तुर्की की संसद में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को मंजूरी देने वाले विधेयक पर चर्चा चल रही है। तीन धाराओं वाले इस विधेयक की पहली धारा को सदन ने स्वीकार कर लिया है। बाकी दो धाराओं और पूरे विधेयक पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
इसी बीच, 4 नवंबर की बहस में संसद में एक अहम सवाल गूंजा। भारत और पाकिस्तान के बीच फिर लड़ाई हुई, तो तुर्की क्या करेगा? विपक्षी सांसदों ने सरकार से पूछा कि किन हालात में अंकारा को पाकिस्तान की सैन्य मदद करनी पड़ेगी। सवाल समझौते की उस शर्त से जुड़ा है, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर बाहरी सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।
बताया जा रहा है कि ऐसी स्थिति में मदद का स्वरूप और दायरा तीनों देशों के आकलन और आपसी बातचीत से तय होगा। तुर्की की संसदीय विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष फुआत ओक्ताय के मुताबिक, लड़ाई में भाग लेने के लिए तुर्की के सैनिकों को विदेश भेजने का फैसला संसद को करना होगा।
संसद में पेश विधेयक तीन धाराओं का है। पहली धारा समझौते के अनुमोदन को स्वीकार करती है। बाकी दो धाराएँ कानून के प्रकाशन के दिन उसके लागू होने और राष्ट्रपति द्वारा उसका क्रियान्वयन किए जाने से संबंधित हैं।
भारत–पाकिस्तान वाला सवाल किसने उठाया?
4 नवंबर को पूर्ण सदन की बहस में भी विपक्षी सांसदों ने भारत–पाकिस्तान का मुद्दा उठाया। उस बैठक की उपलब्ध रिपोर्ट में इस खास सवाल को किसी एक सांसद के नाम से नहीं जोड़ा गया है। इसके पहले मुख्य विपक्षी दल CHP के सांसद उत्कु चाकिरओज़र ने 27 अक्टूबर को विदेश मामलों की समिति की बैठक में भारत और कश्मीर का मुद्दा उठाया था।
उनका कहना था कि पाकिस्तान और तुर्की की सुरक्षा प्राथमिकताएँ अलग हैं। उन्होंने आशंका जताई कि समझौते के चलते तुर्की को पाकिस्तान के सुरक्षा विवादों में खिंचना पड़ सकता है और भारत के साथ उसके संबंधों पर असर पड़ सकता है।
क्या पाकिस्तान की मदद के लिए तुर्की सैनिक भेजे जा सकते हैं?
किसी संकट में पहला सवाल होगा कि क्या वह घटना समझौते में तय बाहरी सशस्त्र हमले की शर्त के तहत आती है। इसके बाद मदद का स्वरूप तय होगा। समझौते में सैन्य सहायता की गुंजाइश है। इसमें खुफिया जानकारी साझा करने, लॉजिस्टिक सहयोग, संयुक्त प्रशिक्षण और रक्षा उपकरणों के विकास व उत्पादन में सहयोग की व्यवस्था भी है।
तुर्की से सैन्य उपकरण या खुफिया जानकारी देने और तुर्की के सैनिकों को लड़ाई में उतारने के फैसले अलग हैं। ओक्ताय ने लड़ाई के लिए विदेश में सैनिक भेजने पर तुर्की के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत संसद की भूमिका बताई। इसी अनुच्छेद में अंतरराष्ट्रीय संधियों से जुड़े मामलों के लिए एक अपवाद भी है। मक्का समझौते को लागू करते समय उस अपवाद की व्याख्या कैसे होगी, यह भी बहस का हिस्सा है।
तुर्की के सांसदों की और क्या-क्या आपत्ति है?
- İYİ पार्टी के लुत्फू तुर्ककान ने पूछा कि तुर्की किन हालात में सैन्य मदद देने के लिए बाध्य होगा, उसका खर्च कितना होगा और देश को क्षेत्रीय संघर्ष में खिंचने से रोकने के लिए क्या व्यवस्था है।
- मुख्य विपक्षी CHP के फाइक ओज़त्राक ने समझौते के पक्ष में वोट देने की बात कही, साथ ही मांग की कि विदेश में तुर्की सैनिक भेजने का फैसला संसद के हाथ में रहे। DEM पार्टी ने समझौते का विरोध किया, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन की सहयोगी MHP ने समर्थन दिया।
- एक बड़ी आपत्ति 10 साल की शर्त पर है। समझौता लागू होने के बाद पहले 10 वर्षों तक कोई सदस्य इससे बाहर नहीं निकल सकेगा। उसके बाद भी कम से कम तीन महीने पहले लिखित सूचना देनी होगी।
कौन समर्थन में है और कौन विरोध में?
सत्तारूढ़ AK पार्टी और उसकी सहयोगी MHP ने समझौते का समर्थन किया। मुख्य विपक्षी दल CHP के फाइक ओज़त्राक ने भी पूर्ण सदन में पक्ष में वोट देने की बात कही, साथ ही विदेश में सैनिक भेजने का अधिकार संसद के पास रखने पर जोर दिया।
İYİ और DEM ने विरोध जताया। येनी योल ने कहा कि सैन्य जिम्मेदारियों की सीमा और संसदीय निगरानी पर स्पष्टता के बिना वह विधेयक के मौजूदा स्वरूप का समर्थन नहीं कर सकती।
विधेयक की अंतिम मंजूरी में अब क्या बाकी है?
तुर्की के पूर्ण सदन में दो धाराओं पर फैसला और फिर पूरे विधेयक पर अंतिम वोट बाकी है। दूसरी धारा मंजूरी कानून के प्रकाशन के दिन लागू होने से जुड़ी है। तीसरी धारा उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राष्ट्रपति को देती है। पूरे विधेयक की मंजूरी के बाद कानून के प्रकाशन का चरण आएगा।
समझौता कब और किसने किया था ?
7 अगस्त 2026 को मक्का में तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने Mecca Joint Defense Agreement पर हस्ताक्षर किए।
इसे 21 अक्टूबर को तुर्की की संसद में पेश किया गया और 27 अक्टूबर को विदेश मामलों की समिति ने मंजूरी दी। समझौता तीनों देशों की अनुमोदन प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू होगा।








