भारतीय निजी रक्षा क्षेत्र (Private Defence Sector) ने ग्लोबल लेवल पर एक और बड़ी कामयाबी हासिल की है। हैदराबाद स्थित डिफेंस कंपनी सिग्मा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (Sigma Advanced Systems Ltd) ने एक नाटो (NATO) कस्टमर (ग्राहक) से बड़ी डिफेंस डील हासिल की है। इस ऑर्डर के तहत कंपनी 155 मिमी आर्टिलरी गोला-बारूद के लिए बेस ब्लीड (Base Bleed–BB) यूनिट्स की मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई करेगी।
कंपनी ने 26 अक्टूबर 2026 को स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में इस ऑर्डर की घोषणा की। यह सौदा Sigma के लिए अंतरराष्ट्रीय आर्टिलरी मैन्युफैक्चरिंग कारोबार में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर है। कंपनी पहले से आर्टिलरी शेल और फ्यूज़ के क्षेत्र में काम कर रही है।
ऑर्डर के तहत इसके निर्माण और सप्लाई का काम 12 महीने की अवधि में पूरा किया जाना है। यह डील न केवल सिग्मा एडवांस्ड सिस्टम्स के कारोबार और गोला-बारूद निर्माण क्षमताओं के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। बल्कि, यह वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला (Global Defence Supply Chain) में भारतीय प्राइवेट कंपनियों की बढ़ती भागीदारी को भी दर्शाता है।
NATO ग्राहक का मतलब क्या है, डील कितने की ?
कंपनी को 102.23 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी लगभग ₹973.64 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट मिला है। हालांकि घोषणा में खरीदार के लिए “NATO customer” शब्द इस्तेमाल किया गया है। यानी कंपनी ने ग्राहक (खरीदार) के नाम और संबंधित देश का खुलासा नहीं किया है।
- सप्लाई की जाने वाली यूनिट्स की संख्या भी सार्वजनिक नहीं की गई है।
- अंतिम उपयोगकर्ता की जानकारी न होने के कारण इस सप्लाई को यूक्रेन युद्ध या किसी दूसरे संघर्ष से जोड़ना भी संभव नहीं है।
- कॉन्ट्रैक्ट का व्यावसायिक महत्व स्पष्ट है, लेकिन इसके आधार पर किसी खास सैन्य तैनाती का नतीजा नहीं निकाला जा सकता।
- खबर का तथ्यात्मक आधार यही है कि Sigma ने NATO ग्राहक से ऑर्डर मिलने की घोषणा की है।
क्या है नाटो ?– NATO यानी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय देशों का एक सैन्य गठबंधन है।
- इसकी स्थापना 4 अप्रैल 1949 को 12 देशों ने की थी और वर्तमान में इसके 32 सदस्य देश हैं।
- इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और तुर्की जैसे देश शामिल हैं।
- दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ से संभावित सैन्य खतरे का मुकाबला करने और सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इसकी स्थापना हुई थी।
- इसके अनुच्छेद 5 के मुताबिक, किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा और बाकी देश उसकी सहायता करेंगे।
क्या होती हैं बेस ब्लीड (Base Bleed) यूनिट्स?
आधुनिक आर्टिलरी और सैन्य अभियानों में गोला-बारूद की मारक क्षमता और उसकी रेंज (दूरी) का अत्यधिक महत्व होता है। ‘बेस ब्लीड’ यूनिट्स तोप के गोलों की रेंज बढ़ाने में मदद करने वाले विशेष तकनीकी घटक (Specialised Components) हैं। जो उड़ान के दौरान तोप के गोलों पर लगने वाली हवा का प्रतिरोध (एयर ड्रैग) कम करके उन्हें ज्यादा दूर तक पहुंचने में मदद करते हैं।
- कार्यप्रणाली: इन यूनिट्स को 155 मिमी आर्टिलरी शेल्स (तोप के गोलों) के पिछले हिस्से (Rear) में फिट किया जाता है। जब गोला तोप से दागा जाता है, तो उड़ान (Flight) के दौरान यह यूनिट नियंत्रित प्रवाह में गैस छोड़ती है।
- तकनीकी लाभ: सामान्य तौर पर जब कोई शेल हवा में तेजी से आगे बढ़ता है, तो उसके ठीक पीछे कम दबाव वाला क्षेत्र (Low-Pressure Wake) बन जाता है। इससे गोले पर पीछे की ओर लगने वाला वायुगतिकीय प्रतिरोध (Aerodynamic Drag) बढ़ता है, जिसे बेस ड्रैग (Base Drag) कहते हैं। बेस ब्लीड यूनिट से निकलने वाली गैस इस क्षेत्र का दबाव बढ़ाकर बेस ड्रैग कम करती है।
- रेंज में बढ़ोतरी: इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि गोले का शुरुआती वेग (Launch Velocity) बढ़ाए बिना उसकी मारक दूरी (Range) बढ़ाई जा सकती है। रेंज में वास्तविक बढ़ोतरी गोले के डिजाइन, इस्तेमाल की गई तोप और फायरिंग की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
बेस ब्लीड यूनिट कैसे बढ़ाती है गोले की रेंज?
