नौसेना के ‘Kilo’ बेड़े पर मंडराया रिटायरमेंट का खतरा, कम होती अंडरवॉटर ताकत की कैसे होगी भरपाई?

By Defence Detective

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Kilo-class Sindhughosh diesel-electric submarine

भारतीय नौसेना के लिए समुद्र के नीचे की जंग अब एक नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। रूस से मिली Kilo-class पनडुब्बियों ने करीब चार दशकों तक भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर स्ट्राइक क्षमता को मजबूती दी, लेकिन अब उम्र इन पनडुब्बियों पर भारी पड़ रही है। नई रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वर्षों में नौसेना अपने तीन और Kilo-class submarines को सेवा से बाहर कर सकती है।

Kilo-class पहले ही अपने पुराने दौर से गुजर रही है और इसका बेड़ा लगातार छोटा हुआ है। अगर अगले कुछ वर्षों में तीन और पनडुब्बियां रिटायर होती हैं और उनकी जगह समय पर नई conventional submarines नहीं आतीं, तो भारत के पास इस वर्ग की केवल तीन सक्रिय पनडुब्बियां बच सकती हैं। यानी मौजूदा छह की तुलना में संख्या लगभग आधी रह जाएगी।

10 Kilo से शुरू हुआ था सफर

भारतीय नौसेना ने सोवियत संघ और बाद में रूस से कुल 10 Project 877EKM Kilo-class diesel-electric submarines हासिल की थीं। इनका भारतीय संस्करण Sindhughosh-class के नाम से जाना जाता है। इस बेड़े में पहली पनडुब्बी INS Sindhughosh थी, जिसे 30 अप्रैल 1986 को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। कुछ पनडुब्बियां 2000 के दशक की शुरुआत में शामिल की गई थीं। समय के साथ दुर्घटनाओं, स्थानांतरण और सेवा-समाप्ति के कारण यह संख्या लगातार घटती गई।

  • INS Sindhurakshak 2013 में मुंबई में हुए हादसे के बाद खो गई और 2017 में उसे decommission किया गया।
  • INS Sindhudhvaj ने जुलाई 2022 में 35 साल की सेवा पूरी करने के बाद विदाई ली।
  • INS Sindhuvir को 2020 में म्यांमार नौसेना को सौंप दिया गया।
  • इसके बाद INS Sindhughosh भी 19 दिसंबर 2025 को 40 साल की सेवा के बाद decommission हो गई।
  • नतीजा यह है कि 10 पनडुब्बियों से शुरू हुआ Kilo बेड़ा अब केवल छह सक्रिय नावों तक सिमट चुका है।

Kilo/Sindhughosh-class की खूबियां ?

भारतीय नौसेना की Kilo-class यानी Sindhughosh-class (Project 877EKM) पनडुब्बियां मूल रूप से सोवियत डिजाइन की डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय बात कम शोर वाला संचालन है। Kilo डिजाइन को पश्चिमी देशों में इसी वजह से लंबे समय तक “Black Hole” उपनाम से भी जाना गया।

खासियतसही/प्रचलित आंकड़ा
क्लासSindhughosh-class
रूसी प्रोजेक्टProject 877EKM / Kilo
प्रकारDiesel-Electric Attack Submarine (SSK)
लंबाई72.6 मीटर
चौड़ाई (Beam)9.9 मीटर
ड्राफ्ट6.6 मीटर
सतह पर विस्थापन2,325 टन
पानी के भीतर विस्थापनलगभग 3,076 टन
प्रणोदनDiesel-electric
सतह पर अधिकतम गतिलगभग 10–11 knots
पानी के भीतर अधिकतम गतिलगभग 17 knots
स्नॉर्कल गतिलगभग 9 knots
अधिकतम/टेस्ट गहराई300 मीटर
ऑपरेशनल गहराईलगभग 240 मीटर
समुद्री endurance45 दिन तक
रेंज — स्नॉर्कल पर6,000 nautical miles @ 7 knots
रेंज — पूरी तरह submerged400 nautical miles @ 3 knots
क्रूलगभग 52
टॉरपीडो ट्यूब6 × 533 mm
टॉरपीडो क्षमता18 तक
माइंस24 DM-1 तक, टॉरपीडो के स्थान पर
एंटी-शिप मिसाइल3M-54E Club-S — संबंधित भारतीय अपग्रेड वाली नौकाओं में
मुख्य सोनारMGK-400 Rubikon/Rubikon-E
भूमिकाAnti-submarine warfare, anti-surface warfare, surveillance और sea-denial

अब तीन और क्यों हो सकती हैं रिटायर?

