हूतियों के हमलों से घिरा सऊदी अरब, अब लगाई इजरायल से गुहार

By Defence Detective

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यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार बढ़ते हमलों ने सऊदी अरब के सामने एक बड़ी सुरक्षा चुनौती खड़ी कर दी है। इसके बीच सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों से निपटने के लिए इजरायल से खुफिया मदद मांगी है। रिपोर्टों के मुताबिक दोनों देशों के बीच संपर्क सीधे नहीं, बल्कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) की मध्यस्थता से हुआ है। फिलहाल बातचीत का मुख्य फोकस हूतियों की गतिविधियों से जुड़ी इंटेलिजेंस और सुरक्षा सहयोग पर है, न कि इजरायली सैनिकों की सऊदी अरब में तैनाती पर।

यह घटनाक्रम इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब और इजरायल के बीच अभी फॉर्मल राजनयिक संबंध नहीं हैं। इसके बावजूद हूतियों का बढ़ता खतरा रियाद को ऐसे देश से मदद लेने की दिशा में ले जा रहा है, जिसके साथ उसके रिश्ते लंबे समय से बेहद संवेदनशील रहे हैं। यह कदम क्षेत्र की एक बदलती रणनीतिक तस्वीर को दिखाता है।

हूतियों की कितनी बड़ी चुनौती ?

यमन के ईरान-समर्थित हूती समूह ने हाल के दिनों में सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल हमले तेज कर दिए हैं। 15 सितंबर को भी हूतियों ने सऊदी ठिकानों को निशाना बनाया और खमीस मुशैत क्षेत्र के सैन्य ठिकाने पर हमला किया। ताजा हमलों में 13 नागरिकों के घायल होने की Reuters ने पुष्टि की है।

खतरा सिर्फ मिसाइल और ड्रोन हमलों तक सीमित नहीं है।

  • हूती यमन के लाल सागर तट पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
  • उन्होंने रणनीतिक पेरिम द्वीप और मोखा क्षेत्र पर कब्जे की दिशा में बड़ी बढ़त बनाई है।
  • इससे बाब-अल-मंदेब समुद्री मार्ग पर दबाव बढ़ गया है।
  • यह मार्ग लाल सागर और हिंद महासागर के बीच जहाजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
  • सऊदी के लिए इसका सीधा असर उसके तेल निर्यात और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है।

यानी रियाद को अब एक साथ हवाई हमलों, मिसाइल-ड्रोन खतरे, समुद्री मार्ग और तेल बुनियादी ढांचे की सुरक्षा करनी पड़ रही है।

इजरायल से मदद मांगने की जरूरत क्यों?

इजरायल को मिसाइल, ड्रोन, रॉकेट और लो-फ्लाइंग हवाई खतरों की पहचान तथा उनसे निपटने का लंबा अनुभव है। लेकिन मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार सऊदी की तत्काल जरूरत इजरायली सेना को बुलाना नहीं, बल्कि हूतियों के बारे में बेहतर खुफिया जानकारी हासिल करना है।

इजरायल के पास क्षेत्र में निगरानी और खुफिया क्षमताओं का बड़ा नेटवर्क है। इसलिए सऊदी के लिए ऐसी जानकारी उपयोगी हो सकती है जिससे—

  • हूतियों के लॉन्च एरिया का पता लगाया जा सके।
  • मिसाइल और ड्रोन गतिविधियों की पहले जानकारी मिले।
  • बाब-अल-मंदेब में हूती गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।
  • सऊदी एयर डिफेंस को संभावित हमले के लिए पहले से तैयार किया जा सके।

और सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस संपर्क को अमेरिकी CENTCOM ने facilitate किया

फिर पाकिस्तान का ‘मक्का पैक्ट’ कहां गया?

यहीं से सऊदी की परेशानी समझ में आती है। अगस्त में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का डिफेंस पैक्ट किया था। समझौते की मुख्य व्यवस्था यह है कि तीनों में से किसी एक पर हमला होने को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इस समझौते को लेकर इसे कई जगह “इस्लामिक NATO” तक कहा गया। लेकिन हूतियों के हमलों ने पहली बार इस पैक्ट पर सवालिया निशान लगा दिया है।

सवाल सीधा है कि सऊदी पर हमला हुआ है तो पाकिस्तान और तुर्की कब आगे आएंगे?

पाकिस्तान ने पहले कहा था—जरूरत पड़ी तो पैक्ट लागू होगा

8 सितंबर को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संकेत दिया था कि अगर सऊदी पर हमले जारी रहते हैं तो मक्का समझौता एक्टिव हो सकता है। इससे लगा कि पाकिस्तान जरूरत पड़ने पर सऊदी की सैन्य मदद के लिए आगे आ सकता है।

लेकिन दो दिन बाद पाकिस्तान का आधिकारिक रुख काफी सावधानी वाला हो गया।

फिर पाकिस्तान पीछे क्यों हुआ?

