क्या पृथ्वी मिसाइल होने वाली है फेज़ आउट, कौन बनेगा वारिस ?

By Alok Ranjan

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पृथ्वी मिसाइल रिप्लेस होगी

पृथ्वी- भारत की पहली बैलेस्टिक मिसाइल, 1988 में अपने पहले टेस्ट और 1994 में सेना में शामिल किये जाने के बाद से लेकर आज तक ये भारत की मिसाइल क्षमता का मजबूत आधार रही है। लेकिन अब DRDO एक नई Next Generation Tactical Missile के डेवलपमेंट पर काम कर रहा है जो Prihvi Missile को रिप्लेस करने वाली है। इसमें सबसे बड़ा चेंज जो किया जाने वाला है वो है फ्यूल प्रॉपल्शन का। इसे समझने के लिए पहले आपको पृथ्वी मिसाइल की बेसिक जानकारी पता होनी चाहिए।

रणनीतिक महत्व

  • Prithvi-I: Army के लिए tactical strike capability।
  • Prithvi-II: Air Force को medium-range strike क्षमता।
  • Prithvi-III: Navy को sea-based deterrence और लंबी दूरी की क्षमता।

पृथ्वी-1 मिसाइल भारत के लिए खास क्यों ?

पृथ्वी 1 भारत की पहली स्वदेशी बैलेस्टिक मिसाइल है।पृथ्वी एक सरफेस टू सरफेस शॉर्ट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है। इसके तीन वर्जन हैं। आर्मी, एयरफोर्स और नेवल वर्जन। इसे पृथ्वी 1, पृथ्वी 2 और पृथ्वी तीन कहा जाता है।Prithvi-1 की रेंज 150 किलोमीटर है जबकि बाकी दोनों वर्जन की रेंज 350 किलोमीटर है।Prithvi-1 और Prithvi-2 में Single Stage Liquid Rocket Engine का इस्तेमाल किया जाता है जबकि Prithvi-3 में 2 Stage Solid+ Liquid Engine का। और यहीं ये मिसाइल नये ज़माने की मिसाइलों से मात खा रही है। असल में लिक्विड फ्यूल रॉकेट इंजन की तकनीक ना केवल आउटडेटेड हो रही है बल्कि ये आज की तेज़ होती जा रही लड़ाई में कारगर भी साबित नहीं हो पाएगी। इसलिए DRDO पृथ्वी की जगह लेने वाली मिसाइल को पूरी तरह से सॉलिड फ्यूल से चलने वाला बनाया जा रहा है।

लिक्विड फ्यूल इंजन

अब सवाल ये उठता है कि लिक्विड फ्यूल और सॉलिड फ्यूल से चलने वाली मिसाइलों की परफॉरमेंस में क्या अंतर होता है कि DRDO एक नई मिसाइल बनाने जा रहा है। अगर आप लिक्विड फ्यूल रॉकेट इंजन का ग्राफ देखेंगे तो इसके मूल रूप से दो हिस्से होते हैं- पहले हिस्से में फ्यूल होता है। ये Fuel- Turbojet Grade Kerosene या Liquid Hydrogen होता है। दूसरे हिस्से में Oxidizer होता है- ये Liquid Oxygen या Nitrogen Tetroxide होता है।इंजन में लगा पंप फ्यूल और Oxidizer को कंबन्शन चैंबर में भेजता है- वहां ये फ्यूल तेज़ी से जलने लगता है और रॉकेट में थ्रस्ट पैदा होता है।

सॉलिड फ्यूल इंजन

वहीं सॉलिड फ्यूल इंजन में एक ही चैंबर में फ्यूल और ऑक्सीडाइजर को ठोस रूप में मिला कर रखा जाता है। आम तौर पर Fuel के लिए Hydroxyl-terminated polybutadiene यानी HTPB और Ammonium Perchlorate Oxidizer का इस्तेमाल किया जाता है। ये दोनों एक साथ सॉलिड फॉर्म में रहते हैं और Ignition से जलना शुरू करते हैं। अब समझिये कि इन दोनों फ्यूल इंजन में अंतर क्या है।

लिक्विड फ्यूल इंजन vs सॉलिड फ्यूल इंजन

लिक्विड फ्यूल रॉकेट इंजन का पूरा सिस्टम बहुत कॉम्प्लैक्स होता है। दो चैंबर होते हैं जिनमें फ्यूल और ऑक्सिडाइजर होते हैं। कई वॉल्व्स लगे होते हैं जो इनके फ्लो को कंट्रोल करते हैं- पाइप्स और पंप होते हैं जबकि सॉलिड फ्यूल इंजन का सिस्टम बहुत साधारण होता है। इसमें कोई जटिलता नहीं होती। किसी पंप या वॉल्व का काम नहीं होता।लिक्विड रॉकेट इंजन वाली मिसाइल को हमले से पहले तैयार करने में समय लगता है। इसमें फ्यूल भर कर नहीं रखा जा सकता। ऑपरेशन से पहले इसमें फ्यूल डाला जाता है। इसलिए ये टाइम टेकिंग है जबकि सॉलिड फ्यूल वाली मिसाइलें रेडी टू फायर रहती हैं। लिक्विड फ्यूल वाली मिसाइलों को लाने ले जाने के साथ-साथ इस्तेमाल के वक्त भी फ्यूल लीक का ख़तरा बना रहता है जबकि सॉलिड फ्यूल इंजन के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। लिक्विड फ्यूल इंजन का मेन्टेनेन्स खर्चीला होता है जबकि सॉलिड फ्यूल इंजन उसके मुकाबले सस्ता होता है। लिक्विड फ्यूल के लिए एक कॉम्प्लैक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत पड़ती है जबकि सॉलिड फ्यूल इंजन को ना केवल आसानी से स्टोर कर सकते हैं बल्कि इनका ट्रांसपोर्टेशन भी आसान है।

वक्त के साथ अपग्रेड होना बेहद ज़रूरी

शॉर्ट रेंज की पृथ्वी मिसाइल का ऑपरेशन लिक्विड फ्यूल इंजन की वजह से ना केवल धीमा है बल्कि ख़तरनाक भी है। फायर टाइम ज़्यादा होने की वजह से लॉन्चर के इंटरसेप्ट होने का भी ख़तरा रहता है। हमले के ख़तरे से बचने के लिए इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी कम ख़तरनाक नहीं है। भारत की अग्नि मिसाइल भी सॉलिड फ्यूल इंजन पर ही काम करती है लेकिन ये लॉन्ग रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है। 500 किलोमीटर की रेंज वाली प्रलय मिसाइल भी सॉलिड फ्यूल से ही चलती है इसलिए DRDO पृथ्वी जैसी ही लेकिन सॉलिड फ्यूल इंजन वाली टैक्टिकल मिसाइल पर काम कर रहा है।

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