नई रिपोर्ट के मुताबिक शेष Kilo submarines में से कुछ करीब 35 साल की सेवा के पड़ाव पर पहुंच रही हैं। पनडुब्बियों की उम्र केवल कैलेंडर से नहीं मापी जाती। उनके pressure hull, machinery, batteries, sensors और दूसरे सिस्टम लगातार समुद्री दबाव और संचालन का सामना करते हैं।

  • Kilo-class submarines को भारतीय नौसेना ने समय-समय पर upgrade भी किया।
  • इनमें बेहतर sonar, combat-management systems, electronic-warfare equipment और Club-S cruise missiles जैसी क्षमताएं जोड़ी गईं।
  • लेकिन इन upgrades की एक सीमा है—नई technology लगाने के बावजूद मूल submarine hull पुराना ही रहता है।
  • उम्र बढ़ने के साथ spare parts की उपलब्धता, maintenance और major overhaul की लागत भी बढ़ती है।

इसलिए किसी बहुत पुरानी पनडुब्बी को बार-बार life extension देना हमेशा व्यावहारिक विकल्प नहीं होता। यही वजह है कि नौसेना के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इन submarines को और कितने साल चलाया जा सकता है, बल्कि यह भी है कि उन्हें चलाते रहना आर्थिक और operational रूप से कितना उचित है।

तीन Kilo का रिटायर होना कितना बड़ा झटका?

यदि मौजूदा छह सक्रिय Kilo-class submarines में से तीन रिटायर होती हैं, तो Kilo fleet में वास्तविक कमी 50% होगी—छह से तीन। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय नौसेना की कुल submarine strength सीधे 50% घट जाएगी। Kilo-class भारतीय conventional submarine fleet का केवल एक हिस्सा है। भारत के पास छह Kalvari-class/Scorpene submarines भी हैं और दूसरी submarine capabilities भी मौजूद हैं।

फिर भी समस्या गंभीर है, क्योंकि conventional submarines की संख्या पहले से ही जरूरत के मुकाबले सीमित है। हिंद महासागर में submarine warfare का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। चीन लगातार अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा रहा है और पाकिस्तान भी अपनी submarine capability को आधुनिक बनाने पर काम कर रहा है।

एक diesel-electric submarine की सबसे बड़ी ताकत उसकी stealth होती है। वह लंबे समय तक समुद्र की गहराई में छिपकर किसी adversary की गतिविधियों पर नजर रख सकती है। इसलिए संख्या में कमी का असर सिर्फ ‘तीन submarines कम’ होने तक सीमित नहीं रहता। इससे उपलब्ध platforms पर operational pressure भी बढ़ सकता है।

‘पुरानी Kilo खरीदो’ विकल्प का क्या हुआ ?

भारत के सामने इस कमी को जल्दी भरने का एक संभावित रास्ता रूस से कुछ refurbished Kilo submarines लेने का भी रहा है। IDRW के मुताबिक रूस ने तीन refurbished Kilo-class submarines की पेशकश की थी।

लेकिन समस्या यह थी कि प्रस्तावित submarines भी काफी पुरानी थीं और कथित तौर पर 25 साल से अधिक सेवा कर चुकी थीं। ऐसे में भारत के लिए एक पुरानी समस्या को दूसरी पुरानी submarine से हल करना कितना उपयोगी होगा, इस पर सवाल खड़े हुए। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय नौसेना ने इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया।

Project-75(I)  से कैसे होगी भरपाई ?

यहीं से कहानी भारत के सबसे महत्वपूर्ण submarine programmes में से एक Project-75(I) तक पहुंचती है। इस कार्यक्रम के तहत भारत को छह नई-generation conventional submarines मिलनी हैं। इनका सबसे बड़ा आकर्षण Air-Independent Propulsion (AIP) capability होगी, जिससे submarine को underwater रहते हुए ज्यादा समय तक stealth बनाए रखने में मदद मिलेगी।

Project-75(I) के लिए जर्मनी की ThyssenKrupp Marine Systems (TKMS) और भारत की Mazagon Dock Shipbuilders Limited (MDL) के बीच बातचीत आगे बढ़ी है। जून 2026 में India Today ने रिपोर्ट किया था कि करीब €8 billion यानी लगभग ₹90,000 करोड़ के कार्यक्रम में technology-transfer package की समीक्षा अंतिम महत्वपूर्ण चरणों में थी।

लेकिन सबसे बड़ी चिंता यही है कि नई submarines आज आदेश देने के बाद कल समुद्र में नहीं उतरेंगी। Project-75(I) की पहली submarine के 2032 से पहले उपलब्ध होने की संभावना कम है और पूरी छह-submarine fleet के 2037-38 तक आने की बात कही गई थी।

हालिया रिपोर्ट के मुताबिक Project-75(I) की RFP प्रक्रिया में एक बार फिर देरी हुई है और जवाब जमा करने की समयसीमा दिसंबर 2026 के अंत तक बढ़ाई गई है।

लंबी अवधि में भारत का लक्ष्य इससे भी आगे जाता है—देश Project-76 के तहत indigenous conventional submarine design पर काम कर रहा है और nuclear-powered submarines की क्षमता भी विकसित कर रहा है।

