पाकिस्तान ने 6 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र (UN) महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को अपने बड़े नागरिक सम्मानों में शामिल निशान-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया। लेकिन इसी पाकिस्तान दौरे में एक ऐसा सवाल भी सामने आया, जिस पर इस्लामाबाद को संयुक्त राष्ट्र प्रमुख से अपने पक्ष में सीधा जवाब मिलने की उम्मीद रही होगी। लेकिन उसे उम्मीदों के अनुरूप जवाब नहीं बल्कि अनदेखी मिली। यानी उसे शर्मसार होना पड़ा, जोरदार मुंहकी खानी पड़ी।
दरअसल एक पाकिस्तानी पत्रकार ने गुटेरेस से जम्मू-कश्मीर से जुड़े संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC के प्रस्तावों के अब तक लागू नहीं होने को लेकर सवाल किया। गुटेरेस ने इस सवाल पर कोई नया UN कदम या कश्मीर प्रस्तावों को लागू कराने का आश्वासन देने के बजाय जवाब का रुख सुरक्षा परिषद की ही मौजूदा व्यवस्था की ओर मोड़ दिया।
एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि UNSC आज की दुनिया का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करता और उसकी legitimacy यानी वैधता तथा effectiveness यानी प्रभावशीलता की समस्या है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को पाकिस्तान के लिए कश्मीर के मोर्चे पर एक असहज जवाब के तौर पर देखा जा रहा है।
पाकिस्तानी पत्रकार ने आखिर क्या पूछा?
6 अक्टूबर को इस्लामाबाद में गुटेरेस और पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार की संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस हुई। इसी दौरान कश्मीर का मुद्दा सामने आया।
पाकिस्तानी पक्ष की ओर से सवाल मूल रूप से इस बात पर था कि जम्मू-कश्मीर को लेकर UNSC के प्रस्ताव अब तक लागू नहीं हुए हैं। यानी पाकिस्तान जिस मुद्दे को लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाता रहा है, उसी को UN महासचिव के सामने फिर रखा गया।
लेकिन गुटेरेस ने इस सवाल का ऐसा सीधा जवाब नहीं दिया कि UNSC के पुराने प्रस्तावों को लागू कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र अब क्या कदम उठाएगा। यहीं से पूरा मामला दिलचस्प हो गया।
गुटेरेस ने UNSC के बारे में क्या-क्या कहा ?
गुटेरेस ने चर्चा को कश्मीर के पुराने प्रस्तावों से हटाकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की व्यापक समस्या की ओर मोड़ दिया। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया और UNSC की मौजूदा संरचना में बड़ा अंतर है। सुरक्षा परिषद में यूरोप के तीन स्थायी सदस्य हैं, जबकि अफ्रीका का कोई स्थायी सदस्य नहीं है।
उनके मुताबिक ऐसी स्थिति परिषद की legitimacy और effectiveness पर सवाल खड़े करती है।
यानी पाकिस्तान की तरफ से सवाल था कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े UNSC के प्रस्ताव लागू क्यों नहीं हुए? लेकिन गुटेरेस ने जवाब में किसी नए जम्मू-कश्मीर-केंद्रित कदम की घोषणा नहीं की। और गुटेरेस की तरफ से चर्चा पहुंच गई—UNSC खुद कितनी प्रतिनिधित्वकारी और प्रभावी है?
यही वह मोड़ है, जिसे इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है। उन्होंने शांति, बातचीत और अपने good offices की पेशकश जैसे व्यापक राजनयिक रुख पर जोर दिया।
इसके बाद उनका फोकस UNSC की संरचना और उसकी प्रभावशीलता पर चला गया।
इशाक डार भी उठा चुके थे मुद्दा ?
दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर का मुद्दा केवल पत्रकार ने नहीं उठाया था। इशाक डार ने गुटेरेस के साथ अपनी बैठक में भी पाकिस्तान का रुख सामने रखा था। पाकिस्तान के आधिकारिक बयान के मुताबिक डार ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान की स्थिति बताते हुए विवाद के “just and peaceful resolution” की मांग दोहराई और संबंधित UNSC प्रस्तावों का हवाला दिया।
यानी गुटेरेस के सामने पाकिस्तान का कश्मीर एजेंडा पहले ही रखा जा चुका था। इसके बावजूद संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस में गुटेरेस ने कश्मीर प्रस्तावों के अमल को लेकर कोई नया कदम घोषित नहीं किया। उन्होंने वह जवाब नहीं दिया जिसकी पाकिस्तान उम्मीद कर रहा था।
उसी दिन पाकिस्तान ने दिया गुटेरेस को निशान-ए-इम्तियाज
जिस दिन UN महासचिव से कश्मीर पर सवाल किया गया, उसी दिन शाम को पाकिस्तान ने उन्हें अपने बड़े नागरिक सम्मानों में शामिल निशान-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया।
राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इस्लामाबाद स्थित ऐवान-ए-सद्र में आयोजित विशेष समारोह में गुटेरेस को यह सम्मान प्रदान किया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति कार्यालय के मुताबिक यह सम्मान उनकी अंतरराष्ट्रीय सेवा, संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व और वैश्विक शांति एवं विकास में योगदान के लिए दिया गया।
खास बात यह भी है कि पाकिस्तान ने पहली बार किसी UN Secretary-General को यह सम्मान दिया है।
पाकिस्तान ने सम्मान दिया, फिर भी कश्मीर पर नहीं मिला सीधा आश्वासन
एक तरफ पाकिस्तान ने गुटेरेस को इतना बड़ा नागरिक सम्मान दिया। दूसरी तरफ उसी दौरे में जब पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर के पुराने UNSC प्रस्तावों के अमल का सवाल उठाया गया, तो गुटेरेस ने कोई नया आश्वासन नहीं दिया।
उन्होंने न तो किसी नए प्रस्ताव की घोषणा की और न ही यह कहा कि सुरक्षा परिषद कश्मीर पर कोई नई कार्रवाई करने वाली है। यानी पाकिस्तान के अरमां आसुओं में बह गए…।
भारत के लिए क्यों अहम है यह पूरा मामला?
भारत लंबे समय से जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय अभियान का विरोध करता रहा है और इसे अपने आंतरिक मामलों से जुड़ा मुद्दा मानता है। ऐसे में 6 अक्टूबर का घटनाक्रम भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान द्वारा कश्मीर और UNSC प्रस्तावों का मुद्दा उठाए जाने के बावजूद गुटेरेस की तरफ से कोई नया कश्मीर-केंद्रित UN कदम सामने नहीं आया।
उनकी प्रतिक्रिया का केंद्र बातचीत, शांति और UNSC सुधार रहा। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को भारत के नजरिए से इस तरह समझा जा सकता है कि पाकिस्तान ने कश्मीर के पुराने प्रस्तावों का सवाल फिर उठाया, लेकिन UN महासचिव ने उसके जवाब में कोई नई कार्रवाई घोषित करने के बजाय संयुक्त राष्ट्र की अपनी संस्था की कमजोरियों पर चर्चा कर दी।
पूरी कहानी का सार- पाकिस्तान ने यूएन महासचिव को सम्मान दिया, जम्मू-कश्मीर का सवाल उठाया, लेकिन गुटेरेस से उसे अपने हित की बात सुनने को नहीं मिली।
जिस UNSC प्रस्ताव की बात हुई, उसमें असल में क्या लिखा है?
पाकिस्तानी पत्रकार जिस प्रस्ताव का हवाला दे रहा था, उसका प्रमुख आधार UNSC Resolution 47, जिसे 21 अप्रैल 1948 को सुरक्षा परिषद ने अपनाया था। इस प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर में लड़ाई रोकने, शांति बहाल करने और परिस्थितियां अनुकूल होने पर राज्य के भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के सवाल पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जनमत-संग्रह कराने की बात कही गई थी।
प्रस्ताव में प्रक्रिया को चरणों में रखा गया था। पहले पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर से उन कबायली लड़ाकों और पाकिस्तानी नागरिकों की वापसी सुनिश्चित करनी थी जो वहां लड़ने के लिए दाखिल हुए थे, साथ ही आगे ऐसी घुसपैठ और लड़ रहे लोगों को मदद रोकने की बात थी।
इसके बाद, जब हालात सामान्य होने लगें, भारत को अपनी सैन्य मौजूदगी को धीरे-धीरे उस न्यूनतम स्तर तक घटाना था जो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी हो।
इसके बाद प्रस्ताव में जनमत-संग्रह के लिए अलग प्रशासन, राजनीतिक स्वतंत्रता, प्रेस और भाषण की आजादी, मतदाताओं को डराने-धमकाने या दबाव डालने से सुरक्षा और विस्थापित लोगों की वापसी जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख था
भारत का आधिकारिक रुख यह रहा है कि जनमत-संग्रह की प्रक्रिया की बुनियादी पूर्वशर्तें पूरी नहीं हुईं, क्योंकि पाकिस्तान ने प्रस्ताव में अपेक्षित पहला कदम—अपने सैनिकों, कबायली लड़ाकों और अन्य पाकिस्तानी तत्वों की वापसी—नहीं किया। विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों में भारत ने इसी क्रम को रेखांकित करते हुए कहा है कि पाकिस्तान की वापसी की शर्त पूरी न होने से आगे की प्रक्रिया संभव नहीं हुई।








