भारतीय नौसेना को मिलेंगे अब तक के सबसे बड़े आकार के डिस्ट्रॉयर, प्रोजेक्ट को मिली मंजूरी

By Defence Detective

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Concept illustration of a future Indian Navy next-generation stealth destroyer sailing at sea.

भारतीय नौसेना के भविष्य के युद्धपोत बेड़े को मजबूत करने की दिशा में अगली पीढ़ी के विध्वंसकों (Next Generation Destroyers) प्रोग्राम को लंबे समय बाद पुश मिला है। टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) के मुताबिक, रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council ) यानी DAC ने Project 18A के तहत इन युद्धपोतों को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। प्रस्तावित जहाज मौजूदा विध्वंसकों से बड़े होंगे और उनमें अधिक उन्नत हथियार और सेंसर लगाने की योजना है।

हालांकि, रक्षा मंत्रालय की आधिकारिक घोषणा में परियोजना का नाम और तकनीकी विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। मंत्रालय ने बताया है कि 26 अक्टूबर की बैठक में नौसेना के लिए अन्य उपकरणों के साथ प्रमुख नौसैनिक प्लेटफॉर्मों की खरीद को शुरुआती स्वीकृति मिली है।

यह योजना ऐसे समय सामने आई है जब भारत भविष्य की समुद्री जरूरतों के अनुरूप अपने युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है। बड़े सतही युद्धपोतों की उपयोगिता केवल अधिक मिसाइलें ले जाने तक सीमित नहीं होती। उनकी भूमिका बेड़े की सुरक्षा, समुद्री प्रहार, कमान और लंबी तैनाती से भी जुड़ती है।

DAC की बैठक में क्या फैसला हुआ?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में तीनों सेनाओं के लगभग ₹2.12 लाख करोड़ के पूंजीगत अधिग्रहण प्रस्तावों को Acceptance of Necessity यानी AoN दिया गया।

इसमें से नौसेना के हिस्से में Active Offboard Decoy System और अन्य प्रमुख नौसैनिक प्लेटफॉर्म शामिल हैं। मंत्रालय के अनुसार, स्वदेशी डिजाइन और निर्माण वाले ये प्लेटफॉर्म आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुरूप नौसेना की लड़ाकू क्षमता बढ़ाएंगे।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक इसी नौसैनिक प्लेटफॉर्म कटेगरी में Next Generation Destroyers को मंजूरी दी गई है।

क्या है Project 18A ?

भारतीय नौसेना के लिए अगली पीढ़ी के बड़े और उन्नत युद्धपोत तैयार करने की प्रस्तावित योजना है। इन विध्वंसकों को समुद्री युद्ध की भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जाना है। अब इसकी संभावित लागत ₹75,000 करोड़ से अधिक बताई गई है।

  • जुलाई 2022 में ‘Project 18’ नाम से नए विध्वंसकों की अवधारणा पर अध्ययन की जानकारी सामने आई थी। दिसंबर 2023 में तत्कालीन नौसेना उपप्रमुख वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह ने पुष्टि की कि इनकी डिजाइन पर काम चल रहा है।
  • जुलाई 2026 की रिपोर्ट में Project 18A को बड़े सतही युद्धपोत कार्यक्रम के रूप में बताया गया, हालांकि पुराने Project 18 से इसका सटीक संबंध आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया है।

अब 26 अक्टूबर 2026 की DAC बैठक में इसे सैद्धांतिक मंजूरी मिलने से औपचारिक बढ़ावा मिला है। दिसंबर 2023 की सार्वजनिक पुष्टि से इस कदम तक करीब दो वर्ष 11 महीने बीते हैं।

क्या होगी नेक्स्ट जेनरेशन डिस्ट्रॉयर की खूबियां ?

Project 18A के प्रस्तावित युद्धपोतों का विस्थापन 10,000 टन से अधिक बताया गया है। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक यह 13000 टन तक हो सकता है। हालांकि, नए युद्धपोतों का अंतिम आकार अभी आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया है। लेकिन यह तय यह कि भारतीय नेवी के पास अभी तक उपलब्ध डिस्ट्रॉयर में इसका आकार सबसे बड़ा होगा।

  • ये भारतीय नौसेना के मौजूदा Visakhapatnam-क्लास विध्वंसकों से बड़े होंगे, जिनका पूर्ण भार विस्थापन लगभग 7,400 टन है।  यह अभी सबसे बड़ा डिस्ट्रॉयर है।
  • इन युद्धपोतों का डिजाइन भारतीय नौसेना का Warship Design Bureau तैयार करेगा।
  • इनमें उन्नत हथियारों, अधिक सेंसर और बेहतर स्टेल्थ विशेषताओं को शामिल करने की योजना है।
  • उद्देश्य ऐसा प्लेटफॉर्म विकसित करना है, जो भविष्य की समुद्री चुनौतियों का सामना कर सके।

इन युद्धपोतों की मिसाइल क्षमता, रडार और प्रोपल्सन सिस्टम का विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए किसी खास मिसाइल, निश्चित संख्या में लॉन्च सेल या अन्य उन्नत हथियार को अभी इनका तय हिस्सा नहीं माना जा सकता।

भारतीय नौसेना के पास अभी कुल 13 डिस्ट्रॉयर हैं:

  • विशाखापत्तनम क्लास: 4
  • कोलकाता क्लास: 3
  • दिल्ली क्लास: 3
  • राजपूत क्लास: 3

इनमें 10 स्वदेशी निर्मित और 3 सोवियत मूल के हैं।

Visakhapatnam-क्लास से तुलना क्यों हो रही है?

