बांग्लादेश ने भारत से मांगा तेल, बजने लगा है बर्बादी का सायरन

By Alok Ranjan

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  • बांग्लादेश में पेट्रोल-डीज़ल की भयंकर किल्लत
  • पाइपलाइन के जरिए भारत से डीजल जाना शुरू
  • रसोई गैस की कमी से लोगों की परेशानी बढ़ी
  • दोगुनी कीमत पर खरीदनी पड़ी कुकिंग गैस

ईरान वॉर का बांग्लादेश पर बुरा असर

जंग हो रही है ईरान की अमेरिका और इज़रायल के साथ। लेकिन तेल तेहरान से करीब 4000 किलोमीटर दूर ढाका का निकल रहा है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था स्ट्रेट ऑफ होर्मूज में डूब सकती है। बांग्लादेश की इकॉनमी के लिए बहुत बड़ी चेतावनी आ चुकी है। चेतावनी कि ईरान युद्ध बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा भूकंप साबित हो सकता है। असल में स्ट्रेट ऑफ होर्मूज से तेल और गैस की सप्लाई ठप होने के बाद बांग्लादेश में केवल फ्यूल क्राइसिस की सिचुएशन ही नहीं पैदा हुई है, बल्कि इससे पूरे देश की इकॉनमी का पहिया भी थमने लगा है। यानी फ्यूल क्राइसिस का ये पूरा चेन रिएक्शन है एनर्जी प्राइस, ट्रेड और प्रोडक्शन फ्लो, एक्सपोर्ट, इन्फ्लेशन और फॉरेन रिजर्व पर एक साथ चोट करने वाला है।

6 मार्च तक बांग्लादेश के पास कितना रिजर्व था ?

  • रिजर्व फ्यूल – 1 लाख 36 हज़ार टन
  • पेट्रोल – 15 दिन
  • डीज़ल – 14 दिन
  • ऑक्टेन – 28 दिन
  • फरनेस ऑयल – 93 दिन
  • जेट फ्यूल – 55 दिन

भारत से जा रहा है डीज़ल

यानी हफ्ते भर बाद तो बांग्लादेश के इस रिजर्व में भी कमी आ चुकी होगी। हालांकि इस क्राइसिस सिचुएशन में भारत बांग्लादेश की मदद से लिए आगे आया है। 10 मार्च को ही 5000 टन डीजल बांग्लादेश को सप्लाई किया है। लेकिन ये मदद बांग्लादेश की मुश्किलों को दूर नहीं कर सकती। असल में बांग्लादेश में रोज़ाना करीब 12 से 13 हज़ार टन का डीज़ल खपत करता है। भारत बांग्लादेश को और 5000 टन डीज़ल देने वाला है यानी टोटल 10 हज़ार टन। लेकिन जब रोज़ाना की ख़पत ही 12-13 हज़ार टन की हो तो ये डीज़ल 10 दिन भी नहीं चल पाएगा। बांग्लादेश ने इस फ्यूल क्राइसिस से निपटने के लिए डीज़ल पेट्रोल और दूसरे फ्यूल प्रोडक्ट्स की राशनिंग शुरू कर दी है।

किसको मिल रहा कितना तेल ?

  • मोटरसाइकिल – अधिकतम 2 लीटर
  • प्राइवेट कार – अधिकतम 10 लीटर
  • SUV और मिनी बस – 20 से 25 लीटर
  • पिकअप, लोकल बस – अधिकतम 80 लीटर
  • लंबी दूरी तक जाने वाले ट्रक-बस – 220 लीटर

