सिंधु जल विवाद में कैसा दांव ? भारत नहीं मानता हेग कोर्ट, फिर भी पाकिस्तान भर रहा उसके हिस्से का खर्च

By Defence Detective

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River Flowing Through a Mountain Valley – Symbolic Image

अपनी ढहती इकोनॉमी को थामने के लिए चीन से लेकर सऊदी अरब और आइएमफ तक की चौखट पर कटोरा लेकर पहुंचने वाला वाला पाकिस्तान सरकारी खर्च में कटौती के दौर से गुजर रहा है, फिर भी भारत के खिलाफ लड़ाई में पीछे हटने को तैयार नहीं है। मतलब कंगाली की स्थिति है, लेकिन उसे खुद को तबाह कर लेने की हद तक दुश्मनी जारी रखना है। शायद ऐसे ही वजहें होंगी, जो कहा गया कि रस्सी जल गई, लेकिन ऐँठन नहीं गई। अब उसकी एक बेहद चौंकाने वाली और विरोधाभासी करतूत सामने आई है।

कंगाल पाकिस्तान सिंधु जल विवाद में भारत के खिलाफ पानी की तरह पैसा बहा रहा है। मामले में पाकिस्तानी सरकार ने नीदरलैंड के हेग (The Hague) स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration – PCA) में भारत के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखने के लिए अब तक करीब 60 लाख डॉलर (लगभग 50 करोड़ भारतीय रुपये) लुटा दिए हैं।

इसमें भी एक और बड़ी बात कि इस भारी-भरकम रकम में भारत के हिस्से का वह भुगतान (कंट्रीब्यूशन) भी शामिल है, जो अदालत ने भारत से मांगा था लेकिन भारत ने चुकाने से साफ इनकार कर दिया था। पाकिस्तान का यह खर्च दिखाता है कि वह इस मुद्दे को लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंच पर उठाए रखना चाहता है।

यह सब तब हो रहा है जब पाकिस्तान सरकार ने हाल ही में पेट्रोल बचाने के लिए सरकारी गाड़ियों के ईंधन को आधा कर दिया है, नई गाड़ियों की खरीद और मंत्रियों के विदेश दौरों व सरकारी दावतों पर पूरी तरह बैन लगा रखा है। आखिर पाकिस्तान इस कानूनी लड़ाई पर इतना पैसा क्यों लगा रहा है?

सिंधु जल मिशन का बजट और पूरे खर्च की कहानी ?

पाकिस्तान के जल संसाधन मंत्रालय के कुल चालू खर्च बजट (करीब 1.53 करोड़ डॉलर) का आधे से अधिक हिस्सा, यानी 79 लाख डॉलर अकेले ‘पाकिस्तान मिशन फॉर सिंधु जल’ को आवंटित कर दिया गया।

एक और बात कि पाकिस्तान ने अदालत की कार्यवाही पर खर्च के अलावा, अलग से नियुक्त Neutral Expert की कार्यवाही के लिए भी लगभग 1.94 मिलियन डॉलर का भुगतान किया है। यानी दोनों प्रक्रियाओं पर पाकिस्तान के भुगतान का जोड़ करीब 7.94 मिलियन डॉलर बैठता है।

पाकिस्तान के बजट में क्या दिखता है?

खर्च या बजट मदरकम
हेग की Court of Arbitration कार्यवाही पर अब तक भुगतानकरीब $6 मिलियन
Neutral Expert की अलग कार्यवाही पर भुगतानकरीब $1.94 मिलियन
2026-27 में Pakistan Mission for Indus Waters का आवंटनकरीब $7.9 मिलियन
Chief Engineering Adviser और Federal Flood Commission के कार्यालय का आवंटनकरीब $1.2 मिलियन
Water Resources Division का कुल चालू खर्च बजटकरीब $15.3 मिलियन

पाकिस्तान के कानूनी खर्चों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। बजट दस्तावेज यह नहीं बताते कि वकीलों की फीस, तकनीकी विशेषज्ञों, कानूनी दस्तावेज तैयार करने और अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर अलग-अलग कितना खर्च हुआ।

भारत के हिस्से का खर्च पाकिस्तान ने क्यों उठाया ?

