भारत ने अपनी मारक क्षमता को और अधिक मजबूत करने करने की दिशा में स्वदेशी क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल का फ्लाइट टेस्ट किया है। 03 नवंबर को ओडिशा के तट के पास हुए परीक्षण की शुरुआती रिपोर्टों में इसे DRDO द्वारा विकसित ‘प्रलय’ (Pralay) मिसाइल बताया गया है। यानी यह ‘प्रलय’ का एक और उड़ान परीक्षण है।
यह मिसाइल विभिन्न सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने और अलग-अलग प्रकार के वारहेड ले जाने में सक्षम है। रिपोर्टों के मुताबिक, परीक्षण से पहले 595 किलोमीटर क्षेत्र के लिए NOTAM जारी किया गया था और टेस्ट रेंज के दो किलोमीटर के दायरे में मौजूद लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक, परीक्षण से मिले डेटा का विस्तृत मूल्यांकन जारी है। यह परीक्षण भारत की पारंपरिक स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करने के लिहाज से अहम है। यह दुश्मन के हाई-वैल्यू एसेट्स यानी कमांड सेंटर, सैन्य ठिकानों और रसद केंद्रों जैसे टारगेट को निशाना बनाने के लिए डेवलप है।
ओडिशा तट पर परीक्षण में क्या हुआ?
यह टेस्ट भारत की स्वदेशी मिसाइल क्षमता के लिहाज से काफी अहम है। हालांकि, इस उड़ान में मिसाइल ने वास्तव में कितनी दूरी तय की, किस वारहेड कॉन्फिगरेशन का इस्तेमाल हुआ और कौन-से विशेष मानक जांचे गए, इसका विस्तृत ब्योरा अभी सामने नहीं आया है।
- प्रलय पहले भी कई परीक्षणों से गुजर चुकी है, जिनमें अलग-अलग रेंज और एक ही लॉन्चर से तेजी से दो मिसाइलें दागने की क्षमता जांची गई थी।
- इस श्रेणी की मिसाइल के फ्लाइट टेस्ट में सिर्फ उसका उड़ना नहीं देखा जाता। लॉन्च के बाद, अधिकतम रेंज, निर्धारित रास्ते पर बढ़ने, गाइडेंस सिस्टम के काम करने और टारगेट तक पहुंचने जैसे कई पहलुओं का डेटा जुटाया जाता है।
क्या है प्रलय मिसाइल की क्षमता ?
प्रलय, DRDO द्वारा डेवलप जमीन से जमीन पर मार करने वाली स्वदेशी क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल है। इसे पारंपरिक वारहेड के साथ सटीक सैन्य हमलों के लिए विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य युद्ध के दौरान जमीन पर मौजूद महत्वपूर्ण टारगेट को निशाना बनाने की क्षमता देना है।
‘प्रलय’ ठोस ईंधन (Solid Propellant) वाली रॉकेट मोटर से संचालित होती है। इसमें लॉन्च से पहले ईंधन भरने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे लॉन्च की तैयारी का समय कम लगता है और जरूरत पड़ने पर तेजी से फायर करना संभव होता है।
- मारक दूरी: लगभग 150 से 500 किलोमीटर दूर मौजूद टारगेट पर हमला कर सकती है।
- जमीन से जमीन पर हमला: दुश्मन के कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, एयरबेस, रनवे और विमान हैंगर, रडार और सैन्य संचार केंद्र, गोला-बारूद और ईंधन डिप जैसे जमीनी टारगेट पर हमले के लिए डेवलप।
- वारहेड/पेलोड क्षमता: लगभग 500–1,000 किलोग्राम (रिपोर्टेड)।
- सटीक निशाना: आधुनिक गाइडेंस और नेविगेशन सिस्टम से निर्धारित टारगेट पर सटीक हमले की क्षमता।
- अलग-अलग वारहेड: टारगेट की जरूरत के मुताबिक विभिन्न प्रकार के पारंपरिक वारहेड ले जा सकती है।
- सॉलिड फ्यूल: ठोस ईंधन वाली रॉकेट मोटर से संचालित होती है।
- तेजी से लगातार लॉन्च: एक ही लॉन्चर से कम अंतराल में दो प्रलय मिसाइलें दागने की क्षमता का परीक्षण हो चुका है।
क्वासी-बैलिस्टिक का मतलब क्या है ?
‘क्वासी-बैलिस्टिक’ शब्द प्रलय की उड़ान के तरीके को बताता है। सामान्य बैलिस्टिक मिसाइल ऊंचाई पर जाकर एक घुमावदार रास्ते से टारगेट की तरफ बढ़ती है।
- क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाले रास्ते पर उड़ सकती है और उड़ान के दौरान अपनी दिशा में बदलाव कर सकती है।
- इसकी इसी क्षमता के कारण इसे इंटरसेप्ट करना चुनौतीपूर्ण होता है।
- दरअसल दुश्मन के लिए उसके आगे के रास्ते का अनुमान लगाना और इंटरसेप्शन की तैयारी करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
- इसकी खासियत उड़ान पथ, गाइडेंस और सटीक हमले की क्षमता का मेल है।
हालांकि, इसे रडार की पकड़ से पूरी तरह बाहर या किसी भी एयर डिफेंस से बच निकलने वाला हथियार कहना सही नहीं होगा।
पहले कब-कब हुए प्रलय के परीक्षण?
