अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ईरान को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने पहले से चल रहे अमेरिका-ईरान सैन्य टकराव को और गंभीर बना दिया है। 22 सितंबर 2026 को UN General Assembly में ट्रंप ने कहा कि उनके सामने ईरान के साथ समझौता करने या “इस्लामिक रिपब्लिक को खत्म” करने का विकल्प है।
ट्रंप ने साफ संकेत दिया कि अगर ईरान के साथ समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई जारी रखने या उसे और आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।
यह बयान आने के कुछ ही समय बाद ईरान के Armed Forces General Staff और Khatam al-Anbiya Central Headquarters की ओर से रिएक्शन सामने आया। ईरानी सैन्य नेतृत्व ने ट्रंप की धमकी को गंभीर सैन्य ताकत का संकेत मानने के बजाय इसे अमेरिकी घरेलू राजनीति और प्रचार से जोड़कर खारिज किया। साथ ही उसने और मजबूत जवाबी सैन्य कार्रवाई की सीधी चेतावनी भी दी।
ट्रंप ने UN में आखिर क्या कहा?
ट्रंप ने अपने भाषण में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों को अमेरिकी कार्रवाई का प्रमुख कारण बताया। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं देगा। इसके बाद उन्होंने ईरान के सामने दो रास्ते रखे:- समझौता या सैन्य कार्रवाई।

“मेरे सामने एक बड़ा फैसला है। क्या ईरान के साथ ऐसा समझौता होगा, जिससे वह दोबारा खड़ा हो सके और पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली देश बन सके, शायद मिडिल-ईस्ट या दुनिया के सबसे महान देशों में से एक? या फिर क्या मैं इस्लामिक रिपब्लिक (ईरान की मौजूदा शासन व्यवस्था) का पूरी तरह विनाश कर दूं और यह काम तेजी से करूं, ताकि उसे दोबारा लोगों और देशों को मारने और तबाह करने का मौका ही न मिले?”
Donald Trump, President, U.S.A
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के पास अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ मिसाइल और ड्रोन क्षमता का बड़ा भंडार है। यानी यह महज पुरानी तरह की राजनीतिक बयानबाजी नहीं थी। ट्रंप ने अपने भाषण में अमेरिकी सैन्य क्षमता और हथियारों के भंडार का भी उल्लेख किया।
ईरानी सेना ने और क्या पलटवार किया?
ट्रंप की धमकी को ईरानी सैन्य नेतृत्व ने ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अमेरिका की ‘रणनीतिक हताशा’ बताया। कहा कि ट्रंप की बार-बार की धमकियां जमीन की वास्तविक स्थिति पर आधारित नहीं हैं, बल्कि “domestic propaganda” का हिस्सा हैं।
ट्रंप के बयान अमेरिका की ताकत नहीं, बल्कि ईरान के खिलाफ उसकी कार्रवाई में “strategic deadlock” दिखाते हैं। वह UN जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल अमेरिका अपने सैन्य रुख को सही ठहराने और राजनीतिक संदेश देने के लिए कर रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात कि ईरानी सेना ने कहा कि ट्रंप की धमकियां शक्ति का संतुलन नहीं बदल सकतीं। ईरानी सशस्त्र बल पूरी तरह तैयार हैं। अगर और हमला हुआ तो अमेरिका और इजरायल के खिलाफ पहले से ज्यादा गंभीर, करारे और अप्रत्याशित हमले किए जाएंगे।
ईरानी सेना ने कहा कि उसकी तैयारी आठ साल के Iran-Iraq War (“Sacred Defense”) और उसके बाद के संघर्षों के अनुभव पर आधारित है।
धमकी के बीच बातचीत भी?
