ग्रीनलैंड पर अमेरिका ने जमाया कब्जा, रूस-चीन का आर्कटिक खेल खत्म ?

By Defence Detective

Published On:

Date:

Snow-covered Greenland landscape in the Arctic

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लंबी समय से कायम जिद सच बन गई ! अमेरिका ने एक नए समझौते की शक्ल में ग्रीनलैंड पर आखिरकार कब्जा जमा ही लिया। डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर एक बड़ा सुरक्षा समझौता किया है। अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच हुए इस समझौते के मुताबिक अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा पर स्थायी नियंत्रण और वहां अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का अधिकार मिलेगा। ट्रंप ने इसे अमेरिका की सुरक्षा जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण समझौता बताया है।

हालांकि औपचारिक रूप से ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा नहीं बन रहा है।  वह अभी भी डेनमार्क के साम्राज्य का ऑटोनॉमस एरिया रहेगा। लेकिन व्यवहारिक तौर पर यह समझौता ग्रीनलैंड पर अमेरिका की पकड़ को कब्जा कर लेना जैसा ताकत देता हुआ माना जा रहा है।

अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड अगले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर करने की योजना बना रहे हैं। इसके बाद समझौते को लागू होने के लिए डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदीय प्रक्रिया से गुजरना होगा। फिर असली तस्वीर सामने आएगी

चीन ने समझौते को अमेरिका का ‘लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन’ (Long-arm jurisdiction) यानी अपनी सीमाओं से बाहर जाकर अन्य संप्रभु क्षेत्रों में गलत हस्तक्षेप बताया है। वहीं रूस ने इस समझौते को पूरी तरह से एक ‘अनफ्रेंडली’ (गैर-दोस्ताना) और उकसावे वाली कार्रवाई बताया है

ट्रंप की ग्रीनलैंड संबंधी क्या रही है मांग ?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर 2019 में कहानी शुरू हुई थी, जो अब 2026 में यहां समझौते की शक्ल में साकार हुई है। ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल में 2019 में अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा की खबर सामने आई थी। ट्रंप ने उस समय कहा था कि वह इस विचार को देख रहे हैं। इसके बाद वह ग्रीनलैंड पर कंट्रोल को लेकर विभिन्न तरह के दावे लगातार करते रहे। लेकिन दूसरे कार्यकाल में मामला ज्यादा गंभीर हो गया।

2019 में उनका शुरुआती कहना था कि ग्रीनलैंड को खरीद सकते हैं। उन्होंने कई मौकों पर ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने की बात की। लेकिन दूसरे कार्यकाल में बात काफी आगे निकल गई।

जनवरी 2025 में बोले कि अमेरिका को ग्रीनलैंड पर नियंत्रण चाहिए। ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए हासिल करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है। मतलब कि पूरी बात खरीद से control/take over” की हो गई थी।

मार्च 2025 में उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड का अमेरिका में शामिल होना होगा और “one way or the other” अमेरिका इसे हासिल करेगा।

इस प्रकार अब ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की जिद समझौते के तौर पर पूरी हो गई।

क्या है समझौते की और खास बातें ?

अभी समझौते की सभी चीजें पूरी तरह सामने नहीं आई हैं। लेकिन जो बातें सामने आईं और उनका मतलब देखें तो अमेरिका की ग्रीनलैंड पर पकड़ सुरक्षा से बहुत आगे की दिखती है। बल्कि वह लगभग मामलों में अमेरिका के अधीन जैसा हो जाएगा।

