दुनिया के युद्ध तेजी से बदल रहे हैं। कभी टैंक और लड़ाकू विमान युद्ध का सबसे बड़ा हथियार माने जाते थे, लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। यूक्रेन युद्ध ने साबित कर दिया है कि लाखों डॉलर की कीमत वाले हथियारों को कभी-कभी हजारों डॉलर के ड्रोन भी भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसी बदलती हकीकत को देखते हुए जापान ने अपनी नई रक्षा रणनीति में स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य का युद्ध Artificial Intelligence (AI), Combat Drones और Autonomous Systems के दम पर लड़ा जाएगा। यह केवल जापान की सैन्य नीति में बदलाव नहीं है, बल्कि एशिया की बदलती सुरक्षा व्यवस्था का संकेत भी है।
चीन का भारत, भूटान, ताइवान, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, जापान सहित विभिन्न देशों के साथ सीमाई विवाद है। जापान ने स्पष्ट रूप से चीन को अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती घोषित कर दिया है। हाल ही में जापानी कैबिनेट द्वारा स्वीकार 598 पेज के रक्षा पत्र में यह बात सामने आई है। प्रशांत महासागर में चीनी वारशिप की बढ़ती गतिविधियों और बार-बार मौजूदगी से जापान बेचैन है। जापानी रक्षा पत्र साफ कहता है कि चीन ने बिना किसी पारदर्शिता के लगातार अपने सैन्य खर्चों में बढ़ोत्तरी की है। परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को व्यापक रूप से और तेजी से मजूबत किया है।
इस सालाना श्वेत पत्र में जापान की सैन्य शक्ति के लिए हथियारों के उत्पादन पर जोर देने और टेक्नोलाजी को आवश्यक बताया गया है। चीन के खतरे से निपटने और यूक्रेन द्वारा रूस के विरुद्ध लड़ाकू ड्रोनों के घातक उपयोग से प्रेरित जापान ने ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए युद्धक हथियारों व तकनीकों को अपनाने की भी जोरदार वकालत की है।
आखिर जापान अपनी रक्षा नीति क्यों बदल रहा है?
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान ने लंबे समय तक सीमित सैन्य नीति अपनाई। उसका ध्यान मुख्य रूप से आत्मरक्षा पर रहा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एशिया का सुरक्षा माहौल तेजी से बदला है। इन परिस्थितियों ने टोक्यो को अपनी रक्षा रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया।
- चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति बढ़ा रहा है।
- ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ रहा है।
- पूर्वी चीन सागर में चीनी नौसेना की गतिविधियाँ तेज हुई हैं।
- उत्तर कोरिया लगातार बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण कर रहा है।
- रूस की सैन्य गतिविधियाँ भी जापान के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं।
सुरक्षा व सैन्य मजबूती के लिए क्या कदम उठा रहा जापान ?
जापान ने हाल के वर्षों में अपनी सैन्य क्षमता और खर्चों में भरपूर बढ़ोत्तरी की है। इसी कड़ी में जापानी सरकार वैज्ञानिक शोध और स्टार्टअप्स के लिए फंडिंग को बढ़ा रही है। घातक हथियारों के निर्यात पर लगे प्रतिबंध को हाल ही में हटाया गया है। इससे देश के अविकसित रक्षा उद्योग को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। चीन की सैन्य गतिविधयों से मुकाबले के लिए लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों को तैनात करना शुरू कर दिया है। विभिन्न देशों के मध्य एक से बढ़कर एक घातक लड़ाकू ड्रोन बनाने की होड़ मची हुई है। ऐसे में जापान सरकार लंबी रेंज की मिसाइलों के साथ अपने लडाकू ड्रोन बनाने को प्रियारिटी दे रही है।
