सऊदी अरब की राजधानी रियाद का सबसे सुरक्षित माना जाने वाला किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट लगातार हमलों से दहल उठा है। यमन के हूती विद्रोहियों के इन मिसाइल और ड्रोन हमलों ने महंगे लड़ाकू विमानों, आधुनिक रडार और मिसाइल-रोधी प्रणालियों पर भारी इन्वेस्टमेंट करने वाले सऊदी अरब की हवाई सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पांच दिनों के भीतर किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कम से कम चार बार मिसाइल और ड्रोन हमले हुए हैं। जिसमें भारतीय, अमेरिकी और पाकिस्तानी सहित अनेक विदेशी नागिरक भी मारे गए और घायल हुए हैं।
इस खूनी सिलसिले में सबसे भीषण तबाही 10 अक्टूबर को हुई, जब हवाई अड्डे के पैसेंजर टर्मिनल पर गिरी बैलिस्टिक की वजह से एक भारतीय नागरिक सहित 13 बेगुनाह लोगों की मौत हो गई, जबकि 300 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इन हमलों ने न केवल सऊदी के हवाई संपर्क को पंगु बना दिया है, बल्कि खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों प्रवासियों की सुरक्षा पर भी बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
लगातार हमलों के बाद दुनिया भर की बड़ी एयरलाइंस ने रियाद के लिए अपनी सेवाएं तुरंत सस्पेंड कर दी हैं। भारत की एयर इंडिया, इंडिगो के साथ-साथ जर्मनी की लुफ्थांसा और श्रीलंका एयरलाइंस ने रियाद जाने वाली 300 से अधिक उड़ानें रद्द कीं। अमेरिकी और ब्रिटिश दूतावासों ने अपने नागरिकों के लिए ‘रेड अलर्ट’ किया।
आखिर दुनिया की सबसे आधुनिक सेनाओं में से एक और अरब जगत का सबसे अमीर देश ‘सऊदी अरब’ आखिर इन हूती विद्रोहियों के सामने इतना लाचार क्यों नजर आ रहा है? सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर बार-बार हमले कैसे हो रहे हैं। बड़ा सवाल यह भी है कि क्या यमन में हूतियों के खिलाफ तेज होती सैन्य कार्रवाई ने संघर्ष को नए दौर में पहुंचा दिया है? और क्या इसका असर सऊदी अरब की इकोनॉमी, तेल कारोबार तथा क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की महत्वाकांक्षी ‘विजन 2030’ योजना पर भी पड़ सकता है?
राजधानी रियाद में हूतियों का तांडव ?
हूतियों ने इस बार अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। वे अब छिटपुट हमलों के बजाय अत्यधिक सटीक और घातक ‘सैचुरेशन अटैक’ (एक साथ कई मिसाइलें और ड्रोन दागना) कर रहे हैं। पिछले पांच दिनों का घटनाक्रम कुछ इस प्रकार है-
| तारीख | हमले का विवरण | मृतक और घायल |
| 6–7 अक्टूबर | मिसाइल और ड्रोन से रियाद एयरपोर्ट पर हमला, आभा एयरपोर्ट पर भी हमले की बात सामने आई। | दोनों हमलों में तीन लोगों की मौत और 30 से अधिक घायल |
| 8 अक्टूबर, गुरुवार | रियाद एयरपोर्ट पर फिर हमला। सऊदिया एयरलाइंस का विमान खड़े होने के दौरान आग की चपेट में आया और बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ। | पायलट समेत तीन सऊदी नागरिकों की मौत |
| 10 अक्टूबर, शनिवार | किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बड़ा हमला। टर्मिनल क्षेत्र में भारी नुकसान हुआ और एयरपोर्ट का संचालन अस्थायी रूप से रोक दिया गया। | 13 की मौत, 309 घायल। मृतकों में एक भारतीय, एक अमेरिकी, दो बांग्लादेशी, चार सऊदी नागरिक और 5 अन्य। |
| 11 अक्टूबर, रविवार | एयरपोर्ट के टर्मिनल-4 पर एक और हमला हुआ, जिससे आग लगी। | 1 पाकिस्तानी की मौत, 11 घायल। |
रियाद हमले में मृत भारतीय कौन ?
