भारत की Military Manufacturing (सैन्य विनिर्माण), डिफेंस डिप्लोमेसी और वीपंस एक्सपोर्ट के इतिहास में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने एक अभूतपूर्व मुकाम हासिल कर लिया है। ‘वॉर-प्रूवन’ ब्रह्मोस की बढ़ती विदेशी मांग के बीच भारत इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की अगली पीढ़ी और लंबी दूरी की क्षमता पर काम आगे बढ़ा रहा है।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के CEO एवं MD डॉ. जयतीर्थ जोशी ने 22 अक्टूबर को ANI से बातचीत में नए निर्यात समझौतों, ब्रह्मोस-NG के विकास और रेंज विस्तार की योजनाओं की जानकारी दी।
जोशी के के मुताबिक, कंपनी की रणनीति अंतरराष्ट्रीय मार्केट में ब्रह्मोस की पहुंच बढ़ाने के साथ इसे ज्यादा स्वदेशी और उन्नत तकनीकों से लैस करने की है। अगली पीढ़ी की मिसाइल का प्रोटोटाइप डेवलप करने और भविष्य के लंबी दूरी वाले संस्करण को आकार देने की दिशा में तेज काम चल रहा है।
इन योजनाओं के साथ भारतीय सेनाओं के मौजूदा ऑर्डर पूरे करना और बढ़ती मांग के लिए उत्पादन व्यवस्था मजबूत करना कंपनी की प्राथमिकता है। इसके लिए उत्पादन इकाइयों, सप्लाई चेन और नई तकनीकों के अनुसंधान एवं विकास पर जोर दिया जा रहा है।
कब आ रहा BrahMos-NG का पहला प्रोटोटाइप ?
इंटरव्यू में अगली पीढ़ी की BrahMos-NG यानी Next Generation मिसाइल के विकास को लेकर महत्वपूर्ण समयसीमा सामने आई। डॉ. जयतीर्थ जोशी ने कहा कि कंपनी 2027 -2028 तक BrahMos-NG का पहला प्रोटोटाइप विकसित करने की उम्मीद कर रही है।
BrahMos-NG को मौजूदा मिसाइल की तुलना में छोटा,हल्का और कम रडार दृश्यता वाला सुपरसोनिक हथियार बनाने पर काम हो रहा है। इसका उद्देश्य भारत की हवाई हमला करने की क्षमता का विस्तार करना है।

“इस नई प्रणाली में स्वदेशी हिस्सेदारी अधिक होगी और इसमें कई नई तकनीकों तथा उन्नत मटेरियल का इस्तेमाल होगा। इसलिए हमें व्यापक अनुसंधान एवं विकास करना होगा। हमने अपनी योजनाएं तैयार कर ली हैं और इस दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे हैं।”
Dr. Jaiteerth Joshi, CEO & MD, BrahMos Aerospace,
1,500 किमी संस्करण का काम कहां तक पहुंचा ?
ब्रह्मोस को अब और अधिक घातक बनाने के लिए इसके रेंज एक्सटेंशन (मारक क्षमता बढ़ाने) का काम चरणबद्ध तरीके से बढ़ रहा है। जोशी ने कहा कि लगभग 1,500 किलोमीटर रेंज वाली ब्रह्मोस का डिजाइन तैयार हो चुका है और सिमुलेशन जारी है। उन्होंने इसे फिलहाल कॉन्सेप्चुअल स्टेज में और कंपनी के भविष्य के रोडमैप का हिस्सा बताया।
- कंपनी इस लंबी दूरी की क्षमता को आगे बढ़ाने के साथ मिसाइल सिस्टम में अतिरिक्त अपग्रेड की संभावनाओं पर भी काम कर रही है।
- जोशी ने कहा कि मिसाइल सिस्टम में आगे के सुधारों के लिए संयुक्त उद्यम के साझेदारों के साथ चर्चा चल रही है।
- उन्होंने निकट भविष्य में अतिरिक्त अपग्रेड पूरे कर पाने का भरोसा जताया।
इस बयान में सामने आई डेवलपमेंट स्थिति के दो महत्वपूर्ण हिस्से हैं—पहला, लंबी दूरी वाला संस्करण कंपनी की योजना में शामिल है। दूसरा, उसके डिजाइन को सिमुलेशन के जरिए परखने का काम हो रहा है।
सिमुलेशन में कंप्यूटर आधारित मॉडल के जरिए डिजाइन के व्यवहार और प्रदर्शन का आकलन किया जाता है। इससे इंजीनियर अलग-अलग परिस्थितियों में प्रस्तावित व्यवस्था को समझते और आगे के विकास के लिए जरूरी बदलाव तय करते हैं।
कॉम्बैट-टेस्टेड ब्रह्मोस की ग्लोबल मार्केट में कितनी पकड़ ?