मौजूदा Project 15B की Visakhapatnam-क्लास तुलना का महत्वपूर्ण आधार है। नौसेना को Visakhapatnam सौंपे जाने की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, इसका पूर्ण भार विस्थापन 7,400 टन है। इसकी लंबाई 163 मीटर और अधिकतम गति 30 नॉट है।

यह श्रेणी पहले के Kolkata-क्लास कार्यक्रम की अगली कड़ी थी। दोनों में पतवार के आकार, प्रणोदन और कई प्रमुख उपकरणों की समानता रखी गई थी, ताकि क्रमिक निर्माण का लाभ मिल सके। नए कार्यक्रम का वास्तविक तकनीकी बदलाव अंतिम डिजाइन सामने आने पर ही स्पष्ट होगा।

अतिरिक्त आकार से क्या फायदा हो सकता है?

सामान्य युद्धपोत डिजाइन के लिहाज से बड़ा प्लेटफॉर्म अतिरिक्त उपकरण और भविष्य के आधुनिकीकरण के लिए अधिक गुंजाइश दे सकता है। हालांकि, उपलब्ध जगह को हथियार, ईंधन, मशीनरी और चालक दल की जरूरतों के बीच बांटना पड़ता है।

इसलिए केवल टन भार बढ़ने से लड़ाकू क्षमता उसी अनुपात में नहीं बढ़ती। सेंसर कितनी जल्दी खतरा पहचानते हैं, हथियारों तक सूचना कैसे पहुंचती है और अलग-अलग प्रणालियां कितने प्रभावी ढंग से मिलकर काम करती हैं—ये बातें भी निर्णायक होती हैं। Project 18A की क्षमता का आकलन इन्हीं मानकों पर करना होगा।

हथियारों की तस्वीर कब साफ होगी?

नई श्रेणी की निश्चित मिसाइल संख्या या अंतिम हथियार विन्यास की पुष्टि उपलब्ध सरकारी विज्ञप्ति से नहीं होती। किसी खास संख्या में लॉन्च सेल, हाइपरसोनिक मिसाइल या लेजर हथियार को अभी इसका तय हिस्सा बताना उचित नहीं होगा।

तुलना के लिए, मौजूदा Surat पर BrahMos सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें, Barak-8 वायु रक्षा मिसाइलें और पनडुब्बी-रोधी प्रणालियां होने की आधिकारिक जानकारी है। लेकिन मौजूदा जहाज के हथियारों को भविष्य की श्रेणी का स्वीकृत विन्यास नहीं माना जा सकता।

डिजाइन और इंजन क्यों महत्वपूर्ण होंगे?

ET Now की रिपोर्ट ने कार्यक्रम को अवधारणा के स्तर पर बताते हुए विस्तृत डिजाइन में लगभग चार–पांच वर्ष लगने की संभावना जताई थी। इसमें सूत्रों के हवाले से इंजन के लिए हाइब्रिड व्यवस्था पर विचार होने का भी उल्लेख था। इसे अंतिम प्रोपल्शन प्रणाली की घोषणा नहीं माना जा सकता।

डिजाइन के दौरान गति, परिचालन दूरी, बिजली की मांग और रखरखाव जैसी जरूरतों में संतुलन बनाना होगा। भविष्य के उपकरण जोड़ने की गुंजाइश भी इसी चरण में तय होती है।

पहला जहाज कब मिल सकता है?

टाइम्स ऑफ इंडिया ने डील पर हस्ताक्षर के बाद डिलीवरी शुरू होने में पांच–दस साल लगने का अनुमान दिया है। यह समय अक्टूबर 2026 से नहीं गिना जाना चाहिए। साथ ही, पहले जहाज की डिलीवरी और पूरी श्रेणी के सेवा में आने की समयसीमा अलग होगी।

भारत के लिए कार्यक्रम की अहमियत भविष्य की समुद्री जरूरतों के अनुरूप स्वदेशी युद्धपोत तैयार करने में है। लेकिन इसकी वास्तविक प्रगति का अगला ठोस संकेत अंतिम आवश्यकताओं, जहाजों की संख्या, निर्माण अनुबंध और घोषित समयसीमा से मिलेगा।

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