यहां कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। जिस दिन ट्रंप ने UN महासभा में ईरान को लेकर “Islamic Republic को annihilate” करने की धमकी दी, उसी दिन अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत भी हुई। यानी सार्वजनिक मंच पर कड़े सैन्य शब्द और पर्दे के पीछे कूटनीतिक संपर्क, दोनों एक साथ चलते रहे।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक, उनके विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर ने न्यूयॉर्क में ईरानी डेलिगेशन के साथ करीब तीन घंटे बैठक की। ट्रंप ने इसे “बहुत अच्छी” और “बहुत productive” बैठक बताया और कहा कि बातचीत आगे भी जारी रहेगी। उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें लगता है कि अंततः दोनों देशों के बीच कोई समझौता हो सकता है।
विटकॉफ ने बताया कि मध्यस्थ अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडलों के बीच लगातार संदेश लेकर आते-जाते रहे। ईरानी पक्ष ने भी बताया कि उसके विदेश मंत्री अब्बास अराघची और विटकॉफ के बीच संपर्क हुआ और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
ईरान बातचीत में क्या चाहता है?
ईरान ने बातचीत के दौरान अपनी कुछ शर्तें भी रखी हैं। इनमें युद्ध को समाप्त करना, अमेरिकी सैन्य दबाव और नौसैनिक नाकाबंदी हटाना तथा ईरान की जमी हुई संपत्तियों को रिलीज करना शामिल बताया गया है। सबसे बड़ा मुद्दा Strait of Hormuz है।
ईरानी अधिकारियों के अनुसार, अगर अमेरिका सैन्य दबाव कम करता है और ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी हटाता है, तो तेहरान Hormuz को फिर से खोलने पर चर्चा कर सकता है। एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में इसे करीब सात दिनों में खोला जा सकता है।
फिर ट्रंप की ‘ईरान मिटाने’ वाली धमकी क्यों?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा विरोधाभास है। एक तरफ ट्रंप समझौते की संभावना और बातचीत में “momentum” की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ उनका सार्वजनिक संदेश बेहद कठोर है। UN में उन्होंने ईरान के सामने समझौते और इस्लामिक रिपब्लिक को खत्म करने के बीच विकल्प रखने की बात कही।
ईरान की Armed Forces General Staff और Khatam al-Anbiya Central Headquarters ने इसके जवाब में अमेरिकी धमकी को खारिज करते हुए कहा कि किसी नए हमले की स्थिति में ईरान और ज्यादा गंभीर तथा अप्रत्याशित जवाब दे सकता है।
इसलिए फिलहाल तस्वीर को “युद्ध या बातचीत में से एक” कहना सही नहीं होगा। दोनों चीजें एक साथ चल रही हैं—सार्वजनिक रूप से सैन्य दबाव, और पर्दे के पीछे समझौते की कोशिश।
अब असली परीक्षा क्या है? आगे की दिशा तीन मुद्दे तय कर सकते हैं—
- परमाणु कार्यक्रम: अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना चाहता है।
- Strait of Hormuz: ईरान इसे बातचीत में महत्वपूर्ण leverage के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
- सैन्य दबाव: अगर बातचीत विफल होती है और कोई नया अमेरिकी या इजरायली हमला होता है, तो ईरानी सैन्य प्रतिक्रिया संकट को फिर तेज कर सकती है।
अमेरिका और ईरान के बीच अभी टकराव की क्या स्थिति ?
इस साल फरवरी से शुरू हुआ इनका बड़ा सैन्य संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। हाल के दिनों में Strait of Hormuz और आसपास के समुद्री क्षेत्र में दोनों पक्षों की सैन्य गतिविधियां और हमले हुए हैं। अमेरिका ने ईरानी तेल टैंकरों को निशाना बनाया है, जबकि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों/जहाजों और क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगियों से जुड़े लक्ष्यों पर मिसाइल-ड्रोन कार्रवाई की है।
यानी अमेरिका की ओर से सैन्य दबाव अभी बना हुआ है। लेकिन बातचीत के रास्ते भी हल निकालने के विकल्प बने हुए हैं। मौजूदा संकट में तीन मोर्चे एक साथ दिखाई दे रहे हैं।








