भारत-चीन युद्ध सीरीज़ में आज बात होगी उस लड़ाई की,जो दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाइयों में गिनी जाती है। वो लड़ाई जो 17 हज़ार फीट की ऊंचाई पर लड़ी गई, वो लड़ाई जिसमें एक तरफ़ केवल 124 जांबाज़ थे तो दूसरी तरफ़ क़रीब 3000। कई जगह चीनी फौजियों का नंबर 5000 भी बताया गया है। एक तरफ़ थ्री नॉट थ्री रायफल्स थीं तो दूसरी तरफ़ ऑटोमेटिक गन्स। एक तरफ़ सिर्फ़ मोर्टार और मशीनगन थी तो दूसरी तरफ़ पूरी आर्टिलरी, फिर भी भारतीय सैनिकों के पराक्रम ने एक ऐसी गाथा लिख दी, जिसकी मिसाल दुनिया में गिनी चुनी ही मिलती है | दादा किशन की जय का युद्धघोष करती हुई जब चार्ली कंपनी दुश्मनों पर बिजली बन कर गिरी तो चुशुल की वो सफ़ेद बर्फ़ से ढंकी घाटी चीनी सैनिकों के ख़ून से लाल हो गई। एक-एक हिंदुस्तानी फौजी आख़िरी गोली रहने तक लड़ा और फिर वीरगति को प्राप्त हो गया | चार्ली कंपनी का जवान मर गया लेकिन अपने ब्रिगेड कमांडर के उस ऑर्डर को पूरा किया जिसमें उन्होंने कहा था कि “आख़िरी गोली, आख़िरी आदमी” वो कंपनी लड़ी और क्या ख़ूब लड़ी। जब-जब भारतीय सैनिकों की जांबाज़ी का ज़िक्र किया जाता है, तब-तब रेजांगला के शहीदों का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है।
जैसे 499 BC में हुई ग्रीक और पर्सियन एंपायर की लड़ाई, जैसे 1897 में हुई सिख रेज़ीमेंट के 21 लड़ाकों और 10 हज़ार से अधिक अफ़गानी हमलावरों की लड़ाई, वैसे ही 124 इंडियन सोल्ज़र और 3000 से अधिक चीनी फौजियों के बीच हुई ये लड़ाई, 60 साल बीत चुके हैं। लद्दाख तक सड़क है और लोग एडवेंचर के लिए बाइक और कार से इस इलाक़े में घूम आते हैं, लेकिन हर कोई रेज़ांगला के इस स्मारक पर आकर ठिठक जाता है|हाथ जुड़ जाते हैं, सिर झुक जाते हैं, हिमालय के इन पहाड़ों को चूमता तिरंगा आज अगर यहां लहरा रहा है तो वो इन बलिदानी वीर सपूतों की वजह से ही है|आज भी वो वीर इसी जगह हैं, अपनी भारत माता की सीमाओं की रक्षा के लिए, उसी मिट्टी पर जहां वो शहीद हुए, उसी मिट्टी पर जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया| ये वही चार्ली कंपनी है जिनके 120 शेरों ने चीन के 3000 से अधिक फौजियों को टक्कर दी थी|वो चार्ली कंपनी जिनके 114 वीरों ने इसी धरती पर अपना बलिदान दे दिया, वो वीर अहीर इसी धरती की गोद में सो रहे हैं|
चुशुल में बने रेज़ांगला म्यूज़िम में रखी कई चीज़ें इस लड़ाई की कहानी सुना रही हैं|इस वॉटर बोटल को देखिये। ये बोतल नायक गुलाब सिंह की है। इस पर पड़े गोलियों के निशान देख रहे हैं आप? एक छोटी सी बोतल पर गोलियों के 5 निशान हैं तो ज़रा सोचिये वहां तैनात भारतीय फौजियों ने कितनी गोलियां झेली होंगी। ये जमादार हरि राम की साबुनदानी है। (hari ram soap case) ये भी रेज़ांगला म्यूज़ियम में रखी गई है। इसका हाल देखिये। ऐसी सैकड़ों चीज़ें इस म्यूज़ियम में रखी गई हैं ताकि देश और दुनिया ये देख सके, महसूस कर सके कि वो वीर बलिदानी कैसे लड़े, कैसे देश के लिए कुर्बान हो गये। रेज़ांगला लद्दाख के चुशुल का एक इलाक़ा है। 