कावेरी 2.0: स्वदेशी फाइटर जेट इंजन के सपने को क्यों मिल रहा दूसरा मौका ?

By Defence Detective

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कई दशकों से कावेरी इंजन, भारत की एयरोस्पेस महत्वाकांक्षाओं और उसकी सबसे बड़ी तकनीकी नाकामियों में से एक, दोनों का प्रतीक रहा है। लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) तेजस को पावर देने के लिए बनाए गए इस स्वदेशी फाइटर जेट इंजन ने आखिरकार भारतीय वायु सेना की ज़रूरतों को पूरा नहीं किया, जिसके कारण तेजस प्रोग्राम को अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के इंजन पर निर्भर होना पड़ा।

अब कई सालों की देरी, नए डिज़ाइन और टेक्नोलॉजी में सुधार के बाद, कावेरी फिर से चर्चा में है। सरकार और डिफेंस साइंटिस्ट एक बेहतर “कावेरी 2.0” पर काम कर रहे हैं, ताकि भविष्य के कॉम्बैट एयरक्राफ्ट को पावर दी जा सके, जिसमें भारत के महत्वाकांक्षी पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के बाद के वर्शन भी शामिल हैं। हालांकि अभी भी कई बड़ी चुनौतियां हैं, लेकिन जानकारों का मानना ​​है कि दो दशक पहले की तुलना में आज इस प्रोग्राम की नींव ज़्यादा मज़बूत है।

ग्लोबल सप्लाई चेन में लगातार आ रही दिक्कतों के कारण विदेशी इंजनों की आपूर्ति में देरी और घरेलू लड़ाकू विमान निर्माण में रुकावटों को देखते हुए DRDO की GTRE (गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट) ने कावेरी 2.0 को अब बड़े और भारी स्टील्थ फाइटर जेट इंजन कार्यक्रमों से अलग दिशा में विकसित करने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य इसे एक स्वतंत्र और व्यावहारिक इंजन परियोजना के रूप में आगे बढ़ाना है।

कब हुई थी कावेरी इंजन प्रोजेक्ट की शुरुआत ?

कावेरी इंजन प्रोजेक्ट 1986 में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन (DRDO) की एक लैब, गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) ने शुरू किया था। इसका मकसद था देश के पहले स्वदेशी फाइटर एयरक्राफ्ट को पावर देने में सक्षम एक स्वदेशी टर्बोफैन इंजन बनाना। उस समय, बहुत कम देशों के पास आधुनिक फाइटर जेट इंजन डिज़ाइन और बनाने की विशेषज्ञता थी। भारत को उम्मीद थी कि कावेरी विदेशी सप्लायर पर निर्भरता खत्म कर देगी और देश में ही एयरो-इंजन इकोसिस्टम तैयार करेगी।

हालांकि, फ़ाइटर जेट का इंजन बनाना उम्मीद से कहीं ज़्यादा मुश्किल साबित हुआ। कमर्शियल एयरक्राफ़्ट इंजन के उलट, फ़ाइटर जेट इंजन को बहुत ज़्यादा थ्रस्ट (धक्का देने की शक्ति) देनी होती है, साथ ही उन्हें छोटा और हल्का भी होना चाहिए और वे बहुत ज़्यादा तापमान और लड़ाई के हालात में भी काम करने में सक्षम होने चाहिए।

तेजस को क्यों नहीं चला सका  कावेरी इंजन ?

सालों तक भारत और विदेशों में कावेरी इंजन की कई बार और बड़े पैमाने पर टेस्टिंग की गई। इसने कई तकनीकी क्षमताएं तो दिखाईं, लेकिन तेजस फाइटर जेट के लिए ज़रूरी थ्रस्ट (धक्का देने की ताकत) हमेशा कम ही रही। यह इंजन योजना से ज़्यादा भारी था और आफ्टरबर्नर के साथ लगातार सुपरसोनिक परफॉर्मेंस के लिए ज़रूरी थ्रस्ट पैदा नहीं कर सका। ज़रूरी भरोसेमंदता और टिकाऊपन हासिल करना भी मुश्किल साबित हुआ। परिणाम क्या हुआ ?

  • भारत ने 2008 में कावेरी इंजन को तेजस प्रोग्राम से आधिकारिक तौर पर अलग कर दिया।
  • इससे इस एयरक्राफ्ट के लिए GE F404 इंजन और बाद में भविष्य के वर्ज़न के लिए ज़्यादा ताकतवर F414 इंजन के इस्तेमाल का रास्ता बना।
  • बहुत से लोगों ने इसे कावेरी प्रोजेक्ट का अंत माना। लेकिन, दशकों की रिसर्च को छोड़ने के बजाय, यह इंजन की अहम तकनीकों को विकसित करते रहने का एक मौका बन गया।

कावेरी 2.0 किस तरह है अलग ?