रियाद एयरपोर्ट पर 10 अक्टूबर को हुए हमले में जान गंवाने वाले भारतीय नागरिक की पहचान मोहम्मद यूसुफ के रूप में हुई। हैदराबाद के रहने वाले 46 वर्षीय यूसुफ आईटी पेशेवर थे और परिवार के साथ उमरा यात्रा पर जा रहे थे। हमले में उनकी पत्नी और तीन बच्चे भी घायल हुए। भारतीय दूतावास ने 11 अक्टूबर को उनकी मौत की पुष्टि की और परिवार के प्रति संवेदना जताई। दूतावास ने पार्थिव शरीर को जल्द भारत लाने में सहायता का भरोसा दिया।
भारतीय दूतावास के मुताबिक, हमले में कुल 11 भारतीय नागरिक घायल हुए थे। 12 अक्टूबर को सामने आए अपडेट के अनुसार, तीन भारतीय गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में थे, लेकिन उनकी हालत स्थिर बताई गई। दो अन्य अस्पताल के सामान्य वार्ड में भर्ती थे, जबकि बाकी घायलों को छुट्टी दी जा चुकी थी।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि आम नागरिकों और बुनियादी ढांचों पर इस तरह के बार-बार किए जा रहे हमले पूरी तरह से Unacceptable हैं और इन्हें तुरंत रोका जाना चाहिए।
क्या हूतियों के सामने लाचार हो चुका है सऊदी अरब ?
यमन के हूती विद्रोहियों को लंबे समय तक मुख्य रूप से स्थानीय संघर्ष में सक्रिय एक सशस्त्र संगठन के रूप में देखा जाता था। लेकिन बीते वर्षों में उनकी मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं ने उन्हें क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बना दिया है। रियाद में हूती बार-बार हमले कर रहे हैं और सऊदी अरब लाचार सा दिख रहा है।
इससे पहले भी सऊदी में तेल संयंत्रों (Aramco Facilities) और हवाई अड्डों को निशाना बनाया जा चुका है। सऊदी अरब, जो अपनी जीडीपी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिकी और यूरोपीय हथियारों (पर खर्च करता है, वह यमन के एक विद्रोही गुट को रोकने में नाकाम क्यों साबित हो रहा है? इसके पीछे कई गहरे सैन्य और रणनीतिक कारण हैं।
- सस्ते ड्रोन बनाम महंगे इंटरसेप्टर: हूती विद्रोही ईरान द्वारा सप्लाई किए गए बेहद सस्ते ‘कामिकेज़’ (आत्मघाती) ड्रोन और उन्नत क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहे हैं। जब ये ड्रोन भारी संख्या में एक साथ दागे जाते हैं, तो सऊदी अरब का पैट्रियट सिस्टम ‘सैचुरेशन पॉइंट’ पर आ जाता है। पैट्रियट की एक मिसाइल की कीमत लाखों डॉलर होती है, जबकि हूतियों का ड्रोन महज कुछ हजार डॉलर का होता है।
- ईरान का बैक-एंड सपोर्ट और तकनीक हस्तांतरण: हूतियों की ताकत का असली स्रोत तेहरान (Iran) है। ईरान ने हूतियों को न केवल मिसाइलें और ड्रोन सप्लाई किए हैं, बल्कि यमन के भीतर ही इन्हें असेंबल करने की तकनीक भी दे दी है। हूतियों की ‘कुद्स’ (Quds) क्रूज मिसाइलें और ‘समद’ (Samad) ड्रोन लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम हैं। जब तक ईरान से हूतियों को लॉजिस्टिक्स और खुफिया इनपुट मिलते रहेंगे, तब तक सऊदी अरब के लिए इस खतरे को जड़ से खत्म करना नामुमकिन है।
