नया रक्षा समझौता : जापान की हाइपरसोनिक मिसाइलों का ऑस्ट्रेलिया में होगा परीक्षण

By Defence Detective

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Australia and Japan defence ministers Richard Marles and Shinjiro Koizumi during talks on defence cooperation and hypersonic missile testing

जापान और ऑस्ट्रेलिया ने अपने रक्षा सहयोग को एक नए और अधिक रणनीतिक स्तर पर ले जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। दोनों देशों के बीच एक नए रक्षा समझौते के तहत जापान ऑस्ट्रेलियाई धरती पर हाइपरसोनिक मिसाइलों का परीक्षण करेगा। मंगलवार को कैनबरा में ऑस्ट्रेलियाई रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स और जापान के रक्षा मंत्री शिंजीरो कोइजुमी ने संयुक्त रूप से इस व्यवस्था की घोषणा की।

जापान को आने वाले दशक में ऑस्ट्रेलिया के मिसाइल परीक्षण रेंज का इस्तेमाल करने के लिए एक बेहतर और विस्तारित व्यवस्था विकसित की जाएगी। इसमें जापान के हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम तथा अन्य लंबी दूरी के सटीक हमलावर हथियारों के परीक्षण की संभावना शामिल है।

हालांकि, इस घटनाक्रम को समझने में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अभी जापानी हाइपरसोनिक मिसाइलों के किसी निश्चित परीक्षण की तारीख या विशेष रेंज की घोषणा नहीं हुई है। आधिकारिक बयान के अनुसार दोनों देश ऐसी व्यवस्था को आगे बढ़ाने और उसे लागू करने के लिए बातचीत तेज करेंगे। जापान के रक्षा मंत्री शिंजीरो कोइजुमी ने इसे संभावित रूप से “groundbreaking development” बताया है।

यह व्यवस्था जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग को बड़े पैमाने पर बढ़ाने का हिस्सा है, क्योंकि दोनों देश इंडो-पैसिफिक में बदलते सुरक्षा माहौल का सामना कर रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया क्यों बन रहा है जापान के लिए अहम टेस्टिंग ग्राउंड?

जापान के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्याओं में से एक है—अपने लंबी दूरी के हथियारों के परीक्षण के लिए पर्याप्त विशाल और सुरक्षित क्षेत्र। जापान भौगोलिक रूप से सीमित भूभाग वाला देश है और उसकी आबादी वाले क्षेत्रों के कारण बड़े पैमाने पर मिसाइल परीक्षण के लिए उपलब्ध स्थान सीमित हैं।

इसके मुकाबले ऑस्ट्रेलिया के पास विशाल, कम आबादी वाले क्षेत्र और बड़े सैन्य परीक्षण क्षेत्र हैं। इसलिए कैनबरा द्वारा टोक्यो को अपनी परीक्षण सुविधाओं तक अधिक व्यवस्थित पहुंच देना जापान की अगली पीढ़ी की लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता के विकास को तेज कर सकता है।

ऑस्ट्रेलियाई रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स ने कहा कि दोनों देश अगले दशक में विभिन्न मिसाइल क्षमताओं के लिए ऑस्ट्रेलियाई परीक्षण रेंज के जापानी इस्तेमाल को लेकर “बेहतर और विस्तारित व्यवस्था” को आगे बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने इसे जापान को ऑस्ट्रेलिया की ओर से मिलने वाली “strategic depth” का हिस्सा बताया।

जापान की हाइपरसोनिक महत्वाकांक्षा

टोक्यो पिछले कुछ वर्षों से अपनी पारंपरिक लंबी दूरी की मारक क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है। जापान के रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रम में Stand-off Defense Capabilities को विशेष महत्व दिया गया है। जापान के 2026 रक्षा बजट दस्तावेजों में Hyper Velocity Gliding Projectile (HVGP), उन्नत Type-12 Surface-to-Ship Missile और अलग हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम शामिल हैं। जापानी रक्षा मंत्रालय के अनुसार हाइपरसोनिक मिसाइलें Mach 5 से अधिक गति पर उड़ती हैं और उनकी उच्च गति के कारण उन्हें इंटरसेप्ट करना कठिन होता है।

टोक्यो ने HVGP के परीक्षण पहले ही शुरू कर दिए हैं। इसके अलावा जापान उन्नत हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणाली विकसित कर रहा है। ऐसे हथियारों के विकास में केवल मिसाइल बनाना पर्याप्त नहीं होता; उन्हें विभिन्न परिस्थितियों, उड़ान प्रोफाइल और लंबी दूरी पर सटीकता के लिए लगातार परीक्षण करना पड़ता है।

यही वह क्षेत्र है जहां ऑस्ट्रेलिया जापान के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

चीन और उत्तर कोरिया कितना बड़ा फैक्टर ?

जापान-ऑस्ट्रेलिया रक्षा सहयोग में चीन का नाम हर बयान में सीधे नहीं लिया जाता, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण की चर्चा में चीन की सैन्य शक्ति विस्तार एक केंद्रीय कारक है। ऑस्ट्रेलिया और जापान दोनों ने हाल के वर्षों में पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की है। 18 अगस्त के संयुक्त बयान में दोनों देशों ने बल या coercion के जरिए यथास्थिति बदलने वाली कार्रवाइयों का विरोध किया।

  • चीन के पास लंबी दूरी की मिसाइलों, हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहनों और Anti-Access/Area-Denial क्षमताओं का तेजी से विस्तार हुआ है।
  • ऐसे वातावरण में जापान के लिए केवल रक्षात्मक हथियार पर्याप्त नहीं माने जा रहे हैं। लंबी दूरी की Stand-off Strike क्षमता अब उसके सैन्य आधुनिकीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • ऑस्ट्रेलिया के लिए भी यह बदलाव महत्वपूर्ण है। वह स्वयं लंबी दूरी के मिसाइल हथियार, Tomahawk और अन्य strike capabilities विकसित कर रहा है।