प्रमुख प्वाइंटआसान भाषा में मतलब
1. अमेरिका को स्थायी सुरक्षा अधिकारग्रीनलैंड की सुरक्षा से जुड़े मामलों में अमेरिका को लंबे समय तक निर्णायक भूमिका मिलेगी। ट्रंप ने इसे “permanent control over security” कहा है।
2. अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ेगीअमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी मौजूदा सैन्य मौजूदगी को काफी बढ़ा सकता है और नई सैन्य सुविधाएं/बेस विकसित करने का रास्ता खुल सकता है।
3. स्थायी बेसिंग अधिकारअमेरिकी सेना को ग्रीनलैंड में सैन्य बेस रखने और जरूरत के मुताबिक सैन्य ढांचा विकसित करने की स्थायी व्यवस्था मिलेगी।
4. स्थायी Access यानी पहुंचअमेरिकी सेना को ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य गतिविधियों के लिए लगातार पहुंच का अधिकार रहेगा। यानी यह केवल किसी अस्थायी अभियान के लिए अनुमति नहीं होगी।
5. Overflight यानी हवाई क्षेत्र का इस्तेमालअमेरिकी सैन्य विमान ग्रीनलैंड के ऊपर से अपनी सैन्य गतिविधियों के लिए उड़ान भर सकेंगे। यह मिसाइल चेतावनी, निगरानी और सैन्य लॉजिस्टिक्स के लिए महत्वपूर्ण है।
6. रूस-चीन जैसे विरोधी देशों के बेस पर रोकगैर-NATO देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य बेस बनाने से रोकने की व्यवस्था होगी। इसका सबसे सीधा निशाना रूस और चीन हैं
7. विरोधी देशों की सैन्य मौजूदगी पर रोककेवल बेस ही नहीं, अमेरिका के विरोधी देशों की सैनिक तैनाती को भी रोकने की व्यवस्था होगी।
8. संवेदनशील निवेश पर अमेरिकी मंजूरीरणनीतिक या संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिका के विरोधी देशों के निवेश पर रोक या अमेरिकी मंजूरी की शर्त होगी। इसका मकसद आर्थिक निवेश के जरिए चीन या किसी अन्य प्रतिद्वंद्वी की रणनीतिक पकड़ बनने से रोकना है।
9. ग्रीनलैंड की संप्रभुता बनी रहेगी ?कागजी तौर पर ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा नहीं बन रहा। वह अभी भी डेनमार्क के Kingdom के भीतर स्वायत्त क्षेत्र रहेगा।
10. ग्रीनलैंड के स्वतंत्र होने पर भी अधिकार जारी रहने की बातअमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक सुरक्षा संबंधी यह व्यवस्था भविष्य में भी लागू रहेगी, भले ही ग्रीनलैंड कभी डेनमार्क से स्वतंत्र हो जाए। यह समझौते के सबसे बड़े रणनीतिक पहलुओं में से एक है।

इस समझौते के बड़े मायने (Significance & Impact) क्या हैं ?

  • चीन और रूस की घेराबंदी (Countering Adversaries): पिघलती बर्फ के कारण आर्कटिक क्षेत्र में नए व्यापारिक मार्ग खुल रहे हैं। रूस और चीन लगातार इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में जुटे थे। इस समझौते के जरिए अमेरिका ने अपने इन दोनों बड़े प्रतिद्वंदियों को उत्तरी अमेरिका के ठीक ऊपर सैन्य रूप से पैर पसारने से पूरी तरह ब्लॉक कर दिया है।
  • ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस और सैन्य विस्तार: ट्रंप प्रशासन की योजना रूस और चीन के मिसाइल हमलों से सुरक्षा के लिए एक ‘गोल्डन डोम डिफेंस सिस्टम’ (Golden Dome Defense System) बनाने की है। ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इस मिसाइल डिफेंस सिस्टम और अंतरिक्ष निगरानी के लिए बेहद सटीक है। अमेरिका अब वहां अपने पुराने शीत युद्ध कालीन बेस दोबारा सक्रिय कर सकता है।
  • खनिजों पर नियंत्रण (Strategic Resources): ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ मिनिरल्स (दुर्लभ खनिज पदार्थों) के विशाल और अछूते भंडार मौजूद हैं, जो स्मार्टफोन, चिपमेकिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की आधुनिक तकनीकों के लिए रीढ़ की हड्डी हैं। संवेदनशील निवेशों की स्क्रीनिंग कर अमेरिका इन संसाधनों पर चीन के एकाधिकार की कोशिशों को खत्म करना चाहता है।
  • नाटो और यूरोप के लिए राहत: ट्रंप की सैन्य कार्रवाई और कब्जे की धमकियों से अमेरिका और उसके नाटो सहयोगी डेनमार्क के बीच युद्ध जैसे तनावपूर्ण हालात बन गए थे। इस समझौते ने नाटो ब्लॉक के भीतर के इस बड़े कूटनीतिक विवाद को सुलझा दिया है और यूरोपीय क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को भी शांत किया है।
  • ग्रीनलैंड अमेरिका की उत्तरी मिसाइल-ढाल का अहम हिस्सा बनेगा– ग्रीनलैंड उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच बेहद रणनीतिक जगह पर है। वहां पहले से अमेरिकी Pituffik Space Base मौजूद है, जिसमें मिसाइल-चेतावनी रडार और अंतरिक्ष निगरानी क्षमता है। नई व्यवस्था अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को और मजबूत करने का रास्ता खोलती है। मतलब: रूस की तरफ से आने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों पर अमेरिका को उत्तर दिशा से पहले चेतावनी और निगरानी क्षमता मजबूत करने का मौका मिलेगा।
  • ग्रीनलैंड पर कब्जा किए बिना रणनीतिक नियंत्रण बढ़ाना– यह सबसे दिलचस्प पहलू है। ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा नहीं बन रहा। उसकी संप्रभुता डेनमार्क के Kingdom के भीतर बनी रहेगी। लेकिन सुरक्षा के क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका बहुत ज्यादा मजबूत हो सकती है।

