अब और घातक होगी अग्नि-V मिसाइल, दुश्मन के डिफेंस सिस्टम होंगे नाकाम, जानिए कैसे

By Defence Detective

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File photo of India’s Agni-V nuclear-capable ballistic missile

भारत अब अपनी मिसाइल की मारक क्षमता के साथ दुश्मन के मिसाइल डिफेंस को धोखा देने की क्षमता भी बढ़ाने पर काम कर रहा है। इसी कड़ी में नई खबर यह है कि अग्नि-V मिसाइल अब दुश्मन के लिए और घातक, और ख़तरनाक होने जा रही है। ये मिसाइल दुश्मन के एयर डिफेंस को एक बड़ी चुनौती देने की तैयारी में है। DRDO ने अग्नि V के लिए एक ऐसी टेक्नोलॉजी डेवलप किया है जो इस मिसाइल को अभेद्य बना सकता है।

इस टेक्नोलॉजी का नाम है Ejectable Electronic Decoy System। रक्षा वेबसाइट IDRW की 30 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, DRDO ने अग्नि V के लिए नया इजेक्टेबल इलेक्ट्रॉनिक डिकॉय तैयार कर लिया है। हालांकि अभी इसकी टेस्टिंग बाकी है। आने वाले महीनों में मिसाइल से उसका परीक्षण किए जाने की बात कही गई है।

आसान भाषा में समझें तो यह दुश्मन के रडार के सामने नकली टारगेट पेश करने की तकनीक है। अगर इसे सफलतापूर्वक विकसित और प्रमाणित कर लिया जाता है, तो MIRV तकनीक के साथ इसका इस्तेमाल अग्नि-V के वॉरहेड को इंटरसेप्ट करने की चुनौती बढ़ा सकता है।

MIRV यानी Multiple Independently Targetable Re-entry Vehicle। इस टेक्नोलॉजी से एक बैलिस्टिक मिसाइल कई वॉरहेड ले जा सकती है।

डिकॉय क्या होता है, दुश्मन को कैसे देता है धोखा?

पूरे मामले को समझने के लिए पहले ये जानते हैं कि डिकॉय क्या होता है? हम सबने डिकॉय के बारे में सुना है। फाइटर जेट्स में डिकॉय सिस्टम होते हैं, नेवल शिप्स में होते हैं। और भी कई मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स में होते हैं।

हालांकि, सभी डिकॉय एक तरह से काम नहीं करते। कुछ रडार सिग्नल को रिफ्लेक्ट करते हैं, कुछ इलेक्ट्रॉनिक संकेत पैदा करते हैं, जबकि दूसरे सिस्टम गर्मी या आवाज जैसे संकेतों का इस्तेमाल करते हैं।

  • डिकॉय का मतलब होता है ऐसा नकली टारगेट या भ्रामक संकेत, जिसका इस्तेमाल दुश्मन को धोखा देने के लिए किया जाए।
  • यानी इनका मकसद दुश्मन के सेंसर या हथियार को असली प्लेटफॉर्म से भटकाना होता है।
  • ये सिस्टम दुश्मन के रडार या इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को ठीक एयरक्राफ्ट या नेवल शिप्स जैसे सिग्नल भेजता है।
  • इससे दुश्मन उसे ही असली टारगेट समझ कर हमला करता है और एक्चुअल फाइटर जेट या नेवल शिप हमले से बच जाता है।

उदाहरण के लिए, युद्धपोतों की सुरक्षा में इस्तेमाल होने वाला चैफ एक पैसिव काउंटरमेजर है। यह रडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी आधारित मिसाइल सीकर को भ्रमित करने के लिए इस्तेमाल होता है। DRDO ने भारतीय नौसेना के लिए ऐसी एडवांस चैफ तकनीक विकसित की है।

अब जानिए ‘इजेक्टेबल इलेक्ट्रॉनिक डिकॉय’ का क्या मतलब ?

