समुद्र के नीचे बिछी केबलों को आज की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण लेकिन सबसे कम दिखाई देने वाली स्ट्रैटजिक एसेट्स में गिना जाता है। इंटरनेट, वित्तीय लेन-देन, सरकारी संचार और सैन्य डेटा का बड़ा हिस्सा इन्हीं केबलों के जरिए चलता है। ऐसे में इन पर हमला किसी देश की इकॉनमी और सुरक्षा व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
इसके बीच अब रूस की बेहद गोपनीय GUGI को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। Reuters के मुताबिक 2026 के शुरुआती महीने में इस रूसी अंडरसी वारफेयर यूनिट ने Arctic में Svalbard के पास ऐसी तकनीक का अभ्यास किया था, जिसका इस्तेमाल समुद्र के नीचे महत्वपूर्ण फाइबर-ऑप्टिक केबलों को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।
नाटो देशों की सैन्य यूनिटों ने रूस की इन गतिविधियों पर लगातार नजर रखी और उन्हें ट्रैक किया था। इस निगरानी के बाद रूसी यूनिट अपना अंडरसी ऑपरेशन पूरा नहीं कर सकी और वहां से चली गई। इस घटना में कोई केबल क्षतिग्रस्त नहीं हुआ था।
Reuters ने दो पश्चिमी अधिकारियों के हवाले से बताया कि रूसी GUGI यूनिट ने Svalbard के आसपास गहरे समुद्र में चलने वाली पनडुब्बी जैसी विशेष submersibles का इस्तेमाल किया था। अधिकारियों ने उस नई तकनीक का तरीका सार्वजनिक नहीं किया।
किन देशों ने रूसी टेस्ट रोका ?
ब्रिटेन, नॉर्वे और अमेरिका के एक जॉइंट ऑपरेशन में समुद्र में रूसी जहाजों को ट्रैक किया और उनका सामना किया। इन जहाजों को अपनी एक्सरसाइज़ पूरी करने से रोका गया और आखिरकार वे उस इलाके से चले गए।
ब्रिटेन और नॉर्वे ने अप्रैल में बताया था कि उन्होंने आर्कटिक के पानी में रूस के एक गुप्त ऑपरेशन का पता लगाया है। लेकिन नई टेक्नोलॉजी का पता चलने, ऑपरेशन की जगह और उसमें अमेरिका की भागीदारी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी।
समुद्र की गहराई में यह आमना-सामना ऐसे समय में हुआ है जब कुछ पश्चिमी खुफिया अधिकारियों को डर है कि क्रेमलिन यूरोप में तोड़-फोड़ की गतिविधियां बढ़ा रहा है और NATO के साथ टकराव की तैयारी कर रहा है।
GUGI आखिर है क्या?
GUGI रूस की नौसेना की एक बेहद गोपनीय “गहरे समुद्र में ऑपरेशन करने वाली यूनिट” (अंडरसी वारफेयर यूनिट) है। यह रूस की सबसे गोपनीय समुद्री क्षमताओं में से एक मानी जाती है।
इसका पूरा रूसी नाम है Main Directorate of Deep-Sea Research। यह गहरे समुद्र में सैन्य अभियान और समुद्र के नीचे मौजूद महत्वपूर्ण ढांचे की निगरानी से भी जुड़ी है।
ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने अप्रैल 2026 में कहा था कि GUGI से जुड़े विशेष जहाज और पनडुब्बियां समुद्र के नीचे मौजूद बुनियादी ढांचे का सर्वेक्षण करने में सक्षम हैं और युद्ध की स्थिति में इन्हें नुकसान पहुंचाने की तैयारी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
GUGI से जुड़ा सबसे चर्चित जहाज Yantar है। ब्रिटेन ने जनवरी 2025 में इसे UK के महत्वपूर्ण underwater infrastructure की mapping करने वाला रूसी spy ship बताया था। उस समय Royal Navy ने Yantar की गतिविधियों पर नजर रखी थी।
नवंबर 2024 में भी Yantar को आयरलैंड के पास समुद्र के नीचे जाने वाली संचार केबलों के आसपास देखा गया था। उस समय ब्रिटेन, अमेरिका और आयरलैंड समेत कई देशों की सेनाओं ने इसकी निगरानी की थी।
Svalbard की केबलें इतनी महत्वपूर्ण क्यों?
इस घटना का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि रूसी पनडुब्बियां Arctic में मौजूद थीं। असली चिंता उन फाइबर-ऑप्टिक केबलों को लेकर है जो Svalbard को नॉर्वे की मुख्य भूमि से जोड़ती हैं।
यहां दो लगभग 1,400 किलोमीटर लंबी subsea fibre-optic cables हैं। ये समुद्र में करीब 2,700 मीटर तक की गहराई में जाती हैं और Svalbard स्थित SvalSat satellite ground station से जुड़े महत्वपूर्ण डेटा को mainland Norway तक पहुंचाती हैं। SvalSat दुनिया के सबसे बड़े satellite ground stations में से एक है।
यानी इन केबलों को नुकसान पहुंचने का असर केवल इंटरनेट कनेक्टिविटी तक सीमित नहीं रहेगा। इससे सैटेलाइट डेटा, संचार और रणनीतिक सूचनाओं के प्रवाह पर भी असर पड़ सकता है।
NATO के अनुसार दुनिया का 95 प्रतिशत से अधिक इंटरनेट ट्रैफिक समुद्र के नीचे मौजूद केबल नेटवर्क से गुजरता है। यही वजह है कि इन केबलों को अब सैन्य और राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखा जा रहा है।
Arctic अब नई अंडरसी जंग का मैदान क्यों?
