पार्ट:1- रेज़ांग-ला (Rezang-La) की लड़ाई, जिसने इतिहास रच दिया

By Alok Ranjan

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  • भारत और चीन के बीच 1962 की लड़ाई में रेज़ांग-ला का युद्ध हुआ था
  • मेजर शैतान सिंह ने इस युद्ध में अदम्य साहस और वीरात दिखायी थी
  • 124 भारतीय जवानों ने 3 हजार से ज्यादा चीनी सैनिकों से युद्ध किया
  • मेजर शैतान सिंह मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किए गए

वो लड़ाई जिसने इतिहास रच दिया

रेज़ांग-ला की ये लड़ाई 17 हज़ार फीट की ऊंचाई पर लड़ी गई, वो लड़ाई जिसमें एक तरफ़ केवल 124 जांबाज़ थे तो दूसरी तरफ़ क़रीब 3000। कई जगह चीनी फौजियों का नंबर 5000 भी बताया गया है। एक तरफ़ थ्री नॉट थ्री रायफल्स थीं तो दूसरी तरफ़ ऑटोमेटिक गन्स। एक तरफ़ सिर्फ़ मोर्टार और मशीनगन थी तो दूसरी तरफ़ पूरी आर्टिलरी, फिर भी भारतीय सैनिकों के पराक्रम ने एक ऐसी गाथा लिख दी, जिसकी मिसाल दुनिया में गिनी चुनी ही मिलती है | दादा किशन की जय का युद्धघोष करती हुई जब चार्ली कंपनी दुश्मनों पर बिजली बन कर गिरी तो चुशुल की वो सफ़ेद बर्फ़ से ढंकी घाटी चीनी सैनिकों के ख़ून से लाल हो गई। एक-एक हिंदुस्तानी फौजी आख़िरी गोली रहने तक लड़ा और फिर वीरगति को प्राप्त हो गया | चार्ली कंपनी का जवान मर गया लेकिन अपने ब्रिगेड कमांडर के उस ऑर्डर को पूरा किया जिसमें उन्होंने कहा था कि “आख़िरी गोली, आख़िरी आदमी” वो कंपनी लड़ी और क्या ख़ूब लड़ी। जब-जब भारतीय सैनिकों की जांबाज़ी का ज़िक्र किया जाता है, तब-तब रेजांगला के शहीदों का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है।

124 भारतीय वीर बनाम 3000 चीन

जैसे 499 BC में हुई ग्रीक और पर्सियन एंपायर की लड़ाई, जैसे 1897 में हुई सिख रेज़ीमेंट के 21 लड़ाकों और 10 हज़ार से अधिक अफ़गानी हमलावरों की लड़ाई, वैसे ही 124 इंडियन सोल्ज़र और 3000 से अधिक चीनी फौजियों के बीच हुई ये लड़ाई, 60 साल बीत चुके हैं। लद्दाख तक सड़क है और लोग एडवेंचर के लिए बाइक और कार से इस इलाक़े में घूम आते हैं, लेकिन हर कोई रेज़ांगला के इस स्मारक पर आकर ठिठक जाता है|हाथ जुड़ जाते हैं, सिर झुक जाते हैं, हिमालय के इन पहाड़ों को चूमता तिरंगा आज अगर यहां लहरा रहा है तो वो इन बलिदानी वीर सपूतों की वजह से ही है|आज भी वो वीर इसी जगह हैं, अपनी भारत माता की सीमाओं की रक्षा के लिए, उसी मिट्टी पर जहां वो शहीद हुए, उसी मिट्टी पर जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया| ये वही चार्ली कंपनी है जिनके 124 शेरों ने चीन के 3000 से अधिक फौजियों को टक्कर दी थी|वो चार्ली कंपनी जिनके 114 वीरों ने इसी धरती पर अपना बलिदान दे दिया, वो वीर अहीर इसी धरती की गोद में सो रहे हैं|

रेज़ाग-ला पर लड़ाई क्यों हुई ?

रेज़ांगला लद्दाख के चुशुल का एक इलाक़ा है। 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया था तो वो तेज़ी से चुशुल एयरस्ट्रिप की तरफ़ बढ़ रहा था। चुशुल एयरस्ट्रिप पर कब्ज़े का मतलब था लद्दाख के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा। चीन यहां गुरुंग हिल के पास स्पैंगुर गैप से आगे बढ़ रहा था। इंडियन आर्मी ने पहली बार टैंकों को एयरलिफ्ट किया और चीन को उसकी घुसपैठ पर करारा जवाब दिया। चुशुल एयर स्ट्रिप तक पहुंचने का एक और रास्ता था जो गैप पर तो नहीं था लेकिन पहाड़ के रास्ते चीनी सेना वहां पहुंच सकती थी। चुशुल एयर स्ट्रिप से क़रीब 10 किलोमीटर साउथ में ये था रेज़ांग ला। इंडियन आर्मी ने 13 कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी को यहां तैनात किया था। रक्षा मंत्रालय की gallantryawards.gov.in में इस लड़ाई के बारे में रिपोर्ट पब्लिश की गई थी। इसमें लिखा था कि 13 कुमाऊं अंबाला से जून 1962 में जम्मू-कश्मीर लाया गया था। जब लड़ाई के हालात बनने लगे तो उन्हें चुशुल भेज दिया गया। तब तक कुमाऊं रेजीमेंट के पास हाई एल्टिट्यूड में लड़ाई का कोई अनुभव नहीं था। 114 इन्फेंट्री ब्रिगेड के अंडर 13 कुमाऊं बटालियन को 2 अक्तूबर 1962 को लेह लाया गया। 10 दिन बाद उनका अगला ठिकाना चुशुल बना। 114 इन्फ्रेंट्री ब्रिगेड को चुशुल एयरस्ट्रिप की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