दूसरी जगहों पर भी तेल में कटौती

सरकार ने पहले डिविजनल सिटीज़ को दी जाने वाली सप्लाई में 25 परसेंट की कटौती भी कर दी थी लेकिन मारामारी बढ़ने के डर से इसे 15 प्रतिशत कर दिया गया है। लेकिन हालात बिगड़ते ही जा रहे हैं। पेट्रोल पंपों पर कार और बाइकों की लंबी-लंबीं कतारें लगी हैं। हालत ये है कि पेट्रोल-डीज़ल को लेकर पेट्रोल पंपों पर बवाल का ख़तरा भी है इसलिए कई पेट्रोल पंपों पर पुलिस की तैनाती की गई है। यानी लॉ एंड ऑर्डर के बिगड़ने के हालात भी पैदा हो रहे हैं। अब बात ये कि बांग्लादेश इस फ्यूल क्राइसिस से कैसे निपटने की कोशिश कर रहा है। तो पहला रास्ता तो मैंने आपको बताया कि बांग्लादेश ने भारत से 5 हज़ार टन डीजल भेजना शुरू कर दिया है, दूसरी तरफ बांग्लादेश दूसरे ऑप्शन्स भी तलाश रहा है।बांग्लादेश, ईरान, UAE, ओमान, साउदी अरब, कुवैत, इराक और क़तर से तेल और गैस लेता है। जबकि भारत, सिंगापोर और मलेशिया से भी वो कुछ फ्यूल खरीदता है। अब अरब देशों की तरफ से तो तेल और गैस आ नहीं पा रहा है तो बांग्लादेश को उम्मीदें एशियाई देशों से ही है। उसने सिंगापोर और इंडोनेशिया से भी और गैस की मांग की है।

बांग्लादेश को गैस मिलने में भारी दिक्कत

10 मार्च को ही बांग्लादेश सरकार ने 3 LNG शिपमेंट के लिए टेंडर जारी किया है लेकिन इसे लेकर भी उम्मीद बहुत कम है।दो-तीन दिन पहले भी बांग्लादेश ने इसी तरह का टेंडर जारी किया था लेकिन किसी सप्लायर ने उसके लिए बोली नहीं लगाई। आख़िरकार बांग्लादेश को ऑन स्पॉट मार्केट से LNG के दो शिपमेंट खरीदने पड़े।और इसके लिए बांग्लादेश ने दोगुनी से भी ज़्यादा कीमत अदा की है। बांग्लादेश ने ये गैस US Based Gunvor Group से खरीदे हैं। दो शिपमेंट के लिए बांग्लादेश ने 2300 करोड़ टका अमेरिकी कंपनी को दिये हैं।यानी एक शिपमेंट के करीब 1150 करोड़ टका जबकि जनवरी में इसी कंपनी से बांग्लादेश ने ऑन स्पॉट LNG की 1 शिपमेंट 500 करोड़ टका में खरीदी थी। तो हुआ ना डबल से भी ज़्यादा। 11 मार्च को डॉलर के मुकाबले बांग्लादेश के टका की कीमत 122.60 टका है। इस हिसाब से 2300 करोड़ टका मतलब 187.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर। अब ये सिचुएशन ऐसी है कि बांग्लादेश अगर ज़्यादा कीमत में गैस ना खरीदे तो देश में हाहाकार मच जाएगा और खरीदे तो फॉरेन रिजर्व पर प्रेशर बढ़ जाएगा क्योंकि भुगतान तो डॉलर में ही हो रहा है ना।

