2030 तक भारतीय नौसेना के सभी युद्धपोतों पर ब्रह्मोस!

By Defence Detective

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BRAHMOS TESTED FROM WARSHIP

भारतीय नौसेना ज़्यादा से ज़्यादा फ्रंटलाइन युद्धपोतों को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल से लैस करने की अपनी मुहिम तेज़ कर रही है और आने वाले सालों में पूरे बेड़े में इस हथियार को शामिल करने की दिशा में काम कर रही है। नौसेना का लक्ष्य अगले कुछ वर्षों में अपने लगभग सभी प्रमुख युद्धपोतों को ब्रह्मोस से लैस करना है।

India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक वर्ष में छह से अधिक ब्रह्मोस-सक्षम युद्धपोत नौसेना में शामिल किए गए हैं और वर्तमान में करीब 20 फ्रंटलाइन नौसैनिक जहाज इस मिसाइल को संचालित करने की क्षमता रखते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, नौसेना 2030 तक 200 से अधिक जहाजों को ब्रह्मोस फायर करने में सक्षम बनाने की दिशा में काम कर रही है।

यह योजना केवल मिसाइलों की संख्या बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं है। बल्कि इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में लंबी दूरी की सटीक मार, समुद्री क्षेत्र में प्रतिरोधक क्षमता और दुश्मन के सतही युद्धपोतों के विरुद्ध तेज तथा शक्तिशाली प्रहार की क्षमता को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराना है।

कैसे पड़ी इसकी नींव ?

इस विस्तार की महत्वपूर्ण आधारशिला फरवरी 2024 में रखी गई थी। उस समय भारत की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने भारतीय नौसेना के लिए 200 से अधिक ब्रह्मोस मिसाइलों की खरीद को लगभग 19,000 करोड़ रुपये की लागत से मंजूरी दी थी। इन मिसाइलों का बड़ा हिस्सा नौसेना के विभिन्न युद्धपोतों पर तैनात किया जाना था। इस पैकेज में लगभग 290 किलोमीटर की क्षमता वाले संस्करणों के साथ लगभग 450 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाले Extended Range संस्करण भी शामिल थे।

इसके बाद मार्च 2024 में रक्षा मंत्रालय ने ब्रह्मोस मिसाइलों और ship-borne BrahMos systems की खरीद के लिए ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ अनुबंध किए। रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक बयान में कहा गया था कि जहाज-आधारित ब्रह्मोस प्रणाली भारतीय रक्षा बलों के लिए खरीदी जा रही है।

इसका अर्थ यह है कि 2030 तक व्यापक तैनाती की वर्तमान योजना किसी एक नए फैसले पर आधारित नहीं है। इसके पीछे पहले से स्वीकृत मिसाइल खरीद, नए युद्धपोतों पर फैक्ट्री-फिटेड सिस्टम और पुराने प्लेटफॉर्मों पर retrofit—तीनों प्रक्रियाएं एक साथ चल रही हैं।

नए युद्धपोत बन रहे हैं ब्रह्मोस के मुख्य प्लेटफॉर्म

भारतीय नौसेना के स्वदेशी युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम के साथ ब्रह्मोस की तैनाती सीधे जुड़ी हुई है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण Project 17A Nilgiri-class stealth frigates हैं। 2026 में कमीशन किया गया INS Dunagiri ब्रह्मोस से लैस है। यह अत्याधुनिक हथियार और सेंसर प्रणाली से लैस stealth frigate है, जिसमें BrahMos surface-to-surface missiles के साथ medium-range surface-to-air missile प्रणाली भी शामिल है।

इसी वर्ग के INS Udaygiri और INS Himgiri भी आठ vertically launched BrahMos missiles से लैस हैं। इन युद्धपोतों में stealth design, electronic warfare और multi-role combat capabilities के साथ anti-surface, anti-air तथा anti-submarine warfare की क्षमता है।

जुलाई 2026 में कमीशन किया गया INS Mahendragiri भी इसी व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है। यह लगभग 6,670 टन का Project 17A stealth frigate है और BrahMos surface-to-surface missiles सहित आधुनिक air-defence तथा anti-submarine systems से लैस है।

इस तरह नौसेना के नए युद्धपोतों में ब्रह्मोस को बाद में जोड़ने की आवश्यकता कम होती जा रही है। मिसाइल प्रणाली को युद्धपोत के डिजाइन और combat-management architecture का हिस्सा बनाकर शुरू से ही शामिल किया जा रहा है।

पुराने युद्धपोत भी होंगे अपग्रेड

2030 की योजना का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू पुराने लेकिन अभी भी operationally relevant युद्धपोतों का आधुनिकीकरण है। केवल नए जहाजों को ब्रह्मोस देने से नौसेना की पूरी surface fleet में समान क्षमता विकसित नहीं हो सकती। इसलिए मौजूदा प्लेटफॉर्म्स पर launchers, fire-control systems और संबंधित combat architecture को upgrade करने पर भी जोर है।

