने से पहले ट्रंप ने ऑपरेशन को रोक दिया।

आखिर यह घटनाक्रम कैसे हुआ, किस तरह आगे बढ़ा और आखिर में अमेरिका ने हूतियों के खिलाफ अपना सैन्य ऑपरेशन को क्यों नहीं शुरू होने दिया ?

सऊदी ने अमेरिका से कब मांगी मदद ?

8 सितंबर को हूतियों ने सऊदी अरब पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिसमें  70 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इसके बाद सऊदी अरब की मदद की अपील का सबसे पहला अहम दिन 11 सितंबर 2026 था।

रॉयटर्स के मुताबिक सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हूतियों के खिलाफ सैन्य मदद मांगी। लेकिन ट्रंप ने तत्काल अमेरिकी बमबारी को मंजूरी नहीं दी।

अमेरिका ने रियाद को खुफिया जानकारी साझा करने और टारगेटिंग में मदद देने की बात कही, मगर उस समय सीधे अमेरिकी सैन्य हमले से पीछे रहा।

14 सितंबर तक क्या था रुख ?

14 सितंबर को भी Reuters ने पुष्टि की कि ट्रंप ने सीधे अमेरिकी स्ट्राइक की अनुमति नहीं दी थी। हालांकि उस दौरान अमेरिकी CENTCOM (मिडिल-ईस्ट क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों की जिम्मेदारी संभालने वाला अमेरिकी कमांड) प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने सऊदी में MBS से मुलाकात की थी। हालांकि इसमें भी हूतियों पर सीधी कार्रवाई का कोई भरोसा नहीं था।

फिर 16 सितंबर की बैठक में क्या हुआ ?

NYT की रिपोर्ट के मुताबिक 16 सितंबर को को ट्रंप ने अपने सलाहकारों के साथ बैठक की थी। उस बैठक में ट्रंप ने साफ संकेत दिया कि वह हूतियों पर अमेरिकी एयरस्ट्राइक के पक्ष में नहीं हैं।  यानी 11–16 सितंबर तक ट्रंप इस मुद्दे पर सोच-विचार करते रहे। और इस दुविधा में अमेरिकी प्रशासन में सीधे सैन्य हस्तक्षेप को लेकर चिंता थी। लेकिन अगले ही दिन घटनाक्रम पूरी तरह बदल गया।

कैसे बदल गई पूरी तस्वीर ?

मोहम्मद बिन सलमान ने  17 सितंबर को फिर ट्रंप को फोन किया और यहीं से कहानी पलटने लगी। सलमान ने इस बार फिर व्यक्तिगत रूप से ट्रंप से हूतियों के खिलाफ अमेरिकी हस्तक्षेप करने की अपील की। उनकी चिंता थी कि हूती तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और सऊदी की स्थिति बिगड़ रही है।

यहीं ट्रंप का पहला बड़ा यू-टर्न हुआ। फोन रखने के बाद ट्रंप ने अपना रुख बदल दिया। उन्होंने पेंटागन को हूतियों के खिलाफ हवाई हमले की तैयारी करने का आदेश दे दिया।

अमेरिका ने हूतियों पर हमले की क्या तैयारी की ?

ट्रंप का आदेश केवल मौखिक नहीं था।  अमेरिका ने वास्तव में हमले की तैयारी शुरू कर दी NYT के मुताबिक अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने:

  • हूतियों के ठिकानों की टारगेट लिस्ट तैयार की
  • उन लक्ष्यों को मंजूरी दी
  • मिशन के लिए अमेरिकी युद्धक विमानों को सेलेक्ट किया
  • विमानों में बम लोड करना शुरू किया
  • हमला शुरू करने की तैयारी पूरी कर दी

और रविवार यानी 20 सितंबर तक अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन शुरू होने के बिल्कुल करीब पहुंच चुका था। फिर आया ट्रंप का सबसे बड़ा यू-टर्न।

क्या था ट्रंप का वह यू-टर्न ?

20 सितंबर को दोपहर तक ट्रंप ने दोबारा अपना फैसला बदल दिया। NYT के मुताबिक हमले की लहर शुरू होने ही वाली थी, लेकिन ट्रंप ने ऐन मौके पर ऑपरेशन को रोक दिया।

20 सितंबर को सुबह Fox News से फोन पर बातचीत में ट्रंप ने ईरान युद्ध के बारे में कहा कि वह अभी “deciding mode” में हैं। हूतियों के मामले में उन्होंने यह कहा कि अमेरिका उनके साथ लगातार संपर्क में है और हूतियों ने अभी तक अमेरिका के खिलाफ लड़ने से परहेज किया है।

यही बात इस फैसले को समझने में सबसे महत्वपूर्ण है।

हूती सऊदी पर हमला कर रहे थे, लेकिन अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बना रहे थे। इसलिए ट्रंप के सामने सवाल था कि क्या सऊदी की रक्षा के लिए अमेरिका को हूतियों के खिलाफ एक नया युद्ध अभियान शुरू करना चाहिए। और आखिरकार हूतियों के खिलाफ अमेरिकी ऑपरेशन नहीं शुरू हुआ।

ट्रंप ने आखिर हमला क्यों रोका?