जापान-ऑस्ट्रेलिया सहयोग का एक महत्वपूर्ण आयाम उत्तर कोरिया भी है। जापान और ऑस्ट्रेलिया दोनों उत्तर कोरिया के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को गंभीर खतरा मानते हैं। 18 अगस्त की बैठक में दोनों देशों ने उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइल विकास की निंदा की तथा उसके लगातार मिसाइल परीक्षणों पर चिंता जताई। जापान के लिए उत्तर कोरिया सीधे सुरक्षा चुनौती है, जबकि ऑस्ट्रेलिया के लिए यह व्यापक Indo-Pacific strategic stability का प्रश्न है।

अमेरिका के बाद दूसरा बड़ा विदेशी टेस्टिंग पार्टनर

जापानी रक्षा मंत्री कोइजुमी ने इस संभावित व्यवस्था को विशेष महत्व देते हुए कहा कि यदि Japan Self-Defense Forces ऑस्ट्रेलिया में हाइपरसोनिक जैसे Stand-off missiles के परीक्षण कर पाती हैं, तो यह अमेरिका के साथ सहयोग के बाद इस तरह की दूसरी बड़ी व्यवस्था होगी। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए बातचीत तेज की जाएगी।

इसका मतलब है कि जापान अपने मिसाइल विकास के लिए विदेशी परीक्षण सुविधाओं पर अधिक निर्भरता विकसित कर रहा है। अमेरिका पहले से जापान का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के साथ ऐसा सहयोग टोक्यो के लिए एक अतिरिक्त रणनीतिक विकल्प उपलब्ध कराता है।

‘प्रोजेक्ट बूबुक’ पर काम कर रहे दोनों देश  

जापान और ऑस्ट्रेलिया मिलकर ‘प्रोजेक्ट बूबुक’ (Project Boobook) पर भी काम कर रहे हैं, जो संभावित खतरों का पता लगाने के लिए बनाया गया एक हाई-एनर्जी लेज़र सिस्टम है। इस टेक्नोलॉजी को ज़मीनी कॉम्बैट प्लेटफॉर्म और तटीय इलाकों में इस्तेमाल होने वाले प्लेटफॉर्म पर लगाने के लिए विकसित किया जा रहा है, और इसके फील्ड ट्रायल पहले ही साउथ ऑस्ट्रेलिया में किए जा चुके हैं। यह जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा क्षेत्र में पहला co-development project है।

मार्ल्स के अनुसार Boobook में ऐसी enhanced laser capability विकसित की जा रही है जिसे land combat platforms और littoral platforms पर लगाया जा सकता है। इसका उद्देश्य incoming threats को optically detect करके बेहतर protection और situational awareness प्रदान करना है।

इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आधुनिक युद्ध में ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य low-cost aerial threats की संख्या बढ़ रही है। भविष्य की air defence व्यवस्था में केवल महंगी interceptor missiles पर निर्भर रहना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में directed-energy systems एक संभावित विकल्प बन रहे हैं।

जापान-ऑस्ट्रेलिया रक्षा संबंध कितने गहरे ?

यह समझना जरूरी है कि हाइपरसोनिक मिसाइल परीक्षण की घोषणा कोई अलग-थलग घटना नहीं है। दोनों देशों के रक्षा संबंध पिछले कुछ सालों में लगातार गहरे हुए हैं।

2022 की Joint Declaration on Security Cooperation, 2023 का Reciprocal Access Agreement और दिसंबर 2025 में स्थापित Framework for Strategic Defence Coordination ने इस सहयोग को संस्थागत आधार दिया है। मई 2026 में दोनों देशों के नेताओं ने रक्षा और सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने के लिए नई दिशा तय की थी।

अब इसका असर जमीन, समुद्र और हवा—तीनों क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है।

जुलाई 2026 में जापानी F-35 लड़ाकू विमान ऑस्ट्रेलिया पहुंचे और उन्होंने Southern Cross तथा Pitch Black अभ्यासों में हिस्सा लिया। जापानी Ground Self-Defense Force ने भी Southern Jackaroo अभ्यास में भाग लिया।

इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया जापान से upgraded Mogami-class general-purpose frigates हासिल कर रहा है। दोनों देशों के अनुसार पहला पोत इस दशक में Royal Australian Navy में सेवा में आने की दिशा में है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब?

इस घटनाक्रम का भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व है। ऑस्ट्रेलिया-जापान के आधिकारिक बयान में भारत को उन क्षेत्रीय साझेदारों में शामिल किया गया है जिनके साथ दोनों देश Indo-Pacific resilience और सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से Quad के सदस्य हैं। यदि जापान की लंबी दूरी की strike capabilities, ऑस्ट्रेलिया के विशाल testing infrastructure और भारत की बढ़ती missile तथा defence-industrial capabilities के बीच भविष्य में तकनीकी या रणनीतिक सहयोग बढ़ता है, तो Indo-Pacific में deterrence architecture और मजबूत हो सकता है।

हालांकि, वर्तमान घोषणा को सीधे किसी Japan-Australia-India missile programme के रूप में देखना उचित नहीं होगा। फिलहाल यह मुख्य रूप से द्विपक्षीय जापान-ऑस्ट्रेलिया रक्षा व्यवस्था है।

साझेदारी से आगे बढ़ाकर operational और technological defence partnership में बदल रहे हैं। चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति, उत्तर कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम और Indo-Pacific में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच यह बदलाव आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय सैन्य संतुलन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

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