भारत को ‘लेक्चर’ देने वाले ट्रंप की पुतिन से डीजल डील, भड़के जेलेंस्की का रूसी तेल ठिकानों पर बड़ा हमला

By Defence Detective

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Donald Trump and Vladimir Putin amid a fire at a Russian oil terminal after a reported Ukrainian drone attack

भारत को रूसी तेल खरीदने पर घेरने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब खुद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से डीजल लेने का रास्ता खोल दिया है। अमेरिका ने रूसी डीजल की सप्लाई की परमिशन देने के लिए पाबंदियों में छूट दी है। ट्रंप का दावा है कि रूस से लाखों टन डीजल मिलने पर अमेरिका और दुनिया में तेल की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी।

लेकिन इस फैसले से यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की भड़क गए हैं। उन्होंने इसे रूस को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक मदद देने वाला कदम बताया। इसी बीच, अमेरिका-यूक्रेन बातचीत के दौरान रूस के रोस्तोव-ऑन-डॉन में स्थित युग रूस तेल टर्मिनल पर यूक्रेनी हमले की खबर सामने आई है।

यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वॉशिंगटन लंबे समय से भारत पर रूसी ऊर्जा की खरीद कम करने का दबाव बनाता रहा है। अब जब अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए डीजल महंगा हुआ, तो ट्रंप प्रशासन ने उसी रूस से ईंधन लेने का फैसला किया, जिसकी ऊर्जा से होने वाली कमाई रोकने के लिए वह दूसरे देशों पर दबाव डालता रहा है।

सवाल उठता है कि क्या रूस से तेल खरीदने का सिद्धांत अमेरिका के लिए अलग और भारत के लिए अलग है?

ट्रंप-पुतिन की डील क्या है ?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 9 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया पर घोषणा की कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत के बाद रूस अमेरिका और वैश्विक बाजारों के लिए डीजल की सप्लाई बढ़ाने पर सहमत हो गया है।

ट्रंप ने तत्काल 3 लाख मीट्रिक टन से अधिक डीजल, नवंबर में 5 लाख टन और उसके बाद 10 लाख टन की अतिरिक्त सप्लाई की बात कही। उन्होंने आगे भी आपूर्ति बढ़ने का संकेत दिया।

ट्रंप के मुताबिक फैसले की वजह अमेरिका में किसानों, ट्रक चालकों और आम उपभोक्ताओं को महंगे ईंधन से राहत दिलाना है।

अमेरिका में डीजल की कीमतें बढ़ने से परिवहन, खेती और माल ढुलाई की लागत पर दबाव पड़ रहा है। इसका असर खाद्य पदार्थों और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

इस समझौते का सबसे बड़ा व्यावहारिक कदम प्रतिबंधों में अस्थायी छूट है।

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने रूसी डीजल की सप्लाई की परमिशन देने वाला लाइसेंस जारी किया है, जिसकी अवधि 7 अप्रैल 2027 तक बताई गई है। यह छूट संबंधित शर्तों के अधीन है। यानी अमेरिका ने रूस से डीजल के कारोबार का रास्ता खोल दिया है, जबकि रूस के खिलाफ उसकी व्यापक प्रतिबंध नीति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

भारत पर दबाव, लेकिन अमेरिका को जरूरत पड़ी तो रूस मंजूर?