प्रलय के फ्लाइट टेस्ट की शुरुआत दिसंबर 2021 में हुई थी। शुरुआती परीक्षणों में इसके गाइडेंस, नियंत्रण और टारगेट पर सटीक पहुंचने की क्षमता परखी गई। इसके बाद यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स में अलग-अलग रेंज और एक ही लॉन्चर से तेजी से दो मिसाइलें दागने की क्षमता जांची गई।
| तारीख | परीक्षण का प्रमुख विवरण |
|---|---|
| 22 दिसंबर 2021 | पहला फ्लाइट टेस्ट; निर्धारित उड़ान पथ और टारगेट पर सटीक पहुंचने की क्षमता जांची गई। |
| 23 दिसंबर 2021 | लगातार दूसरे दिन परीक्षण; अलग रेंज और अधिक भारी पेलोड के साथ प्रदर्शन परखा गया। |
| 28–29 जुलाई 2025 | यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स के तहत दो परीक्षण; न्यूनतम और अधिकतम रेंज की क्षमता जांची गई। |
| 31 दिसंबर 2025 | एक ही लॉन्चर से कम अंतराल में दो मिसाइलें दागी गईं; सैल्वो लॉन्च की क्षमता और सिस्टम की विश्वसनीयता परखी गई। |
प्रलय किसने बनाई, भारत के लिए क्यों अहम?
प्रलय मिसाइल को हैदराबाद में DRDO की रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) ने अन्य प्रयोगशालाओं के साथ मिलकर डेवलप किया है। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) इसके डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर हैं। दिसंबर 2025 के परीक्षण में सेना और वायुसेना के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
रक्षा मंत्रालय ने 31 दिसंबर 2025 के परीक्षण के बाद इसे सेना में शामिल किए जाने की तैयारी के करीब बताया था। जनवरी 2026 के आधिकारिक अपडेट में भी इसका उल्लेख यूजर ट्रायल वाले सिस्टमों में था।
- प्रलय भारत को जमीन पर दुश्मन के अहम सैन्य ठिकानों पर सटीक पारंपरिक हमला करने का विकल्प देती है।
- युद्ध की स्थिति में ऐसी मिसाइल कुछ मिशनों में लड़ाकू विमान भेजे बिना हमला करने में मदद कर सकती है।
- इससे दुश्मन के एयर डिफेंस के सामने पायलट और विमान को जोखिम में डाले बिना उसकी सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचाने का विकल्प बढ़ता है।
चीन-पाकिस्तान की किन क्षमताओं का जवाब है प्रलय ?
चीन और पाकिस्तान के पास जमीन से सैन्य ठिकानों पर हमला करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें और गाइडेड रॉकेट सिस्टम हैं। भूमिका और पहुंच के लिहाज से इसकी तुलना चीन की DF-11/DF-15 श्रेणी और पाकिस्तान के फतह-II से की जा सकती है। यह दुश्मन की मिसाइलों को हवा में रोकने वाला हथियार नहीं, बल्कि उसके सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमला करने की क्षमता है।
| देश / हथियार | सार्वजनिक रेंज | प्रमुख क्षमता | प्रलय से तुलना |
|---|---|---|---|
| भारत — प्रलय | 150–500 किमी | मोबाइल लॉन्चर से दागी जाने वाली जमीन से जमीन पर मारक मिसाइल; पारंपरिक हमले की भूमिका | भारत को इस दूरी पर सटीक जमीनी हमले का विकल्प |
| चीन — DF-11 | लगभग 300–600 किमी, संस्करण के अनुसार | कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल से जमीनी ठिकानों पर हमला | प्रलय की रेंज से काफी हद तक मेल; वास्तविक प्रदर्शन संस्करण पर निर्भर |
| चीन — DF-15 | लगभग 600–900 किमी, संस्करण के अनुसार | सैन्य ठिकानों, रनवे और मजबूत बंकरों पर हमले के लिए पारंपरिक वारहेड विकल्प | समान प्रकार की हमलावर भूमिका, लेकिन इसकी सार्वजनिक अधिकतम रेंज प्रलय से अधिक |
| पाकिस्तान — फतह-II | 400 किमी | गाइडेड रॉकेट सिस्टम; दूर स्थित लक्ष्यों पर सटीक हमला | भूमिका और दूरी के लिहाज से उपयोगी तुलना; दोनों अलग श्रेणी के हथियार |








