भारत की सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ब्रह्मोस (BrahMos) को लेकर एक और देश की दिलचस्पी सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, थाईलैंड भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम खरीदने की संभावना पर विचार कर रहा है। हालांकि इस पर बातचीत अभी शुरुआती चरण में ही है। यदि यह सौदा आगे बढ़ता है, तो यह भारत के रक्षा निर्यात के लिए एक और बड़ी सफलता साबित हो सकता है।
हालांकि, अभी यह बातचीत शुरुआती चरण में है। न तो थाईलैंड सरकार और न ही ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने किसी सौदे की आधिकारिक पुष्टि की है। फिलहाल मिसाइल की संख्या, कॉन्फ़िगरेशन, डिलीवरी टाइमलाइन या तैनाती को लेकर भी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
भारत के ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की खूबियां ही ऐसी हैं, कि विभिन्न देश इसे खरीदने के लिए लालायित हैं। चीनी खतरे का सामना कर रहे फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल की पहली खेप सौदे के तहत भेजी जा चुकी है। दुश्मन को तबाह कर देने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के लिए वियतनाम ने भारत के साथ समझौते कर लिए हैं। इंडोनेशिया भी इसकी डील पक्की कर चुका है। अपनी समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाने और नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए अब थाईलैंड भी कतार में है!
भारत-थाईलैंड रक्षा बातचीत के बाद बढ़ी चर्चा
जून 2026 में बैंकाक में 10वें इंडिया-थाईलैंड डिफेंस डायलाग आयोजित हुआ। इसी के बाद ब्रह्मोस में थाईलैंड द्वारा रुचि दिखाई जाने की बात सामने आई है। दोनों देशों के रक्षा अधिकारियों ने समुद्री सुरक्षा, सैन्य सहयोग, रक्षा विनिर्माण, अनुसंधान और सैन्य क्षमताओं के विकास जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर बातचीत की। इसमें दोनों पक्षों ने इन क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत करने तथा रक्षा संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के अवसरों पर ठोस विचार-विमर्श किया गया।
इस बैठक में थाईलैंड के डिप्टी पर्मानेंट सेक्रेटरी एडमिरल नुत्तापोतल दीववानिच और भारत के ज्वाइंट सेक्रेटरी सत्यजीत मोहंती शामिल हुए। यह बैठक भारत और थाईलैंड द्वारा 2025 में द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किए जाने के बाद हुई है। हालांकि इस बातचीत के बाद आधिकारिक बयानों में ब्रह्मोस की खरीद का कोई विशेष उल्लेख नहीं किया गया। इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि थाईलैंड ने ब्रह्मोस सिस्टम को खरीदने का निर्णय ले लिया है।
क्या है थाईलैंड की मौजूदा समुद्री रक्षा क्षमता ?
थाईलैंड के पास अभी लैंड-बेस्ड कोस्टल एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम मौजूद नहीं है। उसकी मौजूदा एंटी-शिप मिसाइलों में अमेरिका की बनी हार्पून और चीन द्वारा बनाई गई C-802A मिसाइलें शामिल हैं। इन्हें रॉयल थाई नेवी के फ्रिगेट, कार्वेट और ऑफशोर पेट्रोल वेसल पर तैनात किया गया है। थाई नेवी स्वीडन की RBS 15 एयर-लांच्ड एंटी-शिप मिसाइल का भी इस्तेमाल करती है, जिसे JAS 39 ग्रिपेन लड़ाकू विमानों से दागा जा सकता है। RBS 15 मिसाइल का ग्राउंड-बेस्ड वैरिएंट यूक्रेनी नौसेना द्वारा भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इन बातों से यह भी जाहिर हो जाता है कि थाईलैंड रक्षा संबंधों में कितनी विविधता रखे हुए है। थाइलैंड के चीन के साथ मजबूत आर्थिक संबंध हैं और उससे चीनी सैन्य हथियार भी खरीदता रहता है। साथ ही वह अमेरिका, भारत और अन्य देशों के साथ भी सुरक्षा साझेदारी बनाए रखता है। यदि थाईलैंड ब्रह्मोस खरीदता है, तो उसे पहली बार मोबाइल कोस्टल मिसाइल बैटरी मिलेगी, जो समुद्र में दुश्मन के युद्धपोतों को लंबी दूरी से निशाना बना सकेगी।
ब्रह्मोस से थाईलैंड की कैसे बढ़ेगी क्षमता?
