भारतीय सेना ने ₹1,577 करोड़ में खरीदीं 840 Loitering Munitions, ड्रोन वॉरफेयर में बड़ा बदलाव

By Alok Ranjan

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भारतीय सेना ने ₹1,577 करोड़ में 840 Loitering Munitions खरीदीं

भारतीय सेना अपनी ड्रोन युद्धक क्षमता को तेजी से मजबूत कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने 14 अगस्त को Tata Advanced Systems Limited (TASL) और NIBE Limited के साथ लगभग ₹1,577 करोड़ के दो अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए हैं। इन अनुबंधों के तहत सेना को Loiter Munition Systems, म्यूनिशन और संबंधित एक्सेसरीज उपलब्ध कराई जाएंगी। रिपोर्टों के मुताबिक इन सौदों के तहत भारतीय सेना को कुल 840 One-Way Attack Drones, यानी ऐसे ड्रोन मिलेंगे जिन्हें लक्ष्य पर हमला करने के बाद वापस लौटने के लिए डिजाइन नहीं किया जाता। इनमें:

  • Tata Advanced Systems Limited : 480 Loitering Munitions
  • NIBE Limited : 360 Loitering Munitions
  • कुल संख्या : 840 सिस्टम
  • अनुमानित डिलीवरी : लगभग 12 महीने

यह खरीद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय सेना अब पारंपरिक निगरानी और टोह लेने वाले ड्रोन से आगे बढ़कर बड़ी संख्या में ऐसे ड्रोन तैनात करने की दिशा में बढ़ रही है, जो खुद लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर मंडरा सकते हैं और उपयुक्त लक्ष्य मिलने पर उस पर सीधा हमला कर सकते हैं।

Loitering Munition क्या होती है?

Loitering Munition को आसान भाषा में ‘आत्मघाती ड्रोन’ या ‘घूमकर लक्ष्य पर हमला करने वाला ड्रोन’ कहा जा सकता है। हालांकि सैन्य दृष्टि से इसे केवल आत्मघाती ड्रोन कहना इसकी पूरी क्षमता को नहीं दर्शाता। यह एक ऐसा हथियार है जिसमें ड्रोन की उड़ान क्षमता और सटीक मारक क्षमता को एक साथ जोड़ा जाता है। इसे लक्ष्य वाले इलाके में भेजा जाता है। वहां पहुंचने के बाद यह कुछ समय तक लक्ष्य क्षेत्र में घूम सकता है और ऑपरेटर या इसकी प्रणाली द्वारा लक्ष्य की पहचान किए जाने के बाद उस लक्ष्य पर हमला कर सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि सेना को किसी लक्ष्य की सटीक लोकेशन पहले से पूरी तरह तय होने की जरूरत नहीं होती। ड्रोन लक्ष्य क्षेत्र में पहुंचकर संभावित लक्ष्य की तलाश कर सकता है।

840 ड्रोन क्यों महत्वपूर्ण हैं?

840 Loitering Munitions की खरीद केवल संख्या के लिहाज से बड़ी नहीं है, बल्कि यह भारतीय सेना की ड्रोन युद्ध की अवधारणा में बदलाव का संकेत भी देती है। अब तक ड्रोन का बड़ा इस्तेमाल निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने, लक्ष्य की पहचान और युद्धक्षेत्र की निगरानी के लिए किया जाता रहा है। लेकिन यूक्रेन युद्ध सहित हाल के संघर्षों ने दिखाया है कि छोटे और अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन भी युद्धक्षेत्र में सीधे हमला करने के लिए बेहद प्रभावी हो सकते हैं। ऐसे सिस्टम सेना को दुश्मन की अग्रिम चौकियों, वाहन, तोपखाने और अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्यों के खिलाफ तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता दे सकते हैं। खासकर तब, जब किसी लक्ष्य पर पारंपरिक तोपखाने या मिसाइल का इस्तेमाल करना महंगा या समय लेने वाला हो।

