भविष्य की हवाई युद्धक क्षमता के लिहाज से भारत अब एक ठोस धरातल पर आ गया है। ब्रिटेन, जापान और इटली के नेतृत्व वाले Global Combat Air Programme (GCAP) में भारत को ‘Dialogue Partner’ का दर्जा मिला है। GCAP को आमतौर पर उसके भविष्य के लड़ाकू विमान Tempest के नाम से भी जाना जाता है। इसका लक्ष्य 2035 के आसपास छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करना है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—Dialogue Partner बनना GCAP का पूर्ण सदस्य या सह-विकासकर्ता बनना नहीं है। भारत को फिलहाल कार्यक्रम की प्रगति, तकनीकी अवधारणाओं, क्षमताओं और विकास से जुड़े विमर्श तक पहुंच मिल रही है। यानी भारत अभी विमान बनाने के फैसले, फंडिंग या उत्पादन में तीन मूल साझेदारों—ब्रिटेन, जापान और इटली—के बराबर भागीदार नहीं बना है।
फिर भी भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व बहुत बड़ा है, क्योंकि दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियां अब पांचवीं पीढ़ी से आगे निकलकर छठी पीढ़ी के ‘System of Systems’ युद्धक विमानों की ओर बढ़ रही हैं।
छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान की क्या होंगी खूबियां?
छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान केवल ज्यादा तेज या ज्यादा शक्तिशाली फाइटर नहीं होगा। इसकी सबसे बड़ी विशेषता होगी कि वह अकेले लड़ने के बजाय एक पूरे नेटवर्क का एयरबोर्न कमांड सेंटर बन सके। इन विमानों में अत्याधुनिक स्टील्थ, लंबी दूरी, मल्टी-सेंसर फ्यूजन, AI आधारित निर्णय सहायता, अत्यधिक शक्तिशाली कंप्यूटिंग, सुरक्षित डेटा लिंक और मानवयुक्त-अमानवयुक्त टीमिंग जैसी क्षमताएं अपेक्षित हैं।
यानी भविष्य का पायलट अकेले दुश्मन के विमान से मुकाबला नहीं करेगा। उसके साथ कई Collaborative Combat Aircraft यानी स्वायत्त या अर्ध-स्वायत्त ड्रोन हो सकते हैं। ये ड्रोन निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, लक्ष्य पहचान, हथियार ले जाने या दुश्मन की एयर डिफेंस को दबाने जैसे काम कर सकते हैं।
इसीलिए छठी पीढ़ी की असली दौड़ विमान के आकार या अधिकतम गति की नहीं, बल्कि AI + Sensors + Stealth + Networking + Unmanned Systems के संयोजन की है।
भारत को क्या फायदा ?
GCAP में फिलहाल तीन मुख्य देश हैं—ब्रिटेन, इटली और जापान, जिन्होंने मिलकर छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करने का लक्ष्य रखा है। इसमें उद्योग स्तर पर ब्रिटेन की BAE Systems, इटली की Leonardo और जापान की Mitsubishi Heavy Industries महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
GCAP अब केवल कागजी अवधारणा नहीं रह गया है। जुलाई 2026 में इसके औद्योगिक संगठन Edgewing को बेसलाइन डिजाइन को आगे बढ़ाने के लिए लगभग £4.6 अरब का अनुबंध दिया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि कार्यक्रम डिजाइन चरण में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है।
भारत के लिए Dialogue Partner की भूमिका इसलिए उपयोगी है क्योंकि इससे नई दिल्ली को यह समझने का अवसर मिलेगा कि दुनिया के अग्रणी देश भविष्य के एयर-combat system को किस दिशा में ले जा रहे हैं।
यह भारत के लिए technology awareness और strategic access का रास्ता खोल सकता है—हालांकि इसे अभी technology transfer या भारतीय उत्पादन की गारंटी समझना सही नहीं होगा।
छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान की रेस में कौन-कौन?