Arctic का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। यहां रूस की रणनीतिक submarine forces मौजूद हैं और इसी क्षेत्र से North Atlantic तक पहुंचने वाले महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते शुरू होते हैं। Svalbard और mainland Norway के बीच का क्षेत्र रूस की Northern Fleet के Atlantic तक पहुंचने की रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसीलिए यहां किसी भी रूसी underwater activity को NATO गंभीरता से देखता है।
Subsea warfare तैयारी में चीन और अमेरिका कहां ?
Subsea warfare अब केवल रूस और NATO के बीच का मुद्दा नहीं रह गया है। और ना ही समुद्र के नीचे की दुनिया अब सिर्फ पनडुब्बियों की लड़ाई तक सीमित नहीं रह गई है। सी-बेड मैपिंग, अंडरवाटर ड्रोन, सेंसर और समुद्री केबलों की निगरानी अब आधुनिक सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन रहे हैं।
चीन भी समुद्र के नीचे अपनी निगरानी और mapping क्षमता तेजी से बढ़ा रहा है। Reuters की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक चीन Pacific, Indian और Arctic oceans में बड़े पैमाने पर seabed mapping और ocean monitoring कर रहा है। इसमें समुद्र की गहराई, तापमान, salinity और currents जैसी जानकारियां जुटाई जा रही हैं। ये डेटा पनडुब्बियों के navigation, stealth और sonar operations के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है। हालांकि चीन इन गतिविधियों को मुख्य रूप से वैज्ञानिक और समुद्री शोध के रूप में प्रस्तुत करता है।
दूसरी तरफ, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया का AUKUS (तीनों का रक्षा और सुरक्षा गठबंधन) unmanned underwater vehicles यानी UUVs की क्षमताओं पर काम कर रहा है। इनका इस्तेमाल surveillance, reconnaissance, mine countermeasures, anti-submarine warfare और महत्वपूर्ण seabed infrastructure की निगरानी जैसे मिशनों में किया जा सकता है।
ब्रिटेन ने Atlantic Bastion (North Atlantic में समुद्र के नीचे की सैन्य गतिविधियों और खतरों पर नजर रखने की पहल) के जरिए North Atlantic में underwater threats की निगरानी बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाया है। इसमें autonomous systems, sensors, aircraft और warships को एक साथ इस्तेमाल करने की योजना है।
| देश/गठबंधन | प्रमुख गतिविधि | सैन्य महत्व |
| रूस – GUGI | Deep-sea submersibles और underwater operations | समुद्र के नीचे infrastructure की निगरानी और संभावित sabotage capability |
| चीन | Pacific, Indian और Arctic में seabed mapping | पनडुब्बी navigation, sonar और underwater operations के लिए ocean data |
| AUKUS | UUV और underwater technologies का विकास | निगरानी, anti-submarine warfare और seabed security |
| ब्रिटेन – Atlantic Bastion | Sensors, autonomous systems, aircraft और warships | North Atlantic में underwater threats की पहचान और tracking |
रेस में भारत कहां ?
भारत के लिए समुद्र के नीचे की सुरक्षा इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि Indian Ocean Region में चीन की नौसैनिक और underwater गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं और पाकिस्तान भी खतरा है। भारत अब सिर्फ पारंपरिक पनडुब्बियों और anti-submarine warfare तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि समुद्र के नीचे मौजूद गतिविधियों की व्यापक निगरानी यानी Underwater Domain Awareness (UDA) विकसित करने पर भी जोर दे रहा है।
भारत में UDA का मतलब समुद्र की सतह के नीचे पनडुब्बियों, underwater vehicles, समुद्री गतिविधियों और महत्वपूर्ण seabed infrastructure के बारे में लगातार जानकारी जुटाना है। इसमें sonar, underwater sensors, unmanned underwater vehicles और समुद्र के नीचे लगे फाइबर-ऑप्टिक केबलों से मिलने वाले डेटा जैसी तकनीकें महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
भारत Unmanned Underwater Vehicles (UUVs) की दिशा में भी क्षमता विकसित कर रहा है। हालांकि उसकी क्षमता अभी चीन और रूस जैसी नहीं है।
भारत के प्रमुख UUV/AUV प्रोजेक्ट
| प्रोजेक्ट/सिस्टम | किसने विकसित किया | मुख्य भूमिका |
|---|---|---|
| Neerakshi AUV | GRSE | Underwater survey, mine detection |
| Man-Portable AUV | DRDO-NSTL | Surveillance और mine neutralisation |
| AUV Swarm | DRDO-NSTL | कई AUV को coordinated तरीके से चलाना |
| Combat XLAUV | DRDO | बड़े आकार का combat-capable autonomous underwater vehicle |
| UUV Make-II | भारतीय नौसेना/भारतीय उद्योग | स्वदेशी unmanned underwater capability विकसित करना |
| Long-Range ROV | IROV Technologies + DRDO TDF | Underwater objects की detection और neutralisation* |