Tata और NIBE को मिले बड़े ऑर्डर

इस खरीद में दो भारतीय कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। Tata Advanced Systems Limited को 480 Loitering Munitions की आपूर्ति का ऑर्डर मिला है। वहीं NIBE Limited को 360 सिस्टम की आपूर्ति करनी है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय सेना केवल विदेशी प्रणालियों पर निर्भर रहने के बजाय भारतीय रक्षा उद्योग से स्वदेशी ड्रोन और मानव रहित युद्ध प्रणालियों की खरीद बढ़ा रही है। यह कदम सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की नीति के अनुरूप भी है।

High-Altitude Trials में भी हुआ परीक्षण

इन Loitering Munition Systems की क्षमता का आकलन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार परीक्षणों के दौरान इन्हें टैंक, आर्टिलरी गन और सैन्य वाहनों जैसे लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल कर उनकी क्षमता का मूल्यांकन किया गया। यह भारतीय सेना के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की उत्तरी सीमाओं पर कई महत्वपूर्ण सैन्य क्षेत्र बेहद ऊंचाई पर स्थित हैं। High-altitude environment में ड्रोन के सामने कई तकनीकी चुनौतियां होती हैं—जैसे कम तापमान, हवा की स्थिति, ऊंचाई के कारण प्रदर्शन में बदलाव और सीमित लॉजिस्टिक सपोर्ट। ऐसे वातावरण में इन प्रणालियों का सफल परीक्षण सेना को पर्वतीय युद्धक्षेत्र में अतिरिक्त विकल्प दे सकता है।

युद्धक्षेत्र में क्या बदलेगा?

इन 840 Loitering Munitions की तैनाती से भारतीय सेना को एक ऐसी क्षमता मिलेगी जिसमें निगरानी और हमला एक ही हथियार प्रणाली के जरिए किया जा सकता है। मान लीजिए किसी अग्रिम इलाके में दुश्मन की एक आर्टिलरी गन या सैन्य वाहन की गतिविधि का पता चलता है। सामान्य स्थिति में उसकी जानकारी मिलने के बाद लक्ष्य तक प्रभावी फायर पहुंचाने के लिए अलग हथियार प्रणाली की जरूरत हो सकती है। लेकिन Loitering Munition के मामले में उसी क्षेत्र में ड्रोन भेजकर लक्ष्य की पहचान और उस पर हमला करने की प्रक्रिया को काफी तेजी से पूरा किया जा सकता है। इसका मतलब है कि भविष्य के युद्धक्षेत्र में सेना के पास ‘देखो, पहचानो और हमला करो’ वाली क्षमता अधिक तेजी से उपलब्ध होगी।

सिर्फ ड्रोन नहीं, एक नई युद्धक अवधारणा

Loitering Munitions की सबसे बड़ी ताकत इनकी संख्या और नेटवर्क के साथ इस्तेमाल किए जाने की क्षमता है। भविष्य के युद्ध में बड़ी संख्या में छोटे ड्रोन एक साथ अलग-अलग क्षेत्रों में भेजे जा सकते हैं। इनमें कुछ ड्रोन निगरानी कर सकते हैं, जबकि दूसरे लक्ष्य मिलने के बाद हमला कर सकते हैं। इस तरह के सिस्टम पारंपरिक हथियारों की तुलना में युद्धक्षेत्र में अधिक लचीला विकल्प उपलब्ध करा सकते हैं। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं अब Loitering Munitions और Unmanned Combat Systems को अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रही हैं।

भारत के लिए अगला कदम क्या होगा?

840 Loitering Munitions की खरीद को भारतीय सेना के ड्रोन आधुनिकीकरण कार्यक्रम के एक बड़े चरण के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन आने वाले समय में असली चुनौती केवल इन हथियारों को खरीदना नहीं होगी। सेना को इनके साथ बेहतर सेंसर, सुरक्षित संचार नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर से बचाव, लक्ष्य पहचान प्रणाली और मानव रहित प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल विकसित करना होगा। खासकर ऐसे समय में जब विरोधी सेनाएं भी ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम तेजी से विकसित कर रही हैं। भारत के लिए लक्ष्य यह होगा कि Loitering Munitions को केवल अलग-अलग हथियारों के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय उन्हें आर्टिलरी, निगरानी ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और अन्य युद्धक प्रणालियों के साथ जोड़कर एक नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमता में बदला जाए।

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