आज इस रेस को मोटे तौर पर कई अलग-अलग धड़ों में देखा जा सकता है।
| कार्यक्रम | प्रमुख देश | प्रमुख कंपनियां/संगठन | स्थिति |
|---|---|---|---|
| GCAP / Tempest | ब्रिटेन, जापान, इटली | BAE Systems, Leonardo, Mitsubishi | सक्रिय, 2035 लक्ष्य |
| US NGAD / F-47 | अमेरिका | Boeing + USAF | विकास में |
| China J-36/J-50 | चीन | Chengdu, Shenyang | प्रोटोटाइप उड़ान परीक्षण |
| French next-gen programme | फ्रांस | Dassault Aviation | FCAS टूटने के बाद नई दिशा |
| Team Gen 6 | जर्मनी | Airbus + जर्मन उद्योग | शुरुआती चरण/प्रस्ताव |
| PAK DP/अन्य रूसी NGAD अवधारणाएं | रूस | MiG/रूसी उद्योग | शुरुआती/अनिश्चित स्थिति |
इस सूची में एक महत्वपूर्ण बदलाव 2026 में हुआ है—पुराना Franco-German-Spanish FCAS ढांचा टूट चुका है।
Future Combat Air System (FCAS) कभी यूरोप का सबसे बड़ा छठी पीढ़ी का कार्यक्रम था। इसमें फ्रांस, जर्मनी और स्पेन शामिल थे और Dassault Aviation, Airbus तथा Indra प्रमुख औद्योगिक भागीदार थे। इसका उद्देश्य केवल एक नया फाइटर बनाना नहीं था। इसमें Next Generation Fighter (NGF), Remote Carriers और Combat Cloud जैसे तत्व शामिल थे—यानी मानवयुक्त विमान, ड्रोन और जमीन/हवा के सेंसरों को एक नेटवर्क में जोड़ना।
लेकिन जून 2026 में Dassault और Airbus के बीच औद्योगिक नेतृत्व तथा कार्य-विभाजन को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि फ्रांस और जर्मनी ने मुख्य fighter programme को समाप्त कर दिया।
इसका मतलब यह नहीं कि यूरोप ने छठी पीढ़ी के विमान की दौड़ छोड़ दी है।
फ्रांस अब अपने अगले-generation fighter को आगे बढ़ाने का रास्ता तलाश रहा है। Dassault के प्रमुख Eric Trappier ने भी कहा है कि फ्रांस अकेले आगे बढ़ सकता है या नए साझेदार तलाश सकता है।
दूसरी तरफ जर्मनी में Team Gen 6 नाम से Airbus के नेतृत्व में एक नया औद्योगिक समूह सामने आया है। इसमें Airbus Defence and Space, Diehl Defence, Hensoldt, MBDA, MTU Aero Engines, Rohde & Schwarz सहित कई कंपनियां शामिल हैं। हालांकि जर्मन सरकार ने अभी इसे अंतिम सरकारी कार्यक्रम के रूप में मंजूरी नहीं दी है।
इसलिए आज यूरोप में GCAP सबसे स्पष्ट और स्थिर छठी पीढ़ी के कार्यक्रमों में से एक दिखाई देता है।
अमेरिका कहां खड़ा है?
अमेरिका छठी पीढ़ी के विमान की दौड़ में पीछे नहीं है। बल्कि उसकी स्थिति बेहद मजबूत है। अमेरिकी वायुसेना के Next Generation Air Dominance (NGAD) कार्यक्रम के तहत Boeing को F-47 विकसित करने का अनुबंध मिल चुका है। F-47 को F-22 Raptor का उत्तराधिकारी माना जा रहा है।
F-47 का पूरा डिजाइन सार्वजनिक नहीं है, लेकिन अमेरिकी अवधारणा में लंबी दूरी, अत्याधुनिक स्टील्थ, उच्च survivability और मानवयुक्त विमान के साथ ड्रोन की टीमिंग महत्वपूर्ण है। यानी अमेरिकी मॉडल भी उसी दिशा में जा रहा है जहां पायलट केवल विमान उड़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे मानव-मशीन combat network का mission commander होगा।
अमेरिकी नौसेना भी अपने अलग F/A-XX कार्यक्रम पर काम कर रही है। इसलिए अमेरिका की छठी पीढ़ी की रणनीति केवल F-47 तक सीमित नहीं है।
चीन कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है?
