भारत और सिंगापुर मिलकर एक ऐसे बड़े रणनीतिक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, जो आने वाले समय में पूरे दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के जियोपॉलिटकल और ऊर्जा समीकरणों को बदल सकता है। दोनों के बीच कुछ और देशों को जोड़ते हुए एक बड़े बिजली ग्रिड नेटवर्क बनाने की तैयारी चल रही है।
भारत से सिंगापुर तक बिजली ट्रांसमिशन कॉरिडोर बनाने की संभावना तलाशी जा रही है। यह गलियारा पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सिंगापुर तक पहुंचेगा। यह लैंड-बेस्ड (भूमि-आधारित) पावर ट्रांसमिशन कॉरिडोर लगभग 3,000 किलोमीटर लंबा होगा।
इस प्रपोजल का जिक्र केंद्रीय बिजली एवं नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा राज्यमंत्री श्रीपाद येसो नाइक ने 8 अक्टूबर 2026 को फिलीपींस के मनीला में आयोजित 20वीं ईस्ट एशिया समिट ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में किया। भारत और सिंगापुर सीमा पार बिजली संपर्क के विभिन्न ऑप्टन पर विचार कर रहे हैं।
यह प्रोजेक्ट न सिर्फ क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगी, बल्कि हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में भारत के बढ़ते रणनीतिक दखल का एक बहुत बड़ा सबूत भी बनेगी। भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ (Act East Policy) को एक नया रणनीतिक आयाम देगा।
प्रपोज्ड पॉवर कॉरिडोर का पूरा रूट क्या होगा?
प्रस्तावित गलियारे की सबसे खास बात इसका भौगोलिक विस्तार है। यह भारत के पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्व एशिया के महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र सिंगापुर से जोड़ने की संभावना पेश करता है। प्रोजेक्ट का पर्पज भारत की Vast Renewable Energy (खासकर नॉर्थ-ईस्ट और मुख्य भूमि भारत में उत्पादित सौर और जल विद्युत) को दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे बड़े वित्तीय हब सिंगापुर तक पहुँचाना है। यह 2,000 मेगावाट (MW) क्षमता वाला एक मेगा क्रॉस-बॉर्डर पावर ग्रिड होगा।
| प्रमुख जानकारी | विवरण |
| प्रस्तावित क्षमता | 2,000 मेगावाट |
| अनुमानित लंबाई | लगभग 3,000 किलोमीटर |
| भारत में शुरुआती बिंदु | इम्फाल, मणिपुर |
| अंतिम गंतव्य | सिंगापुर |
| संभावित ट्रांजिट देश | म्यांमार, थाईलैंड और मलेशिया |
| मौजूदा स्थिति | विभिन्न विकल्पों पर विचार |
| निर्माण लागत | अभी घोषित नहीं |
| निर्माण और पूरा होने की समयसीमा | अभी घोषित नहीं |
पूरा अनुमानित कनेक्टिविटी रूट: इम्फाल (भारत) ➔ म्यांमार ➔ थाईलैंड ➔ मलेशिया ➔ सिंगापुर।
सिंगापुर को इसकी जरूरत क्यों ?
भारत से आने वाले इस 3,000 किलोमीटर लंबे पावर कॉरिडोर की सबसे ज्यादा जरूरत सिंगापुर को है। क्योंकि उसकी भौगोलिक स्थिति (ज्योग्राफिकल पोजीशन) और ऊर्जा सुरक्षा (एनर्जी सिक्योरिटी) के सामने कुछ ऐसी गंभीर चुनौतियाँ हैं जिनका समाधान सिंगापुर के पास खुद नहीं है।
- शून्य कार्बन उत्सर्जन (Net-Zero) का कड़ा लक्ष्य- सिंगापुर ने साल 2050 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। इसके तहत उन्होंने 2035 तक अपने देश में 6 गीगावाट (GW) लो-कार्बन (पर्यावरण-अनुकूल) बिजली इंपोर्ट करने का फैसला किया है। तो यह प्रोजेक्ट कारगर साबित होगा।
- जमीन की भारी कमी (Lack of Space for Solar Plants)– सिंगापुर एक बहुत ही छोटा द्वीप देश (Island Nation) है। क्लीन एनर्जी बनाने का सबसे आसान तरीका सोलर पैनल लगाना है, लेकिन सिंगापुर के पास बड़े सोलर फार्म या विंड टरबाइन लगाने के लिए जमीन ही नहीं है।
- प्राकृतिक गैस पर 95% निर्भरता का जोखिम– अभी सिंगापुर अपनी 95% बिजली का उत्पादन आयातित प्राकृतिक गैस (Natural Gas) से करता है। किसी एक ही सोर्स पर इतनी बड़ी डिपेंडेंसी एनर्जी सिक्योरिटी के लिहाज से बेहद खतरनाक है। अगर ग्लोबल मार्केट में गैस की कीमतें बढ़ती हैं या Malacca Strait के समुद्री रास्ते में कोई तनाव होता है, तो सिंगापुर में ब्लैकआउट (बिजली गुल) का खतरा पैदा हो जाएगा।
- डेटा सेंटर्स और AI हब के लिए चौबीसों घंटे बिजली– सिंगापुर पूरी दुनिया का एक बड़ा टेक और फाइनेंशियल हब है। वहां बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर काम कर रहे हैं, जिन्हें बिना किसी रुकावट के चौबीसों घंटे (24/7) भारी मात्रा में बिजली चाहिए होती है। ऐसे में यह प्रोजेक्ट बैकबोन (रीढ़ की हड्डी) साबित होगा।
स्ट्रैटेजिक और जियोपॉलिटकल नजरिए से प्रोजेक्ट ?