आखिर ऐसा क्या हुआ कि सऊदी की अपील पर पहले अमेरिका पीछे रहा, फिर हमले के लिए पूरी सैन्य तैयारी की और आखिरी समय में फिर रुक गया। अमेरिका की ओर से सार्वजनिक तौर पर इस फैसले की कोई एक आधिकारिक वजह घोषित नहीं की गई है। इसलिए किसी एक कारण को निश्चित तथ्य बताना ठीक नहीं होगा।

लेकिन  इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सऊदी पर हूतियों के बढ़ते हमले, बाब-अल-मंदेब पर उनकी बढ़त, अमेरिका का ईरान के साथ पहले से चल रहा युद्ध और हूतियों के साथ अमेरिकी संपर्क, जैसी सभी कड़ियां जुड़ी हुई हैं।

1.  अमेरिका पहले ही ईरान युद्ध में व्यस्त

अमेरिका पहले से ईरान के साथ लंबे सैन्य संघर्ष में है। अमेरिकी हथियारों और इंटरसेप्टर भंडार पर भी इसका दबाव पड़ा है। AP ने सऊदी की एयर डिफेंस मदद की जरूरत को अमेरिकी इंटरसेप्टर भंडार में आई कमी से भी जोड़ा है। ऐसे में हूतियों के खिलाफ एक नया अमेरिकी एयर अभियान शुरू करना अतिरिक्त सैन्य संसाधन मांगता।

 ट्रंप के अधिकांश करीबी सलाहकार सऊदी की हूतियों वाली लड़ाई में सीधे शामिल होने को लेकर गंभीर रूप से उलझन या विरोध में थे। मुख्य चिंता थी कि इससे अमेरिका के सामने ईरान के साथ चल रहे युद्ध के अलावा एक नया मोर्चा खुल जाएगा।  

2. अमेरिका और हूतियों के बीच सीधी बातचीत भी हुई

AP के मुताबिक हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने बताया कि ओमान की मध्यस्थता से अमेरिका और हूतियों के बीच बातचीत हुई थी। हूती पक्ष ने अमेरिका को यह आश्वासन देने की बात कही कि वह अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाएगा और उसका मुख्य निशाना सऊदी से जुड़ा रहेगा।

3. सवाल यह भी था कि क्या एयरस्ट्राइक से हूती वास्तव में रुकेंगे?

2025 में अमेरिका ने हूतियों पर 50 दिनों से ज्यादा तक बमबारी की थी और 1,000 से ज्यादा लक्ष्यों को निशाना बनाया था। फिर भी हूती पूरी तरह खत्म नहीं हुए।  इसलिए सवाल था कि अगर अमेरिका दोबारा बम गिराता है, तो क्या इस बार हूती वास्तव में पीछे हट जाएंगे?

इसका जवाब अमेरिकी अधिकारियों के बीच भी स्पष्ट नहीं था।

4. हमला हूतियों को अमेरिका के खिलाफ भी कर सकता था

अभी हूती अमेरिकी जहाजों से सीधे टकराव से बच रहे थे। अमेरिकी हमला शुरू होने पर स्थिति बदल सकती थी। हूती फिर अमेरिकी जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर सकते थे और बाब-अल-मंदेब में समुद्री संकट और बढ़ सकता था

इस बीच सऊदी ने दूसरे देशों से भी मदद मांगी

अमेरिका के रुख में असमंजस के बीच सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा और क्षमता मजबूत करने के लिए दूसरे देशों की तरफ भी देखा। रिपोर्टों के मुताबिक रियाद ने ब्रिटेन, फ्रांस, पाकिस्तान और मिस्र जैसे देशों से सहायता चाही। इजरायल से खुफिया मदद की आस लगाई। लेकिन आखिरकार कुछ नहीं मिला।

हूती सऊदी के किन इलाकों को निशाना बना रहे हैं?

 अमेरिका के इस रुख के बीच 19 सितंबर को संकट का सबसे बड़ा संकेत सऊदी राजधानी रियाद से आया। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के मुताबिक हूतियों ने रियाद की ओर बैलिस्टिक मिसाइल दागी, जिसे एयर डिफेंस ने रोक दिया। इसके बाद रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास काला धुआं दिखाई दिया।

गौरतलब है कि सितंबर में हूतियों के हमले सऊदी के दक्षिणी हिस्सों से लेकर महत्वपूर्ण सैन्य और ऊर्जा ठिकानों तक पहुंचे। खमिस मुशैत, अबहा, जिजान और नजरान जैसे इलाकों को मिसाइल और ड्रोन हमलों के निशाने पर रखा गया। हूतियों ने सऊदी के किंग खालिद एयर बेस जैसे सैन्य ठिकानों पर हमले का दावा भी किया।

16 सितंबर के आसपास सऊदी ने हूतियों पर मक्का की ओर ड्रोन भेजने का आरोप लगाया। लेकिन हूतियों ने साफ तौर पर इस आरोप से इनकार किया।

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