ग्रीनलैंड क्यों है इतना अहम?

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 21.76 लाख वर्ग किमी है। इसका महत्व उसकी जमीन से ज्यादा उसकी भौगोलिक स्थिति में है। यह उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित है और उत्तर अमेरिका की तरफ आने वाले संभावित मिसाइल मार्गों के करीब है।

यह भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है लेकिन राजनीतिक रूप से डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त (autonomous) क्षेत्र है। यह दिखने में भले ही बर्फ की सफेद चादर से ढका एक शांत द्वीप लगे, लेकिन आज की वैश्विक राजनीति (Geopolitics) में यह धरती की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक बन चुका है। कुछ अहम बातें इस प्रकार हैं-

1. अद्भुत भौगोलिक और सैन्य स्थिति (Strategic Location)

हमलों से सुरक्षा: यह इलाका उत्तरी ध्रुव (North Pole) के पास है, जिससे यह रूस या चीन की ओर से आने वाली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBMs) पर नजर रखने के लिए सबसे सटीक जगह है।

अंतरिक्ष और रडार निगरानी: यहाँ अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस (Pituffik Space Base) स्थित है, जो अमेरिकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम और अंतरिक्ष निगरानी का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ से उत्तरी गोलार्ध की हवाई गतिविधियों पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखी जा सकती है।

2. दुर्लभ खनिजों का विशाल भंडार (Rare Earth Minerals)

जैसे-जैसे दुनिया क्लीन एनर्जी और हाई-टेक गैजेट्स की तरफ बढ़ रही है, ग्रीनलैंड की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

तकनीकी रीढ़: ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे रेयर अर्थ मिनिरल्स (दुर्लभ खनिज), यूरेनियम, जस्ता (Zinc), सोना और कच्चे तेल के विशाल और अनछुए भंडार मौजूद हैं।

चीन के एकाधिकार को चुनौती: ये खनिज स्मार्टफोन, कंप्यूटर चिप्स, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) की बैटरी और आधुनिक सैन्य हथियारों को बनाने के लिए जरूरी हैं। वर्तमान में इन खनिजों पर चीन का दबदबा है, इसलिए अमेरिका और पश्चिमी देश ग्रीनलैंड के जरिए चीन की इस मोनोपॉली को तोड़ना चाहते हैं।

3.जलवायु परिवर्तन और नए व्यापारिक मार्ग (New Shipping Routes)

ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिसने ग्रीनलैंड को वैश्विक व्यापार के केंद्र में ला खड़ा किया है।

शॉर्टकट रास्ते: बर्फ पिघलने से आर्कटिक में नए समुद्री मार्ग (जैसे Transpolar Sea Route) खुल रहे हैं। ये रास्ते एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच शिपिंग की दूरी और समय को 30% से 40% तक कम कर देंगे।

व्यापारिक नियंत्रण: जो भी देश ग्रीनलैंड पर रणनीतिक प्रभाव रखेगा, वह भविष्य के इन बेहद महत्वपूर्ण और मुनाफे वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक रास्तों को नियंत्रित कर सकेगा।

4. रूस और चीन की घेराबंदी (Countering Adversaries)

शीत युद्ध (Cold War) के बाद एक बार फिर महाशक्तियों के बीच आर्कटिक पर कब्जे की होड़ शुरू हो गई है।