अगस्त 2025 में Defence Acquisition Council ने नौसेना के लिए BrahMos missile fire-control systems और vertical launchers की खरीद को मंजूरी दी थी। यह कदम पुराने और मौजूदा प्लेटफॉर्मों की strike capability बढ़ाने की दिशा में था।

यानी आने वाले वर्षों में भारतीय नौसेना की BrahMos deployment strategy के दो समानांतर रास्ते होंगे—नए युद्धपोतों में integrated capability और पुराने जहाजों का retrofit

समुद्री युद्ध में ब्रह्मोस क्यों महत्वपूर्ण है?

ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत इसकी सुपरसोनिक गति, सटीकता और कम प्रतिक्रिया समय में है। समुद्री युद्ध में किसी बड़े surface combatant को लंबी दूरी से निशाना बनाने के लिए ऐसी मिसाइल, विरोधी जहाज को detect, track और engage करने के बीच उपलब्ध समय को कम कर सकती है।

भारतीय नौसेना के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की नौसैनिक गतिविधियां और उसकी दूर-दराज के समुद्री क्षेत्रों में मौजूदगी बढ़ रही है। भारतीय नौसेना को अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी और पश्चिमी प्रशांत तक समुद्री संचार मार्गों पर निगरानी तथा deterrence बनाए रखने के लिए लंबी दूरी की strike capability की आवश्यकता है।

ब्रह्मोस से लैस destroyer या frigate केवल अपने आसपास के समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा करने वाला प्लेटफॉर्म नहीं रहता, बल्कि वह एक mobile anti-surface strike platform बन जाता है। कई ऐसे युद्धपोत अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में तैनात किए जाएं तो किसी विरोधी नौसेना के लिए भारत के surface combatants को नजरअंदाज करना कठिन होगा।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा परिचालन महत्व

ब्रह्मोस के व्यापक नौसैनिक integration को हालिया युद्ध अनुभवों से भी गति मिली है। Operation Sindoor के दौरान ब्रह्मोस की operational relevance सामने आई और इसने सशस्त्र बलों के प्रमुख strike systems में अपनी जगह मजबूत की।

हालांकि नौसेना की समुद्री भूमिका अलग है, लेकिन किसी हथियार प्रणाली का वास्तविक combat environment में सफल इस्तेमाल उसके operational confidence, logistics और future procurement को प्रभावित करता है।

इसी वजह से ब्रह्मोस अब केवल एक anti-ship missile programme नहीं रह गया है, बल्कि भारत के broader precision-strike ecosystem का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

क्या है सामरिक संदेश?

भारत की यह नीति हिंद महासागर में sea control और sea denial दोनों क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में देखी जा सकती है। पश्चिम में पाकिस्तान की नौसैनिक क्षमता और पूर्व में चीन की बढ़ती maritime presence के बीच भारतीय नौसेना को ऐसे हथियारों की आवश्यकता है जो कम समय में लंबी दूरी तक निर्णायक प्रहार कर सकें।

इसके साथ ही ब्रह्मोस भारत की रक्षा औद्योगिक नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यह भारत-रूस संयुक्त उपक्रम से विकसित प्रणाली है, लेकिन इसके विभिन्न हिस्सों में लगातार स्वदेशीकरण बढ़ा है। भविष्य में उत्पादन क्षमता बढ़ने से भारतीय नौसेना की जरूरतों के साथ-साथ निर्यात क्षमता भी मजबूत हो सकती है। 2026 में इंडोनेशिया द्वारा ब्रह्मोस की खरीद का फैसला और दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ती रुचि इसका संकेत है।

निष्कर्ष क्या है?

2030 तक भारतीय नौसेना में ब्रह्मोस की व्यापक तैनाती का लक्ष्य भारत की maritime strike doctrine को एक नए स्तर पर ले जा सकता है। करीब 20 फ्रंटलाइन ब्रह्मोस-सक्षम युद्धपोतों से शुरुआत करते हुए नए युद्धपोतों की commissioning, पुराने platforms का retrofit और 2024 में स्वीकृत 200 से अधिक मिसाइलों की खरीद इस विस्तार की आधारशिला बन चुकी है।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह होगा कि ब्रह्मोस किसी चुनिंदा destroyer या frigate की विशेष क्षमता न रहकर भारतीय नौसेना के प्रमुख surface combatants की standard long-range strike capability बन जाए। यदि 2030 की योजना निर्धारित गति से आगे बढ़ती है, तो भारत के पास हिंद महासागर क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे युद्धपोत होंगे जो समुद्र में चलते-फिरते, नेटवर्क से जुड़े और सुपरसोनिक anti-surface strike platforms की तरह काम कर सकेंगे।

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