एक ऑपरेटर! एक मास्टर ड्रोन और उसके साथ 49 स्लेव ड्रोन्स! एक सिग्नल और दुश्मन पर 50 स्वार्म ड्रोन्स की ब्रिगेड का एक साथ हमला! DRDO भारतीय सेना को कुछ ऐसे ही स्वार्म ड्रोन पावर से लैस करने की योजना पर काम कर रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद DRDO ने अपने इस मिशन को तेज़ कर दिया है। ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया है कि भारत को ड्रोन वारफेयर में खुद को लगातार एडवांस और अप-टू डेट रखना होगा और इसी वजह से DRDO ने एक स्पेशल स्वार्म ड्रोन क्लस्टर का प्रोजेक्ट शुरू किया है।
प्रोजेक्ट में निजी क्षेत्र को तवज्जो
इसकी एक ख़ास बात ये है कि इस प्रोजेक्ट को DRDO खुद नहीं बना रहा है। बल्कि इसके लिए उसने टेंडर निकाला है। DRDO के टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड यानी TDF के तहत जारी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल मांगा गया है। इसमें केवल स्टार्ट-अप्स, मीडियम और स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज़ की कंपनियां ही शामिल हो सकती हैं। PSU यानी सरकारी कंपनियों को इस टेंडर से बाहर रखा गया है यानी DRDO का फोकस केवल प्राइवेट प्लेयर्स पर है। लेकिन DRDO ने इसके लिए जो कंडीशन्स रखी हैं- जो पैमाना सेट किया है वो बता रहा है कि ये प्रोजेक्ट कितना घातक होने वाला है। इसे स्टेबल ड्रोन क्लस्टर कहा जा रहा है।
स्वार्म ड्रोन ऑपरेट कैसे होगा ?
- इसमें एक मास्टर ड्रोन होगा
- कम से कम 49 स्लेव यानी सहायक ड्रोन होंगे।
- ये ड्रोन एक-दूसरे से सिर्फ़ 50 cm की दूरी पर उड़ेंगे।
- 20 मीटर/सेकंड की तेज़ हवा में भी उड़ेगा
- 5 हजार मीटर तक की ऊंचाई पर जा सकता है
- तेज हवा की स्थिति में हर ड्रोन के बीच लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई में 5 सेंटीमीटर की दूरी रहेगी
केवल एक आपरेटर, एक सिग्नल और दुश्मन का विध्वंस
अब आपस में इतनी कम दूरी होने का मतलब है कि ज़रा सी गलती से ये ड्रोन आपस में ही टकरा जाएंगे। DRDO ने अपने रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल में इस तरह की गलती सुधारने के लिए केवल 500 मिलीसेकेंड का समय देने की बात कही है।खास बात ये भी है कि इन 50 ड्रोन के समूह को केवल एक ही ऑपरेटर ऑपरेट करेगा। वो मास्टर ड्रोन को सिग्नल देगा और मास्टर ड्रोन से सिग्नल बाकी के ड्रोन्स को भेजे जाएंगे। तत्पश्चात ये स्वार्म ड्रोन दुश्मन पर कहर बरपा देंगे।
क्या है DRDO की रिक्वॉयरमेंट ?
- हर ड्रोन 500 ग्राम से 2 किलोग्राम तक का पेलोड कैरी करेगा।
- इनकी एन्ड्यूरेंस कम से कम 30 मिनट की होनी चाहिए।
- DRDO को ऐसा सिस्टम चाहिए जिसे फास्ट डिप्लॉयमेंट किया जा सके।
- 15 मिनट में रिचार्ज, अनपैकिंग और डिप्लॉयमेंट के लिए केवल 5 मिनट का समय निर्धारित
- ड्रोन क्लस्टर को जैमिंग प्रूफ रखने के लिए इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेज़र यानी ECCM फ़ीचर्स ज़रूरी।
- S-Band, High Frequency Band या C-Band में काम करने वाले 5 किलोमीटर के Jammer Proof Communication Link की भी डिमांड
- यानी 5 किलोमीटर की रेंज तक में जैमर हों, नेटवर्क या कम्यूनिकेशन काम नहीं कर रहा हो तो भी ये ड्रोन्स Jammer Proof Communication Link के ज़रिये अपने मिशन को पूरा कर लेंगे।
- High Precision Navigation, Swarm Intelligence, Control Algorithm, Flight Control System, Artificial Intelligence जैसी टेक्नोलॉजी से लैस होगा
- प्रोजेक्ट में 70% कंटेंट का इंडीजीनस यानी स्वदेशी होना अनिवार्य
- उन देशों के कंपोनेन्ट्स के इस्तेमाल पर भी रोक, जो भारत विरोधी खेमे में हैं।
निर्धारित समय के भीतर पूरा होगा प्रोजेक्ट
DRDO ने इस प्रोजेक्ट की डेडलाइन भी तय की हुई है। प्रोटोटाइप डेवलपमेंट और फंक्शनल टेस्टिंग के लिए 12 महीने का वक्त और क्वालिफिकेशन, ट्रायल्स, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और प्रोजेक्ट क्लोजर 24 महीने का समय तय किया गया है। यानी DRDO भारतीय सेनाओं को ना केवल एक एडवांस जैमिंग प्रूफ स्वार्म ड्रोन ब्रिगेड से लैस करने वाला है। अब देखना ये है कि ड्रोन बनाने वाले भारत के कौन-कौन से स्टार्टअप्स और MSME’s इस रेस में हिस्सा लेने के लिए आगे आते हैं और किन्हें इस हाइटेक स्वॉर्म ड्रोन क्लस्टर को बनाने का ऑर्डर हासिल होता है।








