गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम की D-Company को “India-based” बताने वाली संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट (UN Special Rapporteur’s report) पर भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। भारत ने साफ कहा कि दाऊद सालों से भारत में वांछित (wanted) है और देश छोड़कर फरार हो चुका है। ऐसे में उसके नेटवर्क का परिचय देते समय इन तथ्यों को छोड़ना वास्तविकता से अलग तस्वीर पेश करता है।
संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि रघु पुरी ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा कि दाऊद उसी देश में रहता है, जहाँ ओसामा बिन लादेन मिला और मारा गया था। इस टिप्पणी के साथ भारत ने रिपोर्ट की भाषा पर सवाल उठाने के साथ दाऊद के पाकिस्तानी ठिकाने का मुद्दा भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर सामने रख दिया।
कब और कहाँ भारत ने दर्ज कराया विरोध?
भारत ने 21 अक्टूबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में कड़ा विरोध दर्ज कराया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव रघु पुरी (Raghoo Puri) ने विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट पर संवाद के दौरान भारतीय पक्ष रखा।
- पुरी ने रिपोर्ट में D-Company के लिए इस्तेमाल किए गए शब्दों पर विरोध जताते हुए कहा कि दाऊद के भारत से फरार होने और देश के बाहर रहकर आतंकवादी संगठनों से संबंध रखने का बैकग्राउंड स्पष्ट किया जाना चाहिए था।
- भारतीय विरोध का केंद्र यही था कि रिपोर्ट में दी गई जानकारी पाठक को संगठन के वास्तविक संचालन केंद्र के बारे में गलत धारणा दे सकती है।
किसकी रिपोर्ट पर खड़ा हुआ विवाद?
विवाद बेन सॉल (Ben Saul) की रिपोर्ट से जुड़ा है। वह आतंकवाद से मुकाबले के दौरान मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं के संरक्षण से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक (UN Special Rapporteur) हैं।
- उनकी रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान भारत ने तथ्यात्मक सटीकता और निष्पक्षता का सवाल उठाया।
- भारतीय पक्ष ने कहा कि विशेष प्रतिवेदकों की रिपोर्टों में गलतियाँ होने और उनके लिए जवाबदेही तय नहीं होने की स्थिति चिंताजनक है।
भारत की आपत्ति इसलिए भी तीखी थी क्योंकि रिपोर्ट में ऐसे व्यक्ति और नेटवर्क का उल्लेख किया गया है, जो भारत में आतंकवादी हमलों के मामलों से जुड़ा है। भारतीय प्रतिनिधि ने जोर दिया कि इस संदर्भ में घटनाओं का सही क्रम सामने रखना जरूरी है।
रिपोर्ट में D-Company को लेकर क्या लिखा था?
रिपोर्ट में कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 2003 में “India-based D-Company” के सरगना दाऊद इब्राहिम को अल-कायदा से संबंधों के कारण प्रतिबंध सूची में शामिल किया था।
- इसी विवरण में इस्तेमाल हुए “India-based”, यानी भारत स्थित अथवा भारत से संचालित, शब्दों पर भारत ने विरोध जताया।
- पुरी ने कहा कि इस पंक्ति को अलग से पढ़ने पर वास्तविक स्थिति से बिल्कुल अलग तस्वीर बनती है।
- भारतीय पक्ष का तर्क था कि रिपोर्ट ने 2003 की प्रतिबंध कार्रवाई का उल्लेख तो किया, लेकिन यह महत्वपूर्ण तथ्य छोड़ दिया कि दाऊद उससे बहुत पहले भारत से भाग चुका था।
- इस पृष्ठभूमि के बिना संगठन को “भारत स्थित” बताना उसकी मौजूदा स्थिति और नेतृत्व के ठिकाने को लेकर भ्रम पैदा करता है।
भारत ने जवाब में कौन से तथ्य सामने रखे?
रघु पुरी ने कहा कि दाऊद इब्राहिम और उसका आपराधिक संगठन 1993 के आतंकवादी हमलों के सिलसिले में भारत में वांछित हैं।
- दाऊद 2003 में संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल होने से काफी पहले भारत छोड़ चुका था।
- अल-कायदा और ओसामा बिन लादेन से संबंधों के कारण दाऊद को जिस अवधि की गतिविधियों के लिए सूचीबद्ध किया गया, उस दौरान वह भारत के बाहर था।
भारत ने इसी घटनाक्रम को रिपोर्ट में उचित संदर्भ के साथ रखने की जरूरत बताई। पुरी का कहना था कि प्रतिबंध लगाए जाने की वजहों का विवरण संयुक्त राष्ट्र की अपनी व्यवस्था में दर्ज है। ऐसे में रिपोर्ट तैयार करते समय उस पृष्ठभूमि को छोड़ना गंभीर चूक है।
ओसामा बिन लादेन का जिक्र कर पाकिस्तान को कैसे घेरा?