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया था तो वो तेज़ी से चुशुल एयरस्ट्रिप की तरफ़ बढ़ रहा था। चुशुल एयरस्ट्रिप पर कब्ज़े का मतलब था लद्दाख के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा। चीन यहां गुरुंग हिल के पास स्पैंगुर गैप से आगे बढ़ रहा था। इंडियन आर्मी ने पहली बार टैंकों को एयरलिफ्ट किया और चीन को उसकी घुसपैठ पर करारा जवाब दिया। चुशुल एयर स्ट्रिप तक पहुंचने का एक और रास्ता था जो गैप पर तो नहीं था लेकिन पहाड़ के रास्ते चीनी सेना वहां पहुंच सकती थी। चुशुल एयर स्ट्रिप से क़रीब 10 किलोमीटर साउथ में ये था रेज़ांग ला। इंडियन आर्मी ने 13 कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी को यहां तैनात किया था।
रक्षा मंत्रालय की gallantryawards.gov.in में इस लड़ाई के बारे में रिपोर्ट पब्लिश की गई थी। इसमें लिखा था कि 13 कुमाऊं अंबाला से जून 1962 में जम्मू-कश्मीर लाया गया था। जब लड़ाई के हालात बनने लगे तो उन्हें चुशुल भेज दिया गया। तब तक कुमाऊं रेजीमेंट के पास हाई एल्टिट्यूड में लड़ाई का कोई अनुभव नहीं था। 114 इन्फेंट्री ब्रिगेड के अंडर 13 कुमाऊं बटालियन को 2 अक्तूबर 1962 को लेह लाया गया। 10 दिन बाद उनका अगला ठिकाना चुशुल बना। 114 इन्फ्रेंट्री ब्रिगेड को चुशुल एयरस्ट्रिप की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।इंडियन आर्मी को पूरा अंदेशा था कि चीनी सेना स्पैंगुर गैप से ही चुशुल की तरफ बढ़ेगी इसलिए सारा ज़ोर स्पैंगुर गैप के पास लगाया गया था | जबकि 13 कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी को इस जगह से क़रीब 30 किलोमीटर साउथ में रेज़ांग ला पर तैनात किया गया था। चार्ली कंपनी में 124 जवान थे जिसकी अगुवाई मेजर शैतान सिंह कर रहे थे। मेजर शैतान सिंह जोधपुर के रहने वाले थे |जबकि बाकि के जवान हरियाणा के रेवाड़ी और आसपास के थे। सारे जवान अहीर जाति के थे। इनमें से किसी ने भी तब ना तो इतनी ठंड झेली थी ना ही बर्फ़ देखी थी।कहते हैं ना, चोर चोरी से जाए लेकिन हेराफेरी से ना जाए। यही बात चीन पर भी बख़ूबी लागू होती है। लड़ाई के दौरान भी चीन कुछ इसी तरह से भारत को उलझाता रहा। चीनी सेना स्पैंगुर गैप से तो आगे बढ़ रही थी लेकिन उसकी असल प्लानिंग पीछे के रास्ते से चुशुल पर पहुंचना था। और ये रास्ता था रेज़ांग ला जहां इंडियन आर्मी तैनात तो थी लेकिन बहुत कम संख्या में।
