आत्मनिर्भर बनने की दिशा में इंडियन नेवी का एक और कदम, भारत फोर्ज को मिला 425 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट

By Alok Ranjan

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भारतीय नौसेना के युद्धपोत और समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर का प्रतीकात्मक चित्र

भारतीय नौसेना के युद्धपोतों को बिजली देने वाली एक महत्वपूर्ण तकनीक में भारत अब आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और कदम आगे बढ़ रहा है। भारत फोर्ज को नौसेना के लिए 1.25 मेगावाट क्षमता वाले 12 समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर विकसित करने का 425 करोड़ रुपये का अनुबंध मिला है। इस परियोजना में कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाना है और इसे पांच वर्ष में पूरा किया जाना है।

पहली नजर में यह खबर केवल 12 जनरेटर बनाने की एक रक्षा परियोजना लग सकती है। लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी इससे कहीं बड़ी है। क्योंकि आधुनिक युद्धपोत केवल मिसाइलों, तोपों और रडार से नहीं लड़ता। उसके पीछे एक पूरा ऊर्जा तंत्र काम करता है, जो उसके रडार, सेंसर, संचार प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और दूसरी महत्वपूर्ण प्रणालियों को लगातार बिजली उपलब्ध कराता है। और अगर भारत इस ऊर्जा तंत्र की महत्वपूर्ण तकनीक को भी देश में विकसित करने में सफल होता है, तो इसका असर आने वाले वर्षों में भारतीय नौसेना के युद्धपोतों की आत्मनिर्भरता पर पड़ सकता है।

425 करोड़ रुपये की परियोजना में क्या है?

रक्षा मंत्रालय ने भारत फोर्ज के साथ लगभग 425 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है। इसके तहत भारतीय नौसेना के लिए 1.25 मेगावाट क्षमता वाले 12 समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर विकसित किए जाएंगे। इस परियोजना में कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री रखने की शर्त है और इसे पांच वर्ष की अवधि में पूरा किया जाना है।

इन जनरेटरों का इस्तेमाल भारतीय नौसेना के कोलकाता श्रेणी के विध्वंसक युद्धपोतों में किया जाना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नए जनरेटर इन जहाजों में लगे कम क्षमता वाले पुराने विद्युत उत्पादन तंत्रों की जगह लेंगे। यानी यह परियोजना केवल प्रयोगशाला में तकनीक विकसित करने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य विकसित की जा रही तकनीक को वास्तविक युद्धपोतों पर इस्तेमाल करना भी है। और यही बात इसे महत्वपूर्ण बनाती है।

युद्धपोत में बिजली इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

जब किसी युद्धपोत की बात होती है तो आमतौर पर चर्चा उसकी मिसाइलों, रडार, तोपों या लड़ाकू क्षमता पर होती है। लेकिन इन सभी प्रणालियों के पीछे एक ऐसी आवश्यकता है, जिसके बिना आधुनिक युद्धपोत की लड़ाकू क्षमता लगभग बेकार हो सकती है। वह है विद्युत ऊर्जा।

आज के युद्धपोत बेहद जटिल तकनीकी प्लेटफॉर्म हैं। उनके ऊपर लगे रडार लगातार समुद्र और आकाश की निगरानी करते हैं। अलग-अलग सेंसर आसपास की गतिविधियों का पता लगाते हैं। संचार प्रणाली दूसरे जहाजों, विमानों और कमान केंद्रों से संपर्क बनाए रखती है। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली दुश्मन के संकेतों को पकड़ने और उनका मुकाबला करने का काम करती है।

इन सभी प्रणालियों को बिजली चाहिए। इतना ही नहीं, आधुनिक युद्धपोतों पर हथियारों और युद्ध प्रबंधन से जुड़ी कई प्रणालियां भी विद्युत ऊर्जा पर निर्भर होती हैं। इसलिए युद्धपोत के लिए बिजली पैदा करने वाला जनरेटर महज एक सहायक उपकरण नहीं है। यह युद्धपोत की लड़ाकू क्षमता की बुनियादी जरूरत है। रक्षा मंत्रालय ने भी इन समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटरों को आधुनिक नौसैनिक युद्धपोतों की महत्वपूर्ण प्रणालियों, उन्नत हथियारों और सेंसरों को बिजली उपलब्ध कराने वाला महत्वपूर्ण तंत्र बताया है।

समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर आखिर करता क्या है?

