चीन अपने अगली पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर विमानों को केवल तेज, ज्यादा स्टील्थ और बेहतर हथियारों से लैस बनाने की दिशा में नहीं बढ़ रहा है। उसकी योजना ऐसे लड़ाकू विमानों की है जो जरूरत पड़ने पर खुद उड़ान संभाल सकें, सैटेलाइट नेविगेशन के बिना रास्ता खोज सकें और कई UAV के साथ मिलकर एक नेटवर्क की तरह लड़ सकें।
यह जानकारी चीन के Shenyang Aircraft Design & Research Institute के शोधकर्ताओं के एक हालिया रिसर्च-पेपर से सामने आई है। यह संस्थान चीन के सरकारी विमानन उद्योग समूह AVIC से जुड़ा है और सैन्य विमान डिजाइन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शोध-पत्र में अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए फ्लाइट-कंट्रोल तकनीक का भविष्य बताया गया है।
भविष्य का फाइटर कैसे लड़ेगा ?
शेनयांग के शोधकर्ताओं का यह रोडमैप बताता है कि चीन भविष्य के हवाई युद्ध को केवल बेहतर इंजन, ज्यादा स्टील्थ या लंबी दूरी की मिसाइलों की दौड़ के रूप में नहीं देख रहा। शोधकर्ताओं के मुताबिक हवाई युद्ध धीरे-धीरे तीन चरणों से गुजर रहा है—
- Energy Manoeuvrability: पुराने दौर में गति, चपलता और नजदीकी हवाई लड़ाई अहम थी।
- Information Manoeuvrability: रडार, स्टील्थ और लंबी दूरी की मिसाइलों के दौर में पहले देखना और पहले हमला करना ज्यादा महत्वपूर्ण हुआ।
- Cognitive Manoeuvrability: अगला चरण AI, स्वायत्त सिस्टम और कई विमानों के नेटवर्क के जरिए लड़ाई लड़ने का है।
यानी भविष्य का फाइटर अकेले दुश्मन से नहीं लड़ेगा। वह सेंसर, दूसरे लड़ाकू विमानों और अलग-अलग तरह के ड्रोन के साथ मिलकर एक कॉम्बैट नेटवर्क का हिस्सा होगा। यही बदलाव फ्लाइट-कंट्रोल सिस्टम को भी सिर्फ विमान को स्थिर रखने वाली तकनीक से आगे ले जाता है।
फोकस अब Autonomy + AI + Satellite-denied Navigation + Manned-Unmanned Teaming + Distributed Combat Network के संयोजन पर है।
पायलट बेहोश हुआ तो…?
शोध में सबसे दिलचस्प विचार Autonomous Flight Control का है। आज पायलट विमान की दिशा, ऊंचाई और दूसरे नियंत्रणों को संभालता है। भविष्य के सिस्टम में ऑनबोर्ड कंप्यूटर और AI पायलट के दिए गए मिशन या सामरिक आदेश को वास्तविक फ्लाइट-कंट्रोल कमांड में बदलने में मदद कर सकते हैं। विमान लगातार अपने अलग-अलग सिस्टम की स्थिति पर नजर रखेगा। इसमें—
- Inertial Navigation System
- Airspeed और दूसरे फ्लाइट सेंसर
- Control surfaces की स्थिति
- इंजन का प्रदर्शन
- विमान की मौजूदा उड़ान स्थिति, जैसी जानकारी शामिल होगी।
इससे सिस्टम यह समझ सकेगा कि विमान किस स्थिति में है, उसकी कितनी manoeuvrability बची है और कहीं कोई खराबी तो विकसित नहीं हो रही।
सबसे महत्वपूर्ण स्थिति तब आएगी जब पायलट अत्यधिक दबाव में हो या किसी कारण से विमान को नियंत्रित करने में सक्षम न रहे। ऐसी स्थिति में ऑटोनॉमस सिस्टम फ्लाइट कंट्रोल अपने हाथ में लेकर विमान को सुरक्षित रखने और निर्धारित मिशन को जारी रखने की कोशिश कर सकता है।
GPS बंद हो जाए तो…?