अब नई उम्मीद की वजह यह है कि कावेरी 2.0 सिर्फ़ पुराने इंजन को फिर से शुरू करने जैसा नहीं है। इसमें दशकों की टेस्टिंग से मिली सीख, मटीरियल में हुई तरक्की, बेहतर टरबाइन टेक्नोलॉजी,  मॉडर्न डिजिटल इंजन कंट्रोल और मैन्युफैक्चरिंग की ऐसी तकनीकें शामिल होने की उम्मीद है जो प्रोग्राम शुरू होने के समय उपलब्ध नहीं थीं।

भारत अपने देश में इंजन बनाने के लक्ष्य को बनाए रखते हुए, खास टेक्नोलॉजी के लिए दूसरे देशों के साथ मिलकर काम करने की संभावनाओं पर भी विचार कर रहा है। ऐसी साझेदारियां हाई-टेम्परेचर मटीरियल, टरबाइन ब्लेड टेक्नोलॉजी और इंजन की परफॉर्मेंस से जुड़ी अहम कमियों को दूर करने में मदद कर सकती हैं।

  • प्रस्तावित कावेरी 2.0, ओरिजिनल इंजन का एक बड़ा अपग्रेड है। इसमें सबसे अहम सुधार ज़्यादा थ्रस्ट (जोर) मिलने की उम्मीद है।
  • ओरिजिनल कावेरी इंजन आफ्टरबर्नर के साथ लगभग 70-72 किलोन्यूटन (kN) का थ्रस्ट देता था,  जो तेजस के लिए ज़रूरी 83-85 kN से काफी कम था
  • वहीं अपग्रेडेड वर्शन कावेरी 2.0 का लक्ष्य 55kN से 60kN का “ड्राई” थ्रस्ट और आफ्टरबर्नर के साथ 90kN से 100kN का अधिकतम “वेट” थ्रस्ट हासिल करना है।
  • यह परफॉर्मेंस का वह स्तर है जो अमेरिका में बने जनरल इलेक्ट्रिक F404 इंजन के बराबर है, जो अभी तेजस Mk1A में इस्तेमाल हो रहे हैं।
  • इंजन का वज़न भी घटाकर लगभग 1,180 किलोग्राम कर दिया है, जिससे इसका थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो बेहतर हुआ है।
  • अन्य संभावित सुधारों में ज़्यादा कुशल हाई-प्रेशर कंप्रेसर, बेहतर टरबाइन टेक्नोलॉजी, इंजन की परफॉर्मेंस को बेहतर बनाने के लिए आधुनिक ‘फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल’ (FADEC) सॉफ्टवेयर, और मज़बूती व टिकाऊपन बढ़ाने के लिए मेटलर्जी और हाई-टेम्परेचर मटीरियल में सुधार शामिल हैं।

कावेरी 2.0 सफल होता है तो?

कावेरी के सफ़र में कई रुकावटें आईं, लेकिन इसने दुनिया के सबसे मुश्किल इंजीनियरिंग क्षेत्रों में से एक में महारत हासिल करने में भी मदद की है। अगर कावेरी 2.0 सफल होता है, तो यह न सिर्फ़ लंबे समय से अटके हुए प्रोजेक्ट के फिर से शुरू होने का संकेत होगा, बल्कि कॉम्बैट एविएशन (लड़ाकू विमानन) के सबसे मुश्किल डिपेंडेंसी यानी फाइटर जेट इंजन की निर्भरता को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। जो एडवांस्ड फाइटर जेट इंजन को शुरू से डिज़ाइन और बनाने में सक्षम चुनिंदा देशों में शामिल होने की भारत की कोशिश में एक अहम मील का पत्थर भी साबित होगा।

  • मूल कावेरी इंजन सिर्फ़ तेजस के लिए बनाया गया था, लेकिन कावेरी 2.0 को भविष्य के लिए तैयार स्वदेशी इंजन के तौर पर विकसित किया जा रहा है।
  • यह इंजन आगे चलकर भारत के ‘एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट’ (AMCA) के नए वर्शन और एडवांस्ड बिना पायलट वाले कॉम्बैट एरियल व्हीकल (UCAV) को भी पावर दे सकता है।
  • कावेरी का महत्व सिर्फ़ एक एयरक्राफ्ट तक ही सीमित नहीं है। एक स्वदेशी फाइटर इंजन से विदेशी सप्लायर्स पर भारत की निर्भरता कम होगी, रणनीतिक आज़ादी मज़बूत होगी और भविष्य के मिलिट्री प्रोग्राम एक्सपोर्ट कंट्रोल या जियोपॉलिटिकल रुकावटों से सुरक्षित रहेंगे।
  • इससे डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता की भारत की बड़ी कोशिश को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे भविष्य के फाइटर एयरक्राफ्ट, कॉम्बैट ड्रोन और एडवांस्ड एयरोस्पेस प्रोग्राम घरेलू टेक्नोलॉजी पर ज़्यादा निर्भर हो सकेंगे।

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