सरल भाषा में समझें तो समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर का काम गैस टर्बाइन की शक्ति का इस्तेमाल करके बिजली पैदा करना है। इसे युद्धपोत के एक ऐसे ऊर्जा केंद्र के रूप में समझा जा सकता है, जो जहाज पर मौजूद विभिन्न प्रणालियों को आवश्यक विद्युत शक्ति उपलब्ध कराता है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना भी जरूरी है। जनरेटर और जहाज का मुख्य इंजन एक ही चीज नहीं होते। जनरेटर मुख्य रूप से बिजली पैदा करता है, जबकि मुख्य प्रणोदन इंजन का काम जहाज को आगे बढ़ाने के लिए शक्ति उपलब्ध कराना होता है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भारत ने इस परियोजना के साथ अपने बड़े युद्धपोतों के लिए स्वदेशी गैस टर्बाइन इंजन बना लिया है। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि इस परियोजना का महत्व केवल कुछ जनरेटर बनाने तक सीमित है। क्योंकि गैस टर्बाइन तकनीक से जुड़ी डिजाइन क्षमता, निर्माण तकनीक, उच्च तापमान वाली सामग्री, परीक्षण व्यवस्था और रखरखाव का अनुभव भविष्य में बड़े और अधिक जटिल समुद्री गैस टर्बाइन विकसित करने में उपयोगी हो सकता है।

असली कहानी 12 जनरेटर की नहीं, तकनीकी क्षमता की है

यहीं इस पूरी परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। भारत फोर्ज इस परियोजना के लिए एक समर्पित एकीकरण एवं परीक्षण केंद्र स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है। इसका अर्थ यह है कि कंपनी केवल तैयार प्रणाली को जोड़ने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उसके विकास और परीक्षण के लिए आवश्यक औद्योगिक आधार भी तैयार कर रही है।

और कंपनी ने भविष्य में बड़े विद्युत संयंत्रों तथा प्रणोदन गैस टर्बाइन से जुड़े डिजाइन और विकास कार्यक्रमों में भाग लेने की संभावना भी जताई है। यानी आज शुरुआत हो रही है 1.25 मेगावाट के समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर से। लेकिन भविष्य में इसी क्षमता का अनुभव अधिक बड़े समुद्री ऊर्जा तंत्रों और प्रणोदन प्रणालियों की दिशा में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वह बिंदु है जहां इस परियोजना का महत्व 425 करोड़ रुपये की कीमत से कहीं बड़ा हो जाता है।

भारत को समुद्री गैस टर्बाइन तकनीक की जरूरत क्यों है?

भारत तेजी से अपने युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है। भारतीय नौसेना के लिए डेस्ट्रॉयर्स, फ्रिगेट और दूसरे बड़े युद्धपोत देश में बनाए जा रहे हैं। लेकिन किसी युद्धपोत को स्वदेशी बनाने का मतलब केवल उसके ढांचे को भारत में तैयार करना नहीं है। वास्तविक आत्मनिर्भरता तब होगी जब जहाज के अंदर इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण तकनीकों का बड़ा हिस्सा भी भारत में विकसित और निर्मित हो। उदाहरण के लिए

इन सभी क्षेत्रों में देश की निर्भरता जितनी कम होगी, युद्धपोत उतना ही अधिक रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर होगा। समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर इसी बड़ी तस्वीर का एक हिस्सा है।

कोलकाता क्लास के डेस्ट्रॉयर्स के लिए इसका क्या मतलब है?

कोलकाता श्रेणी के डेस्ट्रॉयर्स भारतीय नौसेना के सबसे महत्वपूर्ण बड़े युद्धपोतों में शामिल हैं। इन जहाजों पर लंबी दूरी की निगरानी करने वाले रडार, विभिन्न सेंसर, संचार प्रणालियां और अत्याधुनिक हथियार मौजूद हैं। ऐसे जहाज में विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी युद्धपोत की विद्युत उत्पादन व्यवस्था में समस्या आती है तो उसका असर केवल रोशनी या सामान्य जहाजी प्रणालियों पर नहीं पड़ता।

इसका असर युद्धपोत की कई महत्वपूर्ण प्रणालियों पर पड़ सकता है। इसीलिए नए 1.25 मेगावाट जनरेटरों का इस्तेमाल कोलकाता श्रेणी के जहाजों में करना इस परियोजना को वास्तविक परिचालन उपयोग से जोड़ता है। भारत के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि स्वदेशी प्रणाली को वास्तविक युद्धपोत पर लंबे समय तक इस्तेमाल और परीक्षण का अवसर मिलेगा। यहीं से वास्तविक अनुभव पैदा होता है।

60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का क्या मतलब है?

यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। परियोजना में कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री रखने की शर्त है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जनरेटर की 60 प्रतिशत तकनीक भारत की अपनी बौद्धिक संपदा है। स्वदेशी सामग्री और स्वदेशी तकनीक दो अलग-अलग बातें हैं। किसी प्रणाली में घरेलू स्तर पर निर्मित हिस्सों, भारत में की गई असेंबली, परीक्षण और दूसरे स्वदेशी योगदान का बड़ा हिस्सा हो सकता है, जबकि कुछ विशेष तकनीक या घटक अभी भी बाहरी स्रोतों से जुड़े हो सकते हैं।

इसलिए इस परियोजना को फिलहाल इस रूप में देखना अधिक उचित होगा कि भारत समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर के निर्माण, परीक्षण और रखरखाव की घरेलू क्षमता विकसित कर रहा है। भविष्य में इसी आधार पर और अधिक महत्वपूर्ण तकनीकों को स्वदेशी बनाने का रास्ता खुल सकता है।

सबसे बड़ा फायदा युद्ध के समय दिखाई देगा

शांतिपूर्ण समय में किसी विदेशी कंपनी से किसी महत्वपूर्ण उपकरण के कलपुर्जे खरीदना आसान हो सकता है। लेकिन युद्ध की स्थिति अलग होती है। अगर किसी देश पर लंबे समय तक युद्ध का दबाव हो और उसी समय किसी महत्वपूर्ण उपकरण की विदेशी आपूर्ति बाधित हो जाए, तो इसका सीधा असर सैन्य तैयारियों पर पड़ सकता है। समुद्री क्षेत्र में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

युद्धपोत लंबे समय तक समुद्र में तैनात रहते हैं। उनके लिए लगातार रखरखाव, कलपुर्जों की आपूर्ति और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि किसी महत्वपूर्ण ऊर्जा प्रणाली के लिए भारत के पास घरेलू निर्माण और मरम्मत की क्षमता मौजूद हो, तो नौसेना की परिचालन स्वतंत्रता बढ़ती है। यही कारण है कि रक्षा आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल हथियार बनाना नहीं है। आत्मनिर्भरता का अर्थ यह भी है कि युद्ध के समय किसी महत्वपूर्ण विदेशी आपूर्ति श्रृंखला के रुक जाने से आपकी सैन्य क्षमता ठप न हो।

रखरखाव में आत्मनिर्भरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण

किसी सैन्य उपकरण को बनाना एक चुनौती है। लेकिन उसे अगले 20 या 30 वर्षों तक चालू रखना उससे भी बड़ी चुनौती हो सकती है। युद्धपोतों में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी को लगातार रखरखाव और समय-समय पर बड़े स्तर की मरम्मत की जरूरत होती है। अगर इसके लिए हर बार विदेशी कंपनी पर निर्भर रहना पड़े तो युद्धपोत की दीर्घकालिक परिचालन क्षमता प्रभावित हो सकती है।

भारत फोर्ज ने इस परियोजना के संदर्भ में गैस टर्बाइन और गैस टर्बाइन जनरेटरों के रखरखाव तथा बड़े स्तर की मरम्मत से जुड़ी घरेलू क्षमता विकसित करने की दिशा में भी काम करने की बात कही है। अगर यह क्षमता विकसित होती है तो इसका फायदा केवल वर्तमान 12 जनरेटरों तक सीमित नहीं रहेगा। यह भारत में एक व्यापक समुद्री गैस टर्बाइन उद्योग के विकास का आधार बन सकता है।

भारत के सामने अभी बड़ी चुनौती बाकी है

इस परियोजना को लेकर उत्साहित होना स्वाभाविक है। लेकिन इसके साथ एक वास्तविकता को समझना भी जरूरी है। 1.25 मेगावाट का जनरेटर और बड़े युद्धपोत का मुख्य प्रणोदन गैस टर्बाइन दो अलग स्तर की तकनीकी चुनौतियां हैं। प्रणोदन गैस टर्बाइन को कहीं अधिक शक्ति, विश्वसनीयता, दक्षता और लंबे समय तक कठिन समुद्री परिस्थितियों में काम करने की क्षमता चाहिए। इसके लिए उच्च तापमान सहने वाली उन्नत सामग्री, अत्यंत सटीक निर्माण तकनीक, जटिल दहन प्रणाली, कंप्रेसर तकनीक, नियंत्रण प्रणाली और व्यापक परीक्षण सुविधाओं की आवश्यकता होती है।

इसलिए भारत के सामने असली सवाल यह नहीं है कि वह 1.25 मेगावाट का जनरेटर बना सकता है या नहीं। असली सवाल है क्या भारत इस अनुभव को भविष्य के बड़े नौसैनिक प्रणोदन गैस टर्बाइन तक ले जा पाएगा? अगर जवाब हां होता है, तो इस परियोजना का महत्व कई गुना बढ़ जाएगा।

भारत के बड़े युद्धपोतों के लिए अगला लक्ष्य क्या होना चाहिए?