इस पूरे मामले का भारत से जुड़ा पहलू सबसे ज्यादा चर्चा में है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रियायती कीमतों पर रूसी कच्चा तेल खरीदना बढ़ाया था। भारत का तर्क रहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा, घरेलू जरूरतों और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर तेल खरीदता है।

लेकिन अमेरिका ने भारत की रूसी तेल खरीद पर लगातार सवाल उठाए। वॉशिंगटन का तर्क था कि रूसी ऊर्जा से होने वाली आय मॉस्को को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में मदद करती है। इसी आधार पर भारत पर अतिरिक्त शुल्क और आर्थिक दबाव की नीति अपनाई गई।

अब तस्वीर का दूसरा पहलू सामने है। अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए डीजल महंगा हुआ, तो ट्रंप प्रशासन ने रूस से आपूर्ति लेने और संबंधित प्रतिबंधों में छूट देने का फैसला किया।

यह घटनाक्रम अमेरिकी नीति में विरोधाभास है। अमेरिका फर्स्ट का पाखंड है। भारत से रूसी ऊर्जा की खरीद कम करने की अपेक्षा करने वाला अमेरिका अब अपने हितों के लिए उसी देश से ईंधन लेने को तैयार है।

इससे भारत का यह तर्क मजबूत होता है कि ऊर्जा नीति में राष्ट्रीय हित और आर्थिक जरूरतें महत्वपूर्ण हैं। यदि अमेरिका अपनी घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए रूसी डीजल खरीद सकता है, तो भारत की ऊर्जा जरूरतों को भी उसी व्यावहारिक नजरिए से देखा जाना चाहिए।

जेलेंस्की क्यों भड़के ?

ट्रंप की घोषणा से यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की नाराज हो गए। रॉयटर्स के मुताबिक, उन्होंने इस फैसले को मजबूत साझेदारों का कमजोर निर्णय बताया। उनका तर्क है कि रूस को पेट्रोलियम उत्पाद बेचने की अनुमति देना उसकी युद्ध अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त पैसा डालने जैसा है।

जेलेंस्की ने कहा कि पुतिन को दिए जाने वाले तोहफे शांति नहीं लाएंगे। उनके मुताबिक, रूस इस आर्थिक लाभ का इस्तेमाल आगे हमले करने के लिए कर सकता है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि रूस के साथ किसी भी तनाव कम करने की व्यवस्था में दोनों पक्षों को बराबर कदम उठाने चाहिए।

जेलेंस्की की नाराजगी का समय भी महत्वपूर्ण है। अमेरिकी प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर मियामी में यूक्रेनी तथा यूरोपीय अधिकारियों के साथ युद्ध समाप्त करने के रास्तों पर बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान ट्रंप ने पुतिन के साथ डीजल समझौते की घोषणा कर दी।

यूक्रेन को लगा कि एक ओर उससे रूस के ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के लिए कहा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मॉस्को को अपने पेट्रोलियम उत्पाद बेचने का अवसर दिया जा रहा है। इससे कीव को आशंका है कि रूस पर आर्थिक दबाव कम करने की अमेरिकी नीति उसके सैन्य हितों को नुकसान पहुंचा सकती है।

डील के कुछ घंटे बाद रूसी तेल टर्मिनल पर हमला

अमेरिका और रूस डील के कुछ घंटे बाद ही रूस के रोस्तोव-ऑन-डॉन में स्थित युग रूस तेल टर्मिनल पर हमले की खबर सामने आई। रूसी अधिकारियों ने इस टर्मिनल पर यूक्रेनी हमले की जानकारी दी। यह हमला ट्रंप की डीजल घोषणा और अमेरिका-यूक्रेन मीटिंग में तनाव के कुछ घंटे बाद हुआ।

यूक्रेन लंबे समय से रूस की तेल रिफाइनरियों, ईंधन भंडारण सुविधाओं और निर्यात टर्मिनलों पर ड्रोन हमले करता रहा है। इन हमलों का उद्देश्य रूस की ईंधन उत्पादन और निर्यात क्षमता को कमजोर करना तथा युद्ध के लिए उपलब्ध आर्थिक संसाधनों पर चोट करना है।

इस बार हमला ऐसे समय हुआ जब अमेरिका यूक्रेन से रूसी ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने की अपेक्षा कर रहा था। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि कीव अपनी सैन्य रणनीति को केवल अमेरिकी ईंधन बाजार की जरूरतों के अनुसार बदलने के लिए तैयार नहीं है।

अमेरिका ने यूक्रेन को दी खुफिया सहयोग रोकने की चेतावनी?