रेज़ांग ला की पोस्ट पर 120 जवान तैनात थे। 4 जवान पोस्ट से नीचे थे। उनकी ड्यूटी राशन और खाना बनाने की थी। नंबर 7 प्लाटून को जमादार सुरजा सिंह कमांड कर रहे थे, ये प्लाटून पोस्ट की उत्तर में तैनात थी। जमादार हरि राम की अगुवाई वाली 8 प्लाटून दर्रे की तरफ़ थी, सेंट्रल पोस्ट पर 9 प्लाटून के साथ जमादार राम चंदर तैनात थे। सेंट्रल पोस्ट के पास कंपनी हेड क्वॉर्टर था। नायक राम सिंह यादव पीछे की ढलान पर मोर्टार सेक्शन के साथ मुस्तैद थे।हर प्लाटून में क़रीब 25 जवान शामिल थे। क़रीब 3 किलोमीटर के इलाक़े में ये तीनों प्लाटून तैनात की गई थी। कंपनी के पास टोटल 9 LMG थी, सैनिकों के पास 303 एनफिल्ड रायफल और 600 गोलियां थीं। ये रायफल सेकेंड वर्ल्ड वॉर की थी और इसमें एक गोली फायर करने के बाद दोबारा लोड करनी पड़ती थी। चार्ली कंपनी के पास 3 इंच और 2 इंच मोर्टार थे जिनके लिये 1000 रॉकेट्स दिये गये थे। इस बटालियन के पास ना तो लैंड माइन्स थी और ना ही आर्टिलरी सपोर्ट। इतना ही नहीं जमा देने वाली इस ठंड में इनके पास ना तो सही गर्म कपड़े और जूते थे ना ही टेंट। इतना ही नहीं, खाना खाना भी इनके लिए मुहाल हो गया था। इतनी ठंड में ना सब्ज़ियां पकती थीं, ना दाल गलती थी। बावजूद इसके क़रीब माइनस 30 डिग्री टेम्प्रेचर, शरीर को चीर देने वाली हवा और भारी बर्फ़बारी के बीच चार्ली कंपनी डटी हुई थी।
रचना सिंह बिष्ट ने परवमीर विजेताओं पर एक किताब THE BRAVE’ लिखी है। इसमें भी उन्होंने हवलदार रामचंद्र के हवाले से बताया है कि पतली जर्सी, पतला कोट और कॉटन पैंट पहने जवानों का वहां टिकना मुश्किल हो रहा था। इंडियन आर्मी की 114 इन्फेंट्री अब चीनी दुश्मनों से मुक़ाबले के लिए तैयार थी। मिशन एक ही था। चुशुल एयरस्ट्रिप की तरफ़ बढ़ने वाले दुश्मन के हर एक क़दम का मुंहतोड़ जवाब देना। लड़ाई 19 अक्तूबर को छिड़ चुकी थी। दुश्मन सेना तेज़ी से एक-एक पोस्ट पर कब्ज़ा करती हुई आगे बढ़ रही थी। अब ख़तरा चुशुल पर था लेकिन इसी बीच 4 दिन की लड़ाई के बाद भारत और चीन के बीच बातचीत शुरू हो गई। चीन ने भी अपनी सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया। अब दोनों सेनाएं एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी थी। क़रीब 3 हफ़्ते तक यही स्थिति बनी रही। बातचीत से कोई समाधान नहीं निकला तो दोनों देशों के बीच लड़ाई फिर शुरू हो गई। 14 नवंबर को शुरू हुई लड़ाई में चुशुल में हमला 18 तारीख़ को हुआ। चीन ने एक साथ स्पैंगुर गैप और रेज़ांग ला पर अटैक किया।चीन ने इस बार हमले की शुरुआत NEFA यानी अरुणाचल प्रदेश से की लेकिन ये साफ़ था कि वो किसी भी समय लद्दाख में भी अटैक करेगा।
