नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को हुए 18वें BRICS समिट ने दुनिया की बदलती जियोपॉलिटक्स तस्वीर का एक बड़ा संकेत दिया है। यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब पश्चिम एशिया में युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष, अमेरिका की व्यापार और प्रतिबंध नीति तथा ग्लोबल शक्ति-संतुलन को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। इसके बीच भारत ने अलग-अलग रणनीतिक हित वाले देशों को एक मंच पर साथ लाने और कठिन मुद्दों पर सहमति बनाने की सफल कोशिश की।
BRICS ने खुद को पश्चिम-विरोधी गठबंधन के रूप में घोषित नहीं किया, लेकिन बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, Global South का बड़ा रोल, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और आर्थिक सहयोग को लेकर उसका संदेश पहले से ज्यादा स्पष्ट रहा। भारत के लिए इस सम्मेलन की खासियत यह रही कि उसने रूस, चीन, ईरान और Gulf देशों जैसे अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच संवाद और सहमति की जगह बनाने की कोशिश की।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान और UAE के बीच तनावपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद BRICS की संयुक्त घोषणा पर सहमति बनी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अहम द्विपक्षीय बातचीत हुई।
यानी नई दिल्ली BRICS में सिर्फ मेजबान की भूमिका में नहीं रही, बल्कि उसने कठिन भू-राजनीतिक मतभेदों के बीच ब्रिज-बिल्डिंग डिप्लोमेसी का इस्तेमाल किया।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि “BRICS ने G7 को हरा दिया या नहीं”। असली सवाल यह है कि क्या BRICS धीरे-धीरे वैश्विक निर्णय लेने में पश्चिम के अलावा एक बड़ा शक्ति-केंद्र बन रहा है। नई दिल्ली सम्मेलन ने इसी बदलाव को मजबूत संकेत दिया है।
इस सम्मेलन से निकली 10 ऐसी बड़ी बातें, जो जियोपॉलिटिक्स और वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) पर गहरा और दूरगामी असर डालेंगी:-
1- ईरान-UAE तनाव के बीच भारत ने कैसे बनाई सहमति की राह?
नई दिल्ली BRICS की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक ईरान और UAE के बीच सहमति बनाने की कोशिश रही।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच दोनों देशों के बीच मतभेदों को लेकर BRICS की संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाना आसान नहीं था। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत के राजनयिकों ने करीब 100 घंटे तक बातचीत और संपर्क के जरिए दोनों पक्षों के बीच साझा भाषा तैयार कराने में भूमिका निभाई।
सम्मेलन के दौरान UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जा यद अल नाहयान और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की मुलाकात भी हुई।
अमेरिका और इजरायल के साथ जारी संघर्ष के बीच दो धुर-विरोधियों को एक मेज पर लाना भारत की वैश्विक कूटनीति की बहुत बड़ी जीत है।
2- G7 बनाम BRICS: असली मुकाबला GDP का है या वैश्विक प्रभाव का?
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दिल्ली की धरती से पश्चिमी देशों के समूह G7 पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि पिछले 5 सालों में वैश्विक जीडीपी (PPP) में ब्रिक्स देशों का योगदान 40 प्रतिशत से अधिक हो चुका है, जबकि खुद को ‘ग्रेट‘ कहने वाले G7 का योगदान सिमटकर केवल 29 प्रतिशत (या नॉमिनल आधार पर 24-28%) रह गया है। पुतिन ने साफ संदेश दिया कि दुनिया का आर्थिक इंजन अब पश्चिम से खिसककर ग्लोबल साउथ (Global South) की तरफ आ चुका है।
इस तुलना का असली महत्व GDP से ज्यादा राजनीतिक है।
3- मोदी-शी मुलाकात: BRICS मंच पर भारत-चीन रिश्तों का नया संकेत
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत के दौरे पर आए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी इस मुलाकात ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। सीमा विवादों और तनाव के बीच दोनों नेताओं का एक साथ बैठना यह दिखाता है कि चीन भी समझ चुका है कि वैश्विक मंचों पर भारत को दरकिनार करना अब उसके लिए मुमकिन नहीं है। यह मुलाकात एशिया की स्थिरता के लिहाज से गेम-चेंजर मानी जा रही है।
4- New Delhi Declaration: मतभेदों के बावजूद BRICS में बनी सहमति
तमाम आंतरिक मतभेदों और दुनिया में चल रहे युद्धों (यूक्रेन और मिडिल-ईस्ट संकट) के बावजूद, सभी 11 सदस्य देशों ने आम सहमति से ‘नई दिल्ली घोषणापत्र‘ को मंजूरी दी। भारत के लिए यह एक बहुत बड़ी राजनयिक सफलता है। इसमें बिना किसी का पक्ष लिए वैश्विक शांति, कूटनीति और व्यापारिक मार्गों को खुला रखने की वकालत की गई।
यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि BRICS में ऐसे देश शामिल हैं जिनके रणनीतिक हित कई मुद्दों पर एक-दूसरे से टकराते हैं।
5- BRICS का विस्तार: 11 देशों से आगे कितना बड़ा हुआ नेटवर्क?
