‘दुश्मन’ तुर्की ने भारत के साथ किया coordination, ‘मोस्ट वांटेड’ को भेजा भारत

By Defence Detective

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Navpreet Singh alias Nawab Virk, alleged international narco kingpin deported from Turkey to India

पाकिस्तान और कश्मीर के मुद्दे पर भारत के खिलाफ खड़े नजर आने वाले तुर्की से अब मोदी सरकार एक ऐसे नार्को किंगपिन को भारत खींच लाई है, जो अपनी पहचान बदलकर वहीं सुरक्षित ठिकाना बनाए बैठा था। इंटरनेशनल नार्को किंगपिन नवप्रीत सिंह उर्फ ‘नवाब विर्क’ को तुर्की से डिपोर्ट कर भारत लाया गया है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 3 अक्टूबर को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि नवप्रीत फर्जी पहचान हासिल कर तुर्की में रह रहा था। उन्होंने कहा कि नवप्रीत सिंह का डिपोर्टेशन सुनिश्चित करके मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है

नवप्रीत सिंह लंबे समय से भारतीय जांच एजेंसियों के रडार पर था। उसका नाम बड़े अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क से जुड़े मामलों में सामने आया था और उस पर विदेश में बैठकर भारत में ड्रग्स की सप्लाई कराने के आरोप हैं। उसे भारत वापस लाना इसलिए अहम है क्योंकि अब उससे उसके नेटवर्क, ड्रग सप्लाई और विदेशों में मौजूद सहयोगियों को लेकर बड़ी जानकारियां मिल सकती हैं।

नवप्रीत की वापसी ऐसे समय हुई है जब भारत और तुर्की के राजनीतिक रिश्ते पिछले कुछ सालों में लगातार तल्ख रहे हैं। पाकिस्तान और कश्मीर को लेकर रुख के अलावा 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की की पाकिस्तान के प्रति सहयोग ने भारत के साथ उसके संबंधों को और चोट पहुंचाई थी।

अमित शाह ने और क्या कहा ?

तुर्की से भारत लाए गए नार्को किंगपिन नवप्रीत सिंह को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूरी कार्रवाई का ब्यौरा दिया है। शाह के मुताबिक, नवप्रीत ने फर्जी पहचान के सहारे तुर्की की नागरिकता हासिल कर ली थी, लेकिन इसके बावजूद अफगानिस्तान से भारत में नशीले पदार्थों की तस्करी जारी रखी। भारतीय एजेंसियों ने उसकी असली पहचान का पता लगाया और तुर्की से उसका डिपोर्टेशन सुनिश्चित कराया।

वह नवाब विर्क बनकर तुर्की की नागरिकता हासिल करने के बाद भी वह अफगानिस्तान से भारत में हेरोइन और मेथामफेटामाइन की तस्करी करता रहा। हमारी एजेंसियों ने उसे ट्रैक किया, परत-दर-परत उसकी असली पहचान उजागर की और उसका डिपोर्टेशन सुनिश्चित किया। आज उसे भारत वापस लाया गया है और ड्रग तस्करी तथा अन्य अपराधों से जुड़े मामलों में जेल भेज दिया गया है। मोदी सरकार दिसंबर हर नार्को-कार्टेल को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है।
Amit Shah, Union home minister

कौन है नवप्रीत सिंह ?

नवप्रीत सिंह पंजाब के वजीर भुल्लर गांव, ब्यास का रहने वाला है। वह अलग-अलग रिपोर्टों में नव और नव भुल्लर के नाम से भी सामने आया है। बाद में वह भारत से बाहर चला गया और अपना नेटवर्क चलाता रहा। 2021 में पंजाब पुलिस ने उसे विदेश में बैठकर पंजाब में अपने सहयोगियों के जरिए बड़ी मात्रा में ड्रग सप्लाई करने वाला तस्कर बताया था।

  • वह NDPS के कई मामलों में वांटेड था और फिल्लौर के चिंटू हत्याकांड में भी उसका नाम सामने आया था।
  • 2020 में पंजाब पुलिस ने एक अलग नार्को-टेरर जांच के दौरान भी उसके नेटवर्क का जिक्र किया था, जिसमें ड्रग कारोबार और हवाला के जरिए पैसों की आवाजाही की बात सामने आई थी।
  • 2021 की रिपोर्टों में उसका विदेश में होना दर्ज है। उस समय एक रिपोर्ट में उसे पुर्तगाल में बताया गया था।
  • बाद के सालों में उसका ठिकाना तुर्की हो गया।  

कैसे खुली उसके नेटवर्क की परत ?

