आर्थिक कंगाली, राजनीतिक अस्थिरता और अंदरूनी बगावत से जूझ रहे पाकिस्तान में एक बार फिर बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। ‘द इकोनॉमिस्ट’ (The Economist) की एक हालिया रिपोर्ट ने रक्षा और राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना के प्रमुख और नवनियुक्त फील्ड मार्शल असीम मुनीर देश के मौजूदा चार प्रांतों—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा (KPK) और बलूचिस्तान—का ऐतिहासिक नक्शा पूरी तरह बदलने की तैयारी कर रहे हैं।
इस गुप्त और बेहद संवेदनशील प्लान के तहत पाकिस्तान के इन चार बड़े राज्यों को तोड़कर 12 से 15 नए प्रांतों में या फिर लगभग 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है। इस खुफिया योजना को रावलपिंडी के गलियारों में ‘ऑपरेशन रीमैप’ (Operation Remap) कहा जा रहा है।
जहां एक तरफ सेना इसे बेहतर गवर्नेंस और प्रशासनिक सुविधा का नाम दे रही है, वहीं दूसरी तरफ रक्षा विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक इसे जनरल असीम मुनीर का ‘डिवाइड एंड रूल’ (बांटो और राज करो) का नया पैंतरा मान रहे हैं।
किसे कितने टुकड़ों में बांटने की है तैयारी?
लीक हुई जानकारियों और पाकिस्तानी गलियारों की चर्चाओं के मुताबिक, 28वें संवैधानिक संशोधन (28th Amendment) के जरिए प्रांतों की सीमाओं को दोबारा तय करने की उम्मीद है। इस विभाजन का खाका कुछ इस तरह तैयार किया गया है:-
- पंजाब (Punjab): वर्तमान में पाकिस्तान की आधी से अधिक आबादी (लगभग 12.8 करोड़) इसी प्रांत में रहती है। इसे चार हिस्सों में तोड़ा जा सकता है: पश्चिमी पंजाब, दक्षिण पंजाब, बहावलपुर और पोठोहार।
- सिंध (Sindh): इसे तीन हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव है: कराची/लोअर सिंध, अपर सिंध और मेहरान।
- बलूचिस्तान (Balochistan): क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़े लेकिन आबादी में सबसे छोटे इस अशांत प्रांत को बलूचिस्तान और मकरान में विभाजित किया जा सकता है।
- खैबर पख्तूनख्वा (KPK): इमरान खान के इस गढ़ को खैबर, दक्षिण केपीके, हजारा और कोहिस्तान नामक चार प्रांतों में विभाजित करने की योजना है।
- संघीय क्षेत्र: इस्लामाबाद के साथ-साथ गिलगित-बाल्टिस्तान और POJK को सीधे केंद्र के नियंत्रण वाले विशेष प्रशासनिक ढांचे में मजबूत किया जा सकता है।
इस बात को चार्ट में देखें-
| वर्तमान प्रांत | प्रस्तावित नए राज्य/टुकड़े | सैन्य नियंत्रण का रणनीतिक कारण |
| पंजाब (12.8 करोड़ आबादी) | • पश्चिमी पंजाब • दक्षिण पंजाब • बहावलपुर • पोठोहार | शरीफ परिवार (PML-N) के ‘वोट बैंक’ को हमेशा के लिए खत्म करना। |
| सिंध (5.5 करोड़ आबादी) | • कराची (लोअर सिंध) • अपर सिंध • मेहरान | भुट्टो-जरदारी (PPP) की रियासत को तोड़ना और कराची के राजस्व पर कब्जा। |
| खैबर पख्तूनख्वा (KPK) | • खैबर • दक्षिण KPK • हजारा • कोहिस्तान | इमरान खान (PTI) के पश्तून राष्ट्रवाद और बगावती गढ़ को तितर-बितर करना। |
| बलूचिस्तान (क्षेत्रफल में सबसे बड़ा) | • बलूचिस्तान • मकरान | बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और अलगाववादी आंदोलनों की भौगोलिक कड़ियाँ तोड़ना। |
रावलपिंडी का चक्रव्यूह: ‘गवर्नेंस’ का मुखौटा या ‘आजीवन सुल्तान’ बनने का एजेंडा ?
पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर का कार्यकाल दिसंबर 2025 में चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) के रूप में नई नियुक्ति के बाद पांच साल के लिए निर्धारित है। वह नवंबर/दिसंबर 2030 तक पाकिस्तान के सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) रह सकते हैं। इसके साथ उनके पास आजीवन फील्ड मार्शल पांच सितारा सैन्य रैंक है। इस कड़ी में उनका री-मैप प्लान शक्तियों के केंद्रीकरण के तौर पर देखा जा रहा है।
पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान (Military Establishment) और सरकार में शामिल उनके करीबी मंत्रियों (जैसे आंतरिक मंत्री मोहसिन नकवी और योजना मंत्री अहसन इकबाल) का तर्क है कि पाकिस्तान के मौजूदा प्रांत गवर्नेंस के लिहाज से बेहद बोझिल हो चुके हैं। बड़े प्रांतों के कारण विकास रुक गया है। जैसा कि पंजाब का बजट लाहौर से बाहर नहीं जाता और बलूचिस्तान की विशालता के कारण वहां गवर्नेंस फेल है।
सितंबर में पाकिस्तान के योजना एवं विकास मंत्री अहसान इकबाल ने प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से देश के प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन करने का आग्रह किया था। साथ ही कहा था कि –

मेरे विचार में पाकिस्तान में 12 से 15 नए प्रांत होने चाहिए। सभी मौजूदा प्रांतों को तीन-तीन हिस्सों में बांट दिया जाना चाहिए। मैंने प्रस्ताव दिया है कि कानून मंत्री के माध्यम से प्रशासनिक सुधारों पर एक समिति बनाई जाए, जो कम से कम इस बात पर राष्ट्रीय और राजनीतिक बहस शुरू कर सके कि क्या किया जा सकता है और क्या नहीं। आखिरकार, नए प्रांत बनाने के लिए राजनीतिक सहमति बनाना जरूरी है।
Ahsan Iqbal, Planning and Development Minister, Pakistan
नए प्रांत बनाने के समर्थकों का तर्क है कि छोटी प्रशासनिक इकाइयों से शासन जनता के करीब पहुंच सकता है और पिछड़े क्षेत्रों तक संसाधन पहुंचाना आसान हो सकता है। लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट का मानना है कि गवर्नेंस का तर्क केवल एक मुखौटा है, वास्तव में इस कदम के पीछे जनरल मुनीर के पांच बेहद क्रूर और दूरगामी रणनीतिक लक्ष्य हैं:-
1. राजनीतिक दलों के ‘पावर बेस’ को पूरी तरह ध्वस्त करना
पाकिस्तान की राजनीति हमेशा से क्षेत्रीय गढ़ों (Fiefdoms) पर टिकी रही है। पंजाब पारंपरिक रूप से शरीफ परिवार (PML-N) का गढ़ रहा है, जबकि सिंध पर भुट्टो-जरदारी परिवार (PPP) का एकाधिकार रहा है। जब ये दल बड़े प्रांतों में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाते हैं, तो वे रावलपिंडी (सैन्य मुख्यालय) के सामने पूरी तरह घुटने नहीं टेकते और सत्ता का एक वैकल्पिक केंद्र बने रहते हैं। अगर पंजाब और सिंध को छोटे राज्यों में तोड़ दिया गया, तो इन पार्टियों की ताकत बिखर जाएगी।
2. इमरान खान और ‘पीटीआई’ के बगावती सुरों को कुचलना
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) का खैबर पख्तूनख्वा (KPK) में मजबूत शासन है। जेल में होने के बावजूद इमरान खान के समर्थक लगातार इस्लामाबाद को चुनौती दे रहे हैं। KPK प्रांत को चार अलग-अलग हिस्सों में बांटकर सेना इमरान के सबसे बड़े जनाधार और उनके समर्थकों की लामबंदी को भौगोलिक रूप से तितर-बितर करना चाहती है, ताकि भविष्य में सेना के खिलाफ कोई बड़ा जन-आंदोलन खड़ा न हो सके।
3. बलूचिस्तान और सिंध के राष्ट्रवाद को दबाना
बलूचिस्तान और सिंध में मजबूत क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान है। बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे संगठन और सिंध में सिंधी राष्ट्रवादी ताकतें सेना के अत्यधिक नियंत्रण का विरोध करती रही हैं। प्रांतों को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करने से इन क्षेत्रों की जातीय और भाषाई एकता कमजोर होगी। सेना का मानना है कि इससे अलगाववादी आंदोलनों की कमर तोड़ी जा सकती है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इससे गृहयुद्ध जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है।
4. कराची के खजाने पर कब्ज़ा और सिंध का खात्मा
सिंध प्रांत पाकिस्तान को सबसे ज्यादा टैक्स (राजस्व) देता है, जिसका मालिक भुट्टो परिवार बना बैठा है। सेना कराची को सिंध से अलग करके एक ‘विशेष संघीय क्षेत्र’ या अलग प्रांत बनाना चाहती है। ऐसा होते ही सिंध कंगाल हो जाएगा और कराची की अर्थव्यवस्था सीधे रावलपिंडी के रिमोट कंट्रोल से चलेगी।
3. ‘पपेट चीफ मिनिस्टर्स’ (कठपुतली मुख्यमंत्री) की फौज
जब 4 बड़े प्रांत होते हैं, तो उनके मुख्यमंत्रियों के पास भारी राजनीतिक ताकत होती है। लेकिन जब 15 छोटे-छोटे प्रांत होंगे, तो उनके मुख्यमंत्री बेहद कमजोर होंगे। इसके बाद केंद्र में बैठी सेना के लिए इन छोटे और कमजोर मुख्यमंत्रियों को अपनी उंगलियों पर नचाना बेहद आसान हो जाएगा। वे एक-एक फंड के लिए केंद्र (यानी सेना) के सामने हाथ फैलाएंगे। जनरल मुनीर यही चाहते हैं—एक ऐसा पाकिस्तान जहां कोई भी नेता सेना को आंख दिखाने की हैसियत में न रहे।
मुनीर के ख्वाब के सामने कितनी बड़ी संवैधानिक और कानूनी दीवार ?