मेजर शैतान सिंह की कंपनी

इंडियन आर्मी को पूरा अंदेशा था कि चीनी सेना स्पैंगुर गैप से ही चुशुल की तरफ बढ़ेगी इसलिए सारा ज़ोर स्पैंगुर गैप के पास लगाया गया था | जबकि 13 कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी को इस जगह से क़रीब 30 किलोमीटर साउथ में रेज़ांग ला पर तैनात किया गया था। चार्ली कंपनी में 124 जवान थे जिसकी अगुवाई मेजर शैतान सिंह कर रहे थे। मेजर शैतान सिंह जोधपुर के रहने वाले थे |जबकि बाकि के जवान हरियाणा के रेवाड़ी और आसपास के थे। सारे जवान अहीर जाति के थे। इनमें से किसी ने भी तब ना तो इतनी ठंड झेली थी ना ही बर्फ़ देखी थी।कहते हैं ना, चोर चोरी से जाए लेकिन हेराफेरी से ना जाए। यही बात चीन पर भी बख़ूबी लागू होती है। लड़ाई के दौरान भी चीन कुछ इसी तरह से भारत को उलझाता रहा। चीनी सेना स्पैंगुर गैप से तो आगे बढ़ रही थी लेकिन उसकी असल प्लानिंग पीछे के रास्ते से चुशुल पर पहुंचना था। और ये रास्ता था रेज़ांग ला जहां इंडियन आर्मी तैनात तो थी लेकिन बहुत कम संख्या में। रेज़ांग ला की पोस्ट पर 120 जवान तैनात थे। 4 जवान पोस्ट से नीचे थे। उनकी ड्यूटी राशन और खाना बनाने की थी। नंबर 7 प्लाटून को जमादार सुमें चीनी सैनिक, टैंक और आर्टिलरी रेज़ांगला के सामने की पहाड़ी के गैप में गई।

18 नवंबर 1962 जब चीन ने हमला किया

सबको ये समझ में आ गया था कि चीन किसी भी वक़्त हमला करने वाला है। 17 नवंबर की रात क़रीब दस बजे से चुशुल में भारी बर्फ़बारी शुरू हो गई। दो घंटे बाद मौसम थोड़ा साफ़ हुआ। धुंध छट चुकी थी और सामने बिल्कुल साफ़ नज़र आ रहा था। हर कोई अपनी पोजिशन पर मुस्तैद था। और फ़िर वो वक़्त भी आ गया जब चार्ली कंपनी का चीन से मुक़ाबला हुआ, तारीख़ थी 18 नवंबर 1962, समय- क़रीब 3.30 बजे, रात के अंधेरे में LMG की ब्रस्ट फायरिंग ने हर किसी को चौंका दिया | इसके साथ ही फ्लेयर लाइट से पूरा आसमान लाल रोशनी से नहा उठा| फ़ायरिंग के बाद मेजर शैतान सिंह ने हवलदार राम चंदर से कहा कि पता करो फ़ायरिंग कहां हुई है।हवलदार राम चंदर ने 8 प्लाटून को फोन लगाया। जमादार हरि राम से बात हुई तो पता लगा कि सामने पहाड़ की गली से क़रीब 10 चीनी सैनिक पोस्ट की तरफ़ बढ़ रहे थे। लिसनिंग पोस्ट से LMG ने घुसपैठिये चीनियों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी। 10 में से 7 वहीं ढेर हो गये जबकि 3 वापस भाग गये। चीन का पहला हमला नाकाम हो चुका था। थोड़ी ही देर बाद 7 प्लाटून से कंपनी कमांडर के पास फोन आया। जमादार सुरजा राम ने बताया कि 500 से अधिक चीनी फौजी सामने पहाड़ की गली से आगे बढ़ रहे हैं। चार्ली कंपनी ने इस गली का Code Name मैना रखा था। सुरजा राम के फोन के बाद सब तैयार हो गये। दुश्मन तब दूर था।

आगे क्या हुआ जानने के लिए पार्ट-2 पढ़ें

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