रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 8 सितंबर को तीन दिवसीय पर श्रीलंका पहुंचे। 10 सितंबर तक चलने वाली इस यात्रा का मकसद भारत और श्रीलंका के बीच रक्षा तथा समुद्री सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करना है। यह यात्रा इसलिए भी खास है क्योंकि करीब 38 साल बाद कोई भारतीय रक्षा मंत्री श्रीलंका पहुंचा है। इससे पहले 1988 में तत्कालीन रक्षा मंत्री के.सी. पंत ने श्रीलंका का दौरा किया था।
इस यात्रा का सबसे अहम रक्षा पहलू श्रीलंका की एयर डिफेंस वेपन खरीद से जुड़ा है। दोनों देशों के बीच तीन नए रक्षा समझौतों पर सहमति बनने की उम्मीद है। यही नहीं दोनों देश पिछले साल हुए व्यापक रक्षा सहयोग समझौते की भी समीक्षा करेंगे।
इस डील का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि श्रीलंका लंबे समय से अपनी मौजूदा एयर डिफेंस क्षमता को बनाए रखने और आधुनिक बनाने की जरूरत महसूस कर रहा है। श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिथा हेराथ के अनुसार, भारत ने 2000 से 2006 के बीच श्रीलंका एयर फोर्स को 40 मिमी L-70 एयर डिफेंस गनों की 24 यूनिट उपलब्ध कराई थीं।
इनमें से 18 गनों का रखरखाव भारत पहले ही मुफ्त में कर चुका है। अब बाकी छह L-70 गनों के लिए भी भारत मुफ्त में मेंटेनेंस सपोर्ट देगा।
यानी राजनाथ सिंह की यात्रा में एयर डिफेंस से जुड़ा समझौता केवल नई हथियार खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रीलंका के मौजूदा एयर डिफेंस हथियारों को ऑपरेशनल बनाए रखने पर भी फोकस है।
राजनाथ की यात्रा कितनी महत्वपूर्ण ?
भारत के लिए श्रीलंका की अहमियत सिर्फ पड़ोसी देश होने तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर की समुद्री सुरक्षा, भारत के दक्षिणी तट की सुरक्षा, चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियों, व्यापार, ऊर्जा और कनेक्टिविटी—इन सभी को जोड़ें तो श्रीलंका भारत की रणनीतिक नीति का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
श्रीलंका हिंद महासागर के बीचोंबीच ऐसी जगह स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग गुजरते हैं। भारत के दक्षिणी तट से इसकी भौगोलिक निकटता इसे भारतीय सुरक्षा के लिए और महत्वपूर्ण बना देती है।
इस यात्रा को सिर्फ हथियारों की बातचीत तक सीमित नहीं रखा गया है। राजनाथ सिंह श्रीलंकाई नेतृत्व के साथ कई मुद्दों पर बातचीत करेंगे और उनके साथ रक्षा तथा विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का डेलिगेशन भी है। बातचीत का प्रमुख आधार मजबूत समुद्री और रक्षा साझेदारी है।
| पहलू | श्रीलंका का महत्व | भारत के लिए असर |
|---|---|---|
| भौगोलिक स्थिति | भारत के दक्षिण में, हिंद महासागर के बीच महत्वपूर्ण स्थान | भारत के दक्षिणी समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा |
| भारत से निकटता | तमिलनाडु के बेहद करीब | समुद्री/हवाई निगरानी के लिए महत्वपूर्ण |
| समुद्री मार्ग | हिंद महासागर के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट | ऊर्जा व व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा |
| कोलंबो पोर्ट | क्षेत्र का प्रमुख ट्रांसशिपमेंट हब | भारत के पश्चिमी/दक्षिणी समुद्री व्यापार से जुड़ा |
| हंबनटोटा | हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाह | चीन की मौजूदगी के कारण सुरक्षा चिंता |
| त्रिंकोमाली | गहरा प्राकृतिक बंदरगाह | नौसैनिक/ऊर्जा रणनीति में महत्व |
| Maritime Domain Awareness | समुद्र में जहाजों की गतिविधियों पर नजर | भारत की समुद्री निगरानी मजबूत |
| चीन का कारक | चीन की आर्थिक/बंदरगाह परियोजनाएं | भारत के लिए रणनीतिक प्रतिस्पर्धा |
तीन नए MoU में क्या-क्या?
