मेजर शरीफ भोंसले का अनसुलझा मामला
भारतीय सेना अपने अनुशासन और सख्ती के लिए जानी जाती है। हर परिस्थिति में अनुशासन का पालन करना सैनिकों की पहचान होती है, जो उन्हें आम जनता से अलग बनाती है। लेकिन कभी-कभी ऐसे मामले सामने आते हैं जो रहस्य बन जाते हैं। ऐसा ही एक रहस्यमयी मामला सेना के सामने आया, जिसे सुलझाने में लगभग एक दशक बीत गया, लेकिन फिर भी निराशा ही हाथ लगी। ये मामला है मेजर शरीफ भोंसले का , जो विशिष्ट द्वितीय बटालियन, पैराशूट रेजिमेंट (विशेष बल) के कमीशन प्राप्त अधिकारी थे। वो अगस्त 2014 में छुट्टी पर तो गए लेकिन फिर कभी वापस नहीं आए। अब 10 साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी जब सेना को उनके बारे में कुछ पता नहीं चला, तो उनके खिलाफ टर्मिनेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हांलाकि, पहले भी कुछ सैनिकों के लापता होने की घटनाएँ हुई हैं, लेकिन किसी अधिकारी का इतने लंबे समय तक बिना किसी जानकारी के गायब रहना बहुत ही कम देखा गया है।
अरुणाचल प्रदेश राज्यपाल के Aide-de-Camp थे मेजर भोंसले

मेजर शरीफ भोंसले भारतीय सेना के 2nd Battalion, Parachute Regiment (Special Forces) के अधिकारी थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक सैन्य शिक्षा राष्ट्रीय रक्षा अकादमी(NDA) में पूरी की और साल 2009 में कमीशन कमिशन हुए । अपनी कई पोस्टिंग्स के बाद साल 2014 में वो अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल निर्भय शर्मा के Aide-de-Camp के रूप में सेवा में आए, जो एक बेहद प्रतिष्ठित और संवेदनशील पद है। यह पद, यानी Aide-de-Camp (ADC) to the Governor, आमतौर पर उन अधिकारियों को दिया जाता है जिनकी क्षमता और भरोसेमंद होने की योग्यता पहले ही साबित हो चुकी होती है। ऐसे पद पर नियुक्ति केवल उन सैन्य अधिकारियों को मिलती है जो न केवल अपने पेशेवर कौशल में बेहतरीन हों बल्कि अनुशासन, गोपनीयता और जिम्मेदारी निभाने में भी पूरी तरह सक्षम हों।
मेजर शरीफ की इस नियुक्ति से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय सेना ने उन्हें एक भरोसेमंद और सक्षम अधिकारी माना था, जो राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदाधिकारी के साथ निकटता से काम करने के लिए औरों से बेहतर साबित हुए थे। यह भूमिका सेना और नागरिक प्रशासन के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का काम करती है और इसमें नियुक्त अधिकारी की व्यक्तिगत ईमानदारी और प्रोफेश्नल कॉम्पीटेंस पर विशेष जोर दिया जाता है। स्पेशल फोर्स में उनकी भर्ती और राज्यपाल के Aide-de-Camp जैसे गंभीर पद दर्शाते हैं कि सेना के अंदर वो एक उच्च क्षमता वाले अधिकारी थे।
मेजर शरीफ भोंसले की गलतियां
मेजर शरीफ भोंसले के मामले में कई गलतियाँ हुईं जैसे कि वे 2014 में छुट्टी पर तो गए लेकिन समय पर वापस नहीं लौटे। बाद में जांच में पता चला कि उन्होंने स्पेन में एक पैराजंपिंग कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, जिसके लिए सेना की (Military Intelligence clearance) से अनुमति लेना जरूरी था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बाद सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी तस्वीरें और जानकारी सामने आई जो नॉर्वे में base jumping जैसी रोमांचक गतिविधियों से जुड़ी मिलीं। इन सबके बाद उनकी कोई पक्की खबर या लोकेशन सामने नहीं आई। इस तरह उनकी अनुपस्थिति ने सेना के नियमों का उल्लंघन किया और अनुशासन पर सवाल खड़े कर दिए। मेजर शरीफ को ढूंढने के लिए सेना ने खोज अभियान चलाया और सिविल प्रशासन के साथ मिलकर तलाश की लेकिन उनके बारे में कोई जानकारी सामने नहीं आई।
भगोड़ा घोषित हुए मेजर शरीफ भोंसले