इस नाम के दो हिस्से हैं। इजेक्टेबल का मतलब है ऐसा उपकरण जिसे मिसाइल से बाहर निकाला या अलग किया जा सके। इलेक्ट्रॉनिक डिकॉय उसके काम करने के तरीके को बताता है—यानी इलेक्ट्रॉनिक संकेतों के जरिए दुश्मन के सेंसर को धोखा देना।

  • अग्नि-V से जुड़ी रिपोर्ट में छोटे उपकरण का जिक्र है, जिसमें अपनी बैटरी, डिजिटल कंट्रोल बोर्ड, रेडियो फ्रीक्वेंसी यानी RF मॉड्यूल और एंटीना होंगे।
  •  मिसाइल से अलग होने के बाद यह सक्रिय होकर भ्रामक रडार संकेत पैदा करने का काम करेगा।
  • आसान भाषा में कहें तो असली वॉरहेड अपनी दिशा में आगे बढ़ेगा और डिकॉय दुश्मन के सामने उसकी पहचान की चुनौती बढ़ाने की कोशिश करेगा।

इसलिए नई तकनीक की अहमियत केवल मिसाइल से अलग होने में नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दुश्मन के सेंसर को धोखा देने की प्रस्तावित क्षमता में है।

मिसाइल की उड़ान में कब काम आएगा यह डिकॉय?

अग्नि-V एक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। लॉन्च के बाद इसकी उड़ान का एक बड़ा हिस्सा धरती के वायुमंडल के बाहर होता है। बाद में इसके री-एंट्री व्हीकल वायुमंडल में वापस प्रवेश करते हैं और अपने निर्धारित लक्ष्यों की ओर बढ़ते हैं यानी अपने वारहेड को रिलीज़ करते हैं।

अब यहां से डिकॉय सिस्टम का काम शुरू होता है। असल में इस डिकॉय को वॉरहेड के साथ ही रिलीज़ किया जाता है। मिसाइल से अलग होते ही डिकॉय की बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम एक्टिव होते हैं। इनमें लगे छोटे एंटीना खुले जाएंगे और ये दुश्मन के लॉन्ग रेंज रडार से निकलने वाले सिग्नल पकड़ना शुरू कर देंगे। इसके बाद शुरू होगा असली खेल।

डिकॉय दुश्मन के रडार सिग्नल को प्रोसेस करके Deceptive यानी भ्रामक इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल रिवर्ट करेंगे। इन सिग्नलों की वजह से दुश्मन के रडार वारहेड को लेकर कन्फ्यूज़ हो जाएगा। उसे टारगेट की दूरी और पहचान के बारे में गलत इन्फॉर्मेशन मिल सकती है। एक के बदले कई वारहेड्स नज़र आ सकते हैं।

यानी दुश्मन के रडार पर ऐसा दिखाई दे सकता है कि कई खतरनाक टारगेट उसकी तरफ बढ़ रहे हैं। ये दुश्मन के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के सामने बड़ी चुनौती होगी। उसे तय करना होगा कि इनमें असली वॉरहेड कौन-सा है और डिकॉय कौन-सा। अगर उसने नकली टारगेट पर इंटरसेप्टर मिसाइल दाग दी, तो उसका इंटरसेप्टर बेकार जा सकता है और अगर असली टारगेट की पहचान करने में ज्यादा समय लगा, तो वॉरहेड को रोकने का मौका हाथ से निकल सकता है।

दुश्मन के मिसाइल डिफेंस के सामने क्या चुनौती होगी?

बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम का काम सिर्फ आती हुई वस्तु को देख लेना नहीं है। उसे उसकी दिशा और गति का आकलन करना होता है, खतरे की पहचान करनी होती है और सही समय पर इंटरसेप्टर भेजना होता है।

अगर उसके सेंसर के सामने असली वॉरहेड के साथ नकली टारगेट भी हों, तो यह प्रक्रिया और कठिन हो सकती है। उसे तय करना होगा कि कौन-सी वस्तु वास्तविक खतरा है और कौन-सी उसे भटकाने के लिए छोड़ी गई है।

नकली टारगेट पर इंटरसेप्टर दागने से संसाधन खर्च हो सकते हैं। वहीं, असली वॉरहेड की पहचान में ज्यादा समय लगने से उसे रोकने का उपलब्ध समय घट सकता है।

MIRV के साथ डिकॉय का कॉम्बिनेशन क्यों अहम है?