13 कुमाऊं के ब्रिगेड कमांडर को मालूम था कि चीन अगर हमला करता है तो उसके पास ना केवल हथियार ज़्यादा होंगे बल्कि फौजी भी बहुत ज़्यादा संख्या में होंगे। इसलिए चार्ली कंपनी को ऑर्डर दिया गया कि एम्युनिशन ख़त्म होने पर कंपनी पीछे हट जाए। लेकिन जब ये संदेश मेजर शैतान सिंह ने अपने फौजियों को सुनाकर उनसे राय ली तो एक भी फौजी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं था। सबने एक सुर में कहा कि भले ही जान चली जाए लेकिन पोस्ट नहीं छोड़ेंगे। कंपनी रेज़ांग ला में डटी रही।17 नवंबर की शाम आउट पोस्ट पर तैनात फौजी ने आकर रिपोर्ट दी। उसने बताया कि भारी संख्या में चीनी सैनिक, टैंक और आर्टिलरी रेज़ांगला के सामने की पहाड़ी के गैप में गई। फौजी की इस रिपोर्ट के बाद सबको ये समझ में आ गया था कि चीन किसी भी वक़्त हमला करने वाला है। 17 नवंबर की रात क़रीब दस बजे से चुशुल में भारी बर्फ़बारी शुरू हो गई। दो घंटे बाद मौसम थोड़ा साफ़ हुआ। धुंध छट चुकी थी और सामने बिल्कुल साफ़ नज़र आ रहा था। हर कोई अपनी पोजिशन पर मुस्तैद था।
और फ़िर वो वक़्त भी आ गया जब चार्ली कंपनी का चीन से मुक़ाबला हुआ, तारीख़ थी 18 नवंबर 1962, समय- क़रीब 3.30 बजे, रात के अंधेरे में LMG की ब्रस्ट फायरिंग ने हर किसी को चौंका दिया |इसके साथ ही फ्लेयर लाइट से पूरा आसमान लाल रोशनी से नहा उठा|फ़ायरिंग के बाद मेजर शैतान सिंह ने हवलदार राम चंदर से कहा कि पता करो फ़ायरिंग कहां हुई है।हवलदार राम चंदर ने 8 प्लाटून को फोन लगाया। जमादार हरि राम से बात हुई तो पता लगा कि सामने पहाड़ की गली से क़रीब 10 चीनी सैनिक पोस्ट की तरफ़ बढ़ रहे थे। लिसनिंग पोस्ट से LMG ने घुसपैठिये चीनियों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी। 10 में से 7 वहीं ढेर हो गये जबकि 3 वापस भाग गये। चीन का पहला हमला नाकाम हो चुका था। थोड़ी ही देर बाद 7 प्लाटून से कंपनी कमांडर के पास फोन आया। जमादार सुरजा राम ने बताया कि 500 से अधिक चीनी फौजी सामने पहाड़ की गली से आगे बढ़ रहे हैं। चार्ली कंपनी ने इस गली का Code Name मैना रखा था। सुरजा राम के फोन के बाद सब तैयार हो गये। दुश्मन तब दूर था। THE BRAVO में रचना बिष्ट ने लिखा है कि मेजर शैतान सिंह ने तब तक फायरिंग के ऑर्डर नहीं दिये जब तक चीनी 300 गज की रेंज में नहीं आ गये। जैसे ही वो रेंज में आये, मेजर शैतान सिंह ने ऑर्डर दे दिया और इसके साथ ही 7 प्लाटून की 3 LMG और 9 प्लाटून की 2 LMG ने एक साथ फ़ायरिंग शुरू कर दी। इसके साथ ही मोर्टार को मैना गैप में फायरिंग करने का ऑर्डर दिया गया। LMG और मोर्टार की एक साथ हुई फ़ायरिंग ने चीनी फौज पूरी तरह तबाह हो गई। सैकड़ों की संख्या में चीनी फौजी मैना गैप में मारे गये। रेज़ांगला पर चीन का दूसरा अटैक भी फेल हो चुका था।