  • रूस की सैन्य पैठ: रूस ने आर्कटिक क्षेत्र में अपने पुराने सैन्य अड्डों को दोबारा सक्रिय कर दिया है और वहां अपनी पनडुब्बियों व मिसाइलों की तैनाती बढ़ाई है।
  • चीन की पोलर सिल्क रोड‘: चीन खुद को एक ‘निकट-आर्कटिक देश’ (Near-Arctic State) बताता है और बुनियादी ढांचे में निवेश करके इस क्षेत्र में पैर पसारने की फिराक में है।
  • पश्चिमी देशों का कवच: अमेरिका और नाटो (NATO) के लिए ग्रीनलैंड एक सुरक्षा कवच की तरह है, जिसका इस्तेमाल करके वे रूस और चीन को उत्तरी अटलांटिक महासागर में प्रवेश करने से रोक सकते हैं।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड का क्या कनेक्शन ?

राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से डेनमार्क के अधीन ग्रीनलैंड एक Autonomous Territory है, जिसका पिछले लगभग 300 सौ सालों से इतिहास, राजनीति और अर्थव्यवस्था डेनमार्क साम्राज्य (Kingdom of Denmark) से गहराई से जुड़ी हुई है। इनके अनोखे कनेक्शन को हम इन प्वाइंट से आसानी से समझ सकते हैं:-

1. राजनीतिक संबंध और स्वायत्तता (Autonomy & Governance)

  • डेनमार्क का हिस्सा: ग्रीनलैंड, डेनमार्क साम्राज्य के तीन हिस्सों में से एक है (अन्य दो डेनमार्क मुख्यभूमि और फरो द्वीप समूह हैं)।
  • घरेलू स्वतंत्रता: ग्रीनलैंड के पास अपनी खुद की चुनी हुई संसद (Inatsisartut) और सरकार है। वह अपने आंतरिक मामले जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कर (Taxation), और मत्स्य पालन खुद संभालता है।
  • डेनमार्क का नियंत्रण: ग्रीनलैंड की सुरक्षा, रक्षा नीति (Defense) और विदेश नीति (Foreign Policy) का अंतिम नियंत्रण आज भी डेनमार्क सरकार के पास है।
  • संसद में प्रतिनिधित्व: ग्रीनलैंड के लोग डेनमार्क की राष्ट्रीय संसद (Folketing) में अपने हितों की रक्षा के लिए 2 सांसद चुनकर भेजते हैं।

2. आर्थिक निर्भरता (Economic Subsidy)

  • सालाना ब्लॉक ग्रांट (Block Grant): ग्रीनलैंड की अर्थव्यवस्था बहुत छोटी है और मुख्य रूप से मछली पकड़ने पर टिकी है। इसे चलाने के लिए डेनमार्क हर साल ग्रीनलैंड को एक बड़ी वित्तीय सहायता (Block Grant) देता है, जो ग्रीनलैंड के कुल बजट का लगभग आधा हिस्सा होती है।
  • मुद्रा: ग्रीनलैंड में आधिकारिक रूप से डेनिश क्रोन (Danish Krone – DKK) मुद्रा का ही उपयोग होता है।

3. ऐतिहासिक संबंध (Historical Links)

  • उपनिवेश का इतिहास: 18वीं शताब्दी (साल 1721) में डेनिश-नार्वेजियन मिशनरियों ने ग्रीनलैंड में अपने पैर पसारे। साल 1814 में यह पूरी तरह से डेनमार्क का उपनिवेश (Colony) बन गया।
  • संवैधानिक बदलाव: 1953 में डेनमार्क ने अपने संविधान में बदलाव करके ग्रीनलैंड को उपनिवेश से बदलकर अपने देश का एक जिला (Province) बनाया। इसके बाद 1979 में इसे ‘होम रूल’ (आंतरिक शासन) और 2009 में व्यापक ‘सेल्फ-रूल’ (स्वायत्तता) दी गई।
  •  4. वर्तमान सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामले

जैसा कि हाल ही में सितंबर 2026 के त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते में देखा गया, जब भी अमेरिका या किसी अन्य महाशक्ति को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने या रणनीतिक निवेश करने होते हैं, तो उन्हें ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार के साथ-साथ डेनमार्क की मंजूरी लेना अनिवार्य होता है।

Leave a Comment