भारत शुरू से ही हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) की इस कार्यवाही को ‘गैर-कानूनी’ और सिंधु जल संधि के नियमों के खिलाफ मानता आया है। जब भारत इस अदालत की वैधता को ही स्वीकार नहीं करता, तो उसने इसके द्वारा मांगे गए किसी भी फंड या एडवांस फीस का भुगतान करने से पूरी तरह मना कर दिया।

लेकिन पाकिस्तान की जिद मुकदमा जिंदा रखने की है। ऐसे में अदालत के नियमों के मुताबिक, अगर एक पक्ष भुगतान नहीं करता है, तो कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे पक्ष (जिसने अपील की है) को वह खर्च उठाना पड़ता है। पाकिस्तान किसी भी कीमत पर इस मुकदमे को चालू रखना चाहता था, इसलिए उसने भारत के हिस्से का बिल भी खुद अपनी जेब से भरा।

आखिर क्या है यह सिंधु जल विवाद (Indus Waters Case)?

19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई थी। लगभग नौ सालों की बातचीत के बाद वर्ल्ड बैंक की मदद से दोनों देशों ने यह समझौता किया था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने कराची में इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत सिंधु नदी तंत्र की 6 नदियों के पानी को दोनों देशों के बीच बांटा गया था-

  • पूर्वी नदियां (सतलुज, ब्यास, रावी): इन तीनों नदियों के पानी पर भारत का पूरा और अनियंत्रित अधिकार दिया गया।
  • पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब): इन तीनों नदियों का अधिकांश पानी पाकिस्तान को आवंटित किया गया। हालांकि, भारत को इन पश्चिमी नदियों पर बिना पानी रोके (Run-of-the-river) बिजली परियोजनाएं (Hydropower Projects) बनाने का सीमित अधिकार दिया गया।

मौजूदा विवाद की असली जड़ क्या है ?


भारत जम्मू-कश्मीर के विकास और वहां बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पश्चिमी नदियों पर दो प्रमुख हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स बना रहा है:

  • किशनगंगा परियोजना (झेलम की सहायक किशनगंगा नदी पर) – इसकी क्षमता 330 मेगावाट है।
  • रतले जलविद्युत परियोजना (चिनाब नदी पर)-  इसकी प्रस्तावित क्षमता 850 मेगावाट है।
  • पाकिस्तान को डर है कि भारत इन परियोजनाओं के जरिए पानी के बहाव को नियंत्रित कर सकता है, जिससे पाकिस्तान में सूखा या कृत्रिम बाढ़ आ सकती है।
  • पाकिस्तान का आरोप है कि परियोजनाओं की कुछ डिजाइन विशेषताएं, जल भंडारण से संबंधित सीमाएं और पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की व्यवस्थाएं संधि के प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं।
  • भारत का पक्ष है कि पश्चिमी नदियों पर निर्धारित शर्तों के तहत जलविद्युत परियोजनाएं बनाने का उसे अधिकार है।
  • इसलिए विवाद सिर्फ पानी के बंटवारे का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि संधि के तकनीकी नियमों की व्याख्या कौन और किस प्रक्रिया के तहत करेगा।  

संधि में विवाद सुलझाने के क्या हैं रास्ते ?

