तुर्की की भारत विरोधी सोच क्या कश्मीर से आगे बढ़कर देश के भीतर धार्मिक अलगाव पैदा करने तक पहुंच गई है? अमेरिकी वेबसाइट जिहाद वॉच पर छपे एक लेख के मुताबिक तुर्की भारत में मुसलमानों को ‘हिंदू रूल’ के विरुद्ध विद्रोह के लिए भड़का रहा है। पाकिस्तान भी इसी सोच को बढ़ावा दे रहा है।
लेख में दावा किया गया है कि दोनों देश भारतीय मुसलमानों को गैर-मुस्लिम शासन के खिलाफ खड़ा करने और अलग मातृभूमि की सोच को बढ़ावा देना चाहते हैं।
‘Turkey Encouraging Muslims in India to Revolt’ शीर्षक वाले आर्टिकल में फिट्जगेराल्ड ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की बयानबाजी और पाकिस्तान के दो-राष्ट्र सिद्धांत को एक साथ जोड़कर देखा है। उनका आरोप है कि दोनों देशों के नेतृत्व की सोच में धार्मिक आधार पर भारत को कमजोर करने की समानता है।
कैसी सोच रखते हैं एर्दोगन ?
फिट्जगेराल्ड के मुताबिक, तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोगन एक मुस्लिम वर्चस्ववादी हैं। उनका मानना है कि कहीं भी गैर-मुस्लिमों का मुसलमानों पर शासन करना बर्दाश्त के बाहर है। उनकी सोच में गैर-मुस्लिम देशों के भीतर रहने वाले मुसलमानों का मुद्दा विशेष महत्व रखता है।
- वह आरोप लगाते हैं कि एर्दोगन ऐसे क्षेत्रों में मुस्लिम अलगाववाद को प्रोत्साहित करना चाहते हैं और इसी वैचारिक आधार पर पाकिस्तान के करीब आए हैं।
- इसी संदर्भ में वह एर्दोगन की एक व्यापक पैन-इस्लामिक सैन्य शक्ति की पुरानी पैरवी का उल्लेख करते हैं।
- फिट्जगेराल्ड के मुताबिक, एर्दोगन ऐसी सैन्य ताकत चाहते रहे हैं, जो इजरायल को पराजित करने में सक्षम हो।
लेखक तर्क देते हैं कि एर्दोगन की यह सोच केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, गैर-मुस्लिम देशों में रहने वाले मुसलमानों के सवाल पर तुर्की और पाकिस्तान का नेतृत्व समान नजरिया रखता है। वह दोनों देशों की बढ़ती नजदीकियों को इसी वैचारिक समानता से जोड़ते हैं।
भारत के टुकड़े चाहते हैं एर्दोगन ?
फिट्जगेराल्ड का सबसे गंभीर आरोप भारत से संबंधित है। वह लिखते हैं कि तुर्की और पाकिस्तान भारतीय मुसलमानों को कथित ‘हिंदू शासन के बंधन’ तोड़ने और अपने लिए अलग मातृभूमि की मांग करने की ओर धकेलना चाहते हैं।
- तुर्की और पाकिस्तान, दोनों ही इस बात पर जोर देते रहे हैं कि भारत के मुसलमानों को हिंदू शासन की ‘बेड़ियों’ को तोड़ देना चाहिए।
- अपने लिए भारत के 20 करोड़ मुसलमानों को एक अलग मातृभूमि की मांग करनी चाहिए—जो या तो पूरी तरह स्वतंत्र हो, या फिर बांग्लादेश या पाकिस्तान का हिस्सा बन जाए।
- लेखक इसे केवल भारत की आलोचना नहीं, बल्कि उसकी मौजूदा सीमाओं और राष्ट्रीय एकता के लिए संभावित चुनौती के तौर पर पेश करते हैं।
किन बातों के आधार पर नतीजों पर पहुंचे फिट्जगेराल्ड ?
इस आर्टिकल का प्रमुख आधार अमेरिकी विश्लेषक माइकल रुबिन का The Sunday Guardian में ‘Could India face a sectarian civil war?’ शीर्षक वाला विश्लेषण है। फिट्जगेराल्ड द्वारा उद्धृत रुबिन के अंश में कहा गया है कि पाकिस्तान और तुर्की के इस्लामवादी विचारों में लंबे समय से यह सोच मौजूद रही है कि भारतीय मुसलमानों को गैर-मुस्लिम शासन के तहत नहीं रहना चाहिए।
इसके समर्थन में 6 अगस्त 2019 को तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के बयान का उल्लेख किया गया है। जिसमें इमरान ने कहा था कि जिन्ना ने भारत के मुसलमानों को कट्टरता और नस्लवाद से मुक्त अलग मातृभूमि देने के लिए दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया था।
इसके बाद इमरान के उस कथन का भी जिक्र है, जिसमें उन्होंने भारत के एक दिन केवल हिंदुओं का देश बन जाने की बात कही थी।
आर्टिकल में दूसरा प्रमुख उदाहरण 16 अप्रैल 2025 के आसिम मुनीर के बयान का है। इसमें मुनीर ने पूर्वजों की सोच का हवाला देते हुए हिंदुओं और मुसलमानों को जीवन के विभिन्न पहलुओं में अलग बताते हुए दोनों के अलग राष्ट्र होने पर जोर दिया था।
संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम में एर्दोगन ने क्या कहा?
