भारतीय नौसेना (Indian Navy) हिंद महासागर में अपनी अभेद्य बादशाहत कायम करने के लिए अपनी समुद्री ताकत और ऑपरेशनल क्षमता-पहुंच बढ़ाने में पूरी शिद्दत से जुटी है। नौसेना बड़े पैमाने पर बेड़े के विस्तार और मॉडर्नाइजेशन पर काम कर रही है। नई दिल्ली में 19 अक्टूबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल अजय कोचर ने बताया कि 78 अतिरिक्त नौसैनिक प्लेटफॉर्म और 120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट की खरीद को शुरुआती सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है। इन प्रस्तावित खरीदों की अनुमानित संयुक्त कीमत ₹2.41 लाख करोड़ है। परियोजनाएं खरीद प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में हैं।
इसके इतर, 42 नौसैनिक प्लेटफॉर्म पहले से ऑर्डर पर हैं। नौसेना ने सैनिकों, सैन्य वाहनों और उपकरणों को समुद्र के रास्ते अभियान वाले इलाके तक पहुंचाने और वहां तट पर उतारने की क्षमता बढ़ाने के लिए चार लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक (LPD) खरीदने का टेंडर जारी कर दिया है। इसकी अनुमानित लागत करीब ₹50,000 करोड़ बताई जा रही है।
नई पीढ़ी के फ्रिगेट के लिए भी प्रस्ताव मांगे गए हैं। इन प्रोजेक्ट से नौसेना की एम्फीबियस अभियान क्षमता और बेड़े की ताकत बढ़ाने की दिशा में प्रगति हुई है।
₹2.41 लाख करोड़ की मंजूरी का मतलब क्या है?
इन प्रस्तावों को Acceptance of Necessity यानी AoN मिला है। इसका मतलब है कि संबंधित सैन्य उपकरण या क्षमता की जरूरत को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है। यह खरीद प्रक्रिया की शुरुआती मंजूरी है। इसके बाद संबंधित प्रोजेक्ट के मुताबिक प्रस्ताव मंगाने, तकनीकी मूल्यांकन, कीमत और शर्तों पर बातचीत तथा डील की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
इसलिए ₹2.41 लाख करोड़ को अभी हस्ताक्षरित रक्षा सौदों की राशि समझना गलत होगा। यह प्रस्तावित खरीदों का अनुमानित मूल्य है। पहले से ऑर्डर पर मौजूद 42 प्लेटफॉर्म का आंकड़ा इससे अलग बताया गया है।
कितना बड़ा होगा नौसेना का विस्तार ?
वाइस एडमिरल अजय कोचर के मुताबिक, भारतीय नौसेना कई क्षेत्रों में एक साथ अभियान चलाने वाली ‘मल्टी-डोमेन और नेटवर्कड फोर्स’ बनने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। वर्तमान में भारतीय नौसेना के लिए 42 नौसैनिक प्लेटफॉर्म के ऑर्डर दिए जा चुके हैं। लेकिन बड़ा गेमचेंजर 78 अतिरिक्त नौसैनिक प्लेटफॉर्म और 120 इंटरसेप्टर बोट्स की खरीद को मिली शुरुआती मंजूरी है।
अंतिम डील अभी बाकी हैं, लेकिन यह मंजूरी नौसेना के विस्तार की बड़ी तैयारी का संकेत देती है। नई पीढ़ी के फ्रिगेट और चार LPD के लिए टेंडर जारी होना भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति है। इन योजनाओं पर अमल होने से भारत समुद्र में अधिक जहाज तैनात कर सकेगा और अलग-अलग इलाकों में एक साथ अभियान चलाने की उसकी क्षमता मजबूत हो सकती है।
- रणनीतिक नजरिए से इससे हिंद महासागर में चीनी नौसैनिक गतिविधियों पर निगरानी रखने और जरूरत पड़ने पर प्रतिक्रिया देने में भारत की स्थिति बेहतर हो सकती है।
- भरतीय नौसेना के पास अभी करीब 150 जहाजों और पनडुब्बियों का बेड़ा है। अगर ये डील परवान चढ़ती हैं तो नौसेना के पास 200 जहाजों का बेड़ा का सपना हकीकत बन सकता है।
चार LPD क्यों हैं इस योजना का बड़ा आकर्षण?