संधि में विवाद सुलझाने के तीन स्टेप हैं—

  • Permanent Indus Commission – इसमें भारत और पाकिस्तान अपने-अपने ‘सिंधु जल आयुक्त’ (Indus Water Commissioners) नियुक्त करते हैं। इन दोनों कमिश्नरों और उनकी टीम से मिलकर बना आयोग मतभेद-शिकायत पर बात कर मामला सुलझाने की कोशिश करते हैं।
  • Neutral Expert: अगर दोनों देशों के कमिश्नर आपसी बातचीत से किसी तकनीकी मुद्दे (जैसे बांध की ऊंचाई या पानी के गेट के डिजाइन) पर एकमत नहीं हो पाते, तो मामला विश्व बैंक (World Bank) के पास जाता है। विश्व बैंक इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक अत्यधिक योग्य स्वतंत्र इंजीनियर को ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ नियुक्त करता है।
  • Court of Arbitration(मध्यस्थता न्यायालय ): अगर विवाद केवल तकनीकी न होकर पूरी संधि की व्याख्या या कानूनी उल्लंघन से जुड़ा हो, तो मामला अंतिम चरण यानी हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) में जाता है

Court of Arbitration की वैधता का विवाद क्यों ?

पाकिस्तान ने चालाकी दिखाते हुए एक ही मामले के लिए दो अलग-अलग जगहों पर अपील की। एक तरफ विश्व बैंक का न्यूट्रल एक्सपर्ट जांच कर रहा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान जबरन हेग की अदालत (PCA) में भी केस चला रहा है।

भारत का रुख बिल्कुल साफ है कि एक ही तकनीकी विवाद के लिए दो समानांतर कानूनी रास्ते नहीं अपनाए जा सकते, इसलिए भारत ने हेग की अदालती कार्यवाही का पूरी तरह बहिष्कार किया हुआ है।

2016 में पाकिस्तान ने विश्व बैंक से Court of Arbitration गठित करने की मांग की थी। भारत ने इसके बजाय Neutral Expert की नियुक्ति का समर्थन किया।

विश्व बैंक ने आखिर में 2022 में दोनों प्रक्रियाओं के लिए नियुक्तियां कीं। दोनों प्रक्रियाएं स्वतंत्र हैं, लेकिन एक ही परियोजनाओं से जुड़े मुद्दों पर उनके अधिकार क्षेत्र को लेकर विवाद बना हुआ है।

यही वजह है कि भारत और पाकिस्तान सिर्फ जलविद्युत परियोजनाओं पर नहीं, बल्कि मामले की सुनवाई करने वाले मंच की वैधता पर भी अलग-अलग पक्ष रखते हैं।

हेग की अदालत के ताजा फैसले पर भारत का रुख ?

31 अगस्त 2026 को हेग स्थित Court of Arbitration ने फैसला दिया कि भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का निर्णय ठीक नहीं है। संधि बनी हुई है और भारत को उसके दायित्वों का पालन करना चाहिए।

भारत ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया। विदेश मंत्रालय का कहना है कि यह Court of Arbitration अवैध रूप से गठित हुआ है और उसे भारत के संप्रभु फैसलों पर आदेश देने का अधिकार नहीं है।

भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि संधि को स्थगित रखने का उसका निर्णय प्रभावी बना हुआ है। भारत ने 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को तत्काल प्रभाव से स्थगित रखने की घोषणा की थी।

6 जुलाई 2023 को हेग कोर्ट ने किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े विवाद पर सुनवाई का अधिकार माना। भारत ने इसे संधि के नियमों के खिलाफ गठित समानांतर कार्यवाही बताते हुए खारिज किया।

27 जून 2025 को अदालत ने कहा कि भारत द्वारा संधि को स्थगित रखने की घोषणा से उसकी कार्यवाही का अधिकार खत्म नहीं होता। भारत ने फैसले को अवैध और अमान्य बताते हुए अस्वीकार किया

पाकिस्तानी इकॉनमी की हालत कैसी ?