साल 2016 में सेना ने“Apprehension Roll” जारी किया ताकि उन्हें ढूंढा जा सके, लेकिन उसमें भी कुछ जानकारी न मिलने पर उन्हें आधिकारिक रूप से “भगोड़ा (Deserter)” घोषित कर दिया गया। आपको बता दें कि Apprehension Roll एक आधिकारिक नोटिस/रिकॉर्ड होता है जिसे सेना (या पुलिस) तब जारी करती है जब कोई व्यक्ति लापता, फरार या बिना अनुमति गायब हो जाता है। इसमें उस व्यक्ति की पूरी जानकारी होती है जैसे (नाम, रैंक, पहचान, फोटो आदि)। इसे अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के साथ साझा किया जाता है। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को ढूंढना और पकड़कर वापस लाना होता है, जिससे उसे वापस लाकर उचित कार्रवाई की जाती है।
क्या है सेना के आगे का रुख
27 अक्टूबर 2025 को सेना ने एक शो कॉज़ नोटिस जारी किया, जिसमें मेजर शरीफ भोंसले से पूछा गया कि उन्हें नौकरी से क्यों न निकाला जाए। उन्हें अपनी सफाई देने के लिए 30 दिनों का समय दिया गया था, लेकिन निर्धारित समय सीमा के अदर कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद सेना ने नियमों के अनुसार एक्स-पार्टी टर्मिनेशन प्रक्रिया शुरू कर दी है, यानी अब बिना उनके जवाब के ही आगे की कार्रवाई की जा रही है। नियमों के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति दिए गए समय में जवाब नहीं देता, तो सेना अपने स्तर पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होती है। आर्मी ऐक्ट 1950 के अनुसार, बिना अनुमति के लंबे समय तक गायब रहना गंभीर अनुशासनहीनता माना जाता है, खासकर स्पेशल फोर्सेस जैसी संवेदनशील यूनिट्स में। इसलिए सभी जरूरी जांच और प्रक्रिया पूरी करने के बाद, नौकरी समाप्त करना एक औपचारिक प्रशासनिक कदम बन जाता है, जैसा की मेजर शरीफ भोंसले के केस में हो रहा है। अप्रैल 2026 का लेटेस्ट अपडेट देखें तो उनकी टर्मिनेशन की प्रक्रिया अभी भी चल रही है। अभी तक यह साफ नहीं है कि वे जिंदा हैं या हमेशा के लिए लापता हो गए हैं। अधिकारियों ने यह भी कहा है कि हो सकता कि है वे अब जीवित न हों, लेकिन इसकी कोई पक्की पुष्टि नहीं हुई है।
पहले भी सैनिक विदेश में तैनाती के दौरान हुए गायब
भारतीय सेना के सामने पहले भी ऐसे मामले आए हैं जब अधिकारी या सैनिक विदेश में तैनाती के दौरान गायब हो गए। सबसे बड़ा झटका साल 2008 में लगा था, जब दो भारतीय सैनिक अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित एक सैन्य बेस से लापता हो गए। वे वहाँ अमेरिकी सेना के साथ संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास Exercise Shatrujeet में भाग लेने गए थे। इस अभ्यास के दौरान ही दोनों अचानक गायब हो गए और आज तक उनका कोई सुराग नहीं मिला। यह घटना भारतीय सेना के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी शर्मिंदगी का कारण बनी थी। इससे यह साफ हुआ कि विदेश में तैनाती के दौरान अनुशासन और निगरानी बेहद अहम होती है। ऐसे मामलों से न केवल सेना की छवि प्रभावित होती है बल्कि द्विपक्षीय सैन्य सहयोग पर भी असर पड़ सकता है।
मेजर शरीफ भोंसले के मामले को भारतीय सेना अनुशासन और सख्ती के उदाहरण के रूप में पेश कर रही है। लगभग एक दशक से अधिक समय तक उनकी अनुपस्थिति ने न केवल सेना को प्रशासनिक और कानूनी कदम उठाने पर मजबूर किया बल्कि यह भी दिखाया कि विशेष बलों जैसी संवेदनशील यूनिट्स में अनुशासन और जवाबदेही कितनी अहम होती है। सेना ने सभी ज़रूरी प्रक्रियाएँ पूरी करते हुए अब टर्मिनेशन की दिशा में कदम बढ़ाया है, ताकि संगठन की विश्वसनीयता और ऑपरेशनल रेडिनेस पर कोई आंच न आए। यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि भारतीय सेना में नियमों और जिम्मेदारियों का पालन हर हाल में सर्वोच्च प्राथमिकता है, और किसी भी अधिकारी की लंबी अनुपस्थिति को हल्के में नहीं लिया जा सकता।








