मंगल के लिए बनी और सैन्य मोर्चे पर पहुंची हैदराबाद के छात्रों की नई ड्रोन टेक्नोलॉजी, कितनी अहम है यह कामयाबी

By Defence Detective

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BITS Hyderabad students Naman Kasliwal and Shiv Patil during drone navigation system testing.

आधुनिक युद्धक्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (EW) और जीपीएस जैमिंग (GPS Jamming) ड्रोन अभियानों के लिए बड़ा खतरा हैं। युद्ध के मैदान में दुश्मन GPS सिग्नल जाम कर दे, तो उस पर निर्भर ड्रोन के लिए सही रास्ते पर उड़ना मुश्किल हो सकता है। सैटेलाइट सिग्नल बाधित होने या गलत सिग्नल मिलने पर उन ड्रोनों का नेविगेशन प्रभावित हो सकता है।

इसी चुनौती का समाधान तलाशते हुए BITS Pilani  के हैदराबाद कैंपस के दो छात्रों ने एक विज़न-बेस्ड जीपीएस-फ्री ड्रोन नेविगेशन मॉड्यूल ने डेवलप किया है। यह ऐसी नेविगेशन टेक्नोलॉजी है, जो ड्रोन को आसपास के दृश्य देखकर अपनी मूवमेंट का अनुमान लगाने में मदद करती है।

दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत मंगल ग्रह पर बिना जीपीएस के ड्रोन को रास्ता दिखाने की चुनौती से हुई थी। अब छात्रों के स्टार्टअप ‘बेजन टेक’ (Beijan Tech) की यह टेक्नोलॉजी भारतीय सेना की जरूरतों के मुताबिक डेवलप और परखी जा रही है।

किसने बनाई यह टेक्नोलॉजी?

यह टेक्नोलॉजी BITS Pilani के हैदराबाद कैंपस के अंडरग्रेजुएट छात्रों नमन कसलीवाल और शिव पाटिल ने डेवलप की है। दोनों ने वर्ष 2025 में Beijan स्टार्टअप शुरू किया। नमन इसके सह-संस्थापक और CEO हैं, जबकि शिव सह-संस्थापक और CTO हैं।

  • स्टार्टअप का फोकस मौजूदा रक्षा उपकरणों में अपना सॉफ्टवेयर और कॉम्पैक्ट कंप्यूटिंग मॉड्यूल जोड़कर उनकी क्षमता बढ़ाना है।
  • ड्रोन नेविगेशन के अलावा कंपनी तोपों की ऑटोमैटिक पोजिशनिंग और ड्रोन स्वार्म के संचालन से जुड़े सिस्टम पर भी काम कर रही है।

वास्तव में बनाया क्या है—ड्रोन या मॉड्यूल?

छात्रों ने Beijan Autonomous Navigation Module—BANM नाम का सिस्टम डेवलप किया है। यह कोई नया ड्रोन नहीं, बल्कि ड्रोन में जोड़ा जाने वाला मॉड्यूल है, जो GPS उपलब्ध न होने पर नेविगेशन में मदद करता है। इसे मौजूदा ड्रोन प्लेटफॉर्म के साथ इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया है।

जानिए Custom Visual Odometry, MAVLink और Plug-and-Play के बारे में-

  • Custom Visual Odometry: कंपनी का विकसित किया सॉफ्टवेयर कैमरे से मिल रही तस्वीरों में बदलाव देखकर अनुमान लगाता है कि ड्रोन किस दिशा में और कितना आगे बढ़ा है।
  • MAVLink: ड्रोन के फ्लाइट कंट्रोलर और दूसरे उपकरणों के बीच जानकारी के आदान-प्रदान का एक तय तरीका है। इसके जरिए मॉड्यूल ड्रोन के कंट्रोल सिस्टम से जुड़ता है।
  • Plug-and-Play: मतलब मॉड्यूल को मौजूदा ड्रोन में आसानी से जोड़कर इस्तेमाल करना, ताकि पूरा सिस्टम नए सिरे से तैयार न करना पड़े। ड्रोन के हिसाब से जरूरी सेटिंग और परीक्षण फिर भी किए जाते हैं।

GPS के बिना रास्ता कैसे पहचानता है-कैसे काम करता है?

यह सिस्टम सैटेलाइट सिग्नल के बजाय कैमरों से मिलने वाली दृश्य जानकारी का इस्तेमाल करता है। लगातार मिल रही तस्वीरों में बदलाव देखकर सॉफ्टवेयर ड्रोन की दिशा और मूवमेंट का अनुमान लगाता है। इस तरह GPS बाधित होने पर भी नेविगेशन में मदद मिलती है।

  • कैमरों से निगरानी: ड्रोन पर लगे कैमरे आसपास के दृश्य रिकॉर्ड करते हैं।
  • मूवमेंट का अनुमान: सॉफ्टवेयर तस्वीरों में दिख रहे बदलावों का विश्लेषण करके अनुमान लगाता है कि ड्रोन किस दिशा में और कितना आगे बढ़ा है।
  • नेविगेशन में सहायता: यह जानकारी ड्रोन के कंट्रोल सिस्टम को उड़ान का रास्ता बनाए रखने में मदद करती है।
  • ड्रोन पर ही प्रोसेसिंग: कंपनी के मुताबिक डेटा का विश्लेषण ऑनबोर्ड कंप्यूटर पर होता है; इसके लिए क्लाउड पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।
  • GPS का विकल्प: इसे GPS सिग्नल उपलब्ध न होने या बाधित होने पर वैकल्पिक नेविगेशन क्षमता देने के लिए डेवलप किया जा रहा है।

यहाँ सीमा समझना जरूरी है: GPS के बिना रास्ता पहचानने का मतलब यह नहीं कि ड्रोन का रेडियो कंट्रोल, डेटा लिंक और हर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी हर प्रकार की जैमिंग से सुरक्षित हो गया।

मंगल ग्रह की चुनौती से कैसे निकला सेना के लिए समाधान?

