चीन की नौसैनिक ताकत को मिलेगा जवाब ? जापानी पनडुब्बियों में हाइपरसोनिक मिसाइल की तैयारी

By Defence Detective

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जापान अपनी पनडुब्बी बेड़े की मारक क्षमता को एक नए स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रहा है। चीन की तेजी से बढ़ती नौसैनिक ताकत, लंबी दूरी की मिसाइलों और हाइपरसोनिक हथियारों के बीच जापान ने पनडुब्बियों से लॉन्च की जा सकने वाली हाइपरसोनिक मिसाइल विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

इसके लिए जापान के रक्षा मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2027 के रक्षा बजट में प्रावधान मांगा है। यह पहल केवल एक नई मिसाइल विकसित करने की योजना नहीं है, बल्कि जापान की पनडुब्बियों को छिपकर लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम बनाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

पूर्वी चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य के आसपास सुरक्षा संबंधी बढ़ती चिंताओं के बीच जापान यह कदम उठा रहा  है।

जापान का VLS कार्यक्रम क्या है ?

इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल मिसाइल नहीं, बल्कि Vertical Launch System यानी VLS है। जापान भविष्य की पनडुब्बियों के लिए ऐसे वर्टिकल लॉन्च सिस्टम की तकनीक विकसित कर रहा है, जिसमें अलग-अलग प्रकार की लंबी दूरी की मिसाइलें रखी जा सकें।

मौजूदा जापानी पनडुब्बियों में अलग से VLS नहीं है। वे मुख्य रूप से 533 मिमी टॉरपीडो ट्यूबों के माध्यम से हथियारों का इस्तेमाल करती हैं। नई VLS व्यवस्था जापान को ऐसी मिसाइलों को पनडुब्बी के भीतर अलग लॉन्च सेल में रखने का विकल्प देगी, जिन्हें पारंपरिक टॉरपीडो ट्यूब से लॉन्च करना कठिन हो सकता है।

जापान के VLS अनुसंधान का मौजूदा कार्यक्रम 2026 से 2029 तक चलने की योजना है और इसके लिए लगभग 3.9 अरब येन के अनुसंधान खर्च का उल्लेख किया गया है। शुरुआती चरण में डिजाइन की व्यवहार्यता, लॉन्च के दौरान स्थिरता और अन्य तकनीकी पहलुओं की जांच की जाएगी।

यानी जापान पहले उस तकनीकी आधार को तैयार कर रहा है, जिस पर भविष्य की मिसाइल क्षमता खड़ी की जा सके।

एक VLS में कई तरह की मिसाइलें

जापान की योजना को केवल हाइपरसोनिक मिसाइल तक सीमित देखना सही नहीं होगा। प्रस्तावित VLS भविष्य में कई प्रकार के लंबी दूरी के हथियारों को संभालने के लिए तैयार किया जा सकता है।

इनमें जापान का Hyper Velocity Gliding Projectile यानी HVGP, लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें और भविष्य की हाइपरसोनिक मिसाइलें शामिल हो सकती हैं। इससे एक ही पनडुब्बी को अलग-अलग परिस्थितियों के लिए अलग-अलग हथियारों का विकल्प मिल सकता है।

HVGP जापान की प्रमुख स्टैंड-ऑफ हथियार परियोजनाओं में से एक है। इसका मूल विचार रॉकेट बूस्टर के जरिए ग्लाइड वाहन को ऊंचाई तक ले जाना और फिर उसे तेज गति से लक्ष्य की ओर ग्लाइड कराना है। जापान पहले ही इसके भूमि-आधारित संस्करण पर काम कर चुका है और अब इसके समुद्री उपयोग की संभावनाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

पनडुब्बी से हाइपरसोनिक हमला क्यों महत्वपूर्ण?

पनडुब्बी की सबसे बड़ी ताकत उसकी गोपनीयता है। समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बी को दुश्मन के लिए खोज पाना कठिन होता है। यदि ऐसी पनडुब्बी के पास लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल भी हो, तो उसे समुद्र के किसी अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्र से हमला करने का विकल्प मिल सकता है।

हाइपरसोनिक हथियार सामान्य तौर पर Mach 5 या उससे अधिक गति से उड़ते हैं। इनमें कुछ प्रणालियां उड़ान के दौरान अपनी दिशा बदलने में सक्षम होती हैं, जिससे पारंपरिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों के लिए उनका पता लगाना, ट्रैक करना और रोकना अधिक कठिन हो सकता है। जापान का रक्षा मंत्रालय भी हाइपरसोनिक हथियारों को आसपास के क्षेत्र में उभरते गंभीर मिसाइल खतरों में शामिल करता है।

चीन की नौसैनिक ताकत को मिलेगा जवाब?

जापान की इस नई क्षमता की चाह के पीछे चीन की सैन्य शक्ति में तेजी से हो रहा विस्तार एक प्रमुख कारक है। लेकिन क्या जापान, चीन की नौसैनिक ताकत को जवाब दे पाएगा? इसका एक उत्तर यह है कि जापान के अपने 2025 Defense White Paper में भी चीन की नौसेना को दुनिया की सबसे बड़ी नौसैनिक ताकतों में बताया गया है। फिलहाल जापान चीन की नौसैनिक ताकत को गंभीर चुनौती दे सकता है, लेकिन अकेले चीन की पूरी नौसैनिक शक्ति की बराबरी करना अभी संभव नहीं दिखता।

