पार्ट:4- रेज़ांग-ला (Rezang-La) जब एक कुत्ते ने भारतीय जवान को चीनी पकड़ से आज़ाद करवाया

By Alok Ranjan

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चीनी पकड़ से कैसे भागे निहाल सिंह ?

20 नवंबर को यानी रेज़ांगला वॉर के ठीक दो दिन बाद चीन ने अचानक सीज़ फ़ायर का एलान कर दिया। इसके साथ ही चीन की फौज मैक मोहन लाइन से पीछे भी चली गई। लेकिन लड़ाई वाली रात ही यानी 18 नवंबर को निहाल सिंह चीनी सेना की क़ैद से निकल भागे। चीनी फौज ने उन्हें चीन सीमा के अंदर बने कैंप में बंदी बनाया हुआ था। उनके दोनों हाथों में गोलियां लगी थी लेकिन देर रात मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए वो कैंप से निकल गये। उन्हें इस बात का भी अंदाज़ा नहीं था कि वो किधर जा रहे हैं। कैंप में घूमने वाले एक कुत्ते ने उनकी मदद की। वो कुत्ता उन्हें इंडियन टेरिटोरी में ले आया। इस बीच चीनी सैनिकों को जैसे ही पता चला कि निहाल भाग निकले हैं, उन्होंने सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया लेकिन निहाल बचते-बचाते इंडियन आर्मी की पोस्ट तक पहुंच गये। उन्हें जम्मू के हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

सेना को क्यों लगा रेज़ांग-ला पर झूठ बोला गया ?

अपने मेजर के शव को एक पत्थर के पास बर्फ़ में दबा कर राम चंद्र हेड क्वॉर्टर पहुंच गये। ब्रिगेड कमांडर को सबकुछ बताया कि रेज़ांग ला में क्या हुआ, फिर कई दिनों बाद राम चंद्र को दिल्ली बुलाया गया। आर्मी के कई सीनियर अधिकारियों ने उनसे पूछताछ शुरू की। किसी को राम चंद्र की बातों पर यकीन नहीं था। जब राम चंद्र ने कहा कि रेज़ांगला में चार्ली कंपनी ने 1300 से अधिक चीनियों को मार गिराया है तो उन्हें ना केवल झूठा बताया बल्कि कोर्ट मार्शल की धमकी तक दे डाली। सबको यही लगता था कि या तो चार्ली कंपनी के ज़्यादातर जवानों को चीन ने प्रिज़नर्स ऑफ़ वॉर बना लिया या फिर वो लड़ाई के दौरान भाग गये। जम्मू में इलाज के दौरान निहाल सिंह ने भी राम चंद्र की कही बातें दोहराई। उन्होंने बताया कि जब चीनी सेना रेज़ांगला से लौट रही थी तो 25 ट्रकों में उनके फौजियों के शव भरे हुए थे। निहाल के मुताबिक मारे गये चीनी सैनिकों का आंकड़ा 1310 था।राम चंद्र अपनी बटालियन में लौट गये। दिन-महीने बीतते गये। आगे कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। अचानक फरवरी 1963 यानी लड़ाई के क़रीब 3 महीने बाद राम चंद्र को ब्रिगेड कमांडर की तरफ़ से चुशुल चलने का ऑर्डर मिला।

रेज़ांग-ला पर वीरगति को प्राप्त हुए जवानों के शव कैसे मिले

THE BRAVE किताब में रचना बिष्ट ने लिखा है कि चुशुल का एक चरवाहा घूमते-घूमते रेज़ांगला पहुंच गया। यहां उसने देखा कि यहां भारतीय सैनिकों के शव पड़े हुए हैं। वो भागता हुआ नीचे गया और इंडियन आर्मी के पोस्ट पर पहुंच कर उसने सारी बातें बताई।इसके बाद 13 कुमाऊं के ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर टी एन रैना के साथ-साथ कई अधिकारी मौक़े पर पहुंचे। हवलदार रामचंद्र को भी साथ ले जाया गया। जब ये लोग वहां पहुंचे तो जैसा रामचंद्र और निहाल सिंह ने बताया था सबकुछ वैसा का वैसा ही था। मेजर शैतान सिंह का शव उसी पत्थर के पास बर्फ़ में दबा था जहां राम चंद्र ने बताया था। सभी भारतीय फौजियों के शव उनकी ट्रेंच और उसके आसपास ही थे। कई जवानों के हाथों में बंदूकें थी। सब बर्फ़ की वजह से जम चुके थे। नर्सिंग अस्सिटेंट धर्मपाल दहिया के हाथों में मॉर्फिन से भरी सिरींज थी। सारे के सारे जवानों के सीने पर गोली लगी थी।

जब ब्रिगेडियर टी एन रैना रोने लगे

अपने जवानों के इस बेमिसाल बलिदान को देखकर ब्रिगेडियर टी एन रैना इतना रोये कि उनकी पत्थर की एक आंख भी बाहर निकल आई।सभी जवानों के शवों को एक जगह लाया गया। तब शहीदों के शवों का शहीद स्थल पर ही अंतिम संस्कार किया जाता था। लेकिन वहां दाह संस्कार के लिए लकड़ियां नहीं थी। पता चला कि पास ही एक स्कूल है जो खंडहर हो चुका है, वहां टूटी बेंच हैं। इंडियन आर्मी के जवान उस स्कूल से बेंच लेकर आ गये। ब्रिगेडियर टी एन रैना ने ख़ुद इन वीर जवानों को मुखाग्नि दी।मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर भेजा गया। उनका अंतिम संस्कार वहीं किया गया।13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी की बहादुरी ने बड़े-बड़े लड़ाकों और जंगबाज़ों को भी हैरत में डाल दिया।

अहीर रेजीमेंट की बहादुरी देख पूरा देश हैरान रह

भारत सरकार ने मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत देश के सबसे बड़े गैलेंट्री अवॉर्ड परमवीर चक्र से सम्मानित किया। हवलदार रामचंद्र को वीर चक्र और निहाल सिंह को सेना मैडल से सम्मानित किया गया। कुल 8 वीर चक्र और 4 सेना मैडल कंपनी को दिये गये। इसके साथ ही एक जवान को मेन्शन इन डिस्पैच से सम्मानित किया गया। 13 कुमाऊं के कमांडिंग ऑफ़िसर को अति विशिष्ट सेवा मैडल दिया गया।क्या कोई सोच सकता है कि 120 जवानों ने चीन के 1000 से अधिक फौजियों को ढेर कर दिया। कोई सोच सकता है कि चीनियों को अपने सैनिकों की डेड बॉडी उठाने के लिए एक-दो नहीं 25 ट्रक लगाने पड़े हों। 1962 की लड़ाई में चीन को सबसे ज़्यादा चोट रेज़ांगला में इन्हीं वीर अहीरों ने दी थी। भले ही आज तक चीन ने अपने मारे गये सैनिकों के सही नंबर नहीं बताये लेकिन ये झटका उसके लिए बहुत बड़ा था। वीर अहीरों की इस कंपनी ने चीन से जंग हार चुके भारत में नया जोश और जज़्बा भर दिया। ये मैसेज गया कि भले ही हम ये लड़ाई हार गये लेकिन चीन अजेय नहीं है। भारत के वीर चीन को भी हार का स्वाद चखा सकते हैं। रेजांगला के लड़ाकों और बहादुरों को सैल्यूट है|

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