तोप से निकलने के बाद गोले की उड़ान पर हवा का प्रतिरोध (resistence) असर डालता है। यह प्रतिरोध केवल उसके सामने वाले हिस्से तक सीमित नहीं होता। गोला जब तेजी से आगे बढ़ता है, तो उसके पीछे कम दबाव वाला क्षेत्र बनता है। इससे पैदा होने वाला बेस ड्रैग भी उसकी आगे बढ़ने की गति को प्रभावित करता है।
बेस ब्लीड यूनिट इसी समस्या को कम करने के लिए इस्तेमाल होती है। गोले के पिछले हिस्से में लगी यह यूनिट उड़ान के दौरान नियंत्रित प्रवाह में गैस छोड़ती है। यह गैस पीछे के कम दबाव वाले क्षेत्र को प्रभावित करती है और बेस ड्रैग घटाने में मदद करती है। नतीजतन, गोला कम प्रतिरोध के साथ आगे बढ़ सकता है और उसकी रेंज बढ़ती है।
आसान शब्दों में समझें तो इस तकनीक का उद्देश्य गोले के पीछे लगने वाले उस वायुगतिकीय (एयरोडायनमिक्स) खिंचाव को कम करना है, जो उसकी उड़ान को छोटा करता है। इसलिए लंबी दूरी के आर्टिलरी गोला-बारूद में बेस ब्लीड एक महत्वपूर्ण तकनीक मानी जाती है।
इसके और रॉकेट-असिस्टेड गोले के बीच क्या अंतर ?
बेस ब्लीड यूनिट से गैस निकलने के कारण इसे रॉकेट इंजन समझ लेना आसान है, लेकिन दोनों की मुख्य भूमिका अलग होती है। रॉकेट-असिस्टेड प्रोजेक्टाइल में मोटर उड़ान के दौरान अतिरिक्त थ्रस्ट देता है। इसका उद्देश्य गोले को आगे की ओर अतिरिक्त धक्का देना होता है।
इसके मुकाबले बेस ब्लीड तकनीक मुख्य रूप से गोले के पीछे का एयर ड्रैग घटाती है। यानी दोनों व्यवस्थाएं रेंज बढ़ाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन एक अतिरिक्त धक्का देने और दूसरी प्रतिरोध (resistence) कम करने के सिद्धांत पर काम करती है।
पूरे गोले में अलग-अलग कंपोनेंट की क्या भूमिका होती है?
आर्टिलरी गोला-बारूद के निर्माण में कई अलग क्षमताओं की जरूरत पड़ती है। शेल बॉडी गोले की मुख्य संरचना होती है। फ्यूज़ विस्फोट के सक्रिय होने की व्यवस्था का हिस्सा होता है। वहीं, बेस ब्लीड यूनिट गोले के उड़ान प्रदर्शन और रेंज से जुड़ा कंपोनेंट है।
इन हिस्सों की भूमिकाएं अलग होने के कारण किसी एक कंपोनेंट का निर्माण करने और तैयार गोला-बारूद की पूरी सप्लाई देने में अंतर होता है। इस मामले में घोषित ऑर्डर विशेष रूप से बेस ब्लीड यूनिट्स के निर्माण और सप्लाई का है।
इसलिए लगभग ₹974 करोड़ की पूरी रकम को तैयार आर्टिलरी गोलों की खरीद की कीमत मानना सही नहीं होगा।
भारत के लिए इसके रणनीतिक मायने ?
