‘भाड़े के सैनिकों का देश’ है पाकिस्तान ? सऊदी को सैन्य सहायता में संसद भी दरकिनार

By Defence Detective

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Pakistan’s Asim Munir and Prime Minister Shehbaz Sharif

आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान की विदेशी मदद पर बढ़ती निर्भरता ने उसकी संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति पर गंभीर सवाल तो उठाए ही हैं लेकिन एक और अहम सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह भाड़े के सैनिकों का देश है ? दरअसल पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार, जिस पर असल में सेना प्रमुख आसिम मुनीर का दबदबा है, सऊदी अरब से जरूरी आर्थिक मदद पाने के लिए अपनी सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल कर रही है। इतना ही नहीं इस पूरे सौदे की असलियत के बारे में देश की जनता को अंधेरे में रखा गया है। संसद को ही दरकिनार कर दिया गया है।

न्यूज एजेंसी IANS की 5 नवंबर की रिपोर्ट में अमेरिकी न्यूज वेबसाइट PJ Media के हवाले से पाकिस्तान-सऊदी के इस संबंध को ‘सैन्य मदद के बदले आर्थिक सहायता’ के रूप में पेश किया गया है। इसका आधार है कि सऊदी वित्तीय सहायता और पाकिस्तानी सैन्य सहयोग साथ-साथ बढ़े हैं।

रिपोर्ट में सैन्य तैनाती की शर्तों, संसदीय निगरानी और पाकिस्तान की विदेश नीति पर आर्थिक निर्भरता के संभावित असर को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस सैन्य समझौते और इसके तहत तैनाती पर पाकिस्तान की संसद में अलग से मतदान नहीं कराया गया।

हालांकि, पाकिस्तानी विदेश कार्यालय का कहना है कि इसके लिए संसदीय मंजूरी अनिवार्य नहीं है और जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई है। लेकिन सवाल समझौते की पारदर्शिता और संसदीय निगरानी को लेकर है।

डील में सैन्य तैनाती की शर्तों और संसदीय निगरानी पर सवाल

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सैन्य सहयोग बढ़ने के साथ उसकी शर्तों की पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। Reuters ने सैन्य तैनाती का विस्तृत विवरण दिया है, जबकि IANS ने दावा किया है कि पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता का इस्तेमाल सऊदी अरब से आर्थिक सहारा हासिल करने के लिए कर रहा है।

  • रिपोर्टों के अनुसार, यह पूरी डील पर्दे के पीछे से संचालित की जा रही है। इस सैन्य प्रतिबद्धता पर पाकिस्तान की संसद में अलग से मतदान नहीं कराया गया।
  • रिपोर्ट में अप्रैल में हुई सऊदी में पाकिस्तानी सैन्य तैनाती और उसी समय सऊदी की ओर से लगभग 3 अरब डॉलर की अतिरिक्त सहायता की घोषणा को जोड़कर देखा गया है।
  • मुख्य सवाल यह है कि वित्तीय राहत के साथ पाकिस्तान ने कौन-सी सैन्य जिम्मेदारियां स्वीकार कीं और उनका कितना विवरण सार्वजनिक है।

क्या पाकिस्तान ने वास्तव में सऊदी अरब में सैनिक भेजे हैं ?

18 मई 2026 की Reuters रिपोर्ट ने पांच पाकिस्तानी सुरक्षा और सरकारी सूत्रों के आधार पर बताया था कि अप्रैल में पाकिस्तान ने करीब 8,000 सैनिक, लगभग 16 लड़ाकू विमान, ड्रोन के दो स्क्वाड्रन और HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम सऊदी अरब भेजे।

  • लड़ाकू विमानों में मुख्यतः JF-17 शामिल थे और गौर करने की बात है कि इसी दौरान सऊदी अरब ने पाकिस्तान को करीब 3 अरब डॉलर की मदद देने का वादा किया था।
  • इसके बाद पांच अक्टूबर को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मक्का रक्षा समझौते के तहत तय सैन्य बलों और क्षमताओं की तेजी से तैनाती पर सहमति जताई। आधिकारिक बयान में कार्रवाई संबंधित देशों के राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार करने की बात कही गई।