यह प्रोजेक्ट महज बिजली के तारों का जाल नहीं, बल्कि यह भारत का एक भू-रणनीतिक सुरक्षा कवच बन सकता है।
- म्यांमार में चीनी प्रभाव को चुनौती: म्यांमार में तख्तापलट के बाद से चीन ने वहाँ भारी निवेश किया है और क्याुकफ्यू (Kyaukphyu) गहरे समुद्र के बंदरगाह के जरिए बंगाल की खाड़ी तक अपनी पहुंच बनाई। भारत का यह ग्रिड म्यांमार को अपने साथ आर्थिक रूप से जोड़ेगा।
- चोक पॉइंट Malacca Strait पर असर: सिंगापुर Malacca Strait के मुहाने पर स्थित है, जो दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग है और चीन की लाइफलाइन है। इस क्षेत्र में ग्रिड के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराके भारत अपनी रणनीतिक स्थिति को बेहद मजबूत कर लेगा।
- आसियान पावर ग्रिड (APG) के साथ एकीकरण: यह कॉरिडोर व्यापक आसियान पावर ग्रिड पहल का हिस्सा बनेगा, जिससे भारत पूरे दक्षिण-पूर्व एशियाई ब्लॉक के साथ रणनीतिक रूप से इंटीग्रेट हो जाएगा।
इसके अलावा प्रोजेक्ट से पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने की नई संभावना बनती है। बिजली का सीमा पार कारोबार बढ़ाने की संभावना। भारत की पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (POWERGRID), NTPC, और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) जैसी कंपनियों और संस्थाओं को वैश्विक स्तर पर अपनी ताकत दिखाने का मौका मिलेगा।
प्रस्तावित प्रोजेक्ट के सामने चुनौतियां ?
यह इंटरनेशनल पॉवर कॉरिडोर तैयार करना इतना आसान नहीं है। इसमें तकनीकी, वित्तीय (फाइनेंशियल), कूटनीतिक और सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
- चार देशों के बीच समझौते: भारत, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर को ट्रांसमिशन तथा बिजली व्यापार से जुड़े नियमों पर सहमति बनानी होगी।
- भारी इन्वेस्टमेंट: प्रोजेक्ट का कुल खर्च अभी घोषित नहीं। लेकिन यह तय कि इसमें बहुत बड़ा खर्च आएगा।
- ग्रिड का तालमेल: अलग-अलग देशों के बिजली नेटवर्क, वोल्टेज व्यवस्था, ट्रांसमिशन तकनीक और परिचालन नियमों के बीच तालमेल।
- सुरक्षा और स्थिरता: लंबे मार्ग पर स्थित ट्रांसमिशन ढांचे को प्राकृतिक आपदाओं, तकनीकी खराबी और स्थानीय सुरक्षा चुनौतियों से बचाना होगा।
- बिजली की कीमत: यह तय करना होगा कि बिजली कौन बेचेगा, कौन खरीदेगा और ट्रांसमिशन का खर्च किस तरह बांटा जाएगा।
म्यांमार की मौजूदा राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियां भी किसी संभावित जमीनी मार्ग की व्यवहार्यता के आकलन में महत्वपूर्ण होंगी।
किन पड़ोसी देशों तक पहुंच रही भारतीय बिजली ?
भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ बिजली का कारोबार साझा ट्रांसमिशन लाइनों और बिजली एक्सचेंजों के जरिए करता है। इसमें नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार जैसे देश शामिल हैं। हालांकि, इन चारों देशों के साथ बिजली का लेन-देन एकतरफा नहीं है। भारत, भूटान और नेपाल जैसे देशों से बिजली लेना-देना, दोनों करता है।