जोशी ने बताया कि BrahMos की एक्सपोर्ट यात्रा 2022 में मिले पहले विदेशी ऑर्डर से शुरू हुई थी। उनके अनुसार, फिलीपींस के साथ पहले एक्सपोर्ट समझौते के बाद इस साल दक्षिण-पूर्व एशिया के दो अन्य देशों (वियतनाम और इंडोनेशिया) के साथ भी सौदे किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि 2025 में ऑपरेशन सिंदूर में अपनी क्षमता साबित करने और ‘वॉर-प्रूवन’ सिस्टम बनने के बाद BrahMos की अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिति बेहद मजबूत हुई है। कंपनी अब अपने निर्यात का दायरा और बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
भारतीय सेनाओं के ऑर्डर पूरे करने पर जोर
घरेलू मांग पर डॉ. जोशी ने बताया कि भारतीय सशस्त्र बलों से ब्रह्मोस को पर्याप्त ऑर्डर मिले हैं और घरेलू बाजार में मांग मजबूत बनी हुई है। कंपनी की प्राथमिकता थलसेना, नौसेना और वायुसेना की जरूरतों के मुताबिक इन ऑर्डर को पूरा करना है। इसके लिए हैदराबाद, नागपुर, पिलानी और लखनऊ की उत्पादन इकाइयों में काम चल रहा है तथा सप्लाई चेन को और मजबूत किया जा रहा है।
- भारतीय नौसेना: युद्धपोतों पर तैनात ब्रह्मोस समुद्र में दुश्मन के जहाजों और तटवर्ती ठिकानों पर सटीक हमले की ताकत देती है।
- भारतीय वायुसेना: सुखोई-30MKI लड़ाकू विमानों से लॉन्च होने वाला इसका हवाई संस्करण लंबी दूरी तक सटीक हमले की क्षमता बढ़ाता है।
- भारतीय थलसेना: मोबाइल लॉन्चरों से लैस ब्रह्मोस रेजिमेंट दुश्मन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण ठिकानों पर सटीक हमले की क्षमता प्रदान करती हैं।
मौजूदा ब्रह्मोस से 1500 किलोमीटर रेंज के ब्रह्मोस तक
भारत और रूस की साझेदारी में ब्रह्मोस की यात्रा 1998 में संयुक्त उद्यम की स्थापना के साथ शुरू हुई और 2001 में इसका पहला सफल परीक्षण हुआ। शुरुआती 290 किलोमीटर की रेंज वाली यह सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल आगे चलकर थलसेना, नौसेना और वायुसेना की ताकत बनी। अब इसे और घातक बनाने पर काम हो रहा है।
| विशेषता | वर्तमान ब्रह्मोस | आगामी ब्रह्मोस-NG | प्रस्तावित 1,500 किमी संस्करण |
|---|---|---|---|
| श्रेणी | सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल | छोटी और हल्की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल | लंबी दूरी वाला ब्रह्मोस संस्करण |
| वजन | जमीन/जहाज से लॉन्च संस्करण लगभग 3 टन; हवाई संस्करण लगभग 2.5 टन | लगभग 1.5–1.6 टन — प्रस्तावित | जानकारी सार्वजनिक नहीं |
| लंबाई | लगभग 8–9 मीटर, संस्करण के अनुसार | लगभग 6 मीटर — प्रस्तावित | जानकारी सार्वजनिक नहीं |
| गति | लगभग मैक 2.8 | मैक 3.5 तक — प्रस्तावित | जानकारी सार्वजनिक नहीं |
| मारक दूरी | मूल संस्करण 290 किमी; विस्तारित संस्करणों में 400–450 किमी और उससे आगे | शुरुआती प्रस्तावित रेंज लगभग 290 किमी; नवीनतम बयान में नया आंकड़ा नहीं | लगभग 1,500 किमी का लक्ष्य |
| प्रमुख प्लेटफॉर्म | युद्धपोत, मोबाइल लैंड लॉन्चर और सुखोई-30MKI | पहले हवा से लॉन्च किए जाने वाले संस्करण का विकास | विवरण सार्वजनिक नहीं |
| प्रमुख क्षमता | दुश्मन के जमीनी ठिकानों और समुद्री जहाजों पर सटीक हमला | छोटे आकार, कम वजन और अधिक स्वदेशी तकनीकों के साथ सटीक प्रहार | अधिक दूरी पर सटीक प्रहार की क्षमता विकसित करना |
| विकास की स्थिति | भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना में तैनात | विकास जारी; नई तकनीकों और उन्नत मटेरियल पर काम | कॉन्सेप्चुअल स्टेज; डिजाइन तैयार, सिमुलेशन जारी |
| समयसीमा | सेवा में सक्रिय | जोशी के अनुसार, 2027 या 2028 तक पहला प्रोटोटाइप विकसित होने की उम्मीद | परीक्षण या तैनाती की निश्चित समयसीमा घोषित नहीं |
ब्रह्मोस का विस्तार भारत की सामरिक ताकत कैसे बढ़ाएगा?
ब्रह्मोस का बढ़ता एक्सपोर्ट भारत के रक्षा उद्योग और सैन्य साझेदारियों को व्यापक आधार दे रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया में इसकी पहुंच खरीददार देशों की समुद्री प्रतिरोधक क्षमता मजबूत कर सकती है। दूसरी ओर, BrahMos-NG और लंबी दूरी की ब्रह्मोस अलग-अलग जरूरतों को संबोधित करने वाले विकास कार्यक्रम हैं—एक का जोर छोटे और हल्के आकार पर है, जबकि दूसरे का लक्ष्य मारक दूरी बढ़ाना है। इन योजनाओं के सफल विकास से भारत के सटीक प्रहार के विकल्प और व्यापक होंगे।