10 सितंबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि हूती हमलों के जवाब में मक्का समझौते के तहत फिलहाल किसी सैन्य अभियान पर चर्चा नहीं हुई है।

उन्होंने यह जरूर कहा कि समय आने पर पाकिस्तान समझौते के तहत कार्रवाई करेगा।

यानी पाकिस्तान ने समझौते से पीछे हटने की घोषणा नहीं की है।

लेकिन उसने यह भी नहीं कहा कि वह अभी सऊदी की तरफ से यमन में सैनिक भेज रहा है।

पाकिस्तान की सबसे बड़ी मजबूरी ?

पाकिस्तान के लिए हूतियों पर फैसला भी आसान नहीं है। एक तरफ उसका बेहद महत्वपूर्ण सुरक्षा और आर्थिक साझेदार सऊदी अरब है।

तो दूसरी तरफ उसकी लंबी सीमा ईरान से लगती है।

और हूतियों को ईरान का प्रमुख क्षेत्रीय सहयोगी माना जाता है। Reuters के अनुसार पाकिस्तान ने ईरान को हूतियों को सऊदी अरब पर हमले रोकने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने को कहा है।

इसलिए इस्लामाबाद के सामने सीधा संकट है—

सऊदी की रक्षा करे तो ईरान के साथ तनाव बढ़ सकता है, और ईरान से रिश्ते बचाए तो सऊदी के साथ किए रक्षा वादे पर सवाल उठ सकते हैं।

तुर्की भी क्यों नहीं कूदा?

मक्का समझौते में पाकिस्तान के साथ तुर्की भी शामिल है। लेकिन सऊदी पर हूती हमलों के बाद तुर्की की तरफ से भी ऐसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई सामने नहीं आई है जिससे यह लगे कि समझौते का सामूहिक रक्षा प्रावधान तुरंत सक्रिय हो गया है।

फिलहाल मक्का पैक्ट पहली बड़ी क्षेत्रीय सुरक्षा परीक्षा से गुजर रहा है और अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इसके सामूहिक रक्षा प्रावधान व्यवहार में किस स्तर तक लागू किए जाएंगे।

ईरान क्या कर रहा है?

ईरान इस पूरे संकट का दूसरा बड़ा खिलाड़ी है। यमन के हूती ईरान के साथ रणनीतिक रूप से जुड़े हुए हैं और तेहरान लंबे समय से उन्हें सैन्य, वित्तीय और तकनीकी सहायता देने वाला प्रमुख शक्ति केंद्र माना जाता है। हालांकि ईरान सीधे हूती अभियानों को नियंत्रित करने से इनकार करता रहा है।

इसलिए सऊदी पर हूती हमले बढ़ने का मतलब सिर्फ सऊदी-हूती टकराव नहीं है।

इसके पीछे व्यापक सऊदी-ईरान शक्ति संघर्ष भी दिखाई देता है।

और पाकिस्तान की समस्या यही है कि वह सऊदी का रक्षा साझेदार होते हुए भी ईरान से पूरी तरह टकराव नहीं चाहता।

अमेरिका से मदद मांगने पर क्या हुआ?

सऊदी के लिए अमेरिका सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदारों में से एक है। ऐसे में यह सवाल भी उठा कि रियाद सीधे अमेरिका से बड़ी सैन्य कार्रवाई क्यों नहीं करवा रहा?

मौजूदा घटनाक्रम में अमेरिका का रोल मुख्य रूप से सुरक्षा सहयोग, खुफिया मदद और क्षेत्रीय कोऑर्डिनेशन तक दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सऊदी और हूती नेतृत्व के साथ संपर्क की पुष्टि की है और क्षेत्रीय तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश की है। Reuters के मुताबिक अमेरिकी रोल अभी उस स्तर की सीधी सैन्य कार्रवाई तक नहीं पहुंची है जिसकी सऊदी को जरूरत हो सकती है।

14 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी CENTCOM प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर से भी क्षेत्रीय घटनाक्रम पर चर्चा की थी।

यानी अमेरिका मौजूद है, लेकिन रियाद को हर मोर्चे पर अमेरिकी सैनिकों के भरोसे रहने का विकल्प नहीं मिल रहा।

आखिर में सऊदी, इजरायल के पास ?

यहीं पूरी कहानी वापस इजरायल पर आती है। अगर अमेरिका से सीधे बड़े सैन्य हस्तक्षेप की गारंटी नहीं मिल रही, पाकिस्तान तत्काल सैनिक नहीं भेज रहा और ईरान हूतियों के पीछे खड़ा दिखाई दे रहा है, तो सऊदी को अपनी इंटेलिजेंस और एयर-डिफेंस तैयारी मजबूत करनी होगी।

इजरायल इस क्षेत्र में इसी तरह की क्षमताओं के कारण उपयोगी साझेदार बन सकता है। इसलिए सऊदी का इजरायल से संपर्क एक बड़ा राजनीतिक संकेत जरूर है।

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