भारत आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में आधुनिक युद्धपोतों को नौसेना में शामिल करने की योजना पर काम कर रहा है। ऐसे में देश को केवल जहाजों की संख्या बढ़ाने के बजाय उनकी तकनीकी आत्मनिर्भरता भी बढ़ानी होगी। भविष्य में लक्ष्य यह होना चाहिए कि युद्धपोत के अधिक से अधिक महत्वपूर्ण हिस्सों के लिए देश के पास अपनी तकनीक और अपनी औद्योगिक क्षमता हो। समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके बाद भारत को बड़े समुद्री गैस टर्बाइन, प्रणोदन प्रणाली और उनसे जुड़ी उच्च तकनीक वाली सामग्री तथा घटकों के क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। यानी आज का छोटा कदम भविष्य के बड़े लक्ष्य की नींव बन सकता है।

भारत की नौसैनिक आत्मनिर्भरता की बड़ी तस्वीर

अगर इस पूरे घटनाक्रम को थोड़ा पीछे हटकर देखें तो तस्वीर और स्पष्ट दिखाई देती है। भारत अब केवल युद्धपोत खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता। भारत ऐसे युद्धपोत बनाना चाहता है जिनमें अधिक से अधिक महत्वपूर्ण प्रणालियां देश में विकसित हों। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में नौसेना से जुड़ी कई महत्वपूर्ण तकनीकों में स्वदेशीकरण पर जोर बढ़ा है। मिसाइलों से लेकर रडार तक और जहाजों से लेकर उनके विभिन्न ऊर्जा तंत्रों तक धीरे-धीरे एक पूरा घरेलू रक्षा औद्योगिक ढांचा तैयार करने की कोशिश की जा रही है। समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर परियोजना उसी श्रृंखला की एक और महत्वपूर्ण कड़ी है।

असली कहानी 12 जनरेटर की नहीं है

425 करोड़ रुपये की यह परियोजना और 12 जनरेटर पहली नजर में शायद भारतीय रक्षा क्षेत्र की सबसे बड़ी परियोजनाओं में शामिल न लगे। लेकिन रक्षा तकनीक के क्षेत्र में किसी नई क्षमता की शुरुआत को केवल उसके शुरुआती अनुबंध के मूल्य से नहीं आंका जा सकता। अगर भारत फोर्ज इस परियोजना के माध्यम से सफलतापूर्वक समुद्री गैस टर्बाइन जनरेटर विकसित करता है, उन्हें भारतीय युद्धपोतों पर सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जाता है और साथ ही परीक्षण, रखरखाव तथा बड़े स्तर की मरम्मत की घरेलू क्षमता तैयार होती है, तो यह आगे की कई परियोजनाओं के लिए आधार बन सकता है।

और अगर इसके बाद भारत बड़े समुद्री ऊर्जा संयंत्रों और प्रणोदन गैस टर्बाइन की दिशा में भी आगे बढ़ता है, तो इसका असर भारतीय नौसेना की आत्मनिर्भरता पर बहुत बड़ा हो सकता है। इसलिए इस खबर को केवल इस तरह देखना सही नहीं होगा कि नौसेना को 12 नए जनरेटर मिलेंगे। इसकी असली कहानी है कि भारत युद्धपोत की उस तकनीकी परत को भी स्वदेशी बनाने की कोशिश कर रहा है, जो उसकी पूरी लड़ाकू क्षमता को ऊर्जा देती है। आज शुरुआत 1.25 मेगावाट से हुई है।

लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि यह यात्रा भारत को कल बड़े नौसैनिक गैस टर्बाइन और प्रणोदन प्रणालियों तक कितनी दूर ले जाती है। अगर यह यात्रा सफल होती है, तो आज के ये 12 जनरेटर केवल 12 मशीनें नहीं होंगे। ये भारत की नौसैनिक इंजन आत्मनिर्भरता की अगली सीढ़ी साबित हो सकते हैं।

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