आधुनिक युद्ध में सैटेलाइट नेविगेशन को जाम या बाधित किया जा सकता है। इसलिए भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए केवल GPS या दूसरे सैटेलाइट सिग्नल पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। इसी समस्या के लिए शोधकर्ताओं ने कई वैकल्पिक तकनीकों को एक साथ इस्तेमाल करने की बात कही है। इनमें प्रमुख हैं—
- Quantum Inertial Navigation
- Visual Navigation
- Geomagnetic Navigation
- Terrain Matching
इनका उद्देश्य विमान को सैटेलाइट सिग्नल उपलब्ध न होने पर भी अपनी स्थिति और दिशा का अनुमान लगाने में सक्षम बनाना है।
असली गेम-चेंजर ?
चीन की योजना का सबसे बड़ा बदलाव शायद Manned-Unmanned Teaming में दिखाई देता है। भविष्य में एक मानवयुक्त फाइटर को कमांड नोड की भूमिका दी जा सकती है, जबकि उसके साथ उड़ने वाले UAV अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं। उदाहरण के तौर पर—
- एक ड्रोन Reconnaissance यानी निगरानी कर सकता है।
- दूसरा Attack मिशन कर सकता है।
- दूसरा Protection या सुरक्षा भूमिका निभा सकता है।
- अलग-अलग विमान इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम और हथियार इस्तेमाल का समन्वय कर सकते हैं।
सबसे खास बात यह है कि यह केवल एक ‘लीड फाइटर और उसके पीछे उड़ते ड्रोन’ वाला मॉडल नहीं होगा। शोध में Dynamic Reorganisation की अवधारणा भी रखी गई है।
अगर किसी विमान को नुकसान हो जाए या वह नेटवर्क से बाहर हो जाए तो बाकी विमान अपनी भूमिका और जिम्मेदारियां बदल सकते हैं। कोई दूसरा विमान उसकी जगह ले सकता है और अधूरा मिशन आगे बढ़ा सकता है।
इसके लिए स्थायी कमांडर की जगह Virtual Leader बदलने वाली व्यवस्था की अवधारणा बताई गई है।
J-50 और J-36 के लिए क्या मायने?
चीन के J-50 और J-36 को उसकी अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों से जोड़ा जाता है। J-50 का संबंध शेनयांग डिजाइन ऑर्गेनाइजेशन से माना जाता है, जबकि J-36 का विकास Chengdu Aircraft Industry Group से जुड़ा है।
लेकिन इस शोध-पत्र को सीधे J-50 की तकनीकी सूची मानना सही नहीं होगा। क्योंकि शोध-पत्र में J-50 का नाम नहीं लिया गया है और इसमें बताई गई तकनीकों को J-50 में लगाए जाने की पुष्टि भी नहीं की गई है।
J-50 नाम से चर्चित चीन का नया विमान दिसंबर 2024 में उड़ान परीक्षण की तस्वीरों के जरिए पहली बार सार्वजनिक चर्चा में आया था। यही कारण है कि इस खबर का महत्व किसी एक विमान की घोषित क्षमता से ज्यादा चीन की अगली पीढ़ी की एयर-कॉम्बैट सोच में है।
AI को कितनी छूट ?
दिलचस्प बात यह है कि शोधकर्ता विमान का पूरा नियंत्रण AI को सौंपने के पक्ष में नहीं हैं। वजह साफ है—AI आधारित सिस्टम हमेशा यह स्पष्ट नहीं कर सकते कि उन्होंने कोई फैसला क्यों लिया। बेहद कठिन या अप्रत्याशित परिस्थितियों में ऐसी प्रणाली गलत निर्णय भी ले सकती है।
इसलिए शोधकर्ताओं ने Layered Architecture की बात की है। इस मॉडल में—
Inner Loop:
विमान की स्थिरता, control-surface movement और flight-envelope protection जैसी बेहद महत्वपूर्ण और सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रियाएं ज्यादा भरोसेमंद, नियंत्रित और निर्धारित सिस्टम के पास रहेंगी।
Outer Loop:
AI का इस्तेमाल tactical decision-making, route/trajectory optimisation, दूसरे विमानों के साथ coordination और मिशन से जुड़े लचीले कामों में ज्यादा किया जा सकता है।
इसका मतलब है कि AI को ताकत दी जाएगी, लेकिन उसके आदेशों पर सुरक्षा की कड़ी सीमाएं रहेंगी।








