ग्लोबल सैन्य संतुलन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में गहराते तनाव के बीच एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। अमेरिका की रिसर्च संस्था ‘सेंटर फॉर एडवांस्ड डिफेंस स्टडीज’ (C4ADS) ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में बताया है कि रूस ने चीन को बेहद अहम डिफेंस टेक्नोलॉजी बेंची है। A Marriage of Benefit? नामक इस रिपोर्ट ने डिफेंस एक्सपर्ट के बीच हलचल मचा दी है।
इतना ही नहीं यह रणनीतिक रक्षा सहयोग उस समय भी लगातार जारी रहा, जब फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने पर किए गए आक्रमण के बाद पश्चिमी देशों ने मास्को पर कड़े आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध लगा दिए थे।
यह खुलासा भारत के लिए बेहद अहम है। क्योंकि चीन के साथ भारत की भारी अदावत है। रूस, भारत को अपना अहम पारंपरिक और लंबे समय से दोस्त मानता है। डिफेंस-वीपंस में भारत, रूस का अहम खरीदार है।
क्या है C4ADS की A Marriage of Benefit रिपोर्ट ?
वाशिंगटन स्थित C4ADS ने 22 अक्टूबर 2026 को A Marriage of Convenience? शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमे शीर्षक का मायने सुविधा और आपसी हितों पर आधारित साझेदारी से है। C4ADS का व्यापक आकलन है कि रूस और चीन अलग-अलग क्षमताएँ लेकर इस सहयोग में शामिल हैं। रिपोर्ट में रूस–चीन के रक्षा तकनीक सहयोग की जाँच की गई और संस्था इस संबंध को असमानताओं पर आधारित, लेकिन दोनों के लिए लाभकारी सहयोग के रूप में देखती है।
- इसमें रूस की सरकारी United Shipbuilding Corporation से जुड़े पनडुब्बी डिजाइन संस्थान Rubin Central Design Bureau for Marine Engineering ने…..चीनी सैन्य खरीद संस्थाओं और China Shipbuilding and Offshore International को तकनीकी सामग्री तथा परीक्षण संबंधी दस्तावेज भेजे।
- रिपोर्ट में पनडुब्बियों के शुरुआती डिजाइन और परीक्षण से संबंधित दस्तावेज भी शामिल होने के संकेत हैं।
- यह सहयोग 2010 के दशक से चले आ रहे पनडुब्बी तकनीक विकास कार्यक्रम का हिस्सा है।
- अगस्त 2015 से अप्रैल 2023 के बीच रूसी पनडुब्बी संस्थान Rubin ने चीनी संस्थाओं और जहाज निर्माण कंपनी को कुल 12 खेपों में तकनीकी सामग्री और दस्तावेज भेजे।
- इनका कुल मूल्य 8 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 670 करोड़ रुपये) से अधिक बताया गया है।
कौन सी अहम तकनीकों से जुड़ा सहयोग सामने आया?
रिपोर्ट में पनडुब्बियों की आवाज घटाने, गैर-परमाणु प्रणोदन, स्वचालित नियंत्रण प्रणालियों और हल डिजाइन को रूस–चीन सहयोग के प्रमुख क्षेत्र बताया गया है। पहचानी गई 12 खेपों में खास तौर पर शुरुआती डिजाइन और परीक्षण संबंधी दस्तावेजों के संकेत मिले हैं। मुख्य तकनीकी पहलू निम्नलिखित हैं:-
- कैविटेशन और नॉइज़ रिडक्शन (Noise Reduction Technology): पनडुब्बी की सबसे बड़ी ताकत उसकी छिपकर ऑपरेशन करने की क्षमता (Stealth) होती है। प्रोपेलर के आसपास पानी का दबाव घटने से वाष्प के बुलबुले बनते और टूटते हैं। इस प्रक्रिया को ‘कैविटेशन’ (Cavitation) कहते हैं। इससे पैदा होने वाली आवाज दुश्मन के सोनार को पनडुब्बी का पता लगाने में मदद कर सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, रूस से चीन भेजी गई दो खेपों में कैविटेशन सहित विभिन्न परीक्षणों के दस्तावेज थे। विशेषज्ञ के आकलन में ये चीन की पनडुब्बियों की आवाज घटाने वाली तकनीकों के मूल्यांकन में रूसी सहायता का संकेत हैं।
- गैर-परमाणु प्रणोदन (Non-Nuclear Propulsion): रिपोर्ट में गैर-परमाणु प्रणोदन प्रणालियों को दोनों देशों के पनडुब्बी सहयोग का एक क्षेत्र बताया गया है। इसमें परमाणु रिएक्टर के बिना पनडुब्बी को चलाने वाली प्रणालियाँ आती हैं। हालांकि, पहचानी गई खेपों से किसी विशिष्ट एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक के हस्तांतरण की पुष्टि नहीं होती।
- स्वचालित कमान और नियंत्रण प्रणाली (Automated Command & Control Systems): ये प्रणालियाँ पनडुब्बी के सेंसरों से मिलने वाली सूचनाओं को संसाधित करने, संचालन में सहायता देने और हथियारों के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। रिपोर्ट इस क्षेत्र में सहयोग का उल्लेख करती है। चीन से रूस भेजी गई सामग्री में पनडुब्बी की सूचना एवं नियंत्रण प्रणाली के परीक्षण के लिए उपकरण और कंसोल के हिस्से भी शामिल बताए गए हैं।