फोरेक्स रिज़र्व पर खतरा बढ़ा

बांग्लादेश के पास एक हफ्ते पहले तक करीब 35 बिलियन डॉलर का फॉरेन रिजर्व था। 8 मार्च को ख़बर आई कि उसने 1.37 बिलियन डॉलर का बकाया इम्पोर्ट बिल क्लियर किया था।इसके बाद उसने स्पॉट मार्केट से गैस खरीदी है। इसके बाद बांग्लादेश का फॉरेन रिजर्व घट कर 30 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है। और ये फॉरेन रिजर्व क्राइसिस की सिचुएशन है।और बांग्लादेश को इसी तरह अगर दोगुने दाम से ज़्यादा की कीमत पर तेल और गैस खरीदते रहना पड़ा तो उसका ये फॉरेन रिजर्व ड्राय होने लगेगा। इससे इम्पोर्ट बिल के भुगतान पर भी संकट मंडराने लगेगा। फॉरेन रिजर्व नहीं रहेगा तो बांग्लादेश इम्पोर्ट किये जाने वाले सामानों के लिए पेमेंट का भुगतान नहीं कर पाएगा और एक नई समस्या खड़ी हो जाएगी। मिडिल ईस्ट क्राइसिस की वजह से डॉलर के मुकाबले टका का रेट भी लगातार कम होता जा रहा है। ये भी बांग्लादेश की इकॉनमी के लिए अलार्मिंग सिचुएशन है। इससे बांग्लादेश का इम्पोर्ट कॉस्ट बहुत बढ़ रहा है और सप्लाई चेन पर भी निगेटिव इम्पैक्ट पड़ रहा है।

रेडिमेड गारमेंट एक्सपोर्ट की कमाई पर भी ग्रहण

बांग्लादेश रेडिमेड गारमेंट का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है। बांग्लादेश की एक्सपोर्ट अर्निंग का 85% हिस्सा केवल इसी सेक्टर से आता है।बांग्लादेश के RMG एक्सपोर्ट का ज़्यादातर हिस्सा यूरोप जाता है। डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स, पोलैंड, स्पेन जैसे देश बांग्लादेश से कपड़े ख़रीदते हैं। इनके अलावा अमेरिका, कनाडा और UK में भी बांग्लादेश के रेडिमेड गारमेंट्स इम्पोर्ट किये जाते हैं। अब हो ये रहा है कि ईरान-अमेरिका और इज़रायल की इस जंग की वजह से यूरोप में भी महंगाई बढ़ गई है। अब वो खाने-पीने की चीज़ों समेत केवल ज़रूरी सामानों की खरीद कर रहे हैं और इसी वजह से कपड़ों की डिमांड कम हो गई है। इसका सीधा असर बांग्लादेश को मिलने वाले एक्सपोर्ट ऑर्डर पर पड़ रहा है। कई ऑर्डर्स कैंसल कर दिये गये हैं तो कई डील के बाद भी निगोशियेट किये जा रहे हैं। वहीं फ्यूल क्राइसिस की वजह से इसका ट्रांसपोर्टेशन खर्च भी बढ़ गया है।

विदेश से आने वाली रेमिटेंस भी हुई कम

इन सबके बीच मीडिल ईस्ट में छिड़ी जंग ने बांग्लादेश के रेमिंटेस को भी झटका देना शुरू कर दिया है। करीब 11 मिलियन बांग्लादेशी दुनिया के अलग-अलग देशों में रह कर काम कर रहे हैं। इनमें से 70 से 74 परसेंट बांग्लादेशी सेमी या लो स्किल वर्कर हैं। इनमें से करीब 8 मिलियन बांग्लादेशी मिडिल ईस्ट में काम कर रहे हैं। परसेंटेज की बात करें तो ये करीब 86 फीसदी है। बांग्लादेश को मिलने वाले रेमिटेंस का 45% भी इसी इलाके से आता है। ग छिड़ने के बाद इस रीज़न में रहने वाले बांग्लादेशियों की जान पर तो ख़तरा है ही, साथ-साथ उनकी नौकरी पर भी संकट मंडरा रहा है। काम बंद होने और सैलेरी देर से या कम आने का भी डर है। जब उन्हें कम पैसे मिलेंगे या नहीं मिलेंगे तो ज़ाहिर है वो अपने घरवालों को भी कम पैसे भेजेंगे। तो बांग्लादेश की आमदनी पर भी असर पड़ेगा।कुल मिलाकर अमेरिका और इज़रायल का ये नया खाड़ी युद्ध बांग्लादेश के लिए बर्बादी का सायरन बजा रहा है।

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