क्या भारत होर्मूज़ स्ट्रेट को बाईपास करने वाला है ?

By Defence Detective

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ईरान पर इजरायल-अमेरिका हमले के बाद तेल को लेकर दुनिया के सामने गहरा संकट है। भारत इससे सबसे बुरी तरह प्रभावित देशों में से एक है। एक ओर होर्मूज स्ट्रेट से आयल ट्रांसपोर्टेशन बाधित है, तो दूसरी ओर भारत द्वारा रूस से तेल मंगाए जाने पर अमेरिका लगातार आंखें दिखा रहा है। यहां तक कि भारत पर रूस से तेल के लिए 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की भी तैयारी कर ली है। ऐसे में देश की विशाल आबादी की जरूरतों को देखते हुए भारत के लिए तेल संकट का स्थायी हल निकालना बहुत जरूरी है।

इसी कड़ी में भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल ‘चोकपॉइंट’  (संकरे रास्ते) से बचने की होड़ में शामिल हो गया है। मिडिल ईस्ट की खाड़ी को भारत से जोड़ने वाली प्रस्तावित यह डीप-वॉटर ऑयल पाइपलाइन, होर्मूज स्ट्रेट के इतर एक्सपोर्ट में गेम-चेंजर साबित हो सकती है। लेकिन यूके की शिप-ब्रोकर कंपनी ‘एलिब्रा शिपिंग’ का कहना है कि मिडिल ईस्ट गल्फ के इस रणनीतिक चोकपॉइंट से बचने की इस महत्वाकांक्षी नवीनतम योजना के सामने लॉजिस्टिक्स से जुड़ी बड़ी चुनौतियां हैं।

होर्मूज स्ट्रेट को बाईपास करने की योजना

UK की इंजीनियरिंग कंपनी Peritus International ने कहा है कि उसे भारत में South Asia Gas Enterprises (SAGE) से एक फ़ीज़िबिलिटी स्टडी (संभाव्यता अध्ययन) का काम मिला है। यह स्टडी अरब सागर के नीचे से होते हुए यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) तक जाने वाली लाइन की संभावनाओं की जांच के लिए है। कंपनी का कहना है कि “यह काम ऐसे समय में मिला है जब खाड़ी क्षेत्र में एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर (ऊर्जा से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं) को लेकर तेज़ी से कदम उठाने की ज़रूरत है, क्योंकि होर्मूज स्ट्रेट से आयल ट्रांसपोर्ट में रुकावटों की वजह से इस इलाके में समुद्र के रास्ते होने वाली ऊर्जा आपूर्ति के रास्तों की कमज़ोरी लगातार सामने आ रही है। होर्मूज स्ट्रेट संकट ने खाड़ी से तेल सप्लाई के रास्तों की कमज़ोरी को गहराई से उजागर किया है। हालांकि भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने जून में बयान कहा था कि इस संबंध में कोई औपचारिक प्रस्ताव या सक्रिय बातचीत विचाराधीन नहीं है।

  • भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है।
  • हालांकि हाल के वर्षों में रूस से खरीद काफ़ी बढ़ी है, फिर भी भारत का लगभग 40% कच्चा तेल आयात होर्मुज़ स्ट्रेट के रास्ते ही होता है।
  • होर्मूज रुकावट ने सप्लाई की निरंतरता और कीमतों में स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ाई
  • संकट ने समुद्री रास्ते के एक ही अहम बिंदु (chokepoint) पर निर्भरता से जुड़े जोखिम को पूरी तरह साफ किया

MEIDP की कहां तक पहुंची बात ?

‘एलिब्रा’ ने बताया कि ‘पेरिटस’ ने खाड़ी से भारत तक प्रस्तावित ‘मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीपवॉटर पाइपलाइन’ (MEIDP) गैस पाइपलाइन पर व्यवहार्यता (feasibility) संबंधी अध्ययन किया। इसमें गहरे समुद्र के जटिल इलाकों, जैसे कि ‘इंडस फैन’ और ‘ओवेन फ्रैक्चर ज़ोन’, का अध्ययन भी शामिल है। ये अरब सागर के नीचे मौजूद बड़ी भू-वैज्ञानिक संरचनाएं हैं, जो समुद्र के नीचे पाइपलाइन बनाने के काम को बहुत मुश्किल बनाती हैं।  प्रस्तावित तेल पाइपलाइन के मामले में, बहुत ज़्यादा गहराई और कच्चे तेल के ट्रांसपोर्टेशन से जुड़ी ऑपरेशनल ज़रूरतों की वजह से और भी चुनौतियां हैं।

क्या है MEIDP ?