इस यात्रा की सबसे अहम संभावित उपलब्धि तीन नए रक्षा MoU माने जा रहे हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण समझौता एयर-डिफेंस गनों की संभावित आपूर्ति से जुड़ा है। श्रीलंका अपनी हवाई सुरक्षा क्षमता को मजबूत करना चाहता है और इसी संदर्भ में भारत से एयर-डिफेंस गन लेने की बात सामने आई है। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में अभी किसी खास गन का नाम, संख्या या अंतिम कीमत सार्वजनिक नहीं की गई है।
दूसरा समझौता भारत और श्रीलंका के National Cadet Corps के बीच सहयोग को बढ़ाने से संबंधित है। इसमें कैडेटों के आदान-प्रदान, संयुक्त प्रशिक्षण और नेतृत्व कार्यक्रमों जैसी गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा सकता है। श्रीलंका के कैडेट कॉर्प्स और भारत के NCC के बीच पहले से चल रहे युवा आदान-प्रदान को संस्थागत रूप देने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण है।
तीसरा MoU Sri Lanka Defence College और भारत के रक्षा शिक्षण संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने से जुड़ा है। इसका मतलब केवल सैन्य अधिकारियों को प्रशिक्षण देना नहीं है, बल्कि रणनीतिक अध्ययन, नेतृत्व, सैन्य योजना और पेशेवर सैन्य शिक्षा में दोनों देशों के संस्थानों के बीच संपर्क बढ़ाना भी है।
गन आधारित एयर डिफेंस का फायदा यह है कि इसका इस्तेमाल कम ऊंचाई पर आने वाले हवाई खतरों, ड्रोन और अन्य लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है। श्रीलंका के लिए ऐसी क्षमता विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि उसकी सुरक्षा जरूरतें भारत या चीन जैसी बड़ी सैन्य शक्तियों के स्तर की नहीं हैं। उसे अपेक्षाकृत कम लागत में महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करने वाली प्रणालियों की जरूरत है।
भारत की मदद का व्यापक ढांचा हो सकता है:
| क्षेत्र | भारत की भूमिका |
|---|---|
| Air Defence | सिस्टम/तकनीकी सहयोग |
| Navy | Training + ships + maritime cooperation |
| Surveillance | Maritime surveillance |
| Radar | समुद्री/हवाई निगरानी |
| Coast Guard | क्षमता निर्माण |
| Training | Sri Lankan military officers की ट्रेनिंग |
| HADR- Humanitarian Assistance and Disaster Relief | आपदा राहत |
| Logistics | समुद्री सुरक्षा सहयोग |
| Defence Industry | भारतीय रक्षा उत्पादों की आपूर्ति |
पिछले समझौते का अगला चरण ?
इन नए MoU को समझने के लिए अप्रैल 2025 में हुए भारत-श्रीलंका रक्षा सहयोग समझौते को देखना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रीलंका यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा सहयोग पर एक व्यापक MoU किया था। इसमें सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास, रक्षा संवाद, समुद्री सहयोग और श्रीलंका की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए प्लेटफॉर्म और उपकरण उपलब्ध कराने जैसे क्षेत्र शामिल थे।
अब राजनाथ सिंह की यात्रा उसी ढांचे को जमीन पर आगे बढ़ाने का प्रयास दिखाई देती है। भारत और श्रीलंका पहले से Mitra Shakti जैसा सैन्य अभ्यास करते हैं। नौसैनिक स्तर पर SLINEX के जरिए दोनों देशों की नौसेनाएं संयुक्त अभ्यास करती हैं। 2025 के Mitra Shakti अभ्यास में ड्रोन और Counter-UAS जैसी क्षमताओं से जुड़े प्रशिक्षण भी शामिल थे।
इसका अर्थ है कि सहयोग अब केवल पारंपरिक सैन्य अभ्यास तक सीमित नहीं है। दोनों देश ड्रोन, समुद्री निगरानी, प्रशिक्षण और आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों पर भी साथ काम कर रहे हैं।
हिंद महासागर में चीन के लिए क्या संदेश है?
