पाकिस्तानी आर्मी का इमरान से पॉलिटकल रिवेंज ? खैबर पख्तूनख्वा में ‘आवाम का शासन’ दफन, पेशावर में टकराव, इस्लामाबाद अलर्ट

By Defence Detective

Updated On:

Date:

Protesters gather on a highway amid burning fires during protests in Pakistan

पाकिस्तान में सेना और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के बीच तनाव, असहमति और खींचतान एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गई है। जेल में बंद इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के शासन वाले खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इमरजेंसी और गवर्नर शासन लगा दिया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और संघीय कैबिनेट की सिफारिश पर आसिफ अली जरदारी ने यह कदम उठाया और (PTI)  की अगुआई वाली प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया गया है।

संघीय कैबिनेट की आपात बैठक के बाद राष्ट्रपति जरदारी ने संविधान के अनुच्छेद 232(1) और 234(1) के तहत इमरजेंसी की अधिसूचना पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही मुख्यमंत्री सोहेल आफरीदी, प्रांतीय मंत्रियों और सलाहकारों को तुरंत पद छोड़ने का आदेश जारी कर दिया गया। प्रांतीय विधानसभा के अधिकार संसद को सौंप दिए गए।

दूसरी ओर, PTI इसे डेमोक्रेटिक सिस्टम पर हमला और इमरान खान की रिहाई के लिए होने वाले आंदोलन को रोकने की कोशिश बता रही है। 11 अक्टूबर 2026 को लिए गए इस फैसले के बाद पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल आ गया है। इस फैसले का फिलहाल सबसे बड़ा राजनीतिक असर यह है कि इमरान खान की पार्टी का वह प्रमुख प्रांतीय सत्ता केंद्र कमजोर पड़ गया, जहां से वह संघीय सरकार के खिलाफ अपनी राजनीतिक ताकत दिखा सकती थी।

इसमें अहम सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ है या इसके पीछे इमरान खान की राजनीतिक ताकत को खत्म करने की सेना की कोशिश भी काम कर रही है?

इमरजेंसी क्यों लगाई गई: आतंकवाद का बहाना या राजनैतिक प्रतिशोध?

सैन्य प्रतिष्ठान (Military Establishment) और शहबाज शरीफ सरकार ने इस आपातकाल को जायज ठहराने के लिए प्रांत की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और बढ़ते आतंकवादी हमलों का हवाला दिया है। पाकिस्तान की संघीय सरकार का आरोप है कि प्रांतीय प्रशासन आतंकवाद के खिलाफ अभियान में पर्याप्त सहयोग नहीं कर रहा था। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू सैन्य जनरल आसिम मुनीर की सत्ता की भूख और राजनैतिक प्रतिशोध की कहानी बयां करता है।

  • दरअसल, पीटीआई सरकार के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में इमरान खान की रिहाई की मांग को लेकर एक विशाल ‘लॉन्ग मार्च’ निकाला जा रहा था।
  • हजारों की संख्या में लोग इस्लामाबाद की ओर बढ़ रहे थे, जिससे घबराई सेना और केंद्र सरकार ने बातचीत के दो दौर नाकाम होने के बाद लोकतंत्र का गला घोंटने का रास्ता चुना।
  • सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, इस तख्तापलट के पीछे एक और गहरा आर्थिक कारण छिपा है। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के पास बेशकीमती खनिज और खदान संसाधन (Mines and Minerals) मौजूद हैं। पाकिस्तानी सेना इन प्राकृतिक संसाधनों पर सीधा नियंत्रण चाहती थी, जिसका पीटीआई की प्रांतीय सरकार लगातार पुरजोर विरोध कर रही थी।
  • अब गवर्नर शासन लागू होते ही अब इन प्राकृतिक संपदाओं पर फैसले लेने का पूरा वास्तविक अधिकार रावलपिंडी (सैन्य मुख्यालय) के हाथों में चला जाएगा।

इमरजेंसी थोपे जाने के बाद देश में क्या हालात ?

आवाम द्वारा चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंके जाने के इस फैसले के बाद खबर जैसे-जैसे फैलती गई। पूरे देश में प्रदर्शन, हिसंक प्रदर्शन, आगजनी, सुरक्षा बलों से भिड़ंत, पथराव-टकराव होने लगे। खबर फैलते ही खैबर पख्तूनख्वा के स्वाबी, खैबर और बारा बाजार सहित कई प्रमुख शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए। आक्रोशित प्रदर्शनकारियों ने कई जगहों पर आगजनी की और गवर्नर हाउस को निशाना बनाने की कोशिश की।

  • भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने आंसू गैस के गोले छोड़े और हवाई फायरिंग की। जवाब में प्रदर्शनकारियों ने भी पथराव किया।
  • इमरान खान की तीन बहनों को भी गिरफ्तार किए जाने की खबरें सामने आईं। इन कार्रवाइयों ने राजनीतिक संघर्ष को और तीखा कर दिया है।
  • अपदस्थ मुख्यमंत्री सोहेल आफरीदी और पीटीआई के प्रांतीय अध्यक्ष जुनैद अकबर को हिरासत में ले लिया गया।
  • पूर्व मुख्यमंत्री अली अमीन गंडापुर को डेरा इस्माइल खान में नजरबंद (House Arrest) कर दिया गया।
  • AFP की रिपोर्टों पर आधारित खबरों में पुलिस के हवाले से खैबर पख्तूनख्वा में PTI के 278 सदस्यों को हिरासत में लिए जाने की सूचना दी गई।
  • प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पेशावर और इस्लामाबाद की ओर जाने वाले प्रमुख राजमार्गों को भारी शिपिंग कंटेनर और कंक्रीट के ब्लॉक लगाकर पूरी तरह सील कर दिया गया।
  • संवेदनशील इलाकों में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह निलंबित कर दी गईं।

आपातकाल के बाद सेना की एंट्री ?

गृह मंत्रालय ने स्थिति को हाथ से निकलता देख संविधान की धारा 245 के तहत चारों प्रांतों, इस्लामाबाद और POJK में सेना की तैनाती को मंजूरी दे दी है। पाकिस्तान की संघीय सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा में सेना के जवानों और सैन्य संसाधनों की तैनाती को नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए अधिकृत किया। यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 245 के तहत जारी किया गया।

पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य लोगों की जान-माल की सुरक्षा, सरकारी प्रतिष्ठानों की रक्षा और कानून-व्यवस्था बहाल करना है। सेना की तैनाती की अवधि आपातकाल की घोषणा से जुड़ी है।

पाकिस्तान में डेमोक्रेसी क्या है ?

पाकिस्तानी सेना ने हमेशा से एक ‘हाइब्रिड व्यवस्था’ (खिलाड़ी पर्दे के पीछे, मुखौटा आगे) चलाने की कोशिश की है। जब भी कोई नागरिक नेता या प्रांतीय सरकार (जैसे इमरान खान की पीटीआई) उनकी तय सीमा से बाहर जाने की कोशिश करती है या सेना के एकाधिकार को चुनौती देती है, तो सैन्य प्रतिष्ठान आपातकाल, गवर्नर शासन या अदालती फैसलों के जरिए उसे सत्ता से बेदखल कर देता है।

  • पाकिस्तान में निर्वाचित सरकारों को कठपुतली और सैन्य प्रतिष्ठान को देश की सत्ता का वास्तविक केंद्र माना जाता है।
  • इमरान खान की राजनीतिक यात्रा भी इस जटिल संबंध से अलग नहीं रही। प्रधानमंत्री रहते हुए उनके सेना के शीर्ष नेतृत्व के साथ संबंधों में तनाव बढ़ा।
  • सत्ता से हटने के बाद उनके और उनके समर्थकों के बीच सेना तथा संघीय सरकार को लेकर टकराव लगातार बना रहा।
  • 2024 के आम चुनाव के बाद PTI समर्थित उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में सीटें जीतीं, लेकिन पार्टी केंद्र में सरकार नहीं बना सकी।
  • खैबर पख्तूनख्वा उसका प्रमुख प्रांतीय सत्ता केंद्र बना रहा। अब उसी प्रांत की सरकार को निलंबित करना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

नई दिल्ली के लिए क्या हैं मायने ?

भारत के लिए खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ता संकट केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति का मामला नहीं है। यह प्रांत अफगानिस्तान से सटा हुआ है और यहां आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों का असर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

पहला जोखिम सीमा पार आतंकवाद का है। यदि पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां घरेलू राजनीतिक संघर्ष में उलझती हैं और आतंकवाद विरोधी अभियानों का समन्वय कमजोर होता है, तो इसका क्षेत्रीय सुरक्षा पर खराब असर पड़ सकता है।

दूसरा पहलू पाकिस्तानी सेना की प्राथमिकताओं का है। यदि सेना और संघीय सरकार का ध्यान घरेलू राजनीतिक नियंत्रण पर अधिक केंद्रित रहता है, तो पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। लेकिन भारत को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि पाकिस्तान की राजनीतिक कमजोरी अपने आप भारत के लिए रणनीतिक लाभ बन जाएगी।

तीसरा पहलू अफगानिस्तान से जुड़ा है। खैबर पख्तूनख्वा में अस्थिरता और सीमा पार आतंकवादी गतिविधियां पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों को और तनावपूर्ण बना सकती हैं। इसका असर दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए सबसे जरूरी है कि वह सीमा सुरक्षा, खुफिया निगरानी और आतंकवाद विरोधी तैयारियों को मजबूत रखे और वास्तविक सुरक्षा घटनाक्रम पर नजर बनाए रखे।

Leave a Comment

Related News