भले ही इसका ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया गया हो, लेकिन पाकिस्तान के 1973 के संविधान के तहत नए प्रांत बनाना कोई आसान खेल नहीं है। इसके लिए बेहद जटिल संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना होगा। बल्कि यह योजना मुनीर के गले की हड्डी बन सकती है। इसके लिए दो ऐसी दीवारें हैं जिन्हें लांघना सेना के लिए भी नामुमकिन सा है।
- आर्टिकल 239 (संवैधानिक संशोधन): नए प्रांत बनाने के लिए पाकिस्तानी संसद (नेशनल असेंबली और सीनेट) में दो-तिहाई (2/3rd) बहुमत चाहिए। वर्तमान में शहबाज सरकार के पास यह नंबर नहीं है। बिना जबरदस्ती के ऐसा बहुमत जुटाना उसके लिए लोहे के चने चबाने जैसा है।
- प्रांतीय विधानसभाओं की मंजूरी का संकट: संविधान के मुताबिक जिस प्रांत को विभाजित किया जाना है, उस प्रांत की विधानसभा को भी अपने दो-तिहाई बहुमत से इस विभाजन का प्रस्ताव पारित करना होगा।
- इसके अलावा इस योजना की राह में सबसे बड़ी दीवार सिंध प्रांत : सिंध की असेंबली में पीपीपी का कब्जा है, उसने 3 सितंबर, 2026 को सिंध के किसी भी तरह के बंटवारे या कराची को अलग करने के प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया है। बल्कि प्रस्ताव पास किया है कि “सिंध का बंटवारा नामंजूर है।”
प्लान, पाकिस्तान के लिए वरदान या विनाश का रास्ता ?
रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि भारत ने भी भाषाई और प्रशासनिक आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया, नए राज्य बनाए (जैसे 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़)। लेकिन भारत में यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक मांग और संसद की सर्वसम्मति से हुई, जिससे देश मजबूत हुआ।
इसके विपरीत, पाकिस्तान में यह मांग जनता की नहीं, बल्कि एक डरे हुए सेना प्रमुख की सुरक्षा रणनीति से उपजी है। यह प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक हत्या का प्रयास है। पाकिस्तान इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है जहां वह पहले ही चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है।
प्रशासनिक रूप से छोटे प्रांत बनाना किसी भी विकासशील देश के लिए एक अच्छा कदम हो सकता है, जैसा कि भारत ने भी समय-समय पर किया है। लेकिन जब यही कदम किसी सेना प्रमुख द्वारा अपनी असीमित शक्तियों को सेंट्रलाइज्ड (केंद्रीकृत) करने और राजनीतिक विरोधियों को नेस्तनाबूद करने के इरादे से उठाया जाता है, तो इसके परिणाम आत्मघाती हो जाते हैं।
अगर असीम मुनीर जबरन इस ‘डिवाइड एंड रूल’ योजना को थोपने की कोशिश करते हैं, तो यह पाकिस्तान को प्रशासनिक रूप से सुधारने के बजाय देश को और अधिक अराजकता, प्रांतीय असंतोष और आंतरिक संघर्ष की आग में झोंक सकता है।
भारत के लिए इस घटनाक्रम के क्या मायने ?
भारत के लिए पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति पर नजर रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी संभावित प्रशासनिक बदलाव को सीधे भारत की सुरक्षा के लिए खतरा या फायदा बताना जल्दबाजी होगी। अगर पाकिस्तान में प्रांतीय पुनर्गठन पर गंभीर राजनीतिक संघर्ष शुरू होता है, तो इसका असर देश की आंतरिक स्थिरता, नागरिक-सैन्य संबंधों और सरकारी प्राथमिकताओं पर पड़ सकता है।
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां पहले से मौजूद हैं। ऐसे में सीमाओं और संसाधनों को लेकर विवाद बढ़ने पर पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। भारत के लिए तीन पहलुओं पर नजर रखना उपयोगी होगा:
- पाकिस्तान की सेना और elected government के बीच सत्ता का संतुलन किस दिशा में जाता है।
- प्रांतीय स्वायत्तता (autonomy), जातीय पहचान और संसाधनों (resources) को लेकर तनाव बढ़ता है या नहीं।
- आंतरिक राजनीतिक विवादों का पाकिस्तान की रक्षा नीति और भारत के साथ संबंधों पर कोई वास्तविक असर पड़ता है या नहीं।
पाकिस्तान का मौजूदा नक्शा ?
लगभग 25 करोड़ की आबादी वाले पाकिस्तान के प्रशासनिक नक्शे को समझना जरूरी है, क्योंकि देश में 12 से 15 नए प्रांत बनाने की चर्चा इसी मौजूदा व्यवस्था को बदलने से जुड़ी है।
पाकिस्तान में अभी चार मुख्य प्रांत हैं—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान। इनके अलावा इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र तथा पाकिस्तान के प्रशासन के अधीन दो क्षेत्र—गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाला जम्मू-कश्मीर—भी हैं।