यह ऑर्डर अंतरराष्ट्रीय रक्षा ग्राहकों को विशेष कंपोनेंट की सप्लाई में भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियों की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। आर्टिलरी शेल्स, फ्यूज़ और बेस ब्लीड यूनिट्स के क्षेत्र में सिग्मा की बढ़ती क्षमताएं उसे गोला-बारूद निर्माण के अधिक व्यापक कार्यक्रमों में भाग लेने की स्थिति में लाती हैं।
ऐसे कॉन्ट्रैक्ट भारतीय कंपनियों को विदेशी ग्राहकों की उत्पादन जरूरतों से जोड़ते हैं। कंपनी के लिए समय पर निर्माण, गुणवत्ता बनाए रखना और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार डिलीवरी करना आगे के कारोबार के लिहाज से अहम होगा।
यह उपलब्धि ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत उन्नत मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं विकसित करने, डिफेंस एक्सपोर्ट बढ़ाने और ग्लोबल एयरोस्पेस और डिफेंस सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत करने की भारत की महत्वाकांक्षा को भी बल देती है।
यूरोप के लिए बड़ा डिफेंस सप्लायर बनकर उभरा भारत
यह ऑर्डर ऐसे समय आया है, जब यूरोप में भारतीय रक्षा उत्पादों की मांग बढ़ रही है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 23 अक्टूबर 2026 को कहा था कि भारत यूरोप का तीसरा सबसे बड़ा हथियार एक्सपोर्टर (निर्यातक) बनकर उभरा है। उन्होंने ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि यूरोप की ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के चलते भारतीय आर्टिलरी शेल्स और बड़े तथा छोटे कैलिबर के गोला-बारूद का एक्सपोर्ट बढ़ा है।
भारत यूरोपीय देशों को हथियार, गोला-बारूद और उनके पुर्जों की सप्लाई कर रहा है। World Bank के WITS/UN Comtrade रिकॉर्ड के अनुसार, 2025 में इस व्यापार श्रेणी में भारत से रोमानिया को करीब 15.76 करोड़ डॉलर और स्लोवेनिया को 10.52 करोड़ डॉलर का एक्सपोर्ट हुआ। चेक गणराज्य, स्पेन, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन भी भारतीय उत्पादों के खरीदारों में शामिल रहे।
WITS-World Integrated Trade Solution- विश्व बैंक का ऑनलाइन व्यापार डेटा प्लेटफॉर्म और UN Comtrade- संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय व्यापार डेटाबेस है।
| यूरोपीय देश | भारत से 2025 में हथियार, गोला-बारूद और संबंधित हिस्सों का एक्सपोर्ट |
| रोमानिया | 15.76 करोड़ अमेरिकी डॉलर |
| स्लोवेनिया | 10.52 करोड़ अमेरिकी डॉलर |
| चेक गणराज्य | 2.58 करोड़ अमेरिकी डॉलर |
| स्पेन | 2.39 करोड़ अमेरिकी डॉलर |
| बुल्गारिया | 99.36 लाख अमेरिकी डॉलर |
| सर्बिया | 83.12 लाख अमेरिकी डॉलर |
| फ्रांस | 60.61 लाख अमेरिकी डॉलर |
| बेल्जियम | 56.45 लाख अमेरिकी डॉलर |
| इटली | 41.23 लाख अमेरिकी डॉलर |
| स्वीडन | 39.59 लाख अमेरिकी डॉलर |
| ब्रिटेन | 29.94 लाख अमेरिकी डॉलर |
| क्रोएशिया | 17.78 लाख अमेरिकी डॉलर |
| फिनलैंड | 15.07 लाख अमेरिकी डॉलर |
| जर्मनी | 14.95 लाख अमेरिकी डॉलर |
यह किसी एक कॉन्ट्रैक्ट की कीमत या भारत के संपूर्ण डिफेंस एकसपोर्ट का आँकड़ा नहीं है।