- जापान ने हाल ही में काम्बैट ड्रोन के संदर्भ में 38 आवेदकों में से चार का चयन किया है। अंतिम चयन से पहले अगस्त की शुरुआत में जापान की नौसेना द्वारा उनका होगा परीक्षण।
- जापान में विभिन्न कंपनियां काम्बैट ड्रोन के लिए सक्रिय। बीते दिनों तोशिबा ने स्टार्टअप प्रो-ड्रोन के साथ संयुक्त रूप से काम्बैट ड्रोन बनाने की घोषणा की।
- घटती आबादी का सामना कर रहे जापान में मानवरहित ये हथियार सैन्यकर्मियों की कम संख्या की भी भरपाई कर सकते हैं।
- जापान की कमर्शियल ड्रोन मार्केट चीन आयात की जकड़ में।
- ऐसे में एक्सपर्ट के अनुसार जापान के लिए पूरी तरह से घरेलू ड्रोन बनान चुनौती होगा।
AI बनेगा युद्ध का नया कमांडर
जापान की नई रणनीति में Artificial Intelligence को विशेष महत्व दिया गया है। AI की मदद से भविष्य में ड्रोन स्वचालित मिशन पूरे कर सकेंगे। खतरे की पहचान कुछ सेकंड में हो सकेगी। मिसाइल हमलों की चेतावनी पहले मिल सकेगी। बड़ी मात्रा में मिलने वाले युद्ध संबंधी डेटा का विश्लेषण तुरंत किया जा सकेगा। विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म आपस में बेहतर तालमेल बना सकेंगे। हालाँकि अंतिम निर्णय इंसानों के हाथ में ही रहेगा, लेकिन AI निर्णय लेने की गति को कई गुना बढ़ा सकता है।
चीन के प्रमुख सीमा विवाद
- भारत – पूर्वी लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश (विशेषकर अक्साई चिन और तवांग क्षेत्र)
- भूटान – डोकलाम क्षेत्र
- जापान – सेनकाकू/दियाओयू द्वीप
- दक्षिण चीन सागर – फिलीपींस, वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों से समुद्री दावे पर टकराव
चीन और जापान के बीच क्या और क्यों है विवाद ?
इन दोनों देशों के विवाद का सबसे बड़ा कारण पूर्वी चीन सागर में स्थित सेनकाकू द्वीप (जापानी नाम) या दियाओयू द्वीप (चीनी नाम) को लेकर है। दोनों ही देश इस पर अपना दावा ठोंकते रहते हैं। यहां अक्सर तटरक्षक जहाजों का आमना-सामना होता रहता है। चीन और रूस के संयुक्त सैन्य अभ्यासों तथा अपनी सीमाओं के पास बढ़ती चीनी नौसेना की गतिविधियों पर पर भी जापान गहरी चिंता जता रहा है। जापान ने सेनकाकू पर 1895 में अधिकार प्राप्त किया और इस समय भी यहां का प्रशासन उसी के पास है। चीन इस द्वीप पर ऐतिहासिक आधार पर दावा जताता है कि यह क्षेत्र उसका रहा है। इस द्वीप के आसपास तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार होने की संभावना है। इसके अलावा विवाद और अविश्वास के कारणों में 1931 से 1945 के बीच जापान द्वारा चीन के कई क्षेत्रों पर कब्जा और उसके द्वारा किए गए अत्याचार भी हैं।
इसके अलावा हालिया तनाव-
- पिछले वर्ष दिसंबर में दक्षिण-पश्चिमी जापान के पास चीनी एयरक्राफ्टर करियर ड्रिल के दौरान जापान-चीन में तनाव देखने को मिला
- बीते जून में पहली बार दो चीनी एयरक्राप्टर करियर दक्षिणी जापानी द्वीप इवो जिमा के पास देखे गए थे।
- पिछले वर्ष नवंबर में जापानी पीएम सनाए तकाइची का यह कहना कि यदि चीन ताइवान पर हमला करता है और जापान के अस्तित्व को खतरा पैदा होता है तो जापान सैन्य बल प्रयोग कर सकता है।
जापान का यह फैसला भारत के संदर्भ में क्यों महत्वपूर्ण ?