चीन की नौसेना भी बड़ी संख्या में आधुनिक युद्धपोत, परमाणु पनडुब्बियां और लंबी दूरी के मिसाइल सिस्टम विकसित कर रही है। हाल में चीनी नौसेना ने YJ-20 जैसे हाइपरसोनिक एंटी-शिप हथियारों को बड़े युद्धपोतों से लॉन्च करते हुए भी प्रदर्शित किया है।

  • 2026 के उपलब्ध आंकड़ों में चीन का नौसैनिक बेड़ा जापान से काफी बड़ा है।
  • चीन के पास लगभग 841 नौसैनिक पोत बनाम जापान के 158, करीब 61 पनडुब्बियां बनाम 23, और 53 विध्वंसक बनाम 41 हैं।
  • चीन के पास तीन विमानवाहक पोत भी हैं, जबकि जापान के पास औपचारिक रूप से विमानवाहक पोत नहीं हैं।
  • चीन के पास परमाणु पनडुब्बियां भी हैं, जबकि जापान के पास नहीं है।  

2031 तक हाइपरसोनिक मिसाइलों के विकास का लक्ष्य  

पनडुब्बी-आधारित हाइपरसोनिक मिसाइल जापान की लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता बढ़ाने की व्यापक नीति का अगला चरण है। टोक्यो पहले ही अमेरिकी Tomahawk क्रूज मिसाइल हासिल कर रहा है। जुलाई 2026 में जापान के विध्वंसक JS Chōkai ने प्रशांत महासागर में पहली बार Tomahawk का वास्तविक फायरिंग परीक्षण किया। जापान के रक्षा मंत्रालय ने इसे स्टैंड-ऑफ रक्षा क्षमता के निर्माण में महत्वपूर्ण कदम बताया।

  • इसके अलावा जापान अपने Upgraded Type-12 एंटी-शिप मिसाइल, JSM, JASSM और हाइपरसोनिक हथियारों जैसी कई प्रणालियों पर समानांतर रूप से काम कर रहा है।
  • हाइपरसोनिक मिसाइलों के विकास को 2031 के आसपास पूरा करने का लक्ष्य बताया गया है, हालांकि कार्यक्रम की समयसीमा बदल सकती है।
  • इसका अर्थ है कि जापान जमीन, हवा, समुद्र और अब पानी के नीचे से लंबी दूरी की मारक क्षमता का एक बहु-स्तरीय नेटवर्क तैयार करना चाहता है।

¥8.9 ट्रिलियन का रिकॉर्ड रक्षा बजट

इस योजना को जापान के बढ़ते रक्षा खर्च के संदर्भ में भी देखना होगा। वित्त वर्ष 2027 के लिए जापान का रक्षा मंत्रालय करीब 8.9 ट्रिलियन येन का रिकॉर्ड बजट मांग रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक इसमें नई युद्ध तकनीकों, ड्रोन और AI, लंबे समय तक सैन्य अभियान चलाने की क्षमता तथा रक्षा उत्पादन आधार को मजबूत करने जैसी प्राथमिकताएं भी शामिल हैं।

पनडुब्बी से लॉन्च होने वाली मिसाइलों के अलावा जापान मानवरहित पनडुब्बियों से लंबी दूरी के हथियारों के इस्तेमाल की संभावनाओं पर भी शोध बढ़ा रहा है। इससे भविष्य में जापानी नौसेना का अंडरवाटर नेटवर्क केवल पारंपरिक पनडुब्बियों तक सीमित नहीं रह सकता।

परमाणु पनडुब्बियों पर भी बहस

जापान की पनडुब्बी क्षमता को लेकर एक और महत्वपूर्ण बहस चल रही है। देश अभी परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां संचालित नहीं करता और उसका मौजूदा बेड़ा पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों पर आधारित है।

लेकिन जापान में भविष्य की पनडुब्बियों के लिए “next-generation propulsion” की चर्चा बढ़ी है। सत्तारूढ़ गठबंधन की नीतिगत चर्चाओं में VLS से लैस अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों का उल्लेख हुआ है और परमाणु प्रणोदन को लेकर भी बहस सामने आई है। हालांकि जापान ने अभी परमाणु पनडुब्बियां हासिल करने का अंतिम फैसला नहीं किया है।

इसलिए VLS, हाइपरसोनिक मिसाइल और संभावित अगली पीढ़ी के प्रणोदन को फिलहाल अलग-अलग विकास धाराओं के रूप में देखना अधिक उचित है।

भारत और पूरे हिंद-प्रशांत के लिए इसका क्या मतलब?

जापान की यह पहल हिंद-प्रशांत में मिसाइल और पनडुब्बी प्रतिस्पर्धा के बढ़ते महत्व को दिखाती है। चीन पहले से ही बड़ी संख्या में लंबी दूरी के मिसाइल सिस्टम और परमाणु तथा पारंपरिक पनडुब्बियों का विकास कर रहा है। अमेरिका भी अपनी पनडुब्बियों से हाइपरसोनिक हथियारों की क्षमता विकसित कर रहा है। अमेरिकी नौसेना के Conventional Prompt Strike कार्यक्रम में Virginia-class पनडुब्बियों से पानी के भीतर हाइपरसोनिक हथियार तैनात करने की योजना शामिल है।

ऐसे माहौल में जापान का कदम क्षेत्रीय समुद्री युद्ध की प्रकृति बदल सकता है। भविष्य में किसी संकट की स्थिति में केवल बड़े युद्धपोत या विमानवाहक पोत ही लंबी दूरी के हमले का माध्यम नहीं होंगे। समुद्र के भीतर छिपी छोटी और अपेक्षाकृत कम दिखाई देने वाली पनडुब्बियां भी लंबी दूरी के सटीक हमलों का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं।  

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