नवप्रीत सिंह का नाम पहली बार अचानक 2026 में सामने नहीं आया। उसके खिलाफ जांच की एक महत्वपूर्ण कड़ी 2021 के दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के बड़े ड्रग केस से जुड़ती है।

  • जुलाई 2021 में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली, फरीदाबाद और गुरुग्राम में कार्रवाई कर करीब 354 किलो हेरोइन बरामद करने का दावा किया था।
  • उस समय पुलिस ने इसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत करीब 2,500 करोड़ रुपये बताई थी।
  • मामले में एक अफगान नागरिक समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया गया था

जांच आगे बढ़ी तो पुलिस के मुताबिक यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क का हिस्सा सामने आया, जिसकी कड़ियां अफगानिस्तान, ईरान, भारत और उस समय पुर्तगाल में मौजूद नवप्रीत सिंह तक पहुंचती थीं।

‘नवाब विर्क’ नाम ने जांच को कैसे पेचीदा बनाया?

इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण परत यही है। नवप्रीत सिंह ने ‘Navab Virk’ यानी नवाब विर्क नाम की फर्जी पहचान के आधार पर तुर्की की नागरिकता हासिल की थी। इसी पहचान के पीछे छिपकर वह भारत से दूर रहा और अफगानिस्तान से भारत तक ड्रग्स पहुंचाने का नेटवर्क चलाता रहा।

यानी इस ऑपरेशन की चुनौती सिर्फ किसी फरार आरोपी का पता लगाना नहीं थी। जांच एजेंसियों को एक दूसरी पहचान, विदेशी नागरिकता और अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क के पीछे छिपे वास्तविक व्यक्ति तक पहुंचना था।

अफगानिस्तान से भारत तक कैसे पहुंचता था ड्रग?

नवप्रीत सिंह का कथित ड्रग नेटवर्क सिर्फ भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी कड़ियां विदेशों तक जुड़ी थीं। यानी ड्रग्स की सप्लाई सीमा पार से शुरू होती थी और भारत में मौजूद उसके नेटवर्क तक पहुंचती थी।

अब उसकी भारत वापसी के बाद जांच का फोकस इस बात पर भी रहेगा कि अफगानिस्तान से ड्रग्स की सप्लाई कैसे होती थी, भारत में इन्हें कौन रिसीव करता था और इस पूरे नेटवर्क में नवप्रीत की वास्तविक भूमिका क्या थी ?

तल्ख रिश्तों के बीच उसे भारत लाना कैसे मुमकिन हुआ ?

नवप्रीत की वापसी इसलिए विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्की के साथ भारत के रिश्ते इस समय अच्छे नहीं है। फिर सवाल उठता है कि नवप्रीत को भारत लाना कैसे मुमकिन हुआ ? तो भारत और तुर्की के बीच 2001 से प्रत्यर्पण का औपचारिक कानूनी ढांचा मौजूद है। हालांकि नवप्रीत सिंह को भारत लाने की मौजूदा कार्रवाई को ‘deportation’ बताया जा रहा है, इसलिए इसे सीधे प्रत्यर्पण संधि (extradition treaty ) के तहत हुई कार्रवाई कहना अभी जल्दबाजी होगी।

  • भारत और तुर्की के बीच प्रत्यर्पण संधि 2001 में हुई थी और जून 2002 में लागू हुई।
  • इस संधि के तहत गंभीर आपराधिक मामलों में वांटेड लोगों को कानूनी प्रक्रिया के जरिए सौंपने का प्रावधान है

यानी राजनीतिक स्तर पर मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन कानून-प्रवर्तन और आपराधिक मामलों में सहयोग के लिए दोनों देशों के बीच औपचारिक तंत्र मौजूद है।

यह 6 महीने में तुर्की से दूसरी बड़ी वापसी

नवप्रीत सिंह की वापसी को मोहम्मद सलीम डोला को तुर्की से भारत लाए जाने की कड़ी में भी देखा जा सकता है। सलीम डोला को तुर्की से 28 अप्रैल 2026 को भारत लाया गया था। भारत के गृह मंत्रालय ने उस समय तुर्की, INTERPOL और भारतीय एजेंसियों के बीच कोऑर्डिनेशन का विशेष उल्लेख किया था।

दिलचस्प बात यह है कि तुर्की से भारत लाए गए दोनों मामलों में पहचान छिपाने का पहलू है। नवप्रीत सिंह ‘Navab Virk’ पहचान के पीछे रह रहा था, तो सलीम डोला भी तुर्किये में ‘Hamza’ नाम की कथित फर्जी पहचान के साथ रह रहा था और उसके पास Bulgarian passport होने की बात सामने आई थी।

भारत-तुर्की रिश्तों के लिए क्या मायने?

अप्रैल 2026 में सलीम डोला की वापसी और अब अक्टूबर में नवप्रीत सिंह का डिपोर्टेशन यह दिखाता है कि भारत और तुर्की के रिश्तों में राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सुरक्षा और कानून-प्रवर्तन का एक अलग channel काम कर रहा है।

8 अप्रैल को दोनों देशों की Foreign Office Consultations में भी सीमा-पार आतंकवाद के खिलाफ सहयोग पर चर्चा हुई थी। हालांकि इन घटनाक्रमों को भारत-तुर्की संबंधों में व्यापक बदलाव का निर्णायक प्रमाण मानना अभी जल्दबाजी होगी।

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