फिट्जगेराल्ड ने रुबिन के जरिए 25 सितंबर 2019 के एक कार्यक्रम का उल्लेख किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हेट स्पीच पर आयोजित इस कार्यक्रम की सह-मेजबानी तुर्की और पाकिस्तान ने की थी।
उद्धृत अंश के मुताबिक, एर्दोगन ने सवाल उठाया था कि भारत में उन मुस्लिम युवाओं की रक्षा कैसे की जाए, जिन्हें बीफ खाने के कारण पीटा जा रहा है, धारदार हथियारों से मारा जा रहा है या मौत की सजा दी जा रही है।
इसके करीब पांच महीने बाद एर्दोगन ने अपनी पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं के सामने भारत में मुसलमानों के नरसंहार का आरोप लगाया। उन्होंने हिंदुओं को इसके लिए जिम्मेदार बताया।
- फरवरी 2020 की दिल्ली हिंसा के दौरान भी एर्दोगन ने भारत पर तीखी टिप्पणी की थी
- फिट्जगेराल्ड इन टिप्पणियों को भारत के खिलाफ एर्दोगन की सोच के उदाहरण के तौर पर रखते हैं।
गोधरा से मुंबई तक हमलों का जवाबी उल्लेख
फिट्जगेराल्ड का कहना है कि एर्दोगन भारत की हिंसा का एकतरफा चित्र पेश करते हैं। एर्दोगन की मुसलमानों के साथ कथित भेदभाव व हिंसा संबंधी टिप्पणियों के जवाब में फिट्जगेराल्ड आरोप लगाते हैं कि वह भारत में हिंदुओं पर हुए हमलों को भूल जाते हैं या उनका उल्लेख नहीं करना चाहते।
फिट्जगेराल्ड गोधरा ट्रेन अग्निकांड में 59 लोगों की मौत का जिक्र करते हैं। इसके अलावा 1998 के चंबा हत्याकांड, 2002 के रघुनाथ मंदिर हमलों, अक्षरधाम हमले और 2003 के मराड हत्याकांड को गिनाते हैं।
आर्टिकल में हिंदू त्योहारों के दौरान हमलों और मुंबई आतंकी हमलों का भी उल्लेख है। मुंबई के संदर्भ में चबाड हाउस को निशाना बनाए जाने की बात भी कही गई है। इन उदाहरणों से फिट्जगेराल्ड का तर्क है कि एर्दोगन भारत की हिंसा का चुनिंदा चित्र पेश करते हैं।
पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों पर क्यों उठाए सवाल?
आर्टिकल में पाकिस्तान और तुर्की पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप भी लगाया गया है। रुबिन का कहना है कि भारत के मुसलमानों की स्थिति पर सवाल उठाने वाले देशों को अपने यहां धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले व्यवहार को भी देखना चाहिए।
- 1947 में, बंटवारे के तुरंत बाद, पश्चिमी पाकिस्तान की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 15% थी, जो चार साल बाद घटकर केवल 1.5% रह गई।
- पूर्वी पाकिस्तान में 1947 में हिंदू आबादी का 30% थे, जबकि आज वे बांग्लादेश की कुल आबादी का 8% हैं।
- पाकिस्तान और बांग्लादेश, दोनों ही जगहों पर ईसाइयों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है, जिसमें ईशनिंदा के झूठे आरोप भी शामिल हैं।
- पाकिस्तान में सिख समुदाय की स्थिति के बीच विरोधाभास भी आर्टिकल में उठाया गया है।
पाकिस्तान के संदर्भ में हिंदुओं और ईसाइयों का पलायन, धार्मिक हिंसा तथा ईशनिंदा कानून के दुरुपयोग का उल्लेख है। फिट्जगेराल्ड आसिया बीबी का उदाहरण देते हैं, जिन्हें ईशनिंदा मामले में दोषमुक्त किए जाने के बावजूद कट्टरपंथियों के खतरे के कारण देश छोड़ना पड़ा।
इंटरनेट से कट्टरता फैलने की चेतावनी
रुबिन की प्रमुख चिंता ऑनलाइन कट्टरपंथ है। उनका तर्क है कि इंटरनेट के जरिए धार्मिक शिकायतों और असुरक्षा को बढ़ाना आसान है, लेकिन कट्टरता की ओर जा चुके लोगों को वापस लाना कठिन होता है।
वह खालिस्तान आतंकवाद के दौर का उदाहरण देकर चेतावनी देते हैं कि अलगाववादी हिंसा किसी देश को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।
यूपी-बिहार-बंगाल के हिस्सों से बनेगा अलग मुस्लिम देश या होगा बांग्लादेश में विलय ?
लेख के आखिरी हिस्से में ह्यू फिट्जगेराल्ड उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल को आपस में जुड़े हुए राज्य बताते हैं। वह सवाल उठाते हैं कि क्या तुर्की-पाकिस्तान के उकसावे से इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मुसलमान कथित ‘हिंदू शासन’ के खिलाफ खड़े होकर अलग मुस्लिम देश बना सकते हैं या बांग्लादेश में शामिल होने की मांग कर सकते हैं।
फिट्जगेराल्ड इसे भारत की मौजूदा सीमाओं और एकता के लिए खतरे के तौर पर पेश करते हैं। उनकी अंतिम चेतावनी है कि भारत तुर्की-पाकिस्तान की वैचारिक पहुंच और धार्मिक बयानबाजी को हल्के में न ले।