हालांकि इसमें देरी Kilo-class के रिटायरमेंट को ज्यादा महत्वपूर्ण बना देती है।

भारतीय नौसेना की मौजूदा पनडुब्बियां

भारतीय नौसेना की पनडुब्बी ताकत को देखें तो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ताजा स्रोतों के आधार पर कुल 19 पनडुब्बियां गिनी जाती हैं—16 conventional diesel-electric attack submarines और 3 nuclear-powered ballistic-missile submarines (SSBNs)

श्रेणीक्लाससंख्याप्रणोदनमुख्य भूमिका
Attack Submarine (SSK)Kalvari / Scorpène6Diesel-ElectricAnti-ship, ASW, surveillance, land-attack
Attack Submarine (SSK)Sindhughosh / Kilo6Diesel-ElectricAnti-ship, ASW, sea denial
Attack Submarine (SSK)Shishumar / Type 2094Diesel-ElectricASW, anti-surface warfare
Ballistic Missile Submarine (SSBN)Arihant class3Nuclear-poweredNuclear deterrence / second strike
कुल4 प्रमुख क्लास19

Kalvari-class की खूबियां ?

Project-75 के तहत भारत में Mazagon Dock Shipbuilders ने इनका निर्माण किया है। सभी छह अब नौसेना में शामिल हैं—INS Kalvari, Khanderi, Karanj, Vela, Vagir और Vagsheer। आखिरी Vagsheer जनवरी 2025 में commissioned हुई। यह भारत की conventional submarine fleet की सबसे नई पूरी तरह inducted class है।

क्षमताKalvari-class
प्रकारDiesel-Electric Attack Submarine
लंबाई67.5 मीटर
पानी के अंदर विस्थापन1,775 टन
अधिकतम गहराई300 मीटर*
गति20 knots तक*
Torpedo tubes6 × 533 mm
हथियारHeavyweight torpedoes, anti-ship missiles
मुख्य ताकतStealth + modern sensors
AIPDRDO AIP लगाने की योजना/इंटीग्रेशन

* कुछ आंकड़े सार्वजनिक स्रोतों में अनुमानित/भिन्न हैं।

Shishumar-class की खूबियां ?

ये German Type-209/1500 डिजाइन पर आधारित diesel-electric submarines हैं। इसके अंतर्गत भारत के पास INS Shishumar, INS ShankushINS Shalki और INS Shankul हैं। इनमें से INS Shalki और INS Shankul भारत में Mazagon Dock पर बनाए गए, जिसने भारत की indigenous submarine-building क्षमता की नींव मजबूत की।

क्षमताShishumar
प्रकारDiesel-Electric Attack Submarine
DesignGerman Type 209/1500
लंबाई64.4 m
submerged displacement1,850 tonnes
speed22 knots तक*
diving depth250 m*
Torpedo tubes8 × 533 mm
मुख्य भूमिकाASW + Anti-surface warfare
खासियतमजबूत sonar + torpedo capability

Arihant-class की खासियत

यह सबसे अलग और रणनीतिक श्रेणी है। भारत के पास अब 3 nuclear-powered ballistic missile submarines (SSBNs) हैं:- INS Arihant, INS Arighaat और INS Aridhaman

      क्षमताArihant-class
प्रकारSSBN
प्रणोदनNuclear-powered
मुख्य भूमिकाNuclear deterrence
submerged enduranceमहीनों तक
Arihant displacement6,000 tonnes
Arighaat6,000 tonnes
Aridhaman7,000 tonnes
ReactorNuclear reactor
MissileK-15 / K-4 family
K-15 range750 km
K-4 range3,500 km
सबसे बड़ी ताकतSecond-strike capability

चीन और पाकिस्तान की पनडुब्बी ताकत ?

चीन और पाकिस्तान की पनडुब्बी ताकत की बात करें तो तस्वीर अलग है। चीन के पास 60 से अधिक पनडुब्बियां हैं, जबकि पाकिस्तान की नौसेना के पास 8 operational submarines हैं। पाकिस्तान की पहली नई Hangor-class पनडुब्बी अप्रैल 2026 में कमीशन हुई।

क्षमताचीन (PLAN)पाकिस्तान (PN)
कुल पनडुब्बियां60+8
Nuclear SSBN60
Nuclear SSN60
Conventional Attack50+5
AIP वाली प्रमुख पनडुब्बियांYuan-class समेत बड़ी संख्याAgosta-90B + Hangor
सबसे आधुनिक conventional classYuan / Type 039A/B/CHangor-class
सबसे महत्वपूर्ण nuclear classJin / Type 094 SSBN
मुख्य रणनीतिक ताकतNuclear deterrence + regional sea denialAIP-based sea denial
भविष्य का लक्ष्य80 by 20358 Hangor-class का पूरा कार्यक्रम

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