छठी पीढ़ी की दौड़ में चीन शायद भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी है। चीन ने 2024 के अंत में दो अलग-अलग अत्याधुनिक stealth aircraft prototypes उड़ाए, जिन्हें पश्चिमी विश्लेषकों ने अस्थायी रूप से Chengdu J-36 और Shenyang J-50 नाम दिया है। इनके वास्तविक आधिकारिक designation और सभी capabilities अभी स्पष्ट नहीं हैं।
J-36 का आकार काफी बड़ा और tailless configuration वाला दिखाई देता है। इससे लंबी दूरी, भारी internal weapons load, बड़े sensors और high-end air dominance जैसी संभावनाओं पर चर्चा हुई है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन अब केवल डिजाइन या mock-up के स्तर पर नहीं है। 2026 में भी J-36 के नए prototypes सामने आने की खबरें आई हैं। यही भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता है।
क्योंकि भारत का AMCA अभी पांचवीं पीढ़ी का कार्यक्रम है, जबकि चीन छठी पीढ़ी के prototypes को उड़ान परीक्षण तक ले जा चुका है।
और रूस?
रूस की स्थिति अमेरिका और चीन से अलग है। रूस के पास छठी पीढ़ी की दिशा में विभिन्न अवधारणाएं और भविष्य के interceptor/fighter programmes रहे हैं, जिनमें PAK DP प्रमुख नाम है। लेकिन अभी रूस के पास अमेरिका के F-47 या चीन के J-36/J-50 जैसी स्पष्ट रूप से उड़ान भरती हुई छठी पीढ़ी की fighter prototype स्थिति नहीं दिखाई देती।
रूस की मौजूदा प्राथमिकता भी Su-57 जैसे पांचवीं पीढ़ी के विमान और उससे जुड़े unmanned तथा advanced weapons ecosystem को विकसित करने पर काफी केंद्रित है।
इसलिए वर्तमान स्थिति में छठी पीढ़ी की दौड़ में अमेरिका और चीन सबसे आगे दिखाई देते हैं, जबकि GCAP यूरोप-जापान का सबसे व्यवस्थित multinational प्रयास है।
भारत की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत के सामने समस्या केवल यह नहीं है कि उसके पास अभी छठी पीढ़ी का विमान नहीं है। असल चुनौती टाइमिंग की है।
भारत का पांचवीं पीढ़ी का AMCA अभी development/design प्रक्रिया में है और उसकी सेवा में शामिल होने की समयसीमा 2030 के दशक के मध्य के आसपास बताई जाती है। दूसरी तरफ GCAP 2035 के आसपास operational होने का लक्ष्य रखता है।
इसका अर्थ है कि जब AMCA भारतीय वायुसेना में प्रवेश करेगा, उसी समय दुनिया की प्रमुख शक्तियां अगली पीढ़ी के combat-air systems तैनात करना शुरू कर सकती हैं।
यही कारण है कि भारत के लिए GCAP में Dialogue Partner बनना महत्वपूर्ण है।
भारत को अब तय करना होगा कि वह केवल AMCA तक सीमित रहकर 5th-generation capability विकसित करता है, या उसके समानांतर छठी पीढ़ी की technologies—AI, autonomous combat aircraft, combat cloud, advanced sensors, adaptive propulsion, directed-energy systems और manned-unmanned teaming—में भी निवेश बढ़ाता है।