भारतीय नौसेना फिलहाल एक लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक, INS जलाश्व, का संचालन करती है। इसे अमेरिका से खरीदा गया था, जहां इसका नाम USS Trenton था। इसे जून 2007 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। ऐसे में चार और LPD से भारत की एम्फीबियस ऑपरेशन क्षमता में जोरदार बढ़ोत्तरी होगी।
- लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक (LPD) एक बड़े एम्फीबियस युद्धपोत होते हैं। इनका काम सैनिकों, सैन्य वाहनों, हथियारों और रसद को समुद्र के रास्ते अभियान वाले इलाके तक पहुंचाना और वहां जमीन पर उतारना है।
- इसके लिए ये छोटी लैंडिंग नौकाओं का इस्तेमाल करते हैं। इसकी खासियत है कि सैनिकों और वाहनों को उतारने के लिए बंदरगाह होना जरूरी नहीं है।
- इन जहाजों पर हेलीकॉप्टर भी तैनात किए जा सकते हैं।
इसे ऐसे समझिए कि अगर किसी द्वीप (आइलैंड) पर सेना भेजनी है, लेकिन वहां जहाज लगाने लायक बंदरगाह नहीं है। LPD सैनिकों, वाहनों और सामान को लेकर उस द्वीप के पास पहुंचेगा। बड़ा जहाज समुद्र में रहेगा। उसके अंदर रखी छोटी लैंडिंग नौकाएं सैनिकों और वाहनों को जहाज से निकालकर द्वीप के किनारे तक पहुंचाएंगी। हेलीकॉप्टर भी सैनिकों को जमीन पर पहुंचा सकते हैं।
अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे रणनीतिक द्वीप समूहों की सुरक्षा और सुदूर क्षेत्रों में मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) ऑपरेशन्स के लिए ये एलपीडी भारतीय नौसेना की रीढ़ साबित होंगे। LPD में ये चीजें होती हैं-
- वेल डेक (Well Deck): जहाज के पिछले हिस्से में एक विशेष डॉक होता है, जिसमें नियंत्रित तरीके से पानी भरा जा सकता है। पिछला गेट खुलने पर अंदर मौजूद लैंडिंग नौकाएं तैरकर बाहर निकलती हैं। ये सैनिकों और सैन्य वाहनों को जहाज से किनारे तक पहुंचाती हैं।
- फ्लाइट डेक (Flight Deck): जहाज के ऊपरी हिस्से में हेलीकॉप्टरों के उड़ान भरने और उतरने के लिए फ्लाइट डेक होता है। हेलीकॉप्टर सैनिकों, जरूरी सामान और घायलों को लाने-ले जाने में मदद करते हैं। हेलीकॉप्टरों की संख्या, आकार और ड्रोन संचालन की सुविधा संबंधित जहाज के डिजाइन तथा उपकरणों पर निर्भर करती है।
- मल्टी-मिशन क्षमता: सैन्य अभियानों के अलावा इन जहाजों का उपयोग मानवीय सहायता, आपदा राहत और लोगों को सुरक्षित निकालने में भी किया जा सकता है। उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं के अनुसार ये घायलों के इलाज में मदद कर सकते हैं।
120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट (FIC): तटीय सीमाओं पर बनेगी ‘अभेद्य दीवार’
तटीय सुरक्षा को चाक-चौबंद करने और मुंबई 26/11 जैसे समुद्री खतरों को टालने के लिए 120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट की खरीद को मंजूरी दी गई है। ये नावें अत्यंत तीव्र गति से चलने वाली और आधुनिक हथियारों से लैस होती हैं।
इनका मुख्य काम उथले पानी में गश्त करना, समुद्री डकैती (Anti-Piracy Operations) को रोकना, और किसी भी संदिग्ध घुसपैठ को तुरंत न्यूट्रलाइज करना होता है। 120 नावों की यह विशाल फ्लीट भारत की लंबी तटीय सीमा पर एक सुरक्षा घेरा तैयार करेगी।
AI, ड्रोन और सुरक्षित संचार पर भी नजर
वाइस एडमिरल कोचर ने नौसेना को कई क्षेत्रों में एक साथ अभियान चलाने वाली, आपस में जुड़ी ताकत बनाने पर जोर दिया। समुद्र की सतह, पानी के नीचे और हवा के साथ साइबर तथा अंतरिक्ष से जुड़ी क्षमताएं भी इस सोच का हिस्सा हैं।
नौसेना की प्राथमिकताओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, निगरानी तकनीक, ड्रोन, काउंटर-ड्रोन प्रणालियां और सुरक्षित संचार के लिए क्वांटम तकनीक शामिल हैं। हालिया संघर्षों से मिले अनुभवों के आधार पर सस्ते ड्रोन के खिलाफ अपेक्षाकृत कम लागत वाले डायरेक्टेड एनर्जी हथियारों के विकल्प भी देखे जा रहे हैं।

भारतीय नौसेना हवा, समुद्र, पानी के नीचे, साइबर और अंतरिक्ष सहित सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमताएं विकसित कर रही है। हम असममित युद्ध और नई तकनीकों पर भी ध्यान दे रहे हैं। इसके लिए हमने ‘मैरीटाइम कैपेबिलिटी पर्सपेक्टिव प्लान’ तैयार किया है, जिसमें नौसैनिक प्लेटफॉर्म और परिचालन क्षमता, दोनों पर जोर दिया गया है। हमारी प्राथमिकताओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कॉग्निटिव और दुश्मन को भ्रमित करने वाली डिसेप्शन प्रणालियां भी शामिल हैं। इसके अलावा, उन्नत प्रोपल्शन, खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोही की तकनीकें, ड्रोन तथा ड्रोन-रोधी प्रणालियों पर भी ध्यान दिया जा रहा है। क्वांटम तकनीक में हमारा विशेष जोर सुरक्षित एन्क्रिप्टेड संचार पर है।
Vice Admiral Ajay Kochhar, Vice Chief of the Naval Staff
भारत के लिए अगली असली कसौटी क्या होगी?
इन योजनाओं से भारत की समुद्री मौजूदगी, तटीय प्रतिक्रिया और सैनिकों को समुद्र के रास्ते पहुंचाने की क्षमता मजबूत हो सकती है। लेकिन मंजूरी को वास्तविक ताकत में बदलने के लिए डील, निर्माण, परीक्षण और प्रशिक्षण समय पर पूरे करने होंगे। चार LPD और नई पीढ़ी के फ्रिगेट के टेंडर खरीद प्रक्रिया में ठोस प्रगति दिखाती हैं।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि निर्माता कब चुने जाते हैं, अंतिम डील किन शर्तों पर होती है और नौसेना को नए प्लेटफॉर्म कब मिलते हैं। भारत की समुद्री ताकत का अगला विस्तार इन परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन से तय होगा।