खास बात यह है कि राजनाथ का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब हिंद महासागर में चीन की सैन्य और समुद्री मौजूदगी लगातार भारत की रणनीतिक चिंता बनी हुई है। श्रीलंका यात्रा का सबसे बड़ा रणनीतिक पहलू यहीं सामने आता है।
भारत और चीन के बीच हिंद महासागर को लेकर प्रतिस्पर्धा नई नहीं है। चीन ने श्रीलंका में बंदरगाह और समुद्री बुनियादी ढांचे से जुड़े कई प्रोजेक्ट विकसित किए हैं। हंबनटोटा बंदरगाह और कोलंबो पोर्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट इस व्यापक रणनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। चीन के शोध और सर्वेक्षण जहाजों की श्रीलंका से जुड़ी गतिविधियों ने भी नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ाई हैं।
ऐसे माहौल में भारत का संदेश यह है कि श्रीलंका की सुरक्षा और हिंद महासागर की स्थिरता में भारत की भूमिका केंद्रीय बनी रहेगी। नई दिल्ली यह सुनिश्चित करना चाहती है कि उसके सबसे नजदीकी समुद्री पड़ोसी के साथ सुरक्षा संबंध इतने मजबूत हों कि किसी बाहरी शक्ति की बढ़ती मौजूदगी भारत के रणनीतिक हितों को कमजोर न कर सके।
2025 में दोनों देशों ने यह भी दोहराया था कि श्रीलंका की जमीन का इस्तेमाल भारत की सुरक्षा के लिए नुकसानदेह गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। दोनों देशों ने हिंद महासागर को स्वतंत्र, खुला, सुरक्षित और स्थिर रखने की प्रतिबद्धता भी जताई थी।
हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी मौजूदगी –
| क्षेत्र/ठिकाना | चीन की मौजूदगी | प्रमुख विशेषता | भारत की नजर क्यों |
| जिबूती | PLA Support Base | 2017 से चीन का पहला और अब तक प्रमुख विदेशी सैन्य अड्डा; जहाजों, हेलीकॉप्टरों और लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए उपयोग | पश्चिमी हिंद महासागर और अदन की खाड़ी में चीनी नौसैनिक पहुंच मजबूत करता है |
| ग्वादर, पाकिस्तान | चीनी निवेश वाला रणनीतिक बंदरगाह | CPEC का समुद्री सिरा; भविष्य में चीनी नौसेना के लॉजिस्टिक/सपोर्ट उपयोग की संभावना पर लगातार चर्चा | अरब सागर में पाकिस्तान-चीन सहयोग को भारत के करीब लाता है। |
| हंबनटोटा, श्रीलंका | चीनी संचालित वाणिज्यिक बंदरगाह | बंदरगाह चीन को दीर्घकालिक लीज पर मिला; फिलहाल इसे चीनी नौसैनिक अड्डा कहना सही नहीं | भारत के दक्षिण में चीन की आर्थिक और समुद्री पहुंच बढ़ाता है |
| कोलंबो पोर्ट/पोर्ट सिटी | बड़ा चीनी निवेश | वाणिज्यिक और वित्तीय गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र | श्रीलंका में चीन के दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव का आधार |
| म्यांमार का समुद्री क्षेत्र | बंदरगाह/इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग | बंगाल की खाड़ी की दिशा में चीन की रणनीतिक पहुंच बढ़ाने वाला क्षेत्र | भारत के पूर्वी समुद्री क्षेत्र और अंडमान-निकोबार के करीब रणनीतिक महत्व |
| बांग्लादेश | बंदरगाह और रक्षा सहयोग | चीन का आर्थिक तथा सैन्य-तकनीकी सहयोग; समुद्री बुनियादी ढांचे में निवेश | बंगाल की खाड़ी में चीनी प्रभाव का विस्तार |
| समुद्री अनुसंधान/सर्वेक्षण जहाज | हिंद महासागर में गतिविधियां | समुद्र की गहराई, समुद्री भूगोल और पर्यावरण संबंधी डेटा जुटाने की क्षमता | ऐसे डेटा का सैन्य उपयोग भी संभव होने के कारण भारत सतर्क रहता है |
| चीनी नौसेना के युद्धपोत | हिंद महासागर में नियमित तैनाती/गतिविधियां | Anti-piracy missions से आगे बढ़कर लंबी दूरी की naval operations | चीन की far-seas naval capability का संकेत |
| पनडुब्बियां | हिंद महासागर में तैनाती का इतिहास | चीन ने इस क्षेत्र में submarine deployments भी किए हैं | भारत के समुद्री निगरानी तंत्र के लिए चुनौती |
| COSCO/चीनी समुद्री नेटवर्क | वैश्विक commercial shipping network | चीन की बड़ी shipping कंपनियां दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों तक पहुंच रखती हैं | हालिया अमेरिकी आरोपों के अनुसार कुछ चीनी commercial vessels से signals intelligence collection की आशंका जताई गई है; चीन ने आरोप खारिज किए हैं |
L-70 गनों की क्या है खासियत ?
L-70 मूल रूप से स्वीडन की Bofors कंपनी की विकसित की गई 40 मिमी एंटी-एयरक्राफ्ट गन है। यह पुरानी डिजाइन होने के बावजूद कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों और ड्रोन जैसे खतरों के खिलाफ उपयोगी रही है।
| खासियत | L-70 |
|---|
| प्रकार | 40 मिमी एंटी-एयरक्राफ्ट गन |
| निर्माता | Bofors, Sweden |
| भूमिका | लो-लेवल एयर डिफेंस |
| कैलिबर | 40 मिमी |
| फायरिंग रेट | लगभग 240 राउंड/मिनट |
| प्रभावी ऊंचाई | लगभग 3–4 किमी तक, संस्करण/फायर-कंट्रोल पर निर्भर |
| गोला-बारूद | 40 मिमी एंटी-एयरक्राफ्ट राउंड |
| लक्ष्य | हेलीकॉप्टर, विमान, ड्रोन और अन्य कम ऊंचाई वाले हवाई लक्ष्य |
| खासियत | तेज फायरिंग, अपेक्षाकृत सरल संचालन और भरोसेमंद डिजाइन |








