भारतीय नौसेना के प्रमुख कृष्णा स्वामीनाथन ने ग्लोबल भू-राजनीतिक तनावों और अस्थिर आपूर्ति श्रृंखलाओं (unstable supply chain) के बीच एक अहम और दूरदर्शी बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि भारत को ऐसी नौसेना तैयार करनी होगी जो बिना किसी बाहरी बाधा या निर्भरता के युद्ध लड़ सके, लंबे समय तक अपनी ताकत बनाए रख सके और बदलते खतरों के मुताबिक खुद को ढाल सके। इसके रास्ते में विदेशी सप्लाई या किसी बाहरी एजेंसी पर निर्भरता बाधा नहीं बननी चाहिए।
एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने यह संदेश देते हुए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को भारत की रणनीतिक जरूरत बताया है। 3 नवंबर 2026 को नई दिल्ली में ‘दिल्ली डिफेंस डायलॉग’ में बोलते हुए नौसेना प्रमुख ने रिसर्च एंड डेवलपमेंट यानी R&D पर खर्च बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया।
उन्होंने स्पेशल और उभरती टेक्नोलॉजी पर ज्यादा काम करने तथा महत्वपूर्ण कमियों को दूर करने पर जोर दिया। साथ ही कहा कि इनोवेशन को वास्तविक ऑपरेशनल क्षमता में बदलने की प्रक्रिया उचित समय के भीतर पूरी होनी चाहिए।
उनके बयान का फोकस भविष्य के लिए ऐसी सैन्य क्षमता तैयार करना है, जिसकी ताकत संकट के समय भी बनी रहे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया से अलग होना नहीं है।
युद्ध में सप्लाई रुकी तो कैसे बरकरार रहेगी नौसेना की ताकत?
एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने कहा कि दुनिया में बढ़ते राजनीतिक तनावों ने पुराने विवादों और ऐतिहासिक टकरावों को फिर उभार दिया है। उनके मुताबिक, राष्ट्रीय नीति के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए बल प्रयोग अब स्वीकार्य ही नहीं, बल्कि पसंदीदा विकल्प के तौर पर भी देखा जा रहा है।
ऐसे माहौल में भारत के लिए अपनी सैन्य क्षमता और उसे लगातार बनाए रखने की तैयारी मजबूत करना जरूरी है। यूक्रेन युद्ध का उदाहरण देते हुए उन्होंने संघर्ष के दौरान सप्लाई चेन और युद्धक क्षमता पर पड़ने वाले असर की ओर ध्यान दिलाया।
- इस बात को सैन्य तैयारी के संदर्भ में समझें तो शुरुआती हथियार भंडार के साथ उसकी भरपाई की व्यवस्था भी जरूरी है।
- लंबे संघर्ष में उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ता है, रखरखाव की जरूरत बढ़ती है और कुछ सिस्टम को बदलना भी पड़ सकता है।
- ऐसे में सवाल होता है कि जरूरी सामान कहां से आएगा और कितनी जल्दी उपलब्ध होगा।
- इस चुनौती को आसान भाषा में समझें तो युद्धपोत और हथियार उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। लंबे संघर्ष में उनके लिए गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और तकनीकी सपोर्ट भी लगातार चाहिए।
- इनमें किसी महत्वपूर्ण जरूरत की विदेशी सप्लाई बाधित होने पर ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित हो सकती है। यह उनके बयान का व्यावहारिक संदर्भ है।
- यदि किसी महत्वपूर्ण हिस्से के लिए बाहर से आने वाली सप्लाई का इंतजार करना पड़े, तो उसका असर तैयारी पर पड़ सकता है।
- घरेलू उत्पादन, मरम्मत और तकनीकी क्षमता इसी चुनौती से निपटने के साधन हैं।
इसीलिए नौसेना प्रमुख ने ऐसी नेवी बनाने पर जोर दिया जो बाहरी निर्भरता से बाधित हुए बिना लड़ सके, अपनी ताकत बनाए रख सके और बदलती परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढाल सके। इसके लिए घरेलू क्षमता का महत्व नए हथियार बनाने के साथ उनके रखरखाव, सुधार और जरूरत पड़ने पर उत्पादन बढ़ाने तक है।
कैसी नौसेना बनाना चाहते हैं एडमिरल स्वामीनाथन?