इधर 8 प्लाटून ने ख़बर की कि क़रीब 800 चीनी फौजी तेज़ी से उनकी पोस्ट की तरफ़ बढ़ रहे हैं। हवलदार राम चंद्र ने बताया कि मेजर शैतान सिंह ने जमादार हरि राम से कहा- आप वीर अहीर हैं, पूरे जोश से लड़िये। अपने मेजर की बात सुन कर हरि राम ने भी जवाब दिया- आप चिंता ही मत करिये साहब, हम लड़ेंगे।इस बार भी जैसे ही चीन के सैनिक रेंज में आए, 8 प्लाटून और 9 प्लाटून के साथ-साथ निहाल सिंह ने भी अपनी LMG से उन पर आग बरसानी शुरू कर दी। एक साथ 7-8 LMG से बरसती गोलियों ने 100 से ज़्यादा चीनी फौजियों को वहीं ढेर कर दिया। बाकी पीठ दिखा कर भाग गये। इस बार भी चीनी फौजियों का अटैक फेल हो गया।थोड़ी देर बाद 7 प्लाटून ने चीनी फौजियों के आगे बढ़ने की ख़बर दी। इस बार चीनियों की तादाद 1000 के क़रीब थी। तीनों प्लाटून ने इस बार भी उन्हें आगे तक आने दिया और फ़िर एक साथ हमला बोला। LMG की फ़ायरिंग के बाद रेज़ांगला की बर्फ़ से ढंके गैप चीनी सैनिकों के ख़ून से लाल हो गये।
चार्ली कंपनी ने फ़ायरिंग बंद ही की कि चीन की तरफ़ से RCL GUNS और मोर्टार से फ़ायरिंग शुरू हो गई। चीनी फौज 120, 81 और 60mm के मोर्टार से गोले बरसा रही थी। इसके साथ ही 75mm और 57mm के RCL गन्स से भी बमबारी की जा रही थी। और तो और मजबूत चट्टानों को भी तोड़ने में सक्षम 132mm के रॉकेट भी चार्ली कंपनी पर बरस रहे थे। इस भारी गोलाबारी ने चार्ली कंपनी के जवानों के लिए बनाये शेल्टर को तबाह कर दिया। बंकरों को ध्वस्त कर दिया। वायरलेस सिस्टम पूरी तरह टूट गया। टेलीफोन लाइन भी कट गई। चीनी फौज इतनी बमबारी कर रही थी कि चार्ली कंपनी को संभलने का मौक़ा तक नहीं मिल रहा था। इस हमले में एक जवान वीरगति को प्राप्त हो गया जबकि दूसरे का पैर कट कर अलग हो गया। क़रीब 5-6 और सैनिक इस हमले में घायल हो गये। फौरन नर्सिंग स्टॉफ धर्मपाल सिंह दहिया ने सबकी मरहम-पट्टी करनी शुरू दी।इसी बीच मेजर शैतान सिंह की बांह में भी रॉकेट का एक टुकड़ा आ कर लगा ।अब तक सुबह के क़रीब 7.30 बज चुके थे।उजाला होने लगा था। अचानक फौजियों की नज़र अपने पीछे की रिज पर पड़ी तो याक का झुंड आगे बढ़ता नज़र आया। पहले तो चार्ली कंपनी को लगा कि हेडक्वॉर्टर से उन्हें मदद भेजी गई है लेकिन जब दूरबीन से देखा तो पता चला कि याक के झुंड के साथ-साथ चीनी फौज बढ़ी चली आ रही है।
मेजर शैतान सिंह ने मोर्टार से बमबारी का आदेश दिया। इस बमबारी में कई चीनी फौजी मारे गये लेकिन तब क वो 4 HMG और RCL सेट कर चुके थे। चीनी फौज अब दो तरफ़ से चार्ली कंपनी पर हमला कर रही थी। इस फ़ायरिंग में मेजर शैतान सिंह को तीन गोलियां लग गई लेकिन वो अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। इधर घायल होने के बावजूद उन्होंने रायफल उठाई और रिज़ की तरफ़ से मीडियम मशीन गन से फायर करने वाले चीनी सैनिक को ढेर कर दिया। इसके बाद मेजर शैतान सिंह बंकर से बाहर निकल गये। जब तक वो आगे बढ़ पाते चीनी मशीन गन की कई गोलियां उनके पेट में आ धंसी।मेजर शैतान सिंह ने हवलदार राम चंद्र से कहा कि वो बटालियन हेडक्वॉर्टर जाकर ये बताए कि कंपनी कैसे लड़ी और कैसे वीरगति को प्राप्त हो गई। लेकिन राम चंद्र ने उन्हें छोड़ कर जाने से इनकार कर दिया। किताब THE BRAVE की राइटर रचना बिष्ट को हवलदार राम चंद्र ने बताया कि जैसे ही मेजर साब को गोली लगी, कंपनी हवलदार मेजर हरफूल ने LMG उठाई और जिस चीनी फौजी ने मेजर शैतान सिंह को गोली मारी थी उसे मार गिराया।