- पनडुब्बी हल डिजाइन (Submarine Hull Design): हल यानी पनडुब्बी के मुख्य ढाँचे का डिजाइन उसकी मजबूती, पानी के भीतर गति और ध्वनिक पहचान को प्रभावित करता है। प्रेशर हल गहराई पर पानी का भारी दबाव सहता है, जबकि बाहरी आकार पानी के प्रतिरोध और प्रवाह से उत्पन्न शोर को प्रभावित करता है। रिपोर्ट हल डिजाइन में सहयोग और पारंपरिक पनडुब्बी के शुरुआती डिजाइन संबंधी दस्तावेजों के संकेत देती है। विशेष स्टील या ध्वनि सोखने वाली रबर कोटिंग के हस्तांतरण का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है।
| तकनीकी सामग्री | उपयोग और महत्व |
| प्रारंभिक या अवधारणात्मक डिजाइन | पनडुब्बी की प्रस्तावित बनावट और डिजाइन के विकास में सहायता |
| परीक्षण संबंधी दस्तावेज | पनडुब्बी के डिजाइन और प्रणालियों के प्रदर्शन की जाँच |
| कैविटेशन परीक्षण संबंधी दस्तावेज | प्रोपेलर के आसपास बुलबुले बनने और टूटने से उत्पन्न शोर का मूल्यांकन |
| सूचना एवं नियंत्रण प्रणाली के परीक्षण उपकरण | संबंधित प्रणाली की कार्यप्रणाली की जाँच। ये उपकरण चीन से रूस भेजे गए थे। |
इस खुलासे का महत्वपूर्ण पहलू पनडुब्बियों की आवाज कम करने वाली तकनीकों का मूल्यांकन है। समुद्र के भीतर पनडुब्बी की पहचान कठिन बनाने में ऐसी तकनीकों की अहम भूमिका होती है।
वन-वे ट्रैफिक नहीं है यह सहयोग
C4ADS के रणनीतिक आकलन के अनुसार, यह रक्षा सहयोग एकतरफा नहीं है। यह अलग-अलग क्षमताओं और आपसी जरूरतों पर टिकी ‘Marriage of Convenience’ यानी फायदे और सुविधा की साझेदारी है। जहाँ रूस चीन को दशकों में विकसित इंजीनियरिंग विशेषज्ञता, अनुसंधान और तकनीकी ज्ञान (Know-how) उपलब्ध करा रहा है, वहीं चीन रूस को अपनी विशाल औद्योगिक विनिर्माण क्षमता (Manufacturing Scale) और संसाधनों का लाभ दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक –
- दिसंबर 2019 से सितंबर 2022 के बीच चीनी कंपनी China Shipbuilding and Offshore International (CSOI) ने रूसी Rubin ब्यूरो को पनडुब्बी परीक्षण के लिए नियंत्रण उपकरण और टेस्ट कंसोल के पुर्जे भेजे।
- इनमें पनडुब्बी की सूचना एवं नियंत्रण प्रणाली (Information Control System) के मूल्यांकन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री शामिल थी।
- सितंबर 2022 की खेप के दस्तावेजों में संयुक्त डिजाइन और निर्माण अनुबंध का संदर्भ भी मिला।
- यानी रूस विशेषज्ञता उपलब्ध करा रहा था, तो चीन भी परीक्षण उपकरण और औद्योगिक सहयोग दे रहा था।
यूक्रेन युद्ध के बाद भी जारी रहा तकनीकी सहयोग
रिपोर्ट में दर्ज लेनदेन बताते हैं कि रूस–चीन का पनडुब्बी तकनीक में सहयोग यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भी जारी रहा। सितंबर 2022 में चीन से रूस के Rubin ब्यूरो को भेजी गई खेप के दस्तावेजों में संयुक्त डिजाइन और निर्माण अनुबंध का संदर्भ मिला। इस खेप में पनडुब्बी की सूचना एवं नियंत्रण प्रणाली के परीक्षण से संबंधित उपकरण और हिस्से शामिल बताए गए हैं।
- दूसरी ओर, रूस से चीन भेजी गई दर्ज खेपों की अवधि अप्रैल 2023 तक जाती है।
- यानी फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के आक्रमण के बाद भी दोनों दिशाओं में तकनीकी आदान-प्रदान चलता रहा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खुलासा?
भारत के पुराने और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार रूस का चीन के साथ पनडुब्बी तकनीक में सहयोग नई दिल्ली के लिए भी महत्वपूर्ण है। समुद्र के भीतर सैन्य ताकत केवल पनडुब्बियों की संख्या से तय नहीं होती, उनकी खामोशी और पहचान से बचकर संचालन करने की क्षमता भी अहम होती है। ऐसे में चीनी पनडुब्बियों की आवाज घटाने में रूसी सहायता, भारतीय नौसेना के पनडुब्बीरोधी अभियानों की चुनौती बढ़ा सकती है।
- भारतीय नौसेना हिंद महासागर में लंबी दूरी की निगरानी और पनडुब्बीरोधी अभियानों के लिए P-8I विमान संचालित करती है। साथ ही भारत अपने पनडुब्बी बेड़े की क्षमता भी बढ़ा रहा है।
- प्रोजेक्ट-75 की छठी पनडुब्बी INS वाघशीर 15 जनवरी 2025 को नौसेना में शामिल हुई थी।
- इसके अलावा, 30 दिसंबर 2024 को लगभग 1,990 करोड़ रुपये का अनुबंध DRDO की एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP प्रणाली के लिए अतिरिक्त खंड के निर्माण और उसके एकीकरण के लिए किया गया था।
- इस प्रणाली का उद्देश्य पारंपरिक पनडुब्बियों की पानी के भीतर रहने की अवधि बढ़ाना है।