इस घटनाक्रम का एक और गंभीर पहलू अमेरिकी खुफिया सहयोग से जुड़ा है। फाइनेंशियल टाइम्स  ने रिपोर्ट किया कि अमेरिकी अधिकारियों ने यूक्रेन को रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले रोकने की चेतावनी दी और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान पर रोक लगाने की संभावना उठाई।

एक्सियोस  की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा कि ट्रंप ने यूक्रेन की ओर से रूसी रिफाइनरियों पर हमले रोकने के अमेरिकी अनुरोधों की अनदेखी किए जाने के बाद डीजल समझौते का रास्ता चुना। हालांकि, खुफिया सहयोग रोकने की धमकी को लेकर दोनों पक्षों के बयानों में अंतर है। इसलिए इसे लागू हो चुका फैसला नहीं माना जाना चाहिए।

यूक्रेन के लिए अमेरिकी खुफिया जानकारी महत्वपूर्ण है। रूसी ठिकानों की निगरानी, लक्ष्य की पहचान और लंबी दूरी के ड्रोन अभियानों की योजना बनाने में ऐसी जानकारी उपयोगी होती है। यदि सहयोग कम होता है, तो यूक्रेन के कुछ अभियानों की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।

क्या रूसी डीजल से अमेरिका और दुनिया को सस्ता ईंधन मिलेगा?

ट्रंप ने दावा किया है कि रूस से अतिरिक्त डीजल आने पर कीमतें तेजी से गिरेंगी। लेकिन ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञ इस प्रभाव को लेकर सावधान हैं।

रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिका में डीजल की कीमतें 9 अक्टूबर को लगभग 6.28 डॉलर प्रति गैलन के स्तर पर थीं। अमेरिकी डीजल वायदा बाजार में समझौते की घोषणा के बाद गिरावट भी दर्ज की गई। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि घोषित मात्रा वैश्विक डीजल बाजार में लंबे समय तक कीमतें कम रखने के लिए पर्याप्त नहीं भी हो सकती है।

इसकी वजह यह है कि डीजल की कीमतें केवल रूसी आपूर्ति पर निर्भर नहीं करतीं। रिफाइनरियों की क्षमता, मध्य पूर्व में संघर्ष, समुद्री परिवहन, बीमा लागत और दूसरे देशों की मांग भी इन पर असर डालती है।

यदि रूसी टर्मिनलों और रिफाइनरियों पर यूक्रेनी हमले जारी रहते हैं, तो रूस की अतिरिक्त आपूर्ति की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, यदि प्रतिबंधों में छूट से अधिक ईंधन बाजार में आता है, तो कुछ समय के लिए कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

भारत के लिए क्या है सबसे बड़ा सबक?

भारत के लिए इस घटनाक्रम का महत्व केवल रूसी डीजल या अमेरिकी प्रतिबंधों तक सीमित नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का भी मामला है।

भारत को अपनी जरूरतों के अनुसार तेल खरीदने, आपूर्तिकर्ताओं में विविधता रखने और वैश्विक कीमतों पर नजर बनाए रखने की आवश्यकता है। अमेरिका का नया फैसला दिखाता है कि जब घरेलू आर्थिक दबाव बढ़ता है, तो बड़ी शक्तियां अपनी ऊर्जा नीति में व्यावहारिक बदलाव कर सकती हैं।

भारत को अमेरिकी नीति में आए इस बदलाव का उपयोग अपने ऊर्जा हितों के पक्ष में तर्क रखने के लिए जरूर करना चाहिए। लेकिन साथ ही उसे रूसी तेल की कीमत, भुगतान व्यवस्था, समुद्री परिवहन और प्रतिबंधों से जुड़े जोखिमों का भी आकलन करना होगा।

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