इसी दौरान वो ख़ुद चीनी RCL के निशाने पर आ गये। अपनी आख़िरी सांसे लेते हुए हरफूल ने राम चंद्र से कहा कि मेजर साब किसी भी क़ीमत पर चीनियों के हाथ नहीं लगने चाहिए।इस बीच दुश्मनों पर अपनी LMG से गोलियां बरसा रहे निहाल सिंह के दोनों हाथों में गोली लग गई। उन्होंने अपने पैर से ग्रेनेड फेंकने की कोशिश की लेकिन वो नाकाम रहे।दुश्मन बिल्कुल पास आ चुका था और अब चार्ली कंपनी की गोलियां और हैंड ग्रेनेड ख़त्म हो रहे थे। इसके बाद वीर अहीर जवान अपने बंकरों से बाहर निकल आये और रायफल की बैनेट से चीनी फौजियों पर हमला कर दिया। लेकिन उनके कोट इतने मोटे थे कि कई बार बैनेट अंदर घुसती ही नहीं थी। ये देख कर भारतीय फौजियों ने पत्थर उठा कर चीनियों पर मारना शुरू कर दिया। जो नज़दीक आया उसे उठा कर पत्थर पर पटक दिया। संग्राम सिंह ने तो कई चीनियों को पकड़ कर दूसरे चीनी के साथ उनके सिर टकरा दिये।चीनी फौजी बढ़ते ही जा रहे थे। राम चंद्र किसी भी क़ीमत पर मेजर शैतान सिंह को चीनियों के हाथ नहीं लगने देना चाहते थे। मौक़ा मिलते ही वो मेजर को लेकर ढलान से 1 किलोमीटर नीचे ले आये। सुबह के 8.8 मिनट पर हिंदुस्तान के इस परमवीर ने अपने प्राण त्याग दिये। ठीक इसी वक़्त मेजर शैतान सिंह की घड़ी भी बंद हो गई।
ये वही घड़ी है, शहीद मेजर शैतान सिंह की घड़ी। परमवीर चक्र से सम्मानित 21 जांबाज़ों पर क़िताब लिखने वाले और मेजर शैतान सिंह की बायोग्राफी पर काम कर रहे जय सामोता ने ये तस्वीर ट्वीट की है।दूसरी तरफ़ पोस्ट पूरी तरह तबाह हो चुकी थी। 120 जवानों में से 114 की जान जा चुकी थी, निहाल सिंह समेत 5 जवानों को चीनी फौज ने बंधक बना लिया। जो 4 जवान नीचे राशन और किचन के काम में तैनात थे, कंपनी उन्हें पहले ही हेडक्वॉर्टर बुला चुकी थी। फॉर्मर कोस्ट गार्ड ऑफ़िसर कुलप्रीत यादव ने रेज़ांगला के वीर अहीरों के बलिदान पर किताब लिखी है- The Battel of Rezang la. बहुत रिसर्च के साथ लिखी गई इस किताब में रेज़ांगला की लड़ाई के बारे में बहुत डिटेल में लिखा गया है। कुलप्रीत यादव इस लड़ाई के बारे में बताते हैं- चार्ली कंपनी के वीर अहीर अपने मेजर शैतान सिंह की अगुवाई में क्या ख़ूब लड़े और लड़ते-लड़ते अपने प्राणों की आहुति दे दी। अब यहां से रेज़ांगला की कहानी दो पार्ट में बंट जाती है। एक हवलदार राम चंद्र का कंपनी हेडक्वॉर्टर पहुंचना और दूसरा निहाल सिंह समेत 5 जवानों का चीन की आर्मी की क़ैद में होना। ज़रा सोचिए। 120 में से 114 जवान लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गए, इससे पहले उन्होंने ना केवल 3 हज़ार से ज़्यादा चीनी सैनिकों से टक्कर ली बल्कि 1 हज़ार से ज़्यादा को मार भी गिराया, और जब वो जवान अपने सीनियर्स के पास पहुंचा, अपनी कंपनी की बहादुरी की कहानी सुनाई तो उसे झूठा करार दे दिया गया।
