भारतीय ड्रोन कंपनी IdeaForge ने अपने मल्टी-रोल टैक्टिकल यूएवी प्लेटफॉर्म, ‘ZOLT’ के दो नए वेरिएंट्स—ZOLT UCAV और ZOLT Hybrid को लॉन्च कर दिया है। 6 अक्टूबर 2026 को हुई यह लॉन्चिंग Indian Defence Ecosystem के लिए एक गेम-चेंजर बताई जा रही है।
ZOLT Hybrid को लंबी अवधि की निगरानी और टोही के लिए तैयार किया गया है, जबकि ZOLT UCAV को सामरिक मिशनों और सटीक हमलों से जुड़ी भूमिका के लिए डेवलप किया गया है।
दोनों की खूबियां अलग हैं, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माहौल में काम करने की क्षमता इन्हें खास बनाती है। सवाल यह है कि इन ड्रोनों की वास्तविक ताकत क्या है और भारतीय सेना को इनसे कितना फायदा मिल सकता है?
किन क्षमताओं से लैस है ZOLT Hybrid ?
ZOLT Hybrid को उन मिशनों के लिए तैयार किया गया है, जिनमें किसी क्षेत्र पर लंबे समय तक नजर बनाए रखना जरूरी होता है। बॉर्डर पर लगातार निगरानी रखनी हो, किसी सेंसेटिव इलाके में मूवमेंट मॉनिटर करना हो, बैटलफील्ड में दुश्मन की एक्टिविटी पर नज़र रखनी हो या फिर आर्टिलरी यूनिट्स को टारगेट की सटीक लोकेशन बतानी हो। ये सबकुछ ZOLT Hybrid आसानी से और लंबे समय तक करने में सक्षम होगा।
लड़ाई के दौरान आर्टिलरी के लिए दुश्मन की सही लोकेशन का पता लगाना मुश्किल होता है। लेकिन ZOLT उसकी इस मुश्किल को बड़ी आसानी से दूर करने में कैपेबल है। ये बैटलफील्ड को लंबे समय तक ऑब्जर्व कर सकता है और दुश्मन के बंकर, आर्टिलरी, कमांड पोस्ट जैसे स्ट्रेटेजिक पॉइन्ट्स की सटीक लोकेशन अपने आर्टिलरी कमांड को भेज सकता है जिसके बाद उसी हिसाब से आर्टिलरी यूनिट्स सटीक निशाना लगा सकती है
सेना के लिए इसका फायदा यह हो सकता है कि सीमावर्ती इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और संवेदनशील सैन्य गतिविधियों वाले क्षेत्रों की लंबे समय तक निगरानी की जा सके। हर कुछ घंटों में ड्रोन बदलने की जरूरत कम होने से निगरानी अभियान अधिक निरंतर हो सकते हैं।
| विशेषता | ZOLT Hybrid |
| मुख्य भूमिका | लंबी अवधि की निगरानी और टोही |
| प्रोपल्शन | इंजन और बैटरी का संयोजन |
| उड़ान अवधि | 6 घंटे से अधिक |
| संचार सीमा | अधिकतम 100 किलोमीटर, लाइन ऑफ साइट |
| घोषित लॉन्च ऊंचाई | 2,000 मीटर AMSL(Above Mean Sea Level) तक |
| प्रस्तावित उच्च-ऊंचाई वाला संस्करण | 4,000 मीटर AMSL तक के क्षेत्र से उड़ान भरने के लिए विकसित किया जा रहा है |
इस वेरिएंट में एक इंटरनल कम्बशन (IC) इंजन और बैटरी बैकअप का कॉम्बो दिया गया है। लंबी दूरी तय करने के लिए यह इंजन का उपयोग करता है और जरूरत पड़ने पर पूरी तरह मूक मिशन के लिए बैटरी पर स्विच हो जाता है।
अब ज़रा सोच कर देखिये। 6 घंटे का लंबा समय और 100 किलोमीटर तक की LOS रेंज यानी ये प्लेटफॉर्म केवल किसी टारगेट एरिया तक जाकर कुछ मिनट में लौट आने के लिए नहीं डेवलप किया गया है। इसे long-duration surveillance और persistent ISR जैसे missions को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
ये जोल्ट हाईब्रिड का सबसे बड़ा एडवांटेज माना जा रहा है लेकिन बैटलफील्ड में काम केवल ISR मिशन का ही नहीं होता है, वहां लॉन्ग रेंज स्ट्राइक कैपेब्लिटी की भी ज़रूरत पड़ती है और यहां काम आता है ZOLT UCAV
ZOLT UCAV की क्या और कितनी घातक कैपिसिटी ?
