भारत और आर्मेनिया के बीच रक्षा संबंध अब केवल हथियारों की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रह गए हैं। आर्टिलरी, रॉकेट सिस्टम, एयर डिफेंस, रडार और एंटी-ड्रोन तकनीक से शुरू हुई यह साझेदारी अब सैन्य प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और भविष्य में संयुक्त रक्षा उत्पादन तक पहुंचती दिखाई दे रही है।
इसी बदलते समीकरण के बीच भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह 16 अगस्त 2026 को दो दिवसीय यात्रा पर आर्मेनिया पहुंचे। 17 अगस्त को उन्होंने आर्मेनिया के रक्षा मंत्री सुरेन पापिक्यान से मुलाकात की और दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा की।
यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में आर्मेनिया भारतीय हथियार प्रणालियों का सबसे महत्वपूर्ण विदेशी ग्राहकों में उभरा है। 2022 में भारत के रक्षा उत्पादन विभाग के अतिरिक्त सचिव के नेतृत्व में भारतीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल की आर्मेनिया यात्रा के दौरान 350 मिलियन डॉलर से अधिक के रक्षा अनुबंध हुए थे।
बढ़ती रक्षा साझेदारी ने आर्मेनिया को भारत के घरेलू हथियार उद्योग के लिए सबसे महत्वपूर्ण विदेशी ग्राहकों में से एक बना दिया है। आर्मेनिया के लिए, यह साझेदारी रूसी सैन्य उपकरणों पर उसकी पारंपरिक निर्भरता का एक विकल्प प्रदान करती है। भारत के लिए, यह बढ़ता हुआ संबंध उसके रक्षा उद्योग को निर्यात का एक बड़ा बाज़ार देता है और दक्षिण काकेशस में उसकी रणनीतिक भागीदारी को मज़बूत करता है।
आर्मेनिया को भारत ने क्या-क्या दिया है?
भारत-आर्मेनिया रक्षा साझेदारी में कई प्रमुख स्वदेशी प्रणालियां शामिल हैं। इनमें Swathi Weapon Locating Radar, Pinaka Multi-Barrel Rocket Launcher, Akash Air Defence System, ATAGS 155mm howitzer, MArG 155 self-propelled howitzer और Zen Anti-Drone System प्रमुख हैं। कुछ अन्य मिसाइल, गोला-बारूद और संबंधित सैन्य उपकरणों की आपूर्ति भी इस व्यापक सहयोग का हिस्सा रही है।
1- Swathi Weapon Locating Radar
भारत की शुरुआती बड़ी रक्षा निर्यात सफलताओं में Swathi Weapon Locating Radar सबसे महत्वपूर्ण था। 2020 में आर्मेनिया ने भारत से चार Swathi रडार खरीदने का लगभग 40 मिलियन डॉलर का समझौता किया था। भारत ने इस सौदे में रूस और पोलैंड जैसे प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ा।
- Swathi का काम दुश्मन की तोपों, रॉकेट लॉन्चरों और मोर्टार की फायरिंग को ट्रैक कर उनके स्थान का पता लगाना है।
- यह प्रणाली आर्मेनिया को केवल दुश्मन की गोलाबारी का पता लगाने में नहीं, बल्कि उसके जवाब में सटीक counter-battery fire करने में भी मदद करती है।
2- Pinaka—आर्मेनिया की लंबी दूरी वाली रॉकेट क्षमता में बड़ा बदलाव
भारत ने आर्मेनिया को Pinaka Multi-Barrel Rocket Launcher System भी दिया है। इससे आर्मेनियाई सेना को कम समय में बड़ी संख्या में रॉकेट दागकर दुश्मन के क्षेत्र में व्यापक प्रभाव पैदा करने की क्षमता मिलती है।
आर्मेनिया ने चार Pinaka batteries के लिए करीब ₹2,000 करोड़ के सौदे पर समझौता किया था। 2026 की शुरुआत में भारत ने इस सौदे के तहत guided Pinaka rockets की पहली खेप भी रवाना की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नागपुर से इसकी पहली खेप को flag off किया था।
यह विकास खास है क्योंकि guided ammunition Pinaka को केवल area-saturation weapon नहीं रहने देता, बल्कि अधिक सटीक लंबी दूरी की strike क्षमता भी देता है।
3. Akash Air Defence System
भारत का Akash surface-to-air missile system भी अब आर्मेनिया की नई air-defence architecture का हिस्सा है। 2026 में आर्मेनिया ने सार्वजनिक रूप से भारतीय Akash systems को प्रदर्शित किया और हालिया सैन्य अभ्यासों में भी इनकी मौजूदगी दिखाई गई।
- Akash कम दूरी की वायु रक्षा के लिए विकसित प्रणाली है। भारत सरकार के अनुसार इसका export version भारतीय सशस्त्र सेनाओं में इस्तेमाल होने वाले version से अलग हो सकता है।
- मूल Akash प्रणाली लगभग 25 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाली surface-to-air missile प्रणाली है।
- आर्मेनिया के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि क्षेत्र में ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य हवाई खतरों का महत्व लगातार बढ़ा है।
4. ATAGS—155mm तोपखाने की ताकत
भारत की ATAGS यानी Advanced Towed Artillery Gun System भी आर्मेनिया के साथ रक्षा सहयोग का हिस्सा है। यह 155mm/52-calibre की आधुनिक towed artillery gun है।
- आर्मेनिया ने शुरुआती तौर पर ATAGS की सीमित संख्या खरीदी थी और बाद में अतिरिक्त प्रणालियों के लिए भी बातचीत/खरीद की खबरें सामने आईं।