20 नवंबर को यानी रेज़ांगला वॉर के ठीक दो दिन बाद चीन ने अचानक सीज़ फ़ायर का एलान कर दिया। इसके साथ ही चीन की फौज मैक मोहन लाइन से पीछे भी चली गई। लेकिन लड़ाई वाली रात ही यानी 18 नवंबर को निहाल सिंह चीनी सेना की क़ैद से निकल भागे। चीनी फौज ने उन्हें चीन सीमा के अंदर बने कैंप में बंदी बनाया हुआ था। उनके दोनों हाथों में गोलियां लगी थी लेकिन देर रात मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए वो कैंप से निकल गये। उन्हें इस बात का भी अंदाज़ा नहीं था कि वो किधर जा रहे हैं। कैंप में घूमने वाले एक कुत्ते ने उनकी मदद की। वो कुत्ता उन्हें इंडियन टेरिटोरी में ले आया। इस बीच चीनी सैनिकों को जैसे ही पता चला कि निहाल भाग निकले हैं, उन्होंने सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया लेकिन निहाल बचते-बचाते इंडियन आर्मी की पोस्ट तक पहुंच गये। उन्हें जम्मू के हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।
अपने मेजर के शव को एक पत्थर के पास बर्फ़ में दबा कर राम चंद्र हेड क्वॉर्टर पहुंच गये। ब्रिगेड कमांडर को सबकुछ बताया कि रेज़ांग ला में क्या हुआ, फिर कई दिनों बाद राम चंद्र को दिल्ली बुलाया गया। आर्मी के कई सीनियर अधिकारियों ने उनसे पूछताछ शुरू की। किसी को राम चंद्र की बातों पर यकीन नहीं था। जब राम चंद्र ने कहा कि रेज़ांगला में चार्ली कंपनी ने 1300 से अधिक चीनियों को मार गिराया है तो उन्हें ना केवल झूठा बताया बल्कि कोर्ट मार्शल की धमकी तक दे डाली। सबको यही लगता था कि या तो चार्ली कंपनी के ज़्यादातर जवानों को चीन ने प्रिज़नर्स ऑफ़ वॉर बना लिया या फिर वो लड़ाई के दौरान भाग गये।जम्मू में इलाज के दौरान निहाल सिंह ने भी राम चंद्र की कही बातें दोहराई। उन्होंने बताया कि जब चीनी सेना रेज़ांगला से लौट रही थी तो 25 ट्रकों में उनके फौजियों के शव भरे हुए थे। निहाल के मुताबिक मारे गये चीनी सैनिकों का आंकड़ा 1310 था।
राम चंद्र अपनी बटालियन में लौट गये। दिन-महीने बीतते गये। आगे कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। अचानक फरवरी 1963 यानी लड़ाई के क़रीब 3 महीने बाद राम चंद्र को ब्रिगेड कमांडर की तरफ़ से चुशुल चलने का ऑर्डर मिला। THE BRAVE किताब में रचना बिष्ट ने लिखा है कि चुशुल का एक चरवाहा घूमते-घूमते रेज़ांगला पहुंच गया। यहां उसने देखा कि यहां भारतीय सैनिकों के शव पड़े हुए हैं। वो भागता हुआ नीचे गया और इंडियन आर्मी के पोस्ट पर पहुंच कर उसने सारी बातें बताई।