एशिया में चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और उसकी दादागीरी का सामना न केवल जापान बल्कि भारत को भी करना पड़ता रहता है। ऐसे में जापान द्वारा भविष्य के युद्ध की तैयारी में काम्बैट ड्रोन और मानवरहित हथियारों पर दांव लगाने का निर्णय भारत के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। भारत और जापान दोनों ही चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधयों पर नजर रखे हुए हैं। एक ओर पूर्वी लद्दाख और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन का दबाव है, तो दूसरी ओर हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसका बढ़ता प्रभाव-गतिविधयां चिंता का सबब हैं। इसी कारण भारत-जापान, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के साथ क्वाड समूह में समुद्री सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और रक्षा साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं। इन सबके बीच जापान की नई रक्षा नीति दोनों देशों के रक्षा सहयोग को और गहरा कर सकती है।
भारत के लिए इसमें क्या सीख है?
भारत भी तेजी से ड्रोन और AI आधारित युद्ध प्रणालियों पर काम कर रहा है। DRDO, भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना कई स्वदेशी परियोजनाओं पर कार्य कर रहे हैं। हाल के वर्षों में स्वार्म ड्रोन, लॉयल विंगमैन जैसी अवधारणाओं और AI आधारित सैन्य प्रणालियों पर भारत का फोकस बढ़ा है। लेकिन जापान का उदाहरण यह बताता है कि भविष्य की लड़ाई केवल हथियार खरीदने से नहीं जीती जाएगी। इसके लिए आवश्यक होगा…
- घरेलू AI इकोसिस्टम,
- स्वदेशी ड्रोन उद्योग,
- इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता,
- सुरक्षित डेटा नेटवर्क,
- और मजबूत सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन।
चीन का दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से क्या है विवाद ?
चीन एक ऐसा देश है, जिसका पाकिस्तान और रूस जैसे पड़ोसी और आसपास के कुछ देशों को छोड़कर लगभग सभी से विवाद है। भारत और ताइवान के साथ उसके गंभीर विवाद अक्सर ही देखने को मिलते हैं। किंतु उसका वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया, ब्रुनेई, मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ भी गंभीर विवाद है। इस विवाद का प्रमुख कारण है दक्षिण चीन सागर, जिसके अधिकांश हिस्से को चीन ऐतिहासिक आधार पर पूरी तरह अपना मानता है। जबकि इसके विभिन्न हिस्सों-द्वीपों पर अलग-अलग देश अपना अधिकार मानते हैं। इस क्षेत्र में कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और मछली पकड़ने के विशाल भंडार हैं। दुनिया के कुल नौवहन व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।
- वियतनाम पैरासेल और स्प्रैटली द्वीप समूह के बड़े हिस्सों पर अपना अधिकार बताता है और चीन के दावों का कड़ा विरोध करता है।
- फिलीपींस स्प्रैटली द्वीप समूह के कुछ हिस्सों और स्कारबोरो शोल (Scarborough Shoal) पर अपना दावा करता है। उसने इसके खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में कानूनी जीत भी हासिल की है।
- ये दोनों देश दक्षिण चीन सागर के दक्षिणी हिस्सों और स्प्रैटली द्वीप के कुछ समुद्री क्षेत्रों पर अपना आर्थिक व संप्रभु अधिकार जताते हैं।
- इंडोनेशिया का मुख्य विवाद उसके नटुना द्वीप के पास के समुद्री और विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में चीनी घुसपैठ को लेकर है।
भविष्य के युद्ध के लिए जापान का संदेश
जापान की नई रक्षा नीति केवल उसके सैन्य आधुनिकीकरण का दस्तावेज़ नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि एशिया की प्रमुख शक्तियाँ अब भविष्य के युद्धों की तैयारी कर रही हैं। भारत के लिए भी यह समय है कि वह केवल आधुनिक लड़ाकू विमान या मिसाइलें खरीदने तक सीमित न रहे, बल्कि AI, Combat Drones, Electronic Warfare और स्वदेशी रक्षा तकनीकों में दीर्घकालिक निवेश बढ़ाए। जो देश इन क्षेत्रों में बढ़त बनाएगा, वही आने वाले दशकों में सैन्य संतुलन तय करेगा। इसलिए जापान का यह कदम केवल उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति नहीं, बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के बदलते सामरिक समीकरण का महत्वपूर्ण संकेत है।