- 2026 तक आर्मेनिया में भारतीय ATAGS की मौजूदगी सार्वजनिक प्रदर्शन में भी दिखाई गई है।
- ATAGS का महत्व केवल इसकी मारक क्षमता में नहीं है। यह NATO-standard 155mm ammunition का उपयोग करने वाली प्रणाली है और इससे आर्मेनिया की artillery inventory में रूसी-सोवियत calibre पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है।
5. MArG 155—मोबाइल artillery
भारत ने आर्मेनिया को MArG 155 wheeled self-propelled howitzer भी दिया है। यह Bharat Forge/Kalyani Strategic Systems की 155mm श्रेणी की माउंटेड आर्टिलरी प्रणाली है।
MArG का बड़ा फायदा इसकी मोबिलिटी है। इसे ट्रक जैसे wheeled platform पर लगाया गया है, जिससे फायरिंग पोजीशन बदलना अपेक्षाकृत तेज हो सकता है। 2026 में आर्मेनिया में MArG systems की मौजूदगी भी सामने आई है।
इससे आर्मेनिया की आर्टिलरी को पुराने Soviet-era systems की तुलना में अधिक मोबाइल और आधुनिक बनाने में मदद मिलती है।
6. Zen Anti-Drone System
ड्रोन युद्ध की बदलती प्रकृति को देखते हुए भारत ने आर्मेनिया को Zen Technologies का anti-drone/C-UAS system भी दिया है। 2023 में आर्मेनिया के लिए लगभग 41.5 मिलियन डॉलर के anti-drone contract की रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें प्रशिक्षण भी शामिल था।
यह क्षमता आर्मेनिया के लिए विशेष महत्व रखती है। 2020 के नागोर्नो-कराबाख युद्ध ने दिखाया था कि UAV और loitering weapons आधुनिक युद्ध में ground forces के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकते हैं।
बदल रही है आर्मेनिया की पूरी सैन्य रणनीति
भारत से हथियार खरीदने के पीछे आर्मेनिया की रणनीति को केवल अजरबैजान के साथ उसके विवाद के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। 2020 के युद्ध के बाद येरेवन ने अपनी सैन्य खरीद नीति में बड़ा बदलाव किया है।
लंबे समय तक रूस आर्मेनिया का प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा। लेकिन हथियारों की डिलीवरी में देरी, रूस की अपनी युद्ध संबंधी आवश्यकताएं और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में बदलाव के बाद आर्मेनिया ने हथियारों के स्रोतों में विविधता लानी शुरू की।
अब भारत, फ्रांस और अन्य देशों से खरीद इसका हिस्सा है। Reuters ने भी 2026 में आर्मेनिया की सैन्य परेड के दौरान भारतीय air-defence systems और अन्य विदेशी हथियारों की मौजूदगी को इस diversification के संकेत के रूप में रेखांकित किया।
पाकिस्तान-अजरबैजान-तुर्किये समीकरण का भी असर
भारत-आर्मेनिया रक्षा संबंधों का एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक पहलू तुर्किये और पाकिस्तान की करीबी सैन्य साझेदारी है। अजरबैजान के साथ तुर्किये के मजबूत संबंध और पाकिस्तान का अजरबैजान के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग नई दिल्ली और येरेवन के बीच रणनीतिक निकटता को अतिरिक्त महत्व देता है।
भारत ने हालांकि आधिकारिक रूप से आर्मेनिया को हथियारों की आपूर्ति को किसी तीसरे देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में पेश नहीं किया है। इसे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और आर्मेनिया की सैन्य आधुनिकीकरण जरूरतों के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की यात्रा क्यों अहम?
रक्षा सचिव की मौजूदा यात्रा का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि अब बातचीत केवल मौजूदा हथियारों की डिलीवरी तक सीमित नहीं रह सकती। अप्रैल 2026 में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और joint military hardware development पर चर्चा हुई थी।
इसका अर्थ है कि आने वाले समय में भारत और आर्मेनिया के बीच प्रशिक्षण, maintenance, technology cooperation, defence industrial collaboration और संभवतः स्थानीय उत्पादन जैसे क्षेत्रों में भी प्रगति हो सकती है।
भारत के लिए यह एक बड़ा strategic export opportunity है। आर्मेनिया में भारतीय हथियारों की operational visibility दूसरे देशों के संभावित ग्राहकों के लिए भी showcase का काम करती है।
रूस के बाद भारत की जगह कितनी बड़ी?
आर्मेनिया अब किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय multi-source military architecture बना रहा है। भारत इस architecture में आर्टिलरी, एयर डिफेंस, रडार और काउंटर-ड्रोन कैपेबिलिटीज का महत्वपूर्ण सप्लायर बन गया है।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत ने रूस को पूरी तरह रिप्लेस कर दिया है। आर्मेनिया के पास अभी भी रूसी और सोवियत मूल के हथियारों की बड़ी इन्वेंट्री है। लेकिन दिशा स्पष्ट है—आर्मेनिया अपनी सैन्य क्षमता को अधिक डाइवर्सीफाइड, मोबाइल और टेक्नोलॉजिकली मॉडर्न बनाना चाहता है।