- एयर डिफेंस सिस्टम की अपनी सीमाएं: सऊदी अरब का झुकाव मुख्य रूप से अमेरिकी पैट्रियट (Patriot Defense System) और ‘थाड’ (THAAD) प्रणालियों पर रहा है। ये प्रणालियां ऊंची उड़ान भरने वाली और तेज गति की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए बेहतरीन हैं। लेकिन, जब हूती विद्रोही बहुत कम ऊंचाई पर उड़ने वाले क्रूज मिसाइलों और ड्रोनों का इस्तेमाल करते हैं, तो सऊदी के रडार इन्हें समय रहते पकड़ नहीं पाते।
- सटीक मारक क्षमता: हूतियों के पास अब ऐसे गाइडेड बैलिस्टिक मिसाइल आ चुके हैं, जो 900 किलोमीटर दूर रियाद के हवाई अड्डे के विशिष्ट टर्मिनलों को सटीकता से निशाना बना सकते हैं। सऊदी का रडार नेटवर्क इन कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोनों और क्रूज मिसाइलों को समय पर इंटरसेप्ट करने में नाकाम साबित हो रहा है।
- इकोनॉमी पर चोट: हूतियों ने न केवल हवाई अड्डों को निशाना बनाया है, बल्कि उन्होंने सऊदी की तेल कंपनी सऊदी अरामको (Saudi Aramco) के ठिकानों और ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को भी नुकसान पहुंचाया है। इससे सऊदी अरब का तेल एक्सपोर्ट और पूरी इकोनॉमी खतरे का सामना कर रही है।
- यमन युद्ध का दलदल : सऊदी अरब ने 2015 में हूतियों को खत्म करने के लिए यमन में सैन्य हस्तक्षेप किया था। लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद भी सऊदी के नेतृत्व वाला गठबंधन यमन के पहाड़ी इलाकों में हूतियों को हरा नहीं सका। अब स्थिति यह है कि सऊदी अरब खुद इस युद्ध से बाहर निकलना चाहता है।
- विजन 2030′ को पंगु बनाने की चाल: सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) सऊदी अरब को कच्चे तेल पर निर्भरता से निकालकर एक ग्लोबल टूरिज्म और बिजनेस हब बनाना चाहते हैं, जिसे ‘विजन 2030’ कहा गया है। इसी अक्टूबर के महीने में रियाद में बड़े वैश्विक सम्मेलन (जैसे WPC एनर्जी कांग्रेस और फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव) होने वाले थे। हूतियों ने ठीक इसी समय इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स को निशाना बनाकर पूरी दुनिया के सामने यह संदेश दे दिया है कि सऊदी अरब अब सुरक्षित नहीं है। जब तक हवाई अड्डे बंद रहेंगे, कोई भी विदेशी निवेशक या पर्यटक सऊदी नहीं आएगा, जिससे सऊदी की अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का चपत लग रहा है।
सऊदी अरब की सैन्य ताकत कितनी?