नौसेना प्रमुख ने जिस क्षमता पर जोर दिया, उसके तीन अहम हिस्से हैं—युद्ध लड़ना, अपनी सैन्य ताकत बनाए रखना और जरूरत के मुताबिक बदलाव करना। इसे आसान भाषा में समझें तो युद्धपोतों और हथियारों की उपलब्धता के साथ उन्हें लगातार इस्तेमाल करने की तैयारी भी जरूरी है।
- कोई युद्धपोत कितना भी आधुनिक क्यों न हो, उसे चलाने और उसके सिस्टम को तैयार रखने के लिए लगातार तकनीकी सपोर्ट चाहिए।
- समुद्र में तैनाती के दौरान किसी उपकरण में खराबी आने पर उसे ठीक करने की व्यवस्था होनी चाहिए। लंबे अभियान में हथियारों और दूसरे जरूरी सामान की उपलब्धता भी मायने रखती है।
- उनके संदेश का व्यावहारिक अर्थ यही है कि सैन्य ताकत का आकलन केवल प्लेटफॉर्म की संख्या से नहीं किया जा सकता।
- यह भी देखना होगा कि जरूरत पड़ने पर वे कितने समय तक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।
R&D पर अधिक खर्च की जरूरत क्यों बताई?
एडमिरल स्वामीनाथन ने महत्वपूर्ण कमियों को दूर करने, रिसर्च एंड डेवलपमेंट में खर्च बढ़ाने और नई तकनीक को समय पर नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता में बदलने पर जोर दिया। यानी R&D पर खर्च बढ़े, लैब से नई तकनीक नौसेना तक जल्दी पहुंचे। उनके बयान के तीन प्रमुख बिंदु हैं:
- महत्वपूर्ण कमियां दूर हों: नौसेना प्रमुख ने ‘क्रिटिकल गैप्स’ भरने की जरूरत बताई। इसका अर्थ सैन्य क्षमता को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण कमियों को दूर करना है। हालांकि, उन्होंने किसी खास हथियार, उपकरण या सिस्टम की कमी का नाम नहीं बताया।
- इनोवेशन समय पर बने ऑपरेशनल ताकत: उन्होंने कहा कि इनोवेशन को वास्तविक ऑपरेशनल क्षमता में बदलने की प्रक्रिया उचित समय के भीतर पूरी होनी चाहिए। व्यावहारिक तौर पर इसका मतलब है कि नई तकनीक सफल प्रदर्शन से आगे बढ़कर जरूरी परीक्षणों, उत्पादन और नौसेना में इस्तेमाल के चरण तक समय पर पहुंचे।
- रिसर्च में बढ़े निवेश का सैन्य फायदा तभी मिलेगा, जब उससे विकसित सिस्टम जरूरत के समय उपलब्ध हों।
विदेशी निर्भरता घटने से क्या फायदा होगा ?
स्वदेशी क्षमता बढ़ने का व्यावहारिक फायदा यह है कि सैन्य जरूरतों पर निर्णय लेने और उन्हें पूरा करने के अधिक विकल्प देश के भीतर उपलब्ध होते हैं। किसी उपकरण में बदलाव, मरम्मत या उत्पादन बढ़ाने की जरूरत हो तो घरेलू व्यवस्था पर काम किया जा सकता है।
इसीलिए नौसेना प्रमुख के बयान में लड़ने के साथ सस्टेन करने, यानी अपनी क्षमता लगातार बनाए रखने, पर जोर अहम है।
क्या मित्र देशों से रक्षा सहयोग कम होगा ?
नौसेना प्रमुख ने आत्मनिर्भरता को अलग-थलग होने से नहीं जोड़ा। उन्होंने मित्र देशों के साथ मजबूत स्थिति से सहयोग करने की बात कही। इस सोच में घरेलू क्षमता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग दोनों के लिए जगह है। भारत अपनी जरूरतों को समझते हुए साझेदारी करे और साथ ही ऐसी तकनीकी क्षमता विकसित करे जो आगे के फैसलों में मदद दे।
इसका सीधा अर्थ है कि सहयोग के साथ अपनी ताकत बढ़ाना जरूरी है। घरेलू उद्योग और रिसर्च का आधार मजबूत होगा तो साझेदारी में भारत की भूमिका भी अधिक प्रभावी हो सकती है।
अंडमान से मलक्का तक पर क्या बोले ?
कार्यक्रम में अंडमान-निकोबार और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को लेकर सवाल पर एडमिरल स्वामीनाथन ने कहा कि भारतीय नौसेना अपने विरोधियों की क्षमताओं से अच्छी तरह वाकिफ है। उन्होंने अंडमान-निकोबार के साथ लक्षद्वीप को भी नौसेना के लिए महत्वपूर्ण बताया और कहा कि समग्र क्षमता मजबूत करने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं।
मलक्का जलडमरूमध्य पर उन्होंने कहा कि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर होने वाले घटनाक्रम भारत को प्रभावित करते हैं, इसलिए नौसेना इस क्षेत्र पर करीबी नजर रखती है।
अंडमान-निकोबार की अहमियत मलक्का की ओर जाने वाले समुद्री रास्तों के निकट उसकी स्थिति से समझी जा सकती है। वहीं, लक्षद्वीप अरब सागर में भारत की समुद्री मौजूदगी के लिहाज से महत्वपूर्ण है।