इसके बाद 13 कुमाऊं के ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर टी एन रैना के साथ-साथ कई अधिकारी मौक़े पर पहुंचे। हवलदार रामचंद्र को भी साथ ले जाया गया। जब ये लोग वहां पहुंचे तो जैसा रामचंद्र और निहाल सिंह ने बताया था सबकुछ वैसा का वैसा ही था। मेजर शैतान सिंह का शव उसी पत्थर के पास बर्फ़ में दबा था जहां राम चंद्र ने बताया था। सभी भारतीय फौजियों के शव उनकी ट्रेंच और उसके आसपास ही थे। कई जवानों के हाथों में बंदूकें थी। सब बर्फ़ की वजह से जम चुके थे।
नर्सिंग अस्सिटेंट धर्मपाल दहिया के हाथों में मॉर्फिन से भरी सिरींज थी। सारे के सारे जवानों के सीने पर गोली लगी थी। अपने जवानों के इस बेमिसाल बलिदान को देखकर ब्रिगेडियर टी एन रैना इतना रोये कि उनकी पत्थर की एक आंख भी बाहर निकल आई।सभी जवानों के शवों को एक जगह लाया गया। तब शहीदों के शवों का शहीद स्थल पर ही अंतिम संस्कार किया जाता था। लेकिन वहां दाह संस्कार के लिए लकड़ियां नहीं थी। पता चला कि पास ही एक स्कूल है जो खंडहर हो चुका है, वहां टूटी बेंच हैं। इंडियन आर्मी के जवान उस स्कूल से बेंच लेकर आ गये। ब्रिगेडियर टी एन रैना ने ख़ुद इन वीर जवानों को मुखाग्नि दी।मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर भेजा गया। उनका अंतिम संस्कार वहीं किया गया।13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी की बहादुरी ने बड़े-बड़े लड़ाकों और जंगबाज़ों को भी हैरत में डाल दिया। भारत सरकार ने मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत देश के सबसे बड़े गैलेंट्री अवॉर्ड परमवीर चक्र से सम्मानित किया।
हवलदार रामचंद्र को वीर चक्र और निहाल सिंह को सेना मैडल से सम्मानित किया गया। कुल 8 वीर चक्र और 4 सेना मैडल कंपनी को दिये गये। इसके साथ ही एक जवान को मेन्शन इन डिस्पैच से सम्मानित किया गया। 13 कुमाऊं के कमांडिंग ऑफ़िसर को अति विशिष्ट सेवा मैडल दिया गया।क्या कोई सोच सकता है कि 120 जवानों ने चीन के 1000 से अधिक फौजियों को ढेर कर दिया। कोई सोच सकता है कि चीनियों को अपने सैनिकों की डेड बॉडी उठाने के लिए एक-दो नहीं 25 ट्रक लगाने पड़े हों। 1962 की लड़ाई में चीन को सबसे ज़्यादा चोट रेज़ांगला में इन्हीं वीर अहीरों ने दी थी। भले ही आज तक चीन ने अपने मारे गये सैनिकों के सही नंबर नहीं बताये लेकिन ये झटका उसके लिए बहुत बड़ा था। वीर अहीरों की इस कंपनी ने चीन से जंग हार चुके भारत में नया जोश और जज़्बा भर दिया। ये मैसेज गया कि भले ही हम ये लड़ाई हार गये लेकिन चीन अजेय नहीं है। भारत के वीर चीन को भी हार का स्वाद चखा सकते हैं। रेजांगला के लड़ाकों और बहादुरों को सैल्यूट है|







