क्या भारत खरीदेगा पांचवीं पीढ़ी के आठ Su-57E ? रूस ने दिया प्रस्ताव

By Defence Detective

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Russian Su-57E fifth-generation stealth fighter jet in flight

भारत और रूस के बीच लड़ाकू विमान सहयोग को लेकर एक नया प्रस्ताव सामने आया है। रूस ने भारतीय वायुसेना को तत्काल क्षमता बढ़ाने के लिए आठ Su-57E पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान देने का प्रस्ताव रखा है। इस पैकेज में R-77M Beyond Visual Range Air-to-Air Missile (BVRAAM) को भी शामिल किए जाने की बात कही जा रही है, जिसकी रिपोर्टेड अधिकतम एंगेजमेंट रेंज करीब 200 किलोमीटर बताई गई है।

हालांकि भारत ने अभी तक इनकी खरीद का कोई आधिकारिक फ़ैसला नहीं लिया है, लेकिन रूस की तरफ़ से Su-57E को बढ़ावा देने के तहत यह प्रस्ताव आधिकारिक है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सार्वजनिक रूप से दोहराया है कि मॉस्को इन विमानों का संयुक्त रूप से उत्पादन करने और बड़े पैमाने पर तकनीकी सहयोग देने के लिए तैयार है।

यह प्रस्ताव चीन और पाकिस्तान के मुकाबले भारत की ‘स्टेल्थ’ क्षमता की कमी को कुछ समय के लिए पूरा करने के मकसद से लाया गया है, क्योंकि भारत का अपना AMCA प्रोग्राम अभी सेवा में आने में कई साल दूर है।

भारत ने पहले इस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोजेक्ट को ठुकरा दिया था, लेकिन मॉस्को ने भारतीय बाज़ार में दोबारा एंट्री करने की कोशिशें कभी नहीं छोड़ीं।

यह प्रस्ताव क्यों महत्वपूर्ण ?

आठ लड़ाकू विमान किसी पूर्ण ऑपरेशनल स्क्वाड्रन के बराबर नहीं है, बल्कि यह पैकेज लगभग आधे स्क्वाड्रन के बराबर है। भारतीय वायुसेना के लिए यह संख्या मुख्य रूप से एक शुरुआती या अंतरिम क्षमता के रूप में देखी जा सकती है। इसका उद्देश्य भारत को तुरंत पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की तकनीक और ऑपरेशनल अनुभव देना हो सकता है।

  • इस प्रस्ताव को बड़े पैमाने की खरीद के बजाय एक तरह के capability bridge के रूप में देखा जा रहा है।
  • भारत सीमित संख्या में Su-57E हासिल करके स्टील्थ ऑपरेशन, सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध की वास्तविक operational learning प्राप्त कर सकता है।
  • यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि जून 2026 में रूस इससे कहीं बड़ा प्रस्ताव सामने रख चुका है।
  • उस समय 36 से 60 Su-57E विमानों की तत्काल आपूर्ति और उसके बाद भारत में उत्पादन की संभावनाओं की रिपोर्ट सामने आई थी।

Su-57E में क्या है खास?

Su-57E रूस के Su-57 लड़ाकू विमान का निर्यात संस्करण है। रूस की आधिकारिक Rosoboronexport जानकारी के अनुसार यह एक बहुउद्देश्यीय पांचवीं पीढ़ी का विमान है, जिसे हवा, जमीन और समुद्री लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

  • इसका अधिकतम टेक-ऑफ वजन 34 टन। अधिकतम पेलोड 7,500 किलोग्राम
  • अधिकतम गति Mach 2 और अधिकतम उड़ान सीमा 2,800 किलोमीटर दी गई है।
  • इसका घोषित combat radius 1,250 किलोमीटर है।
  • रडार पर कम दिखाई देने के लिए low-observable airframe, angled surfaces और internal weapons bays का इस्तेमाल।
  • उच्च गति और भारी हथियार payload के लिए twin-engine configuration।
  • Infrared Search and Track प्रणाली radar emissions के बिना भी कुछ हवाई लक्ष्यों का पता लगाने में मदद कर सकती है।
  • विमान में electronic warfare और electronic countermeasure capabilities को integrate किया गया है। इसके साथ रूस की लंबी दूरी की air-to-air missiles, जिसमें R-77 family शामिल है, इस्तेमाल की जा सकती हैं।   

R-77M ?