इस रक्षा तकनीक की शुरुआत किसी सैन्य छावनी या बॉर्डर पोस्ट की योजना से नहीं हुई थी। बल्कि शुरुआत इस सवाल से हुई कि मंगल ग्रह पर GPS सैटेलाइट नेटवर्क के बिना ड्रोन अपना रास्ता कैसे पहचानेगा? इस विचार का संबंध इसरो के रोबोटिक्स चैलेंज से था। इसरो के IRoC-U 2025 की थीम ‘Fly me on MARS’ थी।

इसमें छात्रों को ऐसा स्वायत्त हवाई नेविगेशन विकसित करना था, जो जीएनएसएस जैसी बाहरी सहायता के बिना उड़ान भर सके, सुरक्षित लैंडिंग स्थान पहचान सके और शुरुआती स्थान पर लौट सके। प्रतियोगिता का केंद्र नेविगेशन और गाइडेंस टेक्नोलॉजी डेवलप करना था।

छात्रों का कम लागत वाला विजन-आधारित नेविगेशन सिस्टम प्रतियोगिता के फाइनल तक पहुँचा। इसी में एक भारतीय सैन्य अधिकारी ने रक्षा जरूरतों का समाधान देखा। उन्होंने बताया कि यही तकनीक उन इलाकों में सैन्य ड्रोन के काम आ सकती है, जहाँ दुश्मन GPS सिग्नल जाम कर देता है।

इसके बाद छात्रों की टीम ने अपने विजन आधारित नेविगेशन को रक्षा जरूरतों के हिसाब से डेवलप करना शुरू किया। चुनौती केवल प्रयोगशाला में सिस्टम चलाने की नहीं थी। उसे कठिन इलाकों में भरोसेमंद बनाना और अलग-अलग ड्रोन के साथ इस्तेमाल के योग्य तैयार करना भी जरूरी था।

कहाँ-कहाँ हुए ट्रायल, सेना की कितनी यूनिटों ने दिखाई दिलचस्पी?

BANM प्रयोगशाला से निकलकर अलग-अलग सैन्य स्थानों पर फील्ड टेस्टिंग तक पहुँच चुका है। कंपनी और प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, ऊँचाई वाले इलाकों से लेकर रेगिस्तान तक इसकी क्षमताएँ परखी गई हैं। प्रदर्शन के बाद कई सैन्य यूनिटों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई है।

  • सिकंदराबाद: सैन्य परीक्षण और पायलट किए गए।
  • लेह: ऊँचाई और कठिन परिस्थितियों में सिस्टम की क्षमता परखी गई।
  • पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज—PFFR: फील्ड मूल्यांकन हुआ। संस्थापकों के मुताबिक, आगे की टेस्टिंग के लिए तीन मॉड्यूल पोखरण ले जाए गए।
  • सेना की सदर्न कमांड: अधिकारियों के सामने टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन किया गया।
  • जैसलमेर के पास: कंपनी ने एक सैन्य कैंप में एक सप्ताह काम करके GPS के बिना नेविगेशन क्षमता जाँचने की जानकारी दी है।
  • आठ सैन्य यूनिटों की दिलचस्पी: कंपनी के मुताबिक, इन यूनिटों से Letters of Intent—LOI मिले हैं। ये तकनीक में रुचि दिखाते हैं। हालांकि इन्हें पक्का खरीद ऑर्डर नहीं माना जा सकता।

डिवीजन स्तर पर खरीद का विचार:  इन्वेस्टर AJVC  के मुताबिक, लेह और पोखरण में फील्ड वैलिडेशन के बाद BANM की डिवीजन स्तर पर खरीद पर विचार हो रहा है। अंतिम खरीद की घोषणा अभी नहीं हुई है।

AJVC एक वेंचर कैपिटल फंड है, जो शुरुआती चरण के स्टार्टअप में इन्वेस्ट करता है। इसी ने Beijan के ₹1.7 करोड़ के निवेश दौर की अगुवाई की है।

कितना स्वदेशी है ?

संस्थापक के मुताबिक, नेविगेशन सॉफ्टवेयर और सिस्टम इंटीग्रेशन का काम टीम ने खुद किया है। सॉफ्टवेयर को छोटे और हल्के हार्डवेयर पर चलाने के लिए तैयार किया गया है। हालांकि, इसमें इस्तेमाल होने वाला सिंगल-बोर्ड कंप्यूटर—यानी एक ही सर्किट बोर्ड पर बना कॉम्पैक्ट कंप्यूटर—अभी आयातित है। कंपनी इसे भी स्वदेशी विकल्प से बदलने की योजना बना रही है।

कौन-सी जरूरी तकनीकी जानकारी अभी नहीं मिली ?

जाँचे गए स्रोतों में BANM की ये संख्यात्मक जानकारियाँ नहीं मिलीं:

  • प्रति मॉड्यूल कीमत।
  • GPS के बिना अधिकतम दूरी और उड़ान अवधि।
  • नेविगेशन की मापी गई त्रुटि या ड्रिफ्ट।
  • प्रमाणित अधिकतम ऊँचाई और गति।
  • रात, धुंध, धूल तथा कम दृश्यता में परीक्षण के विस्तृत परिणाम।
  • सेना की परीक्षण रिपोर्ट, पास होने के मानदंड और खरीद की निश्चित संख्या।

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