इस तकनीक से एक बैलिस्टिक मिसाइल कई री-एंट्री व्हीकल ले जा सकती है, जिन्हें अलग-अलग लक्ष्यों की ओर भेजा जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो एक ही मिसाइल से कई लक्ष्यों पर हमले की क्षमता।

  • MIRV वारहेड वाली मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर पाना पहले से ही मुश्किल है। अब इन्हीं MIRV’s के साथ डिकॉय भी हो तो ज़रा सोचिये कि दुश्मन के रडार की हालत क्या होगी?
  • उसकी तरफ कई असली वारहेड्स बढ़ रहे होंगे। साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक डिकॉय उसके सिग्नल को भटका भी रहे होंगे, गलत सिग्नल भेज रहे होंगे, MIRV’s के अलावा और भी कई वारहेड्स दिखा रहे होंगे।

इस सिचुएशन में उसके मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए सही टारगेट चुनना और ज्यादा मुश्किल हो जाएगा।

भारत ने 11 मार्च 2024 को मिशन दिव्यास्त्र के तहत MIRV तकनीक के साथ अग्नि-V का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया था। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, कई री-एंट्री व्हीकल की निगरानी टेलीमेट्री और रडार स्टेशनों से की गई थी।

क्या अग्नि मिसाइलों में पहले भी डिकॉय इस्तेमाल हुए थे?

अग्नि मिसाइलों के संदर्भ में डिकॉय की चर्चा पहले भी हुई है। जून 2021 के अग्नि-प्राइम परीक्षण के बाद दो मैनूवरेबल डिकॉय इस्तेमाल किए जाने की खबरें सामने आई थीं।

फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स ने दिसंबर 2021 के अपने विश्लेषण में इन खबरों का उल्लेख किया था। हालांकि, उसने यह भी बताया था कि रक्षा मंत्रालय की तत्कालीन विज्ञप्ति में इन पेलोड का जिक्र नहीं था।

मार्च 2024 के मिशन दिव्यास्त्र की आधिकारिक घोषणा में MIRV परीक्षण की पुष्टि की गई थी। उसमें किसी डिकॉय की बनावट या उसके एक्टिव अथवा पैसिव होने का विवरण नहीं दिया गया था।

पुराने और नए डिकॉय में क्या फर्क है?

पैसिव डिकॉय और एक्टिव इलेक्ट्रॉनिक डिकॉय के बीच बुनियादी अंतर उनके संकेत पैदा करने के तरीके में है। पैसिव व्यवस्था रडार ऊर्जा को रिफ्लेक्ट करने जैसे तरीकों से नकली टारगेट पेश कर सकती है। एक्टिव इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था में संकेत प्रसारित करके सेंसर को भ्रमित करने की क्षमता होती है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है यह तकनीक?

लंबी दूरी की मिसाइल होना सामरिक क्षमता का एक हिस्सा है। उसके वॉरहेड का विरोधी के मिसाइल डिफेंस को पार कर पाना भी उतना ही अहम है। इसी जरूरत से MIRV और डिकॉय जैसी तकनीकों का महत्व बढ़ता है।

भारत के लिए इनका उद्देश्य अपनी न्यूक्लियर डिटरेंस क्षमता को विश्वसनीय बनाए रखना है। यानी विरोधी को यह भरोसा न हो कि वह मिसाइल डिफेंस के सहारे भारत की जवाबी कार्रवाई पूरी तरह रोक सकता है। हालांकि अग्नि-V के नए इलेक्ट्रॉनिक डिकॉय की वास्तविक क्षमता उसके परीक्षणों से स्पष्ट होगी।

अग्नि-V मिसाइल के प्रमुख स्पेसिफिकेशन

विशेषताविवरण
नामअग्नि-V (Agni-5)
विकासकर्तारक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO), भारत
प्रकारसतह से सतह पर मार करने वाली लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल
मारक दूरीलगभग 5,000 किमी; कुछ आधिकारिक विवरणों में 5,000 किमी से अधिक
लंबाईलगभग 17–17.5 मीटर
व्यासलगभग 2 मीटर
लॉन्च वजनलगभग 50 टन
प्रणोदनतीन चरणों वाला ठोस ईंधन सिस्टम
पेलोड क्षमतालगभग 1,000 किलोग्राम से अधिक; कॉन्फिगरेशन पर निर्भर
वॉरहेडपरमाणु वॉरहेड ले जाने में सक्षम
लॉन्च व्यवस्थाकैनिस्टर आधारित मोबाइल लॉन्चर
MIRV क्षमताएक मिसाइल से कई री-एंट्री व्हीकल को अलग-अलग लक्ष्यों की ओर भेजने की क्षमता प्रदर्शित
पहला उड़ान परीक्षण19 अप्रैल 2012
पहला MIRV उड़ान परीक्षण11 मार्च 2024, मिशन दिव्यास्त्र

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