इस समिट के बाद ब्रिक्स अब सिर्फ 11 देशों का समूह नहीं रहा। इसमें 10 नए पार्टनर देशों (जैसे मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, नाइजीरिया, क्यूबा आदि) के जुड़ने से अब यह 21 देशों का एक विशाल आर्थिक ब्लॉक बन गया है। यह नेटवर्क BRICS को एशिया, अफ्रीका, यूरोप के आसपास के क्षेत्रों, मिडिल-ईस्ट और लैटिन अमेरिका तक पहुंच देता है।
यह वैश्विक जनसंख्या का लगभग आधा और दुनिया के व्यापार का एक-चौथाई हिस्सा नियंत्रित करता है।
6- ‘डी-डॉलरलाइजेशन’ और लोकल करेंसी को बढ़ावा
समिट में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए सदस्य देशों ने अपनी स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में व्यापार बढ़ाने पर सहमति जताई। रूस और चीन जहां इसे ‘एंटी-वेस्ट’ (पश्चिम विरोधी) हथियार बनाना चाहते हैं, वहीं भारत ने इसे ‘नॉन-वेस्ट’ (पश्चिम से इतर) विकल्प के रूप में पेश किया, ताकि वैश्विक वित्तीय प्रणाली निष्पक्ष हो सके। यह सीधे-सीधे डॉलर को खत्म करने की घोषणा नहीं है। बल्कि लक्ष्य यह है कि सदस्य देशों के बीच व्यापार के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध हों।
सबसे महत्वपूर्ण बात—नई दिल्ली में कोई BRICS साझा मुद्रा लॉन्च नहीं हुई।
7– एआई (AI) गवर्नेंस पर वैश्विक नियम
BRICS ने AI, डिजिटल तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। यह भविष्य की रणनीतिक होड़ का बड़ा क्षेत्र है। AI केवल तकनीक नहीं रहा; रक्षा, साइबर सुरक्षा, उद्योग और अर्थव्यवस्था में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसी तरह lithium, rare earths और दूसरे critical minerals भविष्य की हाई-टेक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
चीन ने नई दिल्ली में BRICS AI Open Source Zone जैसी पहल का प्रस्ताव भी रखा।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्रिटिकल मिनरल्स के ‘हथियारीकरण’ (Weaponisation) के खिलाफ आवाज उठाई। ब्रिक्स ने मांग की कि संयुक्त राष्ट्र (UN) एआई के लिए वैश्विक नियम तय करे।
8- UN Security Council सुधार: भारत के लिए क्यों अहम है BRICS का समर्थन?
नई दिल्ली घोषणा में BRICS ने संयुक्त राष्ट्र और खास तौर पर UN Security Council में व्यापक सुधार की मांग दोहराई।
घोषणा में विकासशील देशों की अधिक प्रतिनिधित्व वाली भूमिका की बात कही गई। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली लंबे समय से UNSC में स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग कर रही है।
इसलिए BRICS का राजनीतिक एजेंडा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, यह वैश्विक निर्णय लेने की व्यवस्था बदलने की कोशिश भी है।
9- BRICS की कमजोरी भी सामने आई?
ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा की जगह विदेश मंत्री माउरो विएरा ने प्रतिनिधित्व किया। सम्मेलन में सदस्य और पार्टनर देशों के स्तर पर अलग-अलग दर्जे के प्रतिनिधित्व ने एक महत्वपूर्ण बात दिखाई—BRICS के सभी देशों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि BRICS कमजोर हो गया। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि इसे एक समान राजनीतिक गठबंधन समझना गलत होगा।
BRICS की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि चीन, रूस, भारत, ईरान, UAE, सऊदी अरब और ब्राजील जैसे देशों के अपने अलग रणनीतिक हित हैं।
10- भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि ?
नई दिल्ली सम्मेलन का सबसे बड़ा भारतीय लाभ शायद किसी एक घोषणा में नहीं, बल्कि कूटनीतिक भूमिका में दिखाई देता है।
भारत ने रूस के साथ अपने रिश्ते बनाए रखे, चीन के साथ बातचीत की, ईरान और Gulf देशों के साथ संवाद किया और साथ ही BRICS को सीधे अमेरिका-विरोधी गठबंधन बनाने से बचाने की भी कोशिश की। एक तरह से भारत बेहतरीन‘ब्रिज बिल्डर’ के रोल में नजर आया।
ईरान-UAE के बीच संवाद और कठिन परिस्थितियों में आम सहमति से घोषणा इस रणनीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
BRICS vs G7: एक नजर में
2001 में Goldman Sachs के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने BRIC शब्द का इस्तेमाल ब्राजील, रूस, भारत और चीन के लिए किया था। बाद में इन देशों ने इसे औपचारिक अंतरराष्ट्रीय मंच का रूप दिया और दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद BRIC का नाम BRICS हो गया।
आज BRICS का उद्देश्य केवल व्यापार बढ़ाना नहीं है। इसके तीन बड़े सहयोग क्षेत्र हैं—राजनीतिक एवं सुरक्षा सहयोग, आर्थिक एवं वित्तीय सहयोग और लोगों के बीच सहयोग। इसका एक बड़ा लक्ष्य Global South की आवाज को मजबूत करना और वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना है।
वहीं G7 का जन्म 1975 के आर्थिक संकट के दौर में प्रमुख विकसित पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक समन्वय के लिए हुआ था। बाद में यह व्यापक वैश्विक राजनीतिक और रणनीतिक मुद्दों पर प्रभावशाली मंच बन गया।
| पैमाना | BRICS | G7 |
|---|---|---|
| देश | 11 सदस्य | 7 सदस्य |
| मुख्य देश | भारत, चीन, रूस, ब्राजील, ईरान, UAE, इंडोनेशिया आदि | अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा, जापान |
| जनसंख्या | दुनिया की करीब आधी | करीब 10% |
| वैश्विक GDP – PPP | करीब 40% | करीब 30% |
| वैश्विक GDP – Nominal | करीब एक-चौथाई | करीब 28% |
| वैश्विक व्यापार | 25% से अधिक | BRICS से काफी कम |
| आर्थिक प्रकृति | उभरती/विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का बड़ा समूह | विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह |
| मुख्य फोकस | Global South, आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्रा, Global Governance Reform | वैश्विक आर्थिक नीति, सुरक्षा, विकसित देशों का रणनीतिक समन्वय |
| साझा मुद्रा | नहीं | नहीं |
| निर्णय प्रक्रिया | आम सहमति पर जोर | सदस्य देशों के बीच सहमति |
| स्थायी सचिवालय | नहीं | नहीं |
| प्रमुख संस्थागत उपलब्धि | New Development Bank | G7 की कोई अलग बहुपक्षीय विकास बैंक नहीं |
| सबसे बड़ी ताकत | आबादी + संसाधन + उभरती अर्थव्यवस्थाएं | हाई पर पेक्टा इनकम + फाइनेंशियल/तकनीकी क्षमता |
| मुख्य चुनौती | चीन-भारत समेत सदस्यों के अलग-अलग रणनीतिक हित | अपेक्षाकृत छोटी आबादी और वैश्विक GDP में घटता हिस्सा |