रूस के प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा संभवतः R-77M है। इसे Izdeliye 180 के नाम से भी जाना जाता है और यह R-77 परिवार का उन्नत संस्करण है। इसका उद्देश्य लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल के रूप में आधुनिक लड़ाकू विमानों को निशाना बनाना है।

  • R-77M की अधिकतम रेंज करीब 200 किमी तक बताई जाती है। हालांकि वास्तविक प्रभावी combat range परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
  • R-77M में active radar seeker और dual-pulse solid-fuel rocket motor जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।
  • इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में dual-pulse propulsion है। इससे मिसाइल उड़ान के अलग-अलग चरणों में propulsion energy का बेहतर इस्तेमाल कर सकती है।
  • इसे अमेरिकी AIM-120D AMRAAM और चीन की PL-15 जैसी long-range air-to-air missiles के मुकाबले रूस के जवाब के रूप में देखा जाता है

चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में क्यों अहम?

भारत के लिए Su-57E प्रस्ताव का सबसे बड़ा रणनीतिक संदर्भ चीन की तेजी से बढ़ती stealth-fighter क्षमता है। चीन के पास J-20 operational service में है और उसकी संख्या लगातार बढ़ रही है। साथ ही छठीं जेनरेशन के प्रोटोटाइप का परीक्षण कर रहा है। पाकिस्तान के चीन से J-35 जैसे stealth fighter हासिल करने की संभावनाओं ने भी भारतीय वायुसेना की चिंता बढ़ाई है। भारत की स्क्वाड्रन क्षमता इस समय 30 से कम है, जबकि 40 से अधिक होनी चाहिए।

  • भारत के पास फिलहाल operational fifth-generation fighter नहीं है। Rafale, Su-30MKI, Mirage-2000 और MiG-29 जैसे प्लेटफॉर्म महत्वपूर्ण क्षमताएं देते हैं, लेकिन वे fifth-generation stealth aircraft नहीं हैं।
  • भारत का AMCA लगभग 2035 के आसपास operational होने की उम्मीद है।

AMCA के लिए अवसर या चुनौती?

यही इस प्रस्ताव का सबसे जटिल पहलू है। Su-57E खरीदने से भारत को तुरंत stealth platform मिल सकता है, लेकिन इसके लिए अलग प्रशिक्षण, maintenance infrastructure, spare parts, weapons inventory और operational doctrine तैयार करनी होगी।

दूसरी ओर, AMCA भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक प्राथमिकता है। यदि Su-57E पर बहुत बड़ा निवेश किया जाता है तो इसका असर AMCA के लिए उपलब्ध वित्तीय और औद्योगिक संसाधनों पर पड़ सकता है। विश्लेषकों ने भी चेताया है कि रूसी विमान खरीदने से स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के कार्यक्रम के लिए संसाधनों और प्राथमिकताओं का संतुलन प्रभावित हो सकता है।

इसलिए आठ विमानों का सीमित पैकेज और 100 या उससे अधिक विमानों का दीर्घकालिक उत्पादन कार्यक्रम रणनीतिक रूप से बिल्कुल अलग फैसले होंगे।

FGFA अनुभव और निष्कर्ष

भारत और रूस पहले भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पर साथ काम कर चुके हैं। Indo-Russian Fifth Generation Fighter Aircraft यानी FGFA कार्यक्रम में भारत की प्रमुख चिंताओं में technology sharing, work share, लागत और प्रदर्शन शामिल थे। DRDO की 2021 की एक प्रकाशित clipping में FGFA से भारत के बाहर निकलने के संदर्भ में thrust, supercruise और stealth से जुड़े प्रदर्शन संबंधी मुद्दों का उल्लेख किया गया था।

इस पुराने अनुभव के कारण नई Su-57E पेशकश में भारत के लिए सिर्फ विमान की कीमत महत्वपूर्ण नहीं होगी। सवाल होगा कि विमान कितना प्रभावी stealth platform है, उसकी sensor और EW capabilities कितनी स्वतंत्र रूप से upgrade की जा सकती हैं, engine की स्थिति क्या है और भारत को technology transfer की वास्तविक गहराई कितनी मिलेगी।

वहीं Su-57E की पेशकश का मामला केवल विमान खरीद तक सीमित नहीं है। रूस लंबे समय से भारत को स्थानीय उत्पादन और व्यापक technology transfer की पेशकश कर रहा है। यदि किसी समझौते में वास्तविक और व्यापक technology transfer, indigenous weapons integration तथा भविष्य के upgrades की स्वतंत्रता मिलती है, तो Su-57E केवल एक imported fighter नहीं रहेगा बल्कि भारतीय aerospace ecosystem के लिए technology-learning platform बन सकता है।

अंततः भारत के सामने विकल्प केवल “Su-57E या नहीं” का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि AMCA के आने तक भारत किस तरह अपने fighter squadron gap, चीन-पाकिस्तान की stealth capability और long-range air-to-air missile threat को संतुलित करे।

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