ZOLT UCAV (Unmanned Combat Aerial Vehicle) को विशेष रूप से सामरिक मिशनों और पिन-पॉइंट एक्यूरेसी के साथ सटीक हमले करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। अब तक भारतीय सेनाएं मुख्य रूप से टोही और निगरानी ड्रोनों पर निर्भर थीं, लेकिन ZOLT UCAV निगरानी से आगे बढ़कर मिशन को सीधे अंजाम देने की क्षमता देता है।
यह वेरिएंट पूरी तरह से बैटरी-संचालित (All-Electric) है। बैटरी पावर के कारण इसका थर्मल और एकूस्टिक सिग्नेचर (आवाज और गर्मी) बेहद कम होता है, जिससे यह दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस की नजरों में आए बिना ‘स्टेल्थ’ मोड में काम कर सकता है।
- यह एक ऑल-इलेक्ट्रिक साइलेंट किलर है।
- यह 2 से 3 घंटे तक लगातार उड़ान भरने में सक्षम है।
- इसकी लाइन-ऑफ-साइट (LOS) ट्रांसमिशन रेंज 30 से 50 किलोमीटर है।
- ZOLT UCAV को समुद्र की सतह से 4,500 मीटर तक की ऊंचाई से उड़ाया जा सकता है। यह खूबी इसे लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पहाड़ी फॉरवर्ड पोस्ट्स के लिए बेहद मुफीद बनाती है।
ये एक स्ट्राइक ड्रोन है लेकिन कंपनी ने अब तक ये डिस्क्लोज़ नहीं किया है कि इसमें कौन सा वारहेड और कितने वजन का वारहेड लगाया जाएगा।
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में इनकी उपयोगिता कैसे ?
इन दोनों ड्रोनों की जो सबसे बड़ी ताकत है, वह है इनका इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर-प्रतिरोधी (EW-Resilient) टेक्नोलॉजी स्टैक। आधुनिक युद्धों में देखा गया है कि दुश्मन सबसे पहले जीपीएस (GPS) सिग्नलों को ब्लॉक करता है या रेडियो संचार को जैम कर देता है, जिससे साधारण ड्रोन दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं या रास्ता भटक जाते हैं। ZOLT प्लेटफॉर्म को इन खतरों से निपटने के लिए तीन मुख्य स्तंभों पर तैयार किया गया है: –
- एंटी-जैम कम्युनिकेशंस (Anti-Jam Communications): तगड़े जैमिंग वातावरण में भी यह बेस स्टेशन के साथ सुरक्षित डेटा लिंक बनाए रखता है।
- GNSS-Denied नेविगेशन: यदि दुश्मन जीपीएस, ग्लोनास या नाविक (NavIC) जैसी उपग्रह प्रणालियों को पूरी तरह ठप कर दे, तब भी ZOLT अपने ऑनबोर्ड सेंसरों और इनर्शियल नेविगेशन की मदद से अपना रास्ता खुद ढूंढ सकता है और मिशन पूरा करके सुरक्षित लौट सकता है।
- ऑनबोर्ड इंटेलिजेंस (AI एनेबल्ड): इसके भीतर लगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चिपसेट ‘एज कंप्यूटिंग’ (Edge Computing) का उपयोग करता है। इसका मतलब है कि ड्रोन को निर्णय लेने के लिए लगातार ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, जिससे डेटा लिंक कटने पर भी यह ऑटोनॉमस रूप से टारगेट की पहचान कर सकता है।
भारतीय सेना में ideaForge ड्रोन्स का कितना मजबूत साम्राज्य ?
महाराष्ट्र के नवी मुंबई बेस्ड ideaForge कंपनी भारतीय सेना को निगरानी और टोही के लिए कई प्रकार के UAV उपलब्ध करा चुकी है। कंपनी के ड्रोन दुर्गम इलाकों में जानकारी जुटाने, सीमा पर निगरानी रखने और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग जैसी चुनौतियों के बीच काम करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। कंपनी के पुराने SWITCH ड्रोन के बाद अब ZOLT जैसे नए सामरिक प्लेटफॉर्म के लिए भी सेना ने ऑर्डर दिए हैं।
| ड्रोन | ऑर्डर की जानकारी | भारतीय सेना में उपयोग |
| SWITCH 1.0 | 2021 में लगभग 2 करोड़ डॉलर (20 मिलियन डॉलर) का अनुबंध। कंपनी ने जनवरी 2022 में डिलीवरी पूरी होने की जानकारी दी। | ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में निगरानी और टोही। |
| ZOLT | नवंबर 2025 में लगभग ₹75 करोड़ का ऑर्डर। | सामरिक निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाना और टोही (ISR)। |
| SWITCH 2 / SWITCH V2 | नवंबर 2025 में लगभग ₹30 करोड़ का ऑर्डर। | निगरानी और टोही। |
| Hybrid Mini UAV | जून 2025 में लगभग ₹137 करोड़ का आपातकालीन खरीद ऑर्डर। निर्धारित डिलीवरी अवधि 12 महीने थी। | कठिन भूभाग में रनवे के बिना उड़ान भरकर निगरानी और टोही। |
| Q4i UAV | सरकारी रक्षा उत्पादन विभाग की वेबसाइट पर भारतीय सेना को इसके इस्तेमालकर्ता के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। ऑर्डर की राशि और तारीख की पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती। | सुरक्षा और निगरानी संबंधी कार्य। |
एक और इम्पॉर्टेंट बात ये कि ZOLT एक वर्टिकल टेक ऑफ लैंडिंग ड्रोन है यानी इसे उड़ने के लिए ना तो रनवे की ज़रूरत है ना किसी तरह के लॉन्चर की। इसी वजह से ये आसानी से कहीं से भी उड़ाया जा सकता है। और जब ये ख़ूबियां ZOLT के दोनों नये वर्जन के साथ जुड़ जाती हैं तो उन्हें और भी कारगर और भी ख़तरनाक बना देती हैं। तो अब आपको समझ में आ गया होगा कि ये दोनों ड्रोन क्यों डेवलप किये गये हैं और क्यों ऐसे ड्रोन्स की भारतीय सेनाओं को ज़रूरत है।