सऊदी अरब मिडिल-ईस्ट की सबसे बड़ी सैन्य शक्तियों में से एक है। उसके पास आधुनिक फाइटर जेट, लंबी दूरी तक मार करने वाली एयर डिफेंस मिसाइलें, भारी टैंक और अत्याधुनिक रडार सिस्टम हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के मुताबिक, सऊदी अरब ने 2024 में रक्षा पर करीब 80.3 अरब डॉलर खर्च किए थे। वहीं, सऊदी सरकार के 2026 के बजट में सैन्य क्षेत्र के लिए 240 अरब सऊदी रियाल आवंटित किए गए हैं, जो लगभग 64 अरब डॉलर के बराबर हैं।
सऊदी अरब की सैन्य ताकत का बड़ा आधार विदेशों से खरीदे गए हथियार हैं। वह मुख्य रूप से अमेरिका से लड़ाकू विमान, टैंक और एयर डिफेंस सिस्टम खरीदता है। ब्रिटेन से यूरोफाइटर टाइफून जैसे लड़ाकू विमान मिले हैं, जबकि फ्रांस और दूसरे यूरोपीय देशों से भी सैन्य उपकरण और तकनीक हासिल की जाती है।
| हथियार/सिस्टम | देश | मुख्य काम |
|---|---|---|
| F-15SA लड़ाकू विमान | अमेरिका | दुश्मन के विमानों से मुकाबला, हवाई श्रेष्ठता और जमीन पर मौजूद सैन्य ठिकानों पर हमला |
| Eurofighter Typhoon | ब्रिटेन और यूरोपीय साझेदार | तेज गति से हवाई गश्त, दुश्मन के विमानों को रोकना और बहुउद्देशीय लड़ाकू अभियान |
| Patriot एयर डिफेंस सिस्टम | अमेरिका | बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और कुछ प्रकार के विमानों को रोकने के लिए |
| THAAD एयर डिफेंस सिस्टम | अमेरिका | खास तौर पर ऊंचाई पर उड़ान के दौरान बैलिस्टिक मिसाइलों को इंटरसेप्ट करना |
| AN/TPY-2 रडार | अमेरिका | THAAD से जुड़ा उन्नत रडार, जो आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने में मदद करता है |
| M1A2 Abrams टैंक | अमेरिका | जमीनी युद्ध में दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों और ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई |
| AH-64 Apache हेलीकॉप्टर | अमेरिका | टैंक रोधी हमले, जमीनी सैनिकों को हवाई सहायता और युद्धक्षेत्र में लक्ष्य पर हमला |
| फ्रिगेट और अन्य युद्धपोत | अमेरिका/यूरोपीय देश | समुद्री मार्गों, तटीय क्षेत्रों और महत्वपूर्ण समुद्री प्रतिष्ठानों की सुरक्षा |
भारत के लिए क्यों अहम है यह संकट?
सऊदी अरब में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रहते और काम करते हैं। भारत के सामने तीन प्रमुख चिंताएं हैं:
- भारतीय नागरिकों की सुरक्षा: सऊदी अरब में रहने वाले और यात्रा करने वाले भारतीयों को सुरक्षित रखना प्राथमिकता है।
- ऊर्जा और आर्थिक संबंध: सऊदी अरब भारत का महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार है। लंबे संघर्ष से व्यापार और तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
- समुद्री मार्गों की सुरक्षा: लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी तथा माल ढुलाई की लागत पर असर पड़ सकता है।
नागरिक एयरपोर्ट पर हमले आम यात्रियों और विदेशी कामगारों को सीधे खतरे में डालते हैं। यही कारण है कि रियाद की घटनाओं पर भारत की नजर केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय और आर्थिक दृष्टि से भी है।
सऊदी अरब के सामने सबसे बड़ी परीक्षा ?
सऊदी अरब को पूरी तरह लाचार कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह स्पष्ट है कि आधुनिक हथियारों के बावजूद हूतियों के हमलों को रोकना आसान नहीं है। यमन में सैन्य संघर्ष का फिर तेज होना सऊदी अरब को सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय रणनीति—तीनों मोर्चों पर चुनौती दे रहा है।
अब असली परीक्षा यह होगी कि सऊदी अरब अपनी हवाई सुरक्षा कितनी मजबूत करता है, हूतियों की हमलावर क्षमता को रोकने के लिए क्या रणनीति अपनाता है और इस संघर्ष को अपने नागरिकों तथा क्षेत्रीय व्यापार के लिए और बड़े संकट में बदलने से कैसे रोकता है।
नागरिक ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करना, हूतियों की हमलावर क्षमता को सीमित करना और संघर्ष को क्षेत्रीय युद्ध में बदलने से रोकना। इसका परिणाम न केवल सऊदी अरब की सुरक्षा, बल्कि भारत के नागरिकों, ऊर्जा हितों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।