अप्रैल की तैनाती और अक्टूबर का फैसला अलग रक्षा व्यवस्थाओं से जुड़े थे। अप्रैल की तैनाती पहले से मौजूद पाकिस्तान-सऊदी द्विपक्षीय समझौते (यह Strategic Mutual Defence Agreement (SMDA)—रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता है, जिस पर पाकिस्तान और सऊदी अरब ने सितंबर 2025 में हस्ताक्षर किए थे।) के तहत थी, जबकि त्रिपक्षीय मक्का समझौते पर सात अगस्त 2026 को हस्ताक्षर हुए।

इसमें द्विपक्षीय रक्षा समझौते की पूरी शर्तों को Reuters ने गोपनीय बताया था। हालांकि बाद के मक्का त्रिपक्षीय समझौते का पाठ तुर्की की संसदीय प्रक्रिया में सार्वजनिक हुआ है।

2015 का पाकिस्तानी फैसला क्यों आया चर्चा में ?

यह पहली बार नहीं है जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान से सैन्य मदद मांगी हो। वर्ष 2015 में यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान के लिए रियाद ने पाकिस्तान से सैनिक, लड़ाकू विमान और युद्धपोत मांगे थे।

  • तब पाकिस्तान की संसद ने 10 अप्रैल को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर यमन संघर्ष में तटस्थ रहने और कूटनीतिक समाधान के प्रयास करने का समर्थन किया।
  • लेकिन अब 2026 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है। इस बार सैन्य प्रतिबद्धताओं पर संसद में अलग मतदान नहीं कराया गया।

सऊदी आर्थिक सहारे पर कितना निर्भर है पाकिस्तान?

सऊदी अरब पाकिस्तान के लिए विदेशी मुद्रा, वित्तीय सहायता और तेल आपूर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत है। इस निर्भरता को समझने के लिए सरकारी डिपॉजिट, तेल की भुगतान सुविधा और प्रवासी पाकिस्तानियों की कमाई को अलग-अलग देखना जरूरी है।

  1. आठ अरब डॉलर की वित्तीय व्यवस्था: सऊदी अरब की पहले से मौजूद पांच अरब डॉलर की सुविधा और अप्रैल में दी गई तीन अरब डॉलर की अतिरिक्त फाइनेंसिंग पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण सहारा हैं। पांच अरब डॉलर की सुविधा 2028 तक बढ़ाई गई थी, जबकि तीन अरब डॉलर की फाइनेंसिंग के रोलओवर की पुष्टि नवंबर में हुई। इससे पाकिस्तान पर तत्काल भुगतान का दबाव घटता है।
  2. तेल आपूर्ति और उधार की सुविधा: सऊदी अरब पाकिस्तान का महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ता है। पाकिस्तान सऊदी से अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा उधारी या क्रेडिट लाइंस पर लेता है।
  3. प्रवासी पाकिस्तानियों से विदेशी मुद्रा:  सऊदी अरब में करीब 27 लाख पाकिस्तानी प्रवासी हैं और वहां से सालाना आठ अरब डॉलर से अधिक की रकम पाकिस्तान भेजी जाती है।

‘भाड़े के सैनिक देश’ की राह पर है पाकिस्तान?

सऊदी अरब से पाकिस्तान को आर्थिक मदद और पाकिस्तान की ओर से उसके लिए बढ़ती सैन्य प्रतिबद्धताओं ने सवाल खड़ा किया है कि क्या पाकिस्तान एक ‘भाड़े के सैनिक देश’ जैसी भूमिका की ओर बढ़ रहा है।

इस सवाल का आधार Reuters की वह रिपोर्ट है, जिसके अनुसार सऊदी अरब में तैनात पाकिस्तानी सैन्य उपकरणों को पाकिस्तानी कर्मी संचालित कर रहे हैं और उनका खर्च रियाद उठा रहा है। इसके साथ यह कि सऊदी सहायता और पाकिस्तानी सैन्य समर्थन एक साथ बढ़े हैं।

  • पाकिस्तान की आर्थिक निर्भरता और सऊदी के प्रति उसकी सैन्य जिम्मेदारियों का साथ बढ़ना इस सवाल को और गहरा कर देता है।
  • इसके अलावा सऊदी अरब पर हमले बढ़ने या उसका ईरान अथवा यमन के हूती विद्रोहियों के साथ टकराव गहराने पर पाकिस्तानी सैनिकों की भूमिका और जोखिम बढ़ सकते हैं।
  • इस व्यवस्था का एक और जोखिम पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका पर पड़ सकता है। आर्थिक सहायता देने वाले देश की रक्षा में व्यापक सैन्य प्रतिबद्धता स्वीकार करने से क्षेत्रीय संघर्ष में संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है।

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