वित्त वर्ष 2025-26 में उसकी GDP लगभग 126.87 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये रही, जबकि जून 2026 के अंत तक उसका सरकारी सार्वजनिक कर्ज 86.72 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। इसमें घरेलू कर्ज और विदेशी कर्ज, दोनों शामिल हैं।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्थाआंकड़ा
सालाना GDP (वित्त वर्ष 2025-26)₹126.87 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये
कुल सरकारी सार्वजनिक कर्ज₹86.72 लाख करोड़
घरेलू सरकारी कर्ज₹59.44 लाख करोड़
विदेशी सार्वजनिक कर्जकरीब $98.08 अरब
सार्वजनिक कर्ज/GDP अनुपात68.3%
वास्तविक GDP वृद्धि, FY2025-263.70%
कुल बाहरी कर्ज और देनदारियां, जून 2026$138.85 अरब

IMF से अमेरिका तक कर्ज की तलाश में पाकिस्तान, चीन-सऊदी के सहारे कितनी चलेगी गाड़ी?

भारत के खिलाफ हेग में सिंधु जल विवाद की कानूनी लड़ाई लड़ रहे पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति विदेश से मिलने वाली मदद पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से लेकर अमेरिका तक, इस्लामाबाद विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने और पुराने कर्ज चुकाने के लिए नए वित्तीय इंतजाम करने में जुटा है।

पाकिस्तान ने अभी कहां से कितनी वित्तीय मदद मांगी या जुटाई?

देश/संस्थारकमस्थिति और मकसद
IMFकरीब 1.21 अरब डॉलर8 अक्टूबर 2026 को अगली किस्त के लिए स्टाफ-स्तरीय समझौता; बोर्ड की मंजूरी बाकी
अमेरिका10 अरब डॉलरविदेशी मुद्रा भंडार और रुपये को सहारा देने के लिए एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन सुविधा मांगी; मंजूरी की घोषणा नहीं
अमेरिकी EXIM बैंकरकम तय नहींअमेरिकी निर्यात से जुड़ी ट्रेड फाइनेंस सुविधा पर बातचीत
अमेरिकी DFCप्रस्तावित 5 अरब डॉलर की रिफाइनरी योजनापाकिस्तान की तेल रिफाइनरियों के आधुनिकीकरण के लिए संभावित वित्तीय सहयोग पर चर्चा; इसे स्वीकृत कर्ज नहीं समझें
चीन30 अरब युआन की मौजूदा स्वैप लाइनपूरी राशि निकाली जा चुकी है; 2027 में व्यवस्था का नवीनीकरण होने पर इसे बढ़ाने की औपचारिक मांग करने की योजना
सऊदी अरब3 अरब डॉलर अतिरिक्त जमा सहायताअप्रैल 2026 में भुगतान संतुलन को सहारा देने के लिए सहायता का ऐलान; इसके अलावा पहले से मौजूद 5 अरब डॉलर की जमा राशि की अवधि बढ़ाई गई

स्रोत: Reuters, 17 सितंबर 2026, Reuters, 15 अप्रैल 2026और Dawn, 9 अक्टूबर 2026।

पाकिस्तान पर किसका कितना कर्ज, कौन-कौन हैं बड़े कर्जदाता?

कर्जदाता/श्रेणीसार्वजनिक बाहरी कर्ज में रकम
चीन (द्विपक्षीय सरकारी कर्ज)करीब 23.50 अरब डॉलर
विश्व बैंककरीब 22.01 अरब डॉलर
ADB, AfDB और IADB (विकास बैंक)करीब 16.87 अरब डॉलर
IMFकरीब 9.27 अरब डॉलर
सऊदी अरब (द्विपक्षीय कर्ज)करीब 5.49 अरब डॉलर
जापानकरीब 3.02 अरब डॉलर
फ्रांसकरीब 1.07 अरब डॉलर
अन्य बहुपक्षीय संस्थाएंकरीब 4.16 अरब डॉलर
अंतरराष्ट्रीय बॉन्डकरीब 7.07 अरब डॉलर
वाणिज्यिक कर्जदाताकरीब 7.53 अरब डॉलर

ये IMF के जून 2025 के आंकड़े हैं,

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