भारत के जवाब का सबसे तीखा हिस्सा दाऊद के ठिकाने को लेकर था। पुरी ने कहा कि वह उसी देश में रहता है, जहाँ ओसामा बिन लादेन मिला और मारा गया था।
यह पाकिस्तान की ओर सीधा इशारा था। इस टिप्पणी के जरिए भारत ने रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए “India-based” विवरण के सामने दाऊद के पाकिस्तान में रहने का अपना स्पष्ट पक्ष रख दिया।
भारतीय प्रतिनिधि ने इस बात पर जोर दिया कि दाऊद को भारत से जोड़कर पेश करते समय उसके भारत में वांछित होने और देश के बाहर रहने की वास्तविकता गायब नहीं होनी चाहिए। इस तरह रिपोर्ट की भाषा पर शुरू हुआ विरोध, पाकिस्तान में दाऊद के ठिकाने के सवाल तक पहुँचा।
UN के अपने रिकॉर्ड में दाऊद के बारे में क्या दर्ज है?
इस विवाद में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का आधिकारिक रिकॉर्ड अहम है। उसकी प्रतिबंध सूची में दाऊद इब्राहिम कासकर के कराची, पाकिस्तान के तीन पते दर्ज हैं। इनमें क्लिफ्टन और डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी क्षेत्र के पते भी शामिल हैं।
सुरक्षा परिषद के आधिकारिक विवरण के अनुसार, दाऊद को 3 नवंबर 2003 को प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया था। सूचीबद्ध करने का आधार अल-कायदा, ओसामा बिन लादेन और तालिबान से संबंधित गतिविधियों में समर्थन, वित्तीय मदद, सुविधाएँ उपलब्ध कराने अथवा हथियारों से जुड़े सहयोग जैसी श्रेणियाँ थीं।
यही रिकॉर्ड भारत की आपत्ति को महत्वपूर्ण संदर्भ देता है। एक तरफ विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट में D-Company के लिए “India-based” शब्द इस्तेमाल हुआ, जबकि सुरक्षा परिषद की सूची में उसके सरगना के पाकिस्तानी पते दर्ज हैं।
भारत ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर क्या कहा?
भारत ने अपनी आपत्ति केवल दो शब्दों तक सीमित नहीं रखी। पुरी ने कहा कि विशेष प्रतिवेदकों द्वारा तथ्यात्मक गलतियों वाली रिपोर्ट जारी करना और उसके लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाना अस्वीकार्य स्थिति है।
उन्होंने कहा कि इससे सदस्य देशों के सामने पहले से जारी रिपोर्ट रख दी जाती है और उन्हें बाद में उसमें मौजूद गलतियों का जवाब देना पड़ता है। भारतीय प्रतिनिधि ने चेताया कि ऐसी चूक संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाती है।
दाऊद के भारत से बाहर रहने की पृष्ठभूमि का उल्लेख नहीं करने को भारत ने खेदजनक बताया। भारतीय पक्ष ने रिपोर्ट में संदर्भ, सटीकता और जिम्मेदारी के सवाल को प्रमुखता से उठाया।
क्या दाऊद पर संयुक्त राष्ट्र ने कोई नया फैसला लिया है?
इस खबर का विषय दाऊद के खिलाफ कोई नया प्रतिबंध या सुरक्षा परिषद का नया फैसला नहीं है। विवाद विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट में इस्तेमाल भाषा और उसमें छोड़े गए तथ्यों को लेकर है। रिपोर्ट में जिस प्रतिबंध कार्रवाई का उल्लेख हुआ, वह 2003 की कार्रवाई है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना पक्ष स्पष्ट किया है।
दाऊद भारत में वांछित भगोड़ा है, जो देश के बाहर रहता है। उसके नेटवर्क का परिचय देते समय यह पृष्ठभूमि सामने रखी जानी चाहिए। “India-based” विवरण पर विरोध और लादेन के ठिकाने का जिक्र करके भारत ने दाऊद के पाकिस्तान में रहने के मुद्दे को फिर संयुक्त राष्ट्र की चर्चा में ला दिया है।
पहले भी UN की रिपोर्टों की भाषा और निष्पक्षता रही है सवालों के घेरे में
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र की किसी रिपोर्ट पर कड़ा विरोध जताया है। 14 जून 2018 को कश्मीर पर OHCHR की रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों को “सशस्त्र समूह” और आतंकवादियों को “नेता” बताए जाने पर भारत ने आपत्ति उठाई थी। विदेश मंत्रालय ने रिपोर्ट को भ्रामक, पक्षपातपूर्ण और दुर्भावना से प्रेरित बताते हुए खारिज किया था।
इसके बाद 8 जुलाई 2019 को जारी अद्यतन रिपोर्ट को भी भारत ने पहले के झूठे और दुर्भावनापूर्ण विवरण की निरंतरता बताया। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि रिपोर्ट सीमा पार आतंकवाद की मूल समस्या की अनदेखी करती है और भारत की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध है।