मध्य-पूर्व (खाड़ी क्षेत्र) से भारत तक समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली संभावित ऊर्जा पाइपलाइन है। इसे कुछ रिपोर्टों में Gulf–India subsea energy pipeline के रूप में भी बताया गया है।

इसका संभवित रूटः खाड़ी क्षेत्र → ओमान तट → Gulf of Oman → अरब सागर → गुजरात तट

  • यह 1,200 किलोमीटर लंबी होगी। जो 3,450 मीटर तक की गहराई से गुज़रेगी।
  • इसे यह अब तक बने सबसे गहरे ऑफशोर पाइपलाइन सिस्टम में से एक बन जाएगी।
  • अनुमान है कि इसके निर्माण में पांच से सात साल लगेंगे।
  • पाइपलाइन के 2031 से 2033 के बीच चालू होने की संभावना है।
  • इसकी लागत लगभग 4.7 अरब डॉलर से 4.8 अरब डॉलर आंकी गई है

MEIDP  से भारत को कितना लाभ ?

1. होर्मूज चोकपॉइंट का विकल्प

  • दुनिया की बड़ी मात्रा में खाड़ी तेल और गैस आपूर्ति होर्मूज स्ट्रेट से गुजरती है।
  • संकट की स्थिति (युद्ध, नाकाबंदी, मिसाइल/ड्रोन खतरे) में वैकल्पिक सप्लाई लाइन भारत की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ा सकती है।

2. ऊर्जा सुरक्षा

  • भारत अपनी कच्चे तेल और गैस जरूरतों के लिए मध्य-पूर्व पर काफी निर्भर है।
  • समुद्री पाइपलाइन लगातार आपूर्ति का विकल्प दे सकती है।

3. भारत–खाड़ी रणनीतिक संबंध

  • ओमान, UAE, सऊदी अरब जैसे देशों के साथ ऊर्जा सहयोग को नया आयाम मिल सकता है।

MEIDP के सामने और चुनौतियां    

  • बहुत ऊंची लागत लागत
  • समुद्री सुरक्षा और रखरखाव
  • ईरान–खाड़ी भू-राजनीतिक तनाव
  • तकनीकी और पर्यावरणीय जोखिम
  • बहुत गहरे समुद्र में पाइपलाइन बिछाना (Deepwater engineering)

खाड़ी देशों के पास वैकल्पिक आयल एक्सपोर्ट रास्ते कम

खाड़ी देशों के प्रोड्यूसर्स के पास अभी भी आयल एक्सपोर्ट के लिए पर्याप्त वैकल्पिक रास्ते नहीं हैं, क्योंकि हूथी विद्रोही रेड सी (लाल सागर) से होने वाले एक्सपोर्ट को निशाना बना रहे हैं। इराक की पहुंच तुर्की के रास्ते मेडिटेरेनियन तक है और वह सीरिया के रास्ते ट्रकों से फ्यूल ऑयल भेज रहा है, लेकिन यह क्षेत्रीय राजनीति और द्विपक्षीय संबंधों के कारण जोखिम में है। जैसे-जैसे क्षेत्रीय प्रोड्यूसर्स होर्मूज के इतर अपने एक्सपोर्ट के विकल्पों को बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, टैंकरों की लंबी अवधि की मांग के ट्रेंड को तय करने के लिए इन प्रोजेक्ट्स के विकास पर नज़र रखना बहुत ज़रूरी है।

अपनी क्षमता बढ़ाने में जुटे खाड़ी देश  

सऊदी अरब रेड-सी तक अपनी पाइपलाइन की क्षमता को 2 मिलियन बैरल्स प्रतिदिन तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है। और कुवैत ने कहा है कि वह इस बात पर बातचीत कर रहा है कि कुवैती तेल की मात्रा को संभालने के लिए सिस्टम का विस्तार कैसे किया जाए। इस बीच, UAE फुजैराह के लिए दूसरी पाइपलाइन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे क्षमता दोगुनी होकर 3.6 मिलियन बैरल्स प्रतिदिन हो जाएगी और भविष्य में होर्मूज में किसी भी तरह की रुकावट से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी। संबंधित पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पूरा होने के बाद यह पाइपलाइन 2027 के आखिर में चालू हो सकती है।

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