यदि थाईलैंड ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम को खरीदता है तो उसे मोबाइल कोस्टल मिसाइल बैटरीज की क्षमता मिल जाएगी, जिससे वह समुद्र में दुश्मन के सर्फेस वेसल्स को निशाना बनाने में सक्षम हो जाएगा। यह मिसाइल शिप-लांच और एयर-लांच दोनों वर्जन में उपलब्ध है। अब यह थाईलैंड को सोचना है कि वह कैसे देश के मौजूदा सैन्य ढांचे में इसे इंटीग्रेट करेगा। विशेषज्ञों के अनुसार ब्रह्मोस में थाईलैंड की रुचि मुख्य रूप से आपरेशन रिक्वायरमेंट से जुड़ी है। इसमें समुद्र तटीय सुरक्षा, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और डिफेंस सप्लायर के विकल्पों को बढ़ाना शामिल है।
क्या है ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम और इसकी विशेषताएं ?
ब्रह्मोस एक अत्यधिक उन्नत और घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। दुश्मन को तबाह कर देने वाली इस मिसाइल को ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड (BAPL) ने बनाया है। BAPL, भारत की डीआरडीओ और रूस की एनपीओएम का एक ज्वाइंट वेंचर है। यह दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है। ब्रह्मोस मिसाइल के कई वैरिएंट हैं, जिन्हें अलग-अलग प्लेटफार्म और मिशन के लिए डेवलप किया गया है।
- वजन लगभग तीन हजार किलोग्राम और लंबाई 8.4 मीटर।
- गति लगभग 2.8 से 3.0 मैक, यानी ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना।
- इसे जमीन, एयरक्राफ्ट शिप या पनडुब्बी, कहीं से भी लांच किया जा सकता है।
- इसकी मारक क्षमता 290 किलोमीटर, जिसे और बढ़ाया जा रहा है।
- लक्ष्य भेदने की क्षमता बहुत ज्यादा, ‘दागो और भूल जाओ’ के सिद्धांत पर काम करती है।
- इसका नाम, भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा नदी के नामों को मिलाकर रखा गया है।
- यह जमीन के काफी करीब उड़ती है। इसे रडार से पकड़ना बहुत मुश्किल।
- इसमें अब अधिकांश कंपोनेंट भारत के होते हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह संभावित सौदा?
यदि भविष्य में थाईलैंड वास्तव में ब्रह्मोस खरीदने का फैसला करता है, तो यह भारत के रक्षा निर्यात कार्यक्रम के लिए एक और बड़ी उपलब्धि होगी। इससे पहले फिलीपींस ब्रह्मोस खरीद चुका है और कई अन्य देश भी इस मिसाइल में रुचि दिखा चुके हैं। ब्रह्मोस लड़ाई में इस्तेमाल, एक अत्यंत घातक और बेजोड़ मिसाइल है। आपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने इसका इस्तेमाल कर पाकिस्तान में जमकर कहर बरपाया था। यूं तो कई देश पहले ही इसके लिए हाथ बढ़ा चुके थे, लेकिन इस घटना ने बड़े पैमाने पर विभिन्न देशों का ध्यान ब्रह्मोस की ओर खींचा। इसके प्रति दिलचस्पी की एक और अहम वजह तुलनात्मक रूप से इसका सस्ता होना है। भारत इसकी तैनाती, ट्रेनिंग